संपत्ति में हक़ मांगनेवाली लड़कियों को नहीं मिलता आज भी सम्मान… (Property For Her… Give Her Property Not Dowry)

संपत्ति में हक़ मांगनेवाली लड़कियों को नहीं मिलता आज भी सम्मान... (Property For Her... Give Her Property Not Dowry) उसका…

संपत्ति में हक़ मांगनेवाली लड़कियों को नहीं मिलता आज भी सम्मान… (Property For Her… Give Her Property Not Dowry)

उसका वजूद जैसे कोई त्याग… उसके लब जैसे ख़ामोशी का पर्याय… उसकी नज़रें लाज-शर्म से झुकीं जैसे घर की लाज… उसके अधिकार…? नहीं हैं कोई… उसका कर्त्तव्य जैसे पिता-भाई द्वारा तय मर्यादाओं का पालन… लफ़्ज़ों के मायने कोई नहीं उसके लिए, जब तक अपने घर न जाए, तब तक एक बोझ, जब अपने घर जाती है, तो सबको ख़ुश रखना ही उसके जीवन का अर्थ… एक औरत के जीवन की यही सच्चाई थी कुछ समय पहले तक और आज भी बहुत कुछ बदलकर भी काफ़ी कुछ नहीं बदला है. यही वजह है कि अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठानेवाली बेटियों को घर-परिवार व समाज में सम्मान नहीं मिलता, क्योंकि समाज में आज भी बेटियों से स़िर्फ और स़िर्फ त्याग की ही उम्मीद की जाती है.

उम्मीदें हैं बेहिसाब…

–    बेटियों से हर तरह की उम्मीदें करना जैसे सबका जन्मसिद्ध अधिकार हो.

–    वो मर्यादा में रहे, सबका कहना माने, सबकी इच्छाओं का सम्मान करे.

–    धीरे बात करे, ज़ोर से हंसे नहीं, लड़कों के साथ ज़्यादा न घूमे, नज़रें झुकाकर चले, जैसे वो कोई अपराधी है…

–    घर की पूरी इज़्ज़त व मान-मर्यादा उसकी ही ज़िम्मेदारी है.

–    एक अच्छी बेटी वो ही है, जो घर के कामकाज में पूरी तरह निपुण हो.

–    भाई-बहनों का, माता-पिता व अन्य तमाम रिश्तेदारों का ख़्याल रखे.

–    हमारे परिवारों में आज भी बेटों की अपेक्षा बेटियों से काफ़ी उम्मीदें रखी जाती हैं. ऐसे में उनका अपने हक़ के लिए कुछ बोलना कहां बर्दाश्त हो पाएगा किसी को भी?

क्यों हैं इतनी उम्मीदें?

–    सामाजिक व पारिवारिक ढांचा ऐसा ही है कि हमें लगता है कि बेटियां स़िर्फ कुर्बानी देने और त्याग करने के लिए ही होती हैं.

–    वो परिवार में झगड़ा नहीं चाहतीं, इसलिए अपना हक़ छोड़ने में ही समझदारी मानती हैं.

–    जबकि बेटों से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वो बहनों को उनका हक़ बिना कुछ कहे दे दें.

–    सब जानते हैं कि अगर बहनों ने अपने हक़ की बात तक की, तो सारे रिश्ते ख़त्म कर दिए जाएंगे.

–    बचपन से बेटों की परवरिश इसी तरह से होती है कि उन्हें अपनी बहनों से यही उम्मीद रहती है कि वो उनके लिए अपनी हर ख़ुशी कुर्बान करेंगी.

–    ऐसे में वो संपत्ति में बहनों को बराबर का हक़ देने के बारे में सोच भी नहीं सकते.

–    क़ानून ने भले ही बेटियों को समानता का हक़ दे दिया हो, पर समाज व परिवार के लिए अब भी ये स्वीकार्य नहीं है.

–    इसका प्रमुख कारण परिवार की सोच व परवरिश के तौर-तरी़के ही हैं, जो आज भी ज़्यादा नहीं बदले हैं.

–    महिलाएं भले ही घर की दहलीज़ लांघकर आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही हैं, लेकिन बावजूद इसके उनकी घरेलू ज़िम्मेदारियां जस की तस हैं.

–    उन्हें पति, पिता या भाई से घर के कामों में ख़ास मदद नहीं मिलती.

–    बाहर काम करने का नतीजा यह हुआ कि महिलाओं की ही ज़िम्मेदारी बढ़ गई और आज वो दोहरी ज़िम्मेदारियों के बीच पिस रही हैं.

–    ऐसे में समानता का दर्जा, वो भी संपत्ति के मामले में तो बहुत दूर की सोच है…

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क्यों स्वीकार्य नहीं बेटियों का हक़?

प्रमिला के पति की मृत्यु हो चुकी थी. उसके दो बच्चे थे. पिता के पास काफ़ी ज़मीन थी, जो उन्होंने सभी बच्चों में बांट दी थी. प्रमिला के बड़े भाई ने कहा कि वो उसकी और उसके बच्चों की देखरेख आजीवन करेगा. बस, वो अपने हिस्से की ज़मीन अपने भाई के नाम कर दे. प्रमिला ने इंकार कर दिया, उसका साफ़ कहना था, “मेरा जो हक़ है, वो मुझे मिलना चाहिए, मैं ताउम्र किसी की मोहताज बनकर नहीं रह सकती.

बस, फिर क्या था. भाई ने न स़िर्फ बातचीत बंद कर दी, बल्कि सारे नाते तोड़ लिए, लेकिन मुझे इस बात की संतुष्टि थी कि मैंने सही समय पर सही फैसला लिया. आज मेरे बच्चे अपने पैरों पर खड़े हैं. मैंने उन्हें अच्छी शिक्षा दी और आज मैं ख़ुश हूं, दुख स़िर्फ इस बात का है कि मात्र संपत्ति ही ज़रिया है क्या प्यार व अपनेपन जैसी भावनाओं को जीवित रखने का?

मेरे भाई ने उसे इतना महत्व दिया कि बहन से सारे रिश्ते तोड़ लिए. कुछ लोगों ने मेरे इस क़दम को सही कहा, तो ऐसे भी लोग हैं, जो मानते हैं कि पैसों के लिए मैंने भाई से दुश्मनी कर ली… मुझे अपना हक़ छोड़ देना चाहिए था… दरअसल, समाज की सोच अब भी वही है कि घर का मुखिया एक पुरुष ही हो सकता है, वही हमारी देखरेख करता, तो प्यार बना रहता. मैंने अपने दम पर अपने बच्चों का जीवन संवारा, तो किसी से बर्दाश्त नहीं हो रहा…!”

प्रमिला की ही तरह कविता और सुषमा का भी केस है. कविता ने बताया, “पापा की मृत्यु के बाद अब मेरी मम्मी ने हम चार भाई-बहनों में ज़मीन-जायदाद का बंटवारा कर दिया. मुझे और मेरी बहन को भी मेरे दोनों भाइयों के बराबर का हिस्सा दिया गया. मेरे दोनों भाई यूं भी आर्थिक रूप से काफ़ी सक्षम हैं. लेकिन बावजूद इसके उनकी नाराज़गी इतनी बढ़ गई कि अब परिवार की शादियों तक में हमें निमंत्रण नहीं दिया जाता. इसकी एकमात्र वजह संपत्ति में हमारा हक़ लेना ही है.

लोग आज भी बेटियों से ही उम्मीद करते हैं कि भाई को नाराज़ करने से अच्छा है कि अपना हक़ छोड़ दें, लेकिन भाई से कभी यह पूछा तक नहीं जाता कि बहनों को अगर समान दर्जा मिल जाता है, तो उन्हें इतनी तकलीफ़ क्यों होती है?

हमने स़िर्फ अपना हक़ लिया है, उनका नहीं. तो उन्हें हमसे नाराज़गी क्यों? वो हमारे हिस्से की हर चीज़ पर अपना अधिकार समझते हैं और हर बार यही उम्मीद करते हैं कि बहनों को ही त्याग करना चाहिए… कोई उनसे पूछे कि क्या वो बहनों के लिए यह त्याग करने के लिए तैयार होंगे कभी?

प्रॉपर्टी में अपना जायज़ हिस्सा लेने पर भी समाज हमें लालची, घर व रिश्ते तोड़नेवाली और भी न जाने क्या-क्या कहता है, लेकिन उस भाई से एक भी सवाल नहीं, जो अपनी बहन का हिस्सा भी ख़ुद ही लेने की चाह रखता है.

दरअसल, यह सोच कभी नहीं बदलनेवाली और कभी बदलेगी भी तो सदियां बीत जाएंगी.”

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प्रॉपर्टी फॉर हर… गिव हर प्रॉपर्टी, नॉट डाउरी!

भारतीय महिलाएं खेतों का लगभग 80% काम करती हैं, लेकिन मात्र 17% ही ज़मीन पर मालिकाना हक़ रखती हैं. अन्य क्षेत्रों में भी तस्वीर कुछ इसी तरह की है और अधिकार व पारिवारिक संपत्ति बेटों को ही मिलती है.

इसी के मद्देनज़र साउथ एशिया में महिलाओं को प्रॉपर्टी में हक़ दिलाने के लिए एक कैंपेन की शुरुआत की गई- प्रॉपर्टी फॉर हर!

इसका उद्देश्य लोगों को जागरूक करना था कि पैरेंट्स इस बात को समझें कि क्यों बेटियों के लिए संपत्ति ज़रूरी है और वो भी उतनी ही हक़दार हैं, जितने बेटे! क्योंकि

बिना किसी मज़बूत सपोर्ट सिस्टम, बिना किसी आर्थिक सुरक्षा के कैसे बेटियां आत्मनिर्भर और सुरक्षित महसूस कर

सकती हैं? यह कहना है इस कैंपेन से जुड़े लोगों का.

ट्विटर पर भी यह कैंपेन चलाया गया था, जिसमें महिला व पुरुष दोनों से ही राय मांगी गई थी. अधिकांश पुरुषों ने भी इस पर सहमति जताई कि महिलाओं को भी संपत्ति में बराबरी का हक़ दिया जाना चाहिए.

जहां तक क़ानून की बात है, तो काफ़ी पहले ही वो बेटियों को समानता का दर्जा दे चुका है, अब स़िर्फ समाज व परिवार को समझना है कि वो अपनी बेटियों को कब समान समझना शुरू करेंगे? ख़ासतौर से घर के बेटे, क्योंकि सोशल मीडिया पर बड़ी-बड़ी बातें करनेवाले भी अपनी बारी आने पर वही पारंपरिक सोच अपनाना बेहतर समझते हैं, जो उन्हें सूट करती है और उनके ईगो को तुष्ट करती है.

– गीता शर्मा

 

 

Geeta Sharma

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