हम क्यों पहनते हैं इतने मुखौटे? (Masking Personality: Do We All Wear Mask?)

हम सब उम्रभर न जानें कितने मुखौटे पहनते हैं. कभी अपनी इच्छा से, कभी किसी को ख़ुश करने के लिए, तो कभी मजबूरी में, लेकिन इतने सारे मुखौटे पहनते-पहनते कई बार हम अपना असली चेहरा ही भूल जाते हैं. क्या ऐसा करना सही है?

क्या ज़रूरी है मुखौटे पहनना?
किसी का दिल न दुखाना, दूसरों की ख़ुशी की परवाह करना, अच्छा माहौल न बिगड़े इस बात का ख़्याल रखना अच्छी बात है. इसके लिए ज़रूरत पड़े तो मुखौटे पहनने में भी कोई बुराई नहीं है, लेकिन सबको ख़ुश रखने के चक्कर में हर समय चेहरे पर कोई न कोई मुखौटा ओढ़े रहना ठीक नहीं है. इससे आप अपने आप को ही भूल जाएंगे, जो आपके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक साबित हो सकता है. दिनभर में कुछ समय ऐसा भी होना चाहिए, जब आपके चेहरे पर कोई मुखौटा न हो, आपके मन पर कोई दबाव या बोझ न हो. उस व़क्त आप ख़ुद से बातें करें. सही-ग़लत का आकलन करें. ख़ुद से साक्षात्कार ही हमें सही मायने में जीना सिखाता है. उस व़क्त हम वही सोचते हैं, जो हम चाहते हैं और ऐसा करना हमारे लिए बहुत ज़रूरी है.

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क्योंकि मन की सफ़ाई भी ज़रूरी है.
हम अपने शरीर, घर, आस-पास के वातावरण को साफ़ रखने के लिए तो हर मुमक़िन कोशिश करते हैं, लेकिन कभी हम अपने मन की सफ़ाई के बारे में सोचते हैं? बॉस के हर हुक्म पर यस बॉस, क्लाइंट की हर हां में हां, रिश्तेदार, पड़ोसी की हर बात पर मुस्कुराना… हर बार हमारे चेहरे पर जो भाव नज़र आते हैं, क्या हमारे मन में वही भाव होते हैं? नहीं… दिनभर में हम अपने चेहरे पर जाने कितने मुखौटे चढ़ाते-उतारते हैं. अपने मन पर दिखावे की जाने कितनी परतें लगाते हैं, जिससे कई बार मन भारी हो जाता है. दूसरों को ख़ुश करने की चाह में हम अपने मन पर इतना बोझ डाल देते हैं कि हमारे मन की ख़ुशी दबती चली जाती है. हम अपने लिए जीना भूल जाते हैं.

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कह दें जो दिल में है
दूसरों को ख़ुश रखने के लिए कई बार हम उनकी उस बात पर भी रिएक्ट नहीं करते, जो हमें बहुत बुरी लगती है. ऐसा करना ठीक नहीं. इसके दो नुक़सान हैं- एक ये कि हम मन ही मन उस व्यक्ति से चिढ़ने लगते हैं और दूसरा ये कि उस व्यक्ति को अपनी ग़लती का एहसास नहीं होता इसलिए वह बार-बार वही ग़लती दोहराता रहता है. इससे रिश्तों में खिंचाव आने लगता है. ऐसी स्थिति में मन की बात साफ़-साफ़ कह देना बेहद ज़रूरी है. इससे आप मन ही मन कुढ़ेंगे भी नहीं और सामने वाले को भी अंदाज़ा हो जाएगा कि आपको उसकी कौन-सी बात पसंद नहीं.

रोना भी ज़रूरी है
कई बार हम किसी की बात या किसी घटना से इतने आहत होते हैं कि लाख चाहने के बावजूद उस बात को भूल नहीं पाते और बार-बार उसी के बारे में सोचते रहते हैं. हम सबके सामने तो नॉर्मल होने का दिखावा करते हैं, लेकिन मन ही मन टूटते चले जाते हैं. ऐसी स्थिति में मन ही मन दुखी होने की बजाय किसी करीबी से अपने मन की बात कहें. यदि रोने का मन कर रहा है तो उसके सामने जीभर कर रो लें. इससे आप हल्का महसूस करेंगे और हो सकता है, सामने वाला व्यक्ति आपको इस तरह समझाए कि आप उस घटना से आसानी से उबर जाएं.

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