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रंग तरंग- सोशल मीडिया के घुड़सवार… (Rang Tarang- Social Media Ke Ghudswar…)

सब्जेक्ट और माइंड दोनों सेट हैं. इसके बाद तो बुद्धि या विवेक को पास भी नहीं फटकने देते. अब योद्धा अपना ज्ञान उड़ेलता है, जिसे…

सब्जेक्ट और माइंड दोनों सेट हैं. इसके बाद तो बुद्धि या विवेक को पास भी नहीं फटकने देते. अब योद्धा अपना ज्ञान उड़ेलता है, जिसे फौरन पंद्रह सौ लाइक और ९९९ कमेंट से बघार दिया जाता है (इतने योद्धा हर वक़्त कुरुक्षेत्र में मौजूद रहते हैं). इतना बुद्धि वैभव आते ही पैदल योद्धा ख़ुद को ऐरावत पर बैठा महसूस करता है.

अगर आप का मन लड़ने के लिए उतावला है और लॉकडाउन के चलते आप बाहर नहीं निकल पा रहे हैं, तो कोई बात नही. घर में फोन है ना. स्मार्ट फोन है जहां, हल्दी घाटी है वहां… योद्धा ही योद्धा… एक बार (फेसबुक में) घुस तो लें. सोशल मीडिया पर एक से एक महारथी चक्रव्यूह उठाए खडे हैं. बस उनके पोस्ट में एक बार नत्थी हो जाइए, फिर तो आपका शुद्धिकरण करके दम लेंगे. फेसबुक पर अनगिनत अक्षोहिणी सेनाएं (ग्रुप) मौजूद हैं, किसी में भी नत्थी हो जाइए. ऐसी पैदल सेना है, जिसमें ज़्यादातर अक्ल से पैदल हैं. ऐसे धर्म योद्धा हैं, जिनकी अक्ल ऑड-इवन के हिसाब से चलती है.
आजकल अनुकूल बयार पाकर इनके संस्कार का ऑक्सीजन लेवल सौ से ऊपर जा रहा है. संप्रदाय विशेष के बारे में इतनी रिसर्च पूर्ण जानकारी फेस बुक पर उड़लेते हैं कि इतिहासकार गश खाकर गिर जाए. यहां पर अपील, साक्ष्य, तर्क या प्रमाण का कोई विकल्प नहीं है. अब अगर विरोधी खेमें के किसी बुद्धिजीवी के ज्ञान में उबाल आ गया और उसने साक्ष्य मांग लिया तो बस… इस अक्षम्य अपराध के एवज में सैकड़ों ततैया बुद्धि वैभव लेकर टूट पड़ते हैं और आपत्ति दर्ज़ करानेवाले को अंतत: देशद्रोही साबित कर दिया जाता है.
सोशल मीडिया के कुछ विद्वान तो व्हाट्स ऐप और फेसबुक को सार्वजनिक शौचालय समझ बैठे है. बहस करो तो अक्ल का लोटा फेंक कर मारते हैं. घमासान जारी है, कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं. इस देवासुर संग्राम में बहुधा बुद्धिजीवी ही परास्त और अपमानित होता है. अनन्त योद्धा हैं और ब्रह्मांड तक फैला युद्धक्षेत्र. अक्ल के घोड़े दौड़ रहे हैं और घुड़सवार ख़ुद अक्ल से पैदल है. यहां युद्धविराम मना है. पूरी-पूरी रात योद्धा इतिहास खोदते रहते हैं. सुबह को जब दुनिया जाग कर काम में लगी होती है, तो ये योद्धा नींद में चरित्र निर्माण का अगला अध्याय ढूंढ़ रहे होते हैं. जागते ही सोशल मीडिया अकाउंट चेक करते हैं कि कहीं कोई हिरण्यकश्यप नत्थी हुआ या सारा अकाउंट अभी भी सात्विक है.
सब्जेक्ट और माइंड दोनों सेट हैं. इसके बाद तो बुद्धि या विवेक को पास भी नहीं फटकने देते. अब योद्धा अपना ज्ञान उड़ेलता है, जिसे फौरन पंद्रह सौ लाइक और ९९९ कमेंट से बघार दिया जाता है (इतने योद्धा हर वक़्त कुरुक्षेत्र में मौजूद रहते हैं). इतना बुद्धि वैभव आते ही पैदल योद्धा ख़ुद को ऐरावत पर बैठा महसूस करता है. कॉमेंट की सूक्ष्म जांच में विरोधी खेमे का देशद्रोही बरामद होते ही पांडव सेना जय श्री राम के उदगार के साथ दिन का पहला यलगार शुरू कर देती है. यहीं से संस्कार का माॅनसून शूरू हो जाता है.
ये विद्वता का निर्द्वंद मैराथन है, जहां प्रतिद्वंदी की टांग खींचने और गाली देने पर कोई पाबंदी नहीं है. सुविधा ये है कि प्रतिद्वंदी फेसबुक पर है फेस टू फेस नहीं. यह बेलगाम प्रतिभा का ऐसा अभयारण्य है, जहां द्रोण और एकलव्य दोनों का विवेक धर्म से संक्रमित है (एकलव्य की दलित विनम्रता ने उसे क्या दिया सिर्फ़ विकलांगता) महाभारत काल में कौरव खेमें में मीडिया की सुविधा के नाम पर सिर्फ़ संजय उपलब्ध थे. उनके पोस्ट का बेनिफिट सिर्फ़ दृष्टिहीन धृतराष्ट्र को था. संजय के ज्ञान को चुनौती गांधारी भी नहीं दे सकती थी, उसने ख़ुद ही आंख पर पट्टी बांध ली थी.
अब दोबारा सोशल मीडिया पर द्वापर लौट आया है. दिव्य ज्ञान से लैस तमाम संजय ज्ञानोपदेश में लगे हैं. धृतराष्ट्र झुंड के झुंड लाइक और कमेंट कर रहे हैं. ऐसे में अगर किसी ने बीच में पांडव बनने का प्रयास किया, तो उसके लिए लाक्षागृह तैयार है.
पिछले पखवाड़े फेसबुक पर हमारे दो मित्र इसी खाड़ी युद्ध में उलझ गए. पत्रकारिता और समाज सेवा को समर्पित दोनों महामानव सोशल मीडिया पर गुथ गए. कोई ग़लती मानने को राजी नहीं. दोनों अपने-अपने बायोडाटा से एक-दूसरे को दो दिन तक धमकाते रहे, पर शिमला समझैता हो न सका. कुछ बुद्धिजीवियों ने सुलह वाली पोस्ट डाली, तो कुछ ने पेट्रोल उड़ेला. तीसरे दिन दोनों फोन पर भिड़ गए. अब दो बुद्धिजीवी लंबे वक़्त के लिए विरोधी हो चुके हैं और ये सब हुआ दिल्ली में अगले साल होनेवाले नगर निगम चुनाव के ऊपर. इसी को कहते हैं- सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम लट्ठा… योद्धा तैयार हैं…
कोरोना ने हाय राम बडा दुख दीन्हा. काम धाम कुछ है नहीं. समय बिताने के लिए सोशल मीडिया पर जाता हूं, तो वहां फेसबुक वॉल पर ततैया छितराए बैठे हैं. कुछ मित्र सिर्फ़ इसलिए नाराज़ हैं कि मैं उनकी अद्वितीय रचनाओं पर मनभावन कमेंट नहीं करता. कई महामानव ऐसे हैं, जिन्हें सिर्फ़ नारियों की पोस्ट में विद्वता का छायावाद नज़र आता है. कुछ मित्रों ने अकारण ख़ुद को वरिष्ठ साहित्यकार मान लिया है और अपना लोहा मनवाने के लिए रोज़ पोस्ट का अश्वमेध यज्ञवाला घोड़ा छोड़ते हैं. समझदार और सहिष्णु लोग लाइक करके मुख्यधारा में बने रहते हैं. तर्क और विवेकवाले विरोध करते हैं और अगली सुबह मित्र सूची से सस्पेंड कर दिए जाते हैं. चलो रे डोली उठाओ कहांर… सोशल मीडिया तू ना गई मेरे मन से…

सुलतान भारती


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Published by
Usha Gupta

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