अपने रिश्ते को बनाएं पॉल्यूशन फ्री!(Effective Tips to Make Your Relationship Pollution Free)

आप कहेंगे, पॉल्यूशन तो वातावरण में होता है, भला रिश्तों में पॉल्यूशन का क्या काम… लेकिन पॉल्यूशन स़िर्फ हवा, पानी या आवाज़ का ही नहीं होता… वह भावनाओं का, विचारों का और सोच का भी होता है. जी हां, जितने भी नकारात्मक विचार व भावनाएं हैं, वो हमारे रिश्तों को प्रदूषित ही तो करते हैं. कैसे बचें इस प्रदूषण से और कैसे बचाएं अपने रिश्ते को इससे, यह जानना भी ज़रूरी है. 

पॉज़िटिव सोचें

यह इंसानी फ़ितरत है कि ज़रा-सी भी कोई चूक या वजह मिलने पर हम फ़ौरन नकारात्मक सोचने लगते हैं. अगर किसी से कोई ग़लती हो गई है या कोई हमारी अपेक्षाओं के अनुसार काम नहीं कर रहा, तो हम तुरंत उसके लिए ग़लत राय कायम कर लेते हैं, जिससे उसके ख़िलाफ़ हमारे मन में और विचारों में नकारात्मकता बढ़ती जाती है. यही नकारात्मकता हमारी भावनाओं को प्रदूषित करने लगती है, जिससे हमें बचना चाहिए.

क्या करें?

– बचने का सबसे बेहतर तरीक़ा है कि अपनी सोच सकारात्मक रखें.

– किसी के बारे में मात्र चंद अनुभवों व घटनाओं को आधार बनाकर एक निश्‍चित राय कायम न कर लें.

– अपनी अपेक्षाओं का दायरा भी बहुत अधिक विस्तृत न कर लें.

– अगर आपके रिश्ते में नकारात्मक सोच का प्रदूषण घर करने लगा है, तो उसे फ़ौरन साफ़ कर लें और आगे बढ़ें, वरना भविष्य में यह रिश्ते को भी प्रदूषित कर देगा.

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ग़ुस्से को नियंत्रित करें

ग़ुस्सा करना या क्रोध आना इंसानी कमज़ोरी है और यह स्वाभाविक भी है. हम सभी को ग़ुस्सा आता है, लेकिन अपने ग़ुस्से को कब, कहां और कैसे ज़ाहिर करना है और कैसे नियंत्रित करना है यह हमें सीखना होगा.

क्या करें?

– ग़ुस्से में अक्सर हम अपने क़रीबी को भी ऐसे अपशब्द कह जाते हैं, जो लंबे समय तक दर्द देते हैं. इसलिए जब भी ग़ुस्सा आए, तो बहस करने से बेहतर है चुप रहकर वहां से हट जाएं.

– मन ही मन यह तय कर लें कि चाहे कितने भी ग़ुस्से में हों आप, लेकिन दिल को चोट करनेवाले शब्द कभी भी अपने पार्टनर को नहीं कहेंगे.

– जब भी आपको लगने लगे कि ग़ुस्सा आप पर हावी होने जा रहा है, तो अपना ध्यान कहीं और लगाएं. ग़ुस्से में आपा खोकर अपने रिश्ते में कड़वाहट का प्रदूषण घोलने से बेहतर है कि आप विवाद को ज़्यादा तूल न दें और अपना ध्यान कहीं और लगाएं.

– ग़ुस्सा आने पर आप ध्यान या योग करें, पानी पीएं या फिर गाने सुनें. इससे क्षणिक आवेग शांत हो जाएगा और आप अपने रिश्ते को इस प्रदूषण से बचा पाएंगे.

शक-संदेह

किसी भी रिश्ते के लिए शक-संदेह का प्रदूषण बेहद ख़तरनाक होता है. यह एक बार मन को प्रदूषित कर दे, तो रिश्ते की डोर कमज़ोर पड़ती जाती है. बेहतर है कि समय रहते इसकी सफ़ाई कर दी जाए या इसे आने ही न दिया जाए.

क्या करें?

– सबसे अच्छा तरीक़ा है बात करें. अक्सर कम्यूनिकेशन गैप की वजह से ही इस तरह की चीज़ें मन में आ जाती हैं.

– अपनी कल्पना से ही स्थिति की वास्तविकता का अंदाज़ा न लगाएं. बेहतर होगा कि किसी भी तरह की ग़लतफ़हमी मन में पालने से पहले उसके बारे में पार्टनर से बात करें.

– बिना बात किए यदि आप यह तय कर लेंगे कि जो कुछ भी आप सोच व समझ रहे हैं, वो ही सही है, तो यह आपके मन में शक के प्रदूषण को और भी गहरा करेगा.

– अपने पार्टनर को भी सफ़ाई देने का व अपनी बात रखने का मौक़ा ज़रूर दें.

 

ईगो

रिश्ते में प्यार-समर्पण और अपनापन बनाए रखने के लिए ईगो जैसी भावना को त्यागना बेहद ज़रूरी है. यूं भी जब हम किसी को प्यार करते हैं, तो अहं की कोई जगह नहीं रह जाती बीच में. लेकिन अक्सर हमारा अहं हमारे लिए इतना बड़ा व महत्वपूर्ण हो जाता है कि अच्छे-ख़ासे रिश्ते को भी प्रदूषित कर देता है.

क्या करें?

– चिंतन करें. यदि आप स्वाभाविक रूप से ईगोइस्ट हैं, तो चिंतन और ज़रूरी हो जाता है कि आपके लिए महत्वपूर्ण क्या है? आपका रिश्ता या आपका ईगो?

– ख़ुद को सबसे बड़ा समझना हमारी सबसे बड़ी ग़लती होती है. जब हम एक से दो होते हैं, तो हमसे बड़ा हमारा रिश्ता हो जाता है.

– अपने रिश्ते के महत्व को पहचानें. अगर रिश्ता टूटेगा, तो आप अपने अकेलेपन में अपने ईगो को संवारकर क्या करेंगे?

– यह अपने विवेक व परिपक्वता पर ही निर्भर करता है कि हम अपने ईगो को किस तरह से कंट्रोल करके अपने रिश्ते को बचाते हैं, तो बेहतर होगा कि ईगो के प्रदूषण से अपने रिश्ते को बचाएं

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ईर्ष्या व द्वेष

ये ऐसी भावनाएं हैं, जो हमारे मन व विचारों को पूरी तरह से प्रदूषित कर देती हैं. ये हमें पूरी तरह से नकारात्मकता की ओर ले जाती हैं और उसके बाद हमारे सोचने-समझने की क्षमता को बुरी तरह से प्रभावित कर देती हैं.

क्या करें?

– ख़ुद से सवाल करें. जी हां, आप ख़ुद से पूछें कि ये ईर्ष्या आप किससे कर रहे हैं और क्यों? अपनों से ही ईर्ष्या? उन अपनों से, जो आपसे इतना प्यार करते हैं, आपकी परवाह करते हैं.

– अक्सर अपने अहंकार के चलते हम अपने पार्टनर के गुण, उसकी तारीफ़ और उसकी कामयाबी बर्दाश्त नहीं कर पाते. हम उसे अपना प्रतियोगी समझने लगते हैं, जिससे ईर्ष्या की भावना और बढ़ जाती है, जो रिश्तों और भावनाओं को इस कदर प्रदूषित करती है कि सब कुछ ख़त्म होने के बाद ही होश आता है.

– बेहतर होगा कि आप अपना नज़रिया बदलें. आपका पार्टनर आपका प्रतियोगी नहीं, सहयोगी है.

– उसकी कामयाबी का अर्थ है आपकी कामयाबी. उसकी ख़ुशी का मतलब है आपकी व आपके परिवार की ख़ुशी.

– आपका रिश्ता तभी संपूर्ण होगा, जब आप अपने पार्टनर को भी अपनी ज़िंदगी में पूरी तरह से शामिल करके उसे अपना ही एक हिस्सा मानें.

– उसके आगे बढ़ने में उसकी मदद करें, उसे सहयोग दें और उसकी ख़ुशियों को भी सेलिब्रेट करें.

– यदि ये तमाम बातें आप अपने जीवन में शामिल कर लेंगे और अपने नज़रिए को थोड़ा-सा बदलकर अपने रिश्तों को देखेंगे, तो आपका रिश्ता व जीवन पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त हो जाएगा.

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– विजयलक्ष्मी 

Pratibha Tiwari :
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