कहानी – अवनि से अंबर ...

कहानी – अवनि से अंबर तक (Hindi Short Story – Avani Se Amber Tak)

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              मृदुला गुप्ता

 

वो मन ही मन सोचने लगा, कहां खो गया हूं? पैसा और पद, इन चीज़ों के पीछे भागते-भागते कितना कुछ अमूल्य पीछे छूट गया. पीछे छूट गए वे कोमल रिश्ते, जिनके संबल से वह यहां तक पहुंच सका. उसका अन्तस उसे कचोटने लगा.

Hindi Short Story

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच आर्यन मंच पर पुरस्कार लेने आया. उसने युवा वैज्ञानिक की पढ़ाई ‘भारतीय विज्ञान संस्थान’ बंगलुरू से की है. उसके सर्वप्रथम आने के उपलक्ष्य में उसे सम्मानित करने के लिए बुलाया गया है. प्रमाणपत्र के साथ उसे मिले हैं ढेरों प्रशस्तिपत्र, एक प्रतिष्ठित कंपनी द्वारा नौकरी का अनुबंध और उसके साथ मिली है एक महंगी चमचमाती कार. जहां मंच पर राज्यपाल महोदय उसे पुरस्कारों के साथ कार की चाबी सौंप रहे थे, वहीं मैं वर्षों पूर्व घटी उस घटना को याद कर अतीत में खो गई थी.
वर्षों पूर्व हमारा परिवार लखनऊ की एक पॉश कॉलोनी में रहता था. गगन हमारा बेटा आठवीं कक्षा का छात्र था और बेटी शोभना छठी में थी. हमारे परिवार में मेरी सासजी सहित पांच सदस्य थे. मेरे पति सचिवालय में अधिकारी थे.
वहां कॉलोनी में सफ़ाई करने जो सफ़ाईकर्मी आता था, उसके चार-पांच बच्चे थे, जो उसके साथ काम में मदद करने आया करते थे. कभी-कभी कुछ खाने का सामान मैं उन बच्चों को दिया करती थी. उन्हीं दिनों हमने नई कार ख़रीदी थी. सफ़ाईकर्मी का सबसे छोटा बेटा छोटू हमारी कार को बड़ी हसरत से देखा करता था. बार-बार कार को छूकर देखता. उसके शीशे में अपनी शक्ल देखकर तरह-तरह के चेहरे बनाता. कभी बड़े प्यार से उसके ऊपर हाथ फिराता मानो उसे सहला रहा हो. मैं उसकी बाल सुलभ गतिविधियों को बड़ी उत्सुकता से देखती रहती थी.
“छोटू, तुम्हें यह गाड़ी बहुत पसंद है?” एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया. “हां आंटी. यह बहुत सुंदर है. यह बहुत महंगी होगी?”
“हां, महंगी तो है. चाहो तो तुम भी ऐसी कार ख़रीद सकते हो, पर उसके लिए तुम्हें पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना पड़ेगा.”
“मुझे कौन पढ़ाएगा? मेरे बापू के पास इतना पैसा नहीं है. मेरे सात भाई-बहन हैं. सभी बापू के साथ कूड़ा बीनने में मदद करते हैं. सारे कूड़े में से हम रद्दी चीज़ें छांटकर अलग करते हैं, तब बापू उसे कबाड़ी को बेचते हैं. उसी पैसे से हमारे परिवार का ख़र्चा चलता है. हमारे पास रहने के लिए घर भी नहीं है. रेलवे लाइन के किनारे झोपड़ी डालकर हम सब रहते हैं. बहुत गंदी जगह है वह. वहां पढ़ाई नहीं हो सकती.” इतना बताकर छोटू उदास हो गया.
उस समय तो मैं घर आ गई, मगर कई दिनों तक मेरे मन में उथल-पुथल मची रही कि छोटू की मदद कैसे करूं? अपने पति से बात करने का अवसर खोज रही थी. उनकी व्यस्तता को देखते हुए उनसे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. अम्माजी से भी बात करना ठीक नहीं होगा. अंततः एक दिन अवसर खोजकर मैंने इनसे छोटू की बात छेड़ ही दी.
“सड़क पर जो सफ़ाई करने आता है, उसका बेटा पढ़ना चाहता है. क्या हम उसकी कुछ सहायता कर सकते हैं?” मैंने सीधे-सीधे इनसे प्रश्‍न किया.
“तुम इन सब पचड़ों में क्यों पड़ती हो? पढ़ाई क्या बच्चों का खेल है? बड़ी लंबी तपस्या है, जिसमें बच्चे के साथ-साथ उसके माता-पिता को भी लगना पड़ता है. कितना तो पैसा ख़र्च होता है? कौन करेगा उसकी आर्थिक सहायता?”
“भगवान की कृपा से हमारे पास सब कुछ है. सुदीप भइया की याद में हम हर वर्ष कुछ न कुछ दान करते ही हैं, उसकी जगह हम छोटू की पढ़ाई का ख़र्च उठाएं तो…” मैंने आशा भरी निगाहों से इन्हें देखा.
इनका छोटा भाई सुदीप बीस वर्ष की आयु में ही एक दुर्घटना का शिकार होकर हमसे सदा के लिए बिछड़ गया था. तब से उसकी याद में हम दान आदि करते आए हैं. सुदीप का नाम आते ही इनकी आंखें नम हो गईं. इन्होंने मेरे सुझाव पर अपनी स्वीकृति दे दी.
जल्द ही मैंने छोटू से इस विषय में बात की. पढ़ाई की बात सुनकर उसकी आंखें चमकने लगीं. “आंटी, क्या सच्ची में आप मुझे पढ़ाएंगी? पढ़ाई में तो बहुत ख़र्चा आता है.” उसने कई प्रश्‍न मुझसे पूछ डाले. “हां, हम तुम्हारी पढ़ाई का ख़र्चा देंगे. तुम्हें ख़ूब मन लगाकर पढ़ना होगा, तभी हम तुम्हारी मदद करेंगे.”
“मैं मन लगाकर पढ़ूंगा. आप मेरे बापू से बात कर लेना.”
जब मैंने छोटू के बापू से बात की, तो वह बड़ी कठिनाई से तैयार हुए. उनके तर्क भी ग़लत नहीं थे, पर आख़िर में मैंने उन्हें मना ही लिया. इस तरह छोटू का एडमिशन एक अच्छे स्कूल में करा दिया. उसकी क़िताबें, बस्ता, ड्रेस आदि की व्यवस्था के कारण कई दिन व्यस्तता में बीते.
वह पहले से ही थोड़ा-बहुत पढ़ना जानता था, इसलिए उसकी पढ़ाई तो ठीक से शुरू हो गई, लेकिन जल्द ही एक नई समस्या सामने आ खड़ी हुई. उसके पुराने मित्र उसका पढ़ना पसंद नहीं करते थे. उसे तरह-तरह से तंग करने लगे. कभी उसका बस्ता छिपाते, तो कभी उसकी क़िताबें फाड़ते. एक दिन तो उन्होंने उसे मारा भी. उसका स्कूल जाना असंभव-सा हो गया.
“मैडम जी छोटू की पढ़ाई बंद करानी होगी. हमारे आस-पास अच्छे लोग नहीं हैं. वे किसी की उन्नति नहीं देख सकते. आप बुरा मत मानना. छोटू के भाग्य में पढ़ना नहीं है.” इतना कहकर छोटू के पापा चुप हो गए.
“आप चिंता मत करो. मैं साहब से बात करके कुछ सोचती हूं.” मैंने उन्हें आश्‍वस्त करके भेज तो दिया, पर इस समस्या को कैसे सुलझाऊं, कुछ समझ नहीं पा रही थी.
कई दिन बड़ी उलझन में व्यतीत हुए. अंततः इन्होंने पूछ ही लिया, “देख रहा हूं तुम काफ़ी परेशान रहती हो.”
मैंने इन्हें छोटू के विषय में सारी बात बता दी. ये भी चिंतित हो गए. “कुछ तो करना ही होगा, वरना बच्चे का दिल टूट जाएगा.”
“देखो कुछ सोचता हूं.” कहकर इन्होंने मुझे आश्‍वस्त कर दिया. कभी-कभी मेरे मन में विचार आता कि छोटू को अपने घर पर रख लें. नहीं-नहीं, बच्चों ने उसे स्वीकार नहीं किया तो? उन दोनों की पढ़ाई पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा. अम्माजी भी क्या इस बात को स्वीकारेंगी? कितना तो छुआछूत मानती हैं. बड़े असमंजस में बीते कई दिन.
जल्द ही इन्होंने एक रास्ता खोज लिया. इनके बचपन के दोस्त की पत्नी बच्चों के एक अनाथालय की संचालिका हैं. उनसे बात करके छोटू के रहने की व्यवस्था हो गई. नए स्कूल में उसका एडमिशन करा दिया गया. नाम दिया गया ‘आर्यन’. धीरे-धीरे आर्यन वहां के वातावरण में घुल-मिल गया. हम भी अक्सर उसे वहां मिलने जाते. पैरेंट्स मीटिंग में भी हम दोनों ही जाते. हमने विधिवत् उसकी सारी ज़िम्मेदारी उठा ली थी. एक तरह से वह अब हमारा मानस पुत्र बन गया था.
समय बीतता गया. हमारे दोनों बच्चे उच्च शिक्षा के लिए बाहर चले गए. आर्यन ने दसवीं, बारहवीं की परीक्षा में 90% अंक प्राप्त किए. वह बहुत ही मेधावी बच्चा साबित हुआ. उसका सामान्य ज्ञान बहुत ही विलक्षण था. बारहवीं की परीक्षा पास करने से पहले ही उसका चयन ‘युवा वैज्ञानिक खोज परीक्षा’ में हो गया था. उसे छात्रवृत्ति भी मिली. इंजीनियरिंग की परीक्षा में भी उसका चयन हुआ, लेकिन उसने वैज्ञानिक बनना पसंद किया. अतः वह यहां बंगलुरू पढ़ने आ गया. समय पंख लगाकर उड़ने लगा. वह छुट्टियों में हमारे पास ही आकर रहता.
अम्माजी का उससे विशेष लगाव हो गया था. वह सुदीप की जगह उसे देखने लगी थीं. हमारी यह धारणा निर्मूल सिद्ध हुई कि वह आर्यन को स्वीकार नहीं करेंगी. उन्होंने उसे कभी शोभना और गगन से अलग नहीं माना. गगन और शोभना पढ़ाई पूरी करके अपनी दुनिया में मस्त हो गए थे. गगन एयरफोर्स में इंजीनियर है. अपनी पत्नी व बेटी के साथ पूना में रहता है. शोभना चार वर्ष के लिए अपने पति के साथ अमेरिका गई है. इस तरह देखा जाए, तो आजकल आर्यन ही हमें व्यस्त किए हुए है.
इन्होंने मेरे कंधे को पकड़कर मुझे हिलाया, तो मैं वर्तमान में लौटी. कितनी देर मैं अतीत में खोई रही, इसका मुझे भान ही नहीं हुआ. सभी हमें आर्यन की शानदार सफलता के लिए बधाइयां दे रहे थे. हम आर्यन के मम्मी-पापा को भी साथ लाए थे. उनकी प्रसन्नता का पारावार नहीं था.
आर्यन की इच्छा अभी उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने की है, यह जानकर हमें प्रसन्नता ही हुई. इन्होंने उसे स्वीकृति दे दी. उसने एमएस के लिए परीक्षा दी. उसका चयन अमेरिका की यूनिवर्सिटी में हो गया. उसकी पढ़ाई का सारा ख़र्च एक प्रतिष्ठित कंपनी ने उठाया. पढ़ाई पूरी करने के पश्‍चात् उसका भारत लौटना, भारतीय वैज्ञानिक संस्थान में नौकरी लगना, ये सब घटनाक्रम बहुत तेज़ी से घटित हुआ. उसके मम्मी-पापा उसके साथ रहने आ गए. समय बीत रहा था. अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में आर्यन एक नामचीन वैज्ञानिक के रूप में प्रसिद्ध होता जा रहा था और अमेरिका के अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान से उसे नौकरी का निमंत्रण मिला. अमेरिका जाकर उसे इतनी ख्याति मिली कि उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा. वर्षों गुज़र गए. हाल ही में उसे भारत के प्रसिद्ध रिसर्च संस्थान से बुलावा आया, जो उसने स्वीकार कर लिया.
एक दिन आर्यन ने मुझे फोन किया और एक घटना के बारे में बताया कि उसका मन उचाट हो रहा था. भीतर बहुत घुटन महसूस कर रहा था, तो वह यूं ही समुद्र के किनारे टहलने चला गया था. उसने अपनी कार खड़ी कर दी और एक पत्थर पर बैठकर समुद्र की लहरों को निहारने लगा. वह वहां बैठा ही था कि उसकी दृष्टि अपनी कार की तरफ़ गई, जहां एक 7-8 वर्ष का बच्चा बड़ी हसरत से उसकी महंगी चमचमाती कार को देख रहा था. वह बार-बार उचककर उसके अंदर देखने का प्रयास कर रहा था. यह दृश्य देखकर वह अतीत में खो गया. उसकी आंखों के सामने उसके बचपन से लेकर आज तक का जीवन प्रत्यक्ष खड़ा हो गया.
उसे याद आया हमारा प्यार, उसे याद आया वह अनाथालय, जहां उसने अपने बचपन के कई वर्ष व्यतीत किए. वह सोचने लगा कि हमसे मिले भी तो उसे अरसा बीत गया था. गगन और शोभना दीदी से तो बस फोन का ही संबंध रह गया है. उसके मम्मी-पापा भी स्वर्गवासी हो चुके हैं.
वो मन ही मन सोचने लगा, कहां खो गया हूं? पैसा और पद, इन चीज़ों के पीछे भागते-भागते कितना कुछ अमूल्य पीछे छूट गया. पीछे छूट गए वे कोमल रिश्ते, जिनके संबल से वह यहां तक पहुंच सका. उसका अन्तस उसे कचोटने लगा. तब उसने निर्णय लिया कि अब वो अपनी ग़लतियां सुधारेगा. हम दोनों को भी जल्द ही अपने पास ले आएगा. अनाथालय के बच्चों के लिए भी ज़रूर कुछ करेगा. इतना सोचने के बाद उसकी दृष्टि अपनी कार की तरफ़ फिर गई, जहां वह छोटा बच्चा अभी भी कार को बड़ी हसरत से निहार रहा था. कहीं यह उसका प्रतिबिंब तो नहीं, जो आर्यन बनने को छटपटा रहा है. उसके लिए कुछ करने के संकल्प के साथ वह उठा और अपनी गाड़ी की तरफ़ चल दिया.

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