कहानी- पार की यात्रा (Paar Ki Yatra)

    ज्योत्सना प्रवाह

“सोचती हूं, स्त्री की कोख़ से जन्म लेनेवाला परम पराक्रमी पुरुष आत्म-पराभव की दशा में कैसी विचित्र भाषा का प्रयोग करने लगता है? मातृशक्ति के बिना क्या दुनिया में जीवन की कल्पना की जा सकती है? तब भी सारा अत्याचार हमीं पर? ऐसा क्यों?”

सुबह के आठ बजे थे. मैंने चाय पीकर कप रखा ही था कि मेरा मोबाइल बज उठा, देखा तो प्रतिष्ठा का फोन था, “हेलो! प्रतिष्ठा, कैसी हो?” फोन उठाते ही मैंने पूछा.
“बहुत अच्छी हूं दीदी.” उधर से प्रतिष्ठा का स्वर था.
“आज इतनी सुबह-सुबह तुमने कैसे फोन किया? और तुम्हारी आवाज़ ही बता रही है कि तुम बहुत अच्छी हो.” मैंने कहा.
“हां दीदी, आपसे बहुत-सी बातें करनी हैं. आज कॉलेज से छुट्टी ले ली है और मैं दोपहर को आपके घर पर आ रही हूं, इसलिए सुबह-सुबह फोन किया है. लंच आपके साथ ही करूंगी.” प्रतिष्ठा की आवाज़ में एक ख़ामोशी की गूंज हमेशा मुझे सुनाई देती थी, जो आज नहीं थी.
“ठीक है, मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी.” मैंने हंसकर कहा.
“ओके दीदी, बाय. फिर मिलते हैं. अब फोन रखती हूं.” कहकर उसने फोन रख दिया. मैं भी जल्दी-जल्दी अपने काम निबटाने में लग गई. मुझे पता था कि प्रतिष्ठा मुझे अपनी बड़ी बहन की तरह मान देती थी और हमारे बीच एक मैत्री भाव भी था, जो सहजता से एक-दूसरे से अपने हृदय की भावनाओं को व्यक्त करने में सहायक था. प्रतिष्ठा एक अति संवदेनशील, भावुक, सुंदर विदुषी स्त्री थी. वह मात्र रूप गर्विता नारी नहीं थी, ये तो उसके व्यक्तित्व का एक छोटा-सा अंश था. उसके संपूर्ण व्यक्तित्व में और भी बहुत कुछ था. वह धर्म को जानती थी, चरित्र और संकल्प से परिचय था उसका. जहां तक मैंने उसे जाना था, वो प्रेम से भरी एक ऐसी गागर थी, जो ज़रा-सा हिलाने से छलक पड़ती थी. प्रथम परिचय में तो वह मुझे भी रूप-गर्विता ही लगी थी, लेकिन जब उसके समीप आई, तो जाना कि उसके भीतर एक मासूम, अल्हड़, अति संवेदनशील बालिका छिपी बैठी है और एक स्त्री, जिसे उसने स्वयं न जाने कितने आवरणों के नीचे छुपा रखा है. पर वह मेरी नज़रों से बच न सकी. उसके व्यक्तित्व के कई आयाम हैं, जो मैंने महसूस किए हैं, पर उस बालिका और स्त्री में एक चीज़ कॉमन है, वो है दोनों का घुटता अकेलापन और यही बात मुझे उसके क़रीब लाती गई. प्रेम जो होता है, तो उसकी अपनी अलग ही भाषा होती है. उसे न जाने कब, कैसे मुझ पर इतना भरोसा हो गया था कि वो अपना दिल मेरे सामने खोलकर रख देती. मैं कभी दीदी बनकर उसे दुलारती, कभी मित्र बनकर उसे समझाती, विचारों व चिंतन के स्तर पर उतरकर उसकी बातें सुनती. मेरे सामने उसका भीतर व बाहर एक हो जाता था. और ये मेरे लिए भी एक प्रकार की उपलब्धि ही थी. आज लगता है उसके मन पर कालेे बादल घुमड़ रहे हैं, जो बरसना चाहते हैं, तभी तो उसने कहा ‘दीदी बहुत-सी बातें करनी हैं आपसे.’
सोचते-सोचते मैंने सारे काम निबटा लिए. आराम से सोफे पर बैठ गई और टीवी ऑन करके उसका इंतज़ार करने लगी. तभी डोरबेल बज उठी. मैंने दरवाज़ा खोला, तो सामने प्रतिष्ठा अपने चिर-परिचित अंदाज़ के साथ मौजूद थी, लेकिन आज उसकी आंखों में कुछ ख़ास बात नज़र आ रही थी.
“आओ प्रतिष्ठा, मैं तुम्हारी ही राह देख रही थी.” मैंने उसका हाथ पकड़कर मुस्कुराते हुए कहा.
हम काफ़ी देर तक इधर-उधर की बातें करते रहे, फिर साथ में भोजन किया. मैंने महसूस किया कि वो जो कहना चाह रही थी, वो कह नहीं पा रही थी, क्योंकि इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था. ऐसा क्या था, ये मैं समझ नहीं पा रही थी.
“आओ प्रतिष्ठा, बेडरूम में आराम भी करेंगे और बातें भी.”
मैं बिस्तर पर कुशन लेकर लेट गई, पर वह एक कुशन अपनी गोद में रखकर मेरे सामने बैठ गई. वो चुप थी और लगातार खिड़की के बाहर बगीचे को देख रही थी. मैं ये जानने को उत्सुक थी कि वो कौन-सी बात है, जो वो चाहकर भी मुझसे कह नहीं पा रही है? मैंने ही शांति भंग की, “प्रतिष्ठा, क्या बात है?” वो वैसे ही बैठे-बैठे स्वयं में ही खोई हुई-सी बोली, “दीदी, वो सामने बगीचे में बेला का पेड़ अपने फूलों से लदा है. फूल ही तो पेड़ की आत्मा है, उसका आनंद है. जब पेड़ आनंदित होता है, तो उसकी आत्मा ही तो है, जो फूलों के रूप में खिलकर सुगंध बिखेरने लगती है. मैं भी स्वयं को उसी बेला की तरह महसूस कर रही हूं. आख़िर स्त्री भी तो प्रकृति है. जब पुरुष और प्रकृति अपने नैसर्गिक रूप में मिलते हैं, तो एक अलौकिक ऊर्जा उत्पन्न होती है, जिसकी आभा से वे आलोकित हो उठते हैं.” अपनी बात समाप्त करके उसने मेरी तरफ़ देखा. मैं चुप थी. फिर उसी ने चुप्पी तोड़ी, “दीदी, आपको तो सब पता ही है कि संभव और मैं आदर्श जोड़े के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन आप जानती हैं ना कि वो मेरे लिए कितनी अधिकार-भावना से भरे हैं? उनके अहं ने हमेशा मेरी भावनाओं को आहत किया है. वो शब्दों का प्रयोग पत्थरों की तरह करते हैं और मैं फूल की तरह चाहती हूं. दोष शायद किसी का नहीं है, पर हम अलग-अलग प्रकृति के प्राणी हैं. पर संभव का दंभ, अहं धीरे-धीरे मुझे तोड़ता गया.
ज़रा-ज़रा-सी बात पर नाराज़ होकर कई-कई दिनों तक अबोला रहने लगा था. हमारे बीच में कुछ बातें व़क्त की स्लेट पर लिखी इबारत की तरह रह जाती हैं. कहनेवाला भूल जाता है, पर सुननेवाले को याद रह जाती हैं. मेरे भीतर का भावनात्मक कोना प्रतीक्षारत ही रहा कि कोई उसके खालीपन को भरे, जिसे स़िर्फ कुछ छोटी-छोटी बातें, कुछ अनकहे एहसास और अनछुए स्पर्श ही भर सकते थे, जो तलाश का ही हिस्सा रहे और जीवन बीतता रहा. कई बार संभव को समझाना भी चाहा कि उसके इस व्यवहार से मैं कितनी आहत होती हूं, कितनी अकेली हो जाती हूं, भीतर कुछ मरने लगता है… पर वो नहीं समझते थे. भावनाओं की गहराई में उतरना उन्हें कहां आता था. फिर धीरे-धीरे मुझे इस अवहेलना, अबोलेपन की आदत हो गई. मगर मुझे महसूस हो रहा था कि मैं संभव से दूर होती जा रही थी. अब इस दूरी ने भी रिश्ते में अपना स्थान ग्रहण कर लिया था. अब संभव से तू-तू, मैं-मैं भी होने लगी थी. कई बार संभव ने यहां तक कह दिया कि चली जाओ जहां तुम्हें जाना हो. मैंने भी कहा कि हां जानते हो न कि तुम्हारे सिवा और कोई नहीं है, इसलिए ये ताना देते हो. और दीदी, एक ही बिस्तर पर मैं घंटों रोती रहती थी चुपचाप, पर संभव को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था. बस, कोई शरीर होता था, जो मेरे बगल में सोता रहता था, लेकिन दीदी संभव के ये शब्द भीतर ही भीतर मुझे कचोटते रहते थे. मेरा अकेलापन और घुटन बढ़ती जा रही थी और संभव के लिए मेरी कटुता भी. स्त्री अपमान की परंपरा बहुत दिनों तक चलती रहेगी, जब तक धर्मशास्त्र को परिवर्तित नहीं किया जाएगा. सोचती हूं, स्त्री की कोख़ से जन्म लेनेवाला परम पराक्रमी पुरुष आत्म-पराभव की दशा में कैसी विचित्र भाषा का प्रयोग करने लगता है? मातृशक्ति के बिना क्या दुनिया में जीवन की कल्पना की जा सकती है? तब भी सारा अत्याचार हमीं पर? ऐसा क्यों?”
प्रतिष्ठा की आंखें नम हो गईं. उसने ख़ुद को संयत किया और बोली, “आहत स्वाभिमान अपना प्रतिकार किस रूप में करेगा ये वह स्वयं नहीं जानता, बल्कि इसका निर्णय परिस्थितियां करती हैं. संभव के इस वाक्य ने मेरी सोच को एक नई दिशा दे दी थी. मेरे भीतर की स्त्री छटपटा रही थी. वो अनजाने ही एक अंतरंग साथी की प्रतीक्षा करने लगी थी, जिसके साथ मैं अपना अंतरंग हिस्सा बांटूं और उसकी दुनिया मुझ पर और मेरी दुनिया उस पर समाप्त हो जाए और जब ऐसा प्रेम मिले, तो सारा संसार भी उनके बीच आ जाए ना, तो भी, ना तो वो दूर होते हैं और ना ही अकेले और तब उन क्षणों में जीवन अपनी पूर्णता प्राप्त कर लेता है. सुना था, जब कोई उत्कट कामना मूर्त रूप लेती है, तो प्रकृति भी उस कामना को पूर्ण करने में लग जाती है. शायद यही हुआ मेरे साथ भी. एकांश ने मेरी ही यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर जॉइन किया था. मैं मनोविज्ञान की प्रोफेसर थी और वो अंग्रेज़ी के. एकांश से मेरा परिचय कोई ख़ास नहीं, तो नया भी नहीं था. इसके पहले हम कई सेमिनारों में मिल चुके थे. अब एक ही जगह काम करते हुए क़रीब रा़ेज ही मिलना होता था. एकांश को तभी जान पाई थी. वह बहुत ही सौम्य, शालीन, सुव्यवस्थित व बेफ़िक्र क़िस्म के इंसान थे. हमारी जान-पहचान से शुरू हुई मुलाक़ातें कॉलेज के स्टाफरूम से होती-होती उनके और मेरे घर तक पहुंच गई. उनके साथ से ये जाना कि ज़िंदगी स़िर्फ तूफ़ान को गुज़रने देने के लिए नहीं है, बल्कि बारिश में नाचने के लिए भी है. उनके साथ एक आत्मीयता जन्म लेने लगी थी. हम बहुत देर तक चुपचाप भी एक-दूसरे के साथ बैठे रहते. हमारा मौन संवाद करता रहता. जब दो व्यक्तियों के बीच मौन भी मुखरित होने लगता है, तब संबंध आत्मा तक जा पहुंचता है, क्योंकि वो मौन की गूंज आत्मा ही सुन पाती है और एक दिन हमेशा की तरह वो मेरे घर आए थे, हम लोग चाय के प्याले के साथ बातें कर रहे थे. फिर वो टीवी चलाकर न्यूज़ देखने बैठ गए और मैं अभी आती हूं कहकर अपने काम निबटाने लगी. अपना काम ख़त्म कर मैं भी उनके साथ समाचार देखने लगी और धीरे-धीरे हमारे बीच एक मौन बहता रहा. और कुछ देर बाद उस मौन का स्पर्श अपने हाथों पर महसूस हुआ, जो धीरे-धीरे देह से गुज़रता हुआ मेरी आत्मा को भिगोता जा रहा था. हम दोनों ही इस मौन की नदी में एक साथ उतर चुके थे और बहाव में स्वयं को समर्पित कर दिया था. इतना ही पता था और कुछ नहीं. और तब पहली बार जाना था दीदी कि प्रेम मौन ही तो होता है, एक मौन की नदी गुज़रती है दो लोगों के बीच और बहा ले जाती है, समूचा अस्तित्व, समूची सोच. आधे चांद की तरह, अधूरी रह जाती हैं अभिव्यक्तियां. सच दीदी, मैंने ख़ुद को बहुत रोकना चाहा था, पर रोक न पाई. मैं लहरों पर तैरती ऐसी कश्ती बन गई थी, जिसने स्वयं को लहरों के हवाले कर दिया था और जब किनारे पर लगी, तो कोई संताप नहीं था, क्योंकि मुझे माझी मिल गया था. एकांश चुप बैठे थे. बस, मुझे देख रहे थे और मैं नज़रें झुकाए उनके सामने बैठी थी. मैंने वो फल चखा था दीदी जो वर्जित था, एक मां के लिए, एक पत्नी के लिए, एक बेटी के लिए, लेकिन एक शाश्‍वत स्त्री को पूर्ण करने के लिए वो फल अनिवार्य था. थोड़ी देर बाद एकांश ने कहा, “मैं चलूं…?”
“हां.” मैंने बड़ी मुश्किल से कहा. उनके जाने के बाद मैं काफ़ी देर आंखें मूंदे लेटी रही. अपने भीतर समाई उस अपरिचित-सी परिचित ख़ुशबू को महसूस करती रही. फिर मैंने महसूस किया कि मेरे भीतर एक नई प्रतिष्ठा ने जन्म ले लिया है. मेरा ख़ुद से ये नया परिचय था, लेकिन मैं स्वयं से ही अभिभूत हो रही थी.” बताते-बताते कुछ देर को प्रतिष्ठा ठहरी थी. मैं अपलक उसके चेहरे की दीप्ति और दृढ़ता को देख रही थी और उसमें आए परिवर्तन को महसूस कर रही थी. उसने मेरी तरफ़ देखा और मुझसे पूछा, “दीदी, ऐसे क्या देख रही हैं? शायद आप भी यही सोच रही होंगी कि मैंने जो किया वो ग़लत है और मैं तमाम तर्क़ों द्वारा ख़ुद को सत्यापित कर रही हूं.”
“नहीं, बिल्कुल नहीं. मैं तुम्हारे भीतर की उस स्त्री को देख रही हूं, जो प्रेम के एक पल की छांव में ख़ुद को रख देने के लिए अपने जीवन का बड़े से बड़ा सुख त्यागने को तैयार है. एक लम्हे का सुख जीवनभर के दुखों से कहीं बेहतर है. एक स्त्री होकर एक स्त्री को समझ रही हूं बस.” मैंने कहा.
“जितना प्रचार इस बात का किया गया कि स्त्री ही स्त्री की शत्रु है, इस बात को बार-बार क्यूं नहीं कहा गया कि एक स्त्री ही दूसरी स्त्री के मन को भली-भांति समझ सकती है.” बोलते-बोलते प्रतिष्ठा भाव-विह्वल हो उठी. उसकी आंखें तरल हो उठी थीं. मैंने उसे अपने अंक में भर लिया.
मुझे वो बिल्कुल मासूम-सी लगी उस पल. “पगली, ये सब मुझे बताने के लिए तुझे इतना सोचना पड़ा? क्या तू मुझे इतना ही जान पाई है? हर बात को सही या ग़लत दृष्टिकोण से नहीं देखा जाता, बल्कि दो विचार एक ही समय में अपनी-अपनी जगह सही भी हो सकते हैं.” मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा.
“मैं चली गई, जहां मुझे जाना था. मेरी आत्मा में वो ख़ुशबू बस गई है, आत्मा सुगंधित हो उठी है. अब इसी सुगंध में भीगी फिरती रहूंगी जीवनभर. मेरे लिए ये प्रेम है, पर संभव के लिए प्रतिकार का संदेश, जो मेरे ईश्वर ने उसे दिया है. प्रतिकार… मेरे सारे अपमान का, मेरे तिरस्कार का, प्रतिकार… संभव से, उसके अहं से. यह एक अनोखी बात थी कि मैंने घुटन के प्रतिकार में प्रेम पाया. आहत स्वाभिमान के प्रतिकार में प्रेम मिला मुझे, इसीलिए कोई ग्लानि नहीं हैं, क्योंकि प्रेम में तो आनंद है ग्लानि नहीं है, क्योंकि मैंने समर्पण को जाना है, जैसे कोई ईश्वर को समर्पित हो. समर्पण भी तभी प्रसन्नता से भर देता है, जब कोई उस समर्पण से अभिभूत हो, कृतज्ञ हो, उस समर्पण को पाकर धन्य महसूस करे. यही समर्पण का सुफल है, जो समर्पण करनेवाले को ऊर्जा के रूप में वापस मिलता है. अब संभव पर मेरी कटुता कम हो गई है. और दीदी, उस दिन के बाद से संभव का वो वाक्य मेरे कानों में नहीं गूंजता. उस वाक्य के प्रेत ने मेरा पीछा छोड़ दिया है.” उसने मुझसे अलग होते हुए कहा, “और दीदी, मैंने दूसरे दिन एकांश से कहा, ‘एकांश, तुम अपना ट्रांसफर करा लो.’
एकांश कुछ पल तक मुझे देखते रहे फिर मेरा हाथ हौले से अपने हाथों में लेते हुए बोले, ‘यक़ीन करो प्रतिष्ठा, मैं भी कल से यही सोच रहा था, इसलिए नहीं कि मुझे कोई भय या ग्लानि है, बल्कि इसलिए कि तुमने एक ख़ुशबू की तरह मेरे भीतर स्थान ले लिया है, हम पूर्ण होने के लिए ही अपनी जीवनयात्रा में मिले थे. सो मैं तुम्हारी बात समझ सकता हूं. बिल्कुल वैसे ही जैसे फूल अपनी जड़ों से ही तो ख़ुशबू लेता है. उसी तरह तुम मेरी जड़ों में समा चुकी हो और हमारा मिलन आत्मिक है, फिर सामने रहना ज़रूरी नहीं.’ दीदी, इंसान रिश्तों को भुलाने का प्रयास कर सकता है, पर स्मृतियों को भुलाना उसके वश में नहीं होता. वह इंसान को बेचैन कर ही देती हैं.” मैं उसके भीतर एक नई प्रतिष्ठा का उदय देख रही थी. फिर कुछ देर की चुप्पी के बाद उसने लंबी सांस छोड़ते हुए कहा, “कल एकांश चला गया. उसका ट्रांसफर लखनऊ हो गया है. एक आप ही थीं, जो मेरा मन पढ़ सकती थीं और मैं अपनी भावनाएं आपसे बांट सकती हूं. अब मैं अपनी इस दुनिया में लौट आई हूं, उस पार की यात्रा से… जहां मेरे कर्त्तव्य हैं, रिश्ते हैं, मैं हूं… एक संपूर्ण स्त्री… कभी एकांश से न मिलने के संकल्प के साथ… और ये जाना है कि विरह छोटे प्रेम को संकीर्ण और बड़े प्रेम को विस्तृत बनाता है. जैसे तूफ़ान दीये को बुझा देता है, पर होली की आग को भड़काता है. अब मुझे संभव से प्रेम की अपेक्षा नहीं रही. सही व़क्त पर प्रेम न मिले, तो बेव़क्त पर उसका स्वाद कड़वा हो जाता है. दांपत्य का विकल्प तो संभव है, प्रेम का नहीं. यदि ऐसा होता, तो प्रेम कथाओं का अस्तित्व ही नहीं होता.” प्रतिष्ठा ने अपनी बात समाप्त की और कुशन को एक तरफ़ रखते हुए उठी और बोली, “दीदी, ये भी एक प्रकार की उपलब्धि है, प्राप्ति है. नाव को पानी में खेने के लिए किनारा छोड़ना ही पड़ता है ना…?”
“हूं.” मैंने कहा और उठकर बैठ गई. “चलो, चाय बनाती हूं.” शाम हो रही थी. डूबते सूरज को देखते हुए मैं सोच रही थी ये गोधूलि बेला भी कैसी है? जब धीरे-धीरे निशा का आंचल प्रकाश को ढंकता जाता है, सूरज भी अपने पांव आहिस्ता-आहिस्ता पीछे खींचने लगता है और पश्चिम आकाश की गोद में उतरता जाता है व प्रकाश को सूरज अपने संबंधी दीपक को सौंप जाता है ज्योति बनाकर… और इस तरह रात और दिन मिलकर एक हो जाते हैं, उनके
प्रेम-मिलन से वातावरण में एक रक्तिम आभा फैल जाती है. आकाश उस नवयौवना के गाल की तरह रक्तवर्णी हो जाता है, जिसे अभी-अभी उसके प्रियतम ने चूम लिया हो.
“दीदी, कहां खोई हैं, देखिए चाय खौल चुकी है.” प्रतिष्ठा की आवाज़ से मेरी तंद्रा भंग हुई.
“सोच रही हूं कि कभी-कभी मौन भी कितना कठोर उत्तर दे जाता है कि सामनेवाला भी सहम जाता है.” मैंने चाय का कप ट्रे में रखते
हुए कहा.
“और ज़िंदगी इस बात को तरसते गुज़र जाती है, जिन्हें हम अपना कुछ दिखाना चाहते हैं वे कभी भूलकर भी उसे देखने या जानने की कोशिश नहीं करते, वो लोग हमेशा दूर चले जाते हैं, जिन्हें वास्तव में पास हमेशा खड़े रहना चाहिए था.” प्रतिष्ठा ने गहरी सांस लेते
हुए कहा.
“दीदी, अब मैं चलती हूं, इस चाय के कप की तरह ही मेरा मन भी अब रिक्त हो चला है. आप जैसी सखी देने के लिए ईश्‍वर को धन्यवाद कहती हूं.” कहते हुए प्रतिष्ठा ने अपना पर्स उठाया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गई. पीछे-पीछे मैं भी उसे गाड़ी तक विदा करने चल दी.
प्रतिष्ठा के जाने के बाद मैं वहीं लॉन में कुर्सी पर बैठ गई. खुली हवा में फूलों के बीच अच्छा लग रहा था. मेरे भीतर कुछ प्रश्‍न उमड़ रहे थे कि जीवन तर्क थोड़े ही है. जीवन गणित थोड़े ही है. जीवन बड़ी पहेली है. काश! जीवन तर्क और गणित ही होता. सब समस्याएं कभी की हल हो गई होतीं. जीवन के उलझन तर्क और गणित से बहुत गहरे होते हैं. तर्क और गणित तो जीवन की ही सतह पर उठी हुई थोड़ी-सी तरंगें हैं, जीवन की गहराइयों को कहां तर्क छूता है, कहां गणित छूता है? तो क्या जीवन दर्शन है? नहीं… दर्शन जीवन में क्या? किधर? कहां? के प्रश्नों का उत्तर देता है, जीवन को पहचानने की दृष्टि देता है, पर वो जीवन नहीं है. जीवन तो प्रेम है. सामाजिक संदर्भों को निर्धारित करने में प्रेम है, दर्शन नहीं. प्रेम न होता, तो मनुष्य न होता, समाज न होता और शायद ईश्‍वर भी न होता. दर्शन तो मानवीय चिंतन का परिणाम है, और प्रेम… मानव जीवन इस प्रेम का परिणाम है. और जब कोई प्रेम करता है, तो स़िर्फ समर्पण होता है, सत्य और झूठ को नहीं तौलता, क्योंकि प्रेम में तो स़िर्फ समर्पण होता है, सत्य और झूठ तो विवेक की सीमा में रहते हैं और प्रेम विवेक के बाहर… ये तो पार की यात्रा है.

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Meri Saheli Team :
© Merisaheli