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जानें हिंदू मैरिज एक्ट… समय के साथ क्या-क्या बदला? (Hindu Marriage Act: Recent Changes You Must Know)

साल 1955 में हमारे देश के जो हालात थे, आज स्थिति उससे बिल्कुल अलग है. आज लड़कियां भी उच्च शिक्षा…

साल 1955 में हमारे देश के जो हालात थे, आज स्थिति उससे बिल्कुल अलग है. आज लड़कियां भी उच्च शिक्षा प्राप्त करके सफलता के नित नए आयाम छू रही हैं, ऐसे में हमारा क़ानून भला बदलाव से अछूता कैसे रह सकता है. जब-जब महिलाओं ने अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाई, तब-तब क़ानून में महत्वपूर्ण बदलाव हुए. पिछले 63 सालों में कितना बदला हमारा हिंदू विवाह क़ानून? आइए जानते हैं.

कितना जानते हैं आप हिंदू मैरिज एक्ट के बारे में?

हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 में बनाया गया था. इस क़ानून के तहत सभी हिंदुओं, सिख, जैन और बौद्धों के शादी, तलाक़ और मेंटेनेंस के मामले सुलझाए जाते हैं.

–     सबसे पहले तो शादी के समय लड़की की उम्र 18 और लड़के की 21 साल होनी चाहिए. कुछ समय पहले जनहित याचिका के तहत एक वकील ने लड़के की उम्र भी 18 साल करने की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने सिरे से ख़ारिज कर दिया.

–     हिंदू मैरिज एक्ट के तहत कोई शादीशुदा व्यक्ति पहली पत्नी के जीवित रहते, उससे तलाक़ लिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता. अगर ऐसा होता है, तो उसे सात साल की जेल और जुर्माना दोनों हो सकता है. कुछ लोगों ने इसका तोड़ निकालने के लिए धर्म बदलकर शादी करनी शुरू की, जिसके ख़िलाफ़ 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने ़फैसला सुनाया कि यह क़ानूनन जुर्म है, जिसके लिए उस व्यक्ति को सज़ा हो सकती है.

–     गोवा के फैमिली लॉ के कोड ऑफ यूसेजेस एंड कस्टम्स में गैर-ईसाई हिंदू व्यक्ति को एक से ज़्यादा शादियां करने की छूट है, बशर्ते 25 साल की उम्र तक उसकी पत्नी मां न बनी हो और 30 साल की उम्र तक उन्हें कोई बेटा न हो.

–     इसके तहत शादी के लिए किसी ख़ास रस्म का ज़िक्र नहीं किया गया है. लड़के या लड़की किसी के भी रीति-रिवाज़ों के आधार पर शादी की जा सकती है.

–     शादी के बाद पति-पत्नी दोनों को ही वैवाहिक अधिकार (सेक्सुअल रिलेशन के अधिकार) मिलते हैं. क़ानूनन शादी तभी संपन्न मानी जाती है, जब उनके बीच शारीरिक संबंध बनते हैं. अगर कोई पार्टनर दूसरे को इस अधिकार से महरूम रखता है, तो दूसरा पार्टनर कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकता है. कोर्ट ऐसी शादी को अमान्य या निरस्त कर सकता है.

–     इसके तहत शादी का रजिस्ट्रेशन ज़रूरी है, ताकि शादी के बाद होनेवाली लीगल डॉक्यूमेंटेशन में कोई अड़चन न आए, लेकिन आज भी बहुत से लोग मैरिज सर्टिफिकेट नहीं बनवाते, जिसके कारण कुछ लोग उसका ग़लत फ़ायदा भी उठाते हैं.

–     हिंदू मैरिज एक्ट में शादी को पवित्र बंधन माना गया है, लेकिन अगर दोनों की शादी में समस्या आ रही है, तो वो तलाक़ ले सकते हैं. तलाक़ के आधार- व्यभिचार, धर्मांतरण, मानसिक विकार, कुष्ठ रोग, नपुंसकता, सांसारिक कर्त्तव्यों को त्याग देना, सात सालों से लापता, जुडीशियल सेपरेशन (कोर्ट द्वारा अलग रहने की इजाज़त), किसी भी तरह के शारीरिक संबंध नहीं बनाना और निष्ठुरता या क्रूरता हैं. पिछले कुछ सालों में मानसिक क्रूरता (मेंटल क्रुएल्टी) के आधार पर तलाक़ के मामलों में बढ़ोतरी हुई है.

–   क़ानून ने महिलाओं को परमानेंट एलीमनी और मेंटेनेंस का अधिकार दिया है, लेकिन वो ऐसी महिलाएं हैं, जो ख़ुद अपना भरण-पोषण नहीं कर सकतीं. कामकाजी महिलाओं को मेंटेनेंस का अधिकार नहीं था, लेकिन 2011 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम् ़फैसला दिया कि पति से अलग रहनेवाली कामकाजी महिलाएं भी मेंटेनेंस की हक़दार होंगी.

–     बच्चों की कस्टडी को लेकर भी नियम बनाए गए हैं. तलाक़ के बाद अगर बच्चा छोटा है, तो मां को ही उसकी कस्टडी मिलती है. बड़े बच्चों के लिए कोर्ट मामले को दोनों की आर्थिक स्थिति व परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ़फैसला करता है.

किन स्थितियों में शादी हो सकती है अमान्य?

हिंदू मैरिज एक्ट में ऐसा भी प्रावधान है कि कुछ स्थितियों में आप अपनी शादी को कोर्ट से अमान्य घोषित करा सकते हैं. ऐसे में आप तलाक़शुदा नहीं कहे जाएंगे, बल्कि ऐसा माना जाएगा कि आपकी शादी हुई ही नहीं थी.

–   अगर शादी के व़क्त लड़की किसी और पुरुष से प्रेग्नेंट हो, तो ऐसी सूरत में शादी अमान्य हो सकती है. कुछ साल पहले ऐसा एक मामला सुर्ख़ियों में आया था. उस केस में लड़की शादी के व़क्त प्रेग्नेंट थी. शादी के बाद जब उसके पति को इसका शक हुआ, तो उन्होंने सोनोग्राफी करवाई, तो पता चला कि लड़की प्रेग्नेंट है. उसके पति ने तुरंत फैमिली कोर्ट में शादी को अमान्य करने की याचिका दाख़िल की. इस मामले में आपको यह ध्यान रखना होगा कि शादी के एक साल के भीतर मामला दाख़िल करना होगा.

–     अगर नपुंसकता के कारण पति-पत्नी का रिश्ता नहीं बन पाया, तो शादी क़ानूनन पूरी नहीं मानी जाएगी और ऐसे में व्यक्ति को हक़ है कि वो शादी को अमान्य करा सके. ऐसे में आपको तलाक़ लेने की ज़रूरत नहीं, बल्कि शादी को अमान्य करा सकते हैं.

–    अगर शादी के बाद आपको पता चले कि शादी के व़क्त ही आपके पार्टनर की मानसिक स्थिति सही नहीं थी और यह बात आपसे छुपाई गई, तो आप ऐसी स्थिति में अपनी शादी को अमान्य करा सकते हैं.

यह भी पढ़ें: 10 क़ानूनी मिथ्याएं और उनकी हक़ीक़त (10 Common Myths About Indian Laws Busted!)

विवाह विधेयक क़ानून, 2010

हिंदू मैरिज एक्ट और स्पेशल मैरिज एक्ट में कुछ बदलाव करने के उद्देश्य से साल 2010 में यह विधेयक लाया गया था. इस विधेयक में महिलाओं के ह़क़ में कई बदलाव किए गए हैं. 2013 में यह विधेयक राज्यसभा में पारित हुआ, पर लोकसभा में पारित न हो सका. इसमें प्रस्तावित कुछ बदलावों के बारे में आइए आपको बताते हैं.

–    इसमें पत्नी को यह अधिकार दिया गया है कि वो इस आधार पर अपने पति से तलाक़ ले सकती है कि अब उनकी शादी इस मुक़ाम पर पहुंच गई है कि उसे बरक़रार रखना नामुमकिन है, इसलिए वो तलाक़ चाहती है.

–     अगर पति ‘शादी पूरी तरह से टूट गई है और बरक़रार नहीं रह सकती,’ इस आधार पर तलाक़ लेना चाहता है, तो पत्नी इसका विरोध कर सकती है, पर पति के पास यह अधिकार नहीं है.

–     पत्नी को पति की चल-अचल संपत्ति में समान अधिकार मिलेगा. साथ ही उसे पति की रिहायशी संपत्ति यानी घर आदि में हिस्सा मिलेगा.

–     पति-पत्नी द्वारा गोद लिए बच्चों को सगे बच्चों के समान प्रॉपर्टी में अधिकार मिलेगा.

–     आपसी सहमति से तलाक़ के लिए याचिका दायर करने के बाद कोई पक्ष क़ानूनी कार्यवाही से पीछे नहीं हट सकता.

छह महीने का इंतज़ार ख़त्म

इस बीच सितंबर, 2017 में हिंदू मैरिज एक्ट में एक और अहम् बदलाव आया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से तलाक़ लेने के लिए लोगों को 6 महीने का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा. कोर्ट के मुताबिक़ अगर दोनों के बीच समझौते की कोई गुंजाइश नहीं बची है और बच्चों की कस्टडी का ़फैसला भी हो गया है, तो उन्हें छह महीने के कूलिंग ऑफ पीरियड को पूरा करने की मजबूरी नहीं है. इससे दोबारा वो जल्दी अपना घर बसा सकते हैं.

यह भी पढ़ें: हर महिला को पता होना चाहिए रिप्रोडक्टिव राइट्स (मातृत्व अधिकार)(Every Woman Must Know These Reproductive Rights)

  
 स्पेशल मैरिज एक्ट से जुड़ी 10 ज़रूरी बातें

यह क़ानून ख़ासतौर से अंतर्जातीय विवाह कर रहे लोगों की रक्षा के लिए बनाया गया है. इसके तहत अपनी शादी रजिस्टर कराने के लिए आपको कोई धार्मिक रीति-रिवाज़ निभाने नहीं पड़ते.

  1. इस एक्ट के तहत अंतर्जातीय और अलग-अलग धर्म के लोग विवाह कर सकते हैं.
  2. इसके तहत हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन या बौद्ध धर्म के लोग विवाह कर सकते हैं.
  3. शादी के लिए आपको 30 दिन पहले नोटिस देना पड़ता है. दूल्हा या दुल्हन दोनों में से कोई एक अपने इलाके के रजिस्ट्रार ऑफिस में नोटिस जमा कर सकता है.
  4. इसके तहत स़िर्फ भारतीय ही नहीं, बल्कि विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीय भी विवाह रजिस्टर करा सकते हैं.
  5. हिंदू मैरिज एक्ट की तरह इसमें भी कुछ नियम व शर्तें हैं, जैसे-

–     लड़के की उम्र कम से कम 21 साल और लड़की 18 साल होनी चाहिए.

–     दोनों कुंआरे हों या फिर शादीशुदा न हों यानी कोई पति-पत्नी न हों.

–     शादी के व़क्त मानसिक स्थिति अच्छी होनी चाहिए.

–     दोनों ही पक्ष प्रोहिबिटेड रिलेशनशिप की कैटेगरी में न आते हों. प्रोहिबिटेड रिलेशनशिप यानी भाई-बहन न हों, न ही सौतेले भाई-बहन हों. आपको बता दें कि सपिंडवाले भी इसके तहत शादी नहीं कर सकते. सपिंड यानी मां की तरफ़ से तीन पीढ़ी और पिता की तरफ़ से पांच पीढ़ी तक में शादी निषिद्ध मानी जाती है.

  1. 30 दिनों के लिए शादी का नोटिस रजिस्ट्रार ऑफिस के नोटिस बोर्ड पर लगाया जाता है. अगर किसी को इस शादी से आपत्ति हो, तो वो अपनी आपत्ति ज़ाहिर कर सकता है.
  2. अगर कोई आपत्ति आती है, तो रजिस्ट्रार को उसे 30 दिनों के भीतर सुलझाना होता है, लेकिन अगर कोई आपत्ति नहीं आती, तो नियत तारीख़ को तीन गवाहों की उपस्थिति में शादी संपन्न कराई जाती है.
  3. हर किसी के लिए यह जानना ज़रूरी है कि इसके तहत शादी करनेवालों के प्रॉपर्टी सक्सेशन के मामले इंडियन सक्सेशन एक्ट के तहत सुलझाए जाते हैं.
  1. यहां यह जानना भी बेहद ज़रूरी है कि आप शादी के एक साल के भीतर तलाक़ के लिए अप्लाई नहीं कर सकते. लेकिन अगर आप साबित कर सकें कि शादी बहुत बुरे हालात से गुज़र रही है, तो कोर्ट आवेदन पर अमल कर सकता है.
  2. इस एक्ट में दोबारा शादी का प्रावधान भी शामिल किया गया है, लेकिन शर्त यही है कि पहली शादी टूट चुकी हो और मामले में दोबारा अपील की गुंजाइश न बची हो.

– अनीता सिंह

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Aneeta Singh

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