हिंदी कहानी- बालू घड़ी (Hindi Short Story Balu Ghadi)

Hindi Short Story
“नहीं…नहीं… मैं तुझे इस बार जीतने नहीं दूंगी.” स्टूल पर बैठी-बैठी गौरी जैसे फुफकार उठी.
“सुनो बाई.” नर्स ने गौरी का कंधा हिलाया तो उसकी तंद्रा टूटी.
“सारा टेस्ट एक बार फिर करना पड़ेगा. बड़े डॉक्टर ने बोला है.”
“विजय बच तो जाएगा न?” गौरी ने जैसे बुदबुदाते हुए नर्स से पूछा.
“तुमको कौन बोला कि नही बचेगा. इधर हास्पिटल में पेशंट ठीक होने के वास्ते इच आते हैं.”

समय जैसे ठहर गया था. घड़ी का कोई कांटा आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रहा था. घड़ी बंद नहीं थी. फिर भी एक-एक पल घंटों के समान लग रहा था.
गौरी घुटने टेकने के लिए तैयार नहीं थी. वह लड़ना चाहती थी. वैसे भी ज़िंदगीभर उसने किया ही क्या है, लड़ती ही तो रही है. कभी अपने लिए, तो कभी अपनों के लिए.
अपने दिल के टुकड़ों को कलेजे से लगाए गौरी जिस निश्‍चय के साथ मुंबई की धारावी झोपड़पट्टी के अपने खोली में लौटी थी, क्या उस निश्‍चय को आज वह बिना लड़े टूट जाने देगी? इंदिरा नगर की इस बस्ती में हर घर अपनी-अपनी ज़िंदगी से जुड़े संघर्षों में जुटा था. यही संघर्ष इन अलग-अलग जाति, धर्म, प्रांत के लोगों के बीच एक सेतु था, जहां सब अक्सर एक-दूसरे का दु:ख बांटते रहते थे.
दस साल पहले उसके सीने से जो सिसकारी उठी थी, एक बार फिर वह सिसकी बनकर फूट पड़ना चाहती थी. गौरी की सूनी आंखें कार्डियोग्राम मशीन को देख रही थीं. उसकी आंखों में बार-बार समंदर छलछलाने की कोशिश करता था. जब-जब आंसुओं का आवेग बाहर निकलने को होता, तब-तब गौरी अस्पताल के उस खाट को कसकर पकड़ लेती, जिस पर उसका बेटा बेसुध पड़ा था. दस साल पहले उसका पति भी इसी तरह बेसुध हुआ होगा, लेकिन उसकी सुध लेने के लिए गौरी उस व़क़्त उसके पास नहीं थी. कभी-कभी वह चौंक उठती कि इस बिस्तर पर मृत्युशय्या पर पड़ा हुआ उसका बेटा है या पति. आज रह-रहकर उसे अपने स्वर्गीय पति की छाया दिख जाती थी.
उसकी निगाह कार्डियोग्राम मशीन पर टिकी हुई थी. टकटकी लगाकर वह अपने बेटे के दिल की धड़कनों को महसूस कर रही थी. यूं तो पिछले सत्रह साल में उसने अपने बेटे को हर पल महसूस किया था, लेकिन आज की बात कुछ अलग थी. दृढ़ निश्‍चय की मिसाल मानी जाने वाली गौरी पर आज रह-रहकर बेबसी हावी हो जाती थी. समय उसकी बंद मुट्ठी को फिर से खुलवा लेना चाहता था. वह भयभीत थी और महसूस कर रही थी कि जैसे वह एक ‘सैंड ग्लास’ में तब्दील हो गई है और व़क़्त सूराख से रेत की तरह उसके हाथों से फिसला जा रहा है.
गौरी रोना नहीं चाहती थी. आज उसने तय कर लिया था कि वह लड़ेगी मौत से. मज़ाक नहीं है कि कोई उसके जवान होते बेटे को उससे छीन कर चलता बने. गौरी का मन यहां से वहां तेज़ी से दौड़ रहा था.
गौरी को पढ़ाने का बड़ा शौक़ था. बारहवीं पास होते ही वह ब्याह दी गई थी. उसका पति मुंबई में किसी फैक्टरी में सुपरवाइज़र था, जो साल में एक बार गांव आता था. ससुरालवालों से मिन्नतें कर उसने तीन साल में अपना ग्रेज्युएशन पूरा कर लिया. फिर उसने बी.एड. को अपना लक्ष्य बनाया, पर यह आसान नहीं था. दो बेटे उसकी गोद में आ चुके थे. तीसरी बार फिर वह मां बनने वाली थी. आख़िर डेढ़ साल बाद उसे बी.एड. में एडमिशन मिला. अपनी दुधमुंही बच्ची को छोड़ गांव से वह 30 कि.मी. दूर कॉलेज में पढ़ने जाती. साल भर बाद बी.एड. की डिग्री उसके पास थी.
पति जब पहली बार उसे अपने साथ मुंबई लेकर आए तो उसकी उम्मीदों की कोंपले फूटने लगी थीं. बेहतर ज़िंदगी के सपनों के हरे-हरे पत्ते संघर्ष की शाखों पर उगने लगे थे. इससे पहले कि वह ख़ुशी के पेड़ पर झूला डालकर आसमान में उड़ते बादलों से गलबहियां करती. समय ने उसे एक ज़ोर की ठोकर मारी और वह धड़ाम से नीचे गिर पड़ी लहूलुहान होकर.
मार्च का महीना था. उसके पति बड़े भाई की बीमारी की ख़बर सुनकर जौनपुर चले गए थे. गौरी उसी साल मुंबई के एक स्कूल में टीचर नियुक्त हुई थी. ऐन परीक्षा का व़क़्त था, इसलिए वह पति के साथ गांव नहीं जा सकी थी. मगर स्कूल की यह परीक्षा उसके जीवन की परीक्षा निकली. उसे पति की मौत की ख़बर मिली. चौथे दिन जब वह तीनों बच्चों समेत रोते-कलपते गांव पहुंची, तो पति की राख के ही दर्शन हुए. गांव में भरा-पूरा घर था, लेकिन ठाकुर परिवार की बहू ने पर्दे से निकल कर अपने बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य के लिए मुंबई आकर ख़ुद को संघर्षो की भट्ठी में झोंक दिया.
उसने ज़िंदगी फिर जीने की कोशिश की, मगर समय के बेरहम हाथों ने उसे फिर चोट दी. “नहीं…नहीं… मैं तुझे इस बार जीतने नहीं दूंगी.” स्टूल पर बैठी-बैठी गौरी जैसे फुफकार उठी.
“सुनो बाई.” नर्स ने गौरी का कंधा हिलाया तो उसकी तंद्रा टूटी.
“सारा टेस्ट एक बार फिर करना पड़ेगा. बड़े डॉक्टर ने बोला है.”
“विजय बच तो जाएगा न?” गौरी ने जैसे बुदबुदाते हुए नर्स से पूछा.
“तुमको कौन बोला कि नही बचेगा. इधर हास्पिटल में पेशंट ठीक होने के वास्ते इच आते हैं.”
नर्स के रूखे शब्दों में गौरी को अपने बेटे को नया जीवन मिलता हुआ दिखाई देने लगा. नर्स से आश्‍वासन पाकर गौरी जूनियर डॉक्टर का यह वाक्य भूल जाना चाहती थी कि उसके बेटे के दिल की धड़कनें गिनी-चुनी ही बची हैं. लेकिन बरबस ही उसकी धड़कनें बढ़ने लगीं. वह अपने बेटे को कस कर भींच लेना चाहती थी, पर तब तक नर्स और वार्डब्वाय उसे स्ट्रेचर पर डाल कर फ़ाइनल टेस्ट के लिए लेकर चले गए. बेटे को इस तरह जाता देख गौरी को पसीना छूटने लगा. उसका हलक उछल कर जैसे गले में आ गया. कनपटियां गरम हो गईं. सिर घूमने लगा. वह किसी अनहोनी के भय से मुक्त होना चाहती थी, डर का शिकंजा उसके इर्द-गिर्द कसता जा रहा था.
अचानक एक चीख से उसकी मूर्च्छा लौटी. वार्ड में गहमा-गहमी बढ़ गई थी. डॉक्टर, नर्स, वार्डब्वाय एक साथ बेड नंबर 21 के मरीज़ की सांसों को टूटने से रोकने का प्रयास कर रहे थे. वह एक सात-आठ साल का बच्चा था. धीरे-धीरे डॉक्टरों की कोशिश रंग लाई और बच्चे का दिल पहले की तरह धड़कने लगा. गौरी ने इससे पहले मौत को कभी इतने क़रीब से नहीं देखा था. उसका टूटता विश्‍वास बढ़ने लगा था. इस गहमा-गहमी में कब डेढ़ घंटा बीत गया, गौरी को पता ही नहीं चला. अब उसे यक़ीन हो चला था कि उसका विजय मौत को हरा देगा.
गौरी के दिल को थोड़ी तसल्ली-सी हुई. उसकी पलकें मुंद-सी गईं. उसके होंठों से दर्द की एक सिसकारी फूटी. लगातार पांच रातों से जागते हुए आंखें सूज-सी गईं थीं. उसे लग रहा था कि आंखों में किसी ने रेत झोंक दी है. दर्द के बावजूद वह आंखें बंद किए रही. वह इस दर्द को भी पार कर जाना चाहती थी. इस बीच घड़ी की सुइयां कितने घंटे पार कर गईं, उसे पता ही नहीं चला. जब उसने आंखें खोलीं तो शाम पूरे वार्ड में पसर चुकी थी. उसने बिस्तर पर नज़र दौड़ाई तो उसका दिल धक से रह गया. यह क्या? उसके बेटे को अभी तक लाया नहीं गया था. वह नर्स की ओर दौड़ी. नर्स ने उसे बताया कि उसके बेटे को आईसीसीयू में फिर से भर्ती कर दिया गया है. वह सकते में आ गई, क्योंकि डॉक्टर ने उसे उम्मीद जताई थी कि आज शाम तक उसके बेटे को डिस्चार्ज कर दिया जाएगा.
गौरी भागती हुई आईसीसीयू में पहुंची. धुंधले कांच के दरवाज़े के पारदर्शी हिस्से से उसने अंदर झांक कर अपने बेटे को देखा. नर्स बता रही थी कि इऩ्फेक्शन पूरी तरह से गया नहीं है. आज की रात वह और काट ले.
वह वहीं पास पड़ी बेंच पर धड़ाम से बैठ गई. जी चाहा कि वह फूट-फूट कर रो दे, मगर उसने अपनी हिम्मत को टूटने नहीं दिया. इन दस सालों में बार-बार उसके धैर्य की परीक्षा हुई है. उसने बलपूर्वक अपनी रुलाई को रोके रखा. उसके चेहरे पर जैसे चिंगारियां छिटक-छिटक जाती थीं. हाथ-पैर ठंडे पड़ चुके थे उसके. लकड़ी के बेंच पर बैठी गौरी फटी आंखों से अस्पताल की छत को घूरे जा रही थी. छत पर एक बड़ी-सी छिपकली एक कीट
पर घात लगाए थी. उसकी लपलपाती हुई जीभ गौरी को अपनी ओर बढ़ती दिखी. वह झटके के साथ उठ खड़ी हुई. खड़े होते ही वह अपना संतुलन खो बैठी. सहारे के लिए उसने अपनी बांहें दीवार पर फैला दीं.
गौरी ने अपनी आंखें भींच रखी थीं. इस दीवार पर वह भी एक छिपकली की तरह टंग गई थी. अचानक दीवार उसे तेज़ी से घूमती हुई लगी. उसके चारों तरफ़ एक भंवर बन गया था. वह क्षुद्र-सी उस महाकाय भंवर में समा चुकी थी. एक ऐसा भंवर जहां समय भी न था, वहां न अंधेरा था, न प्रकाश. न ध्वनि थी, न निस्तब्धता. न स्पर्श था, न गंध और न ही कोई एंद्रिक अनुभूति. उसका अपना आकार खो गया था. वायु के समान पतली, मगर स्थिर-सी. बस एक चेतना रह गई थी, जो सर्वत्र व्याप्त थी.
तभी एक महाविस्फोट हुआ. ध्वनि की तरंगें वर्तुलाकार फैलने लगीं. एक तरंग आई, जिसने उसे उछालकर बालू के बवंडर से ऊपर की ओर कर दिया. अस्पताल की ठंडी फ़र्श पर उसे अपना संज्ञाहीन शरीर पड़ा दिखा. तभी उसके शरीर में एक सुराख उभर आया, जिसमें वह बालू की तरह समाती चली गई. हठात् उसकी समस्त इंद्रियां जागृत हो उठीं. वह अपनी संपूर्ण चेतना के साथ त्रास भरे इस लोक में फिर लौट आई थी. बिजली की गति से वह उठ खड़ी हुई. उसने आईसीसीयू में अंदर झांक कर देखा. उसके बेटे की उल्टियां थमने का नाम नहीं ले रही थीं. वह बेटे का सीना सहलाना चाहती थी. उसके माथे को कस कर दबाना चाहती थी, मगर उसे अंदर जाने की इज़ाज़त नहीं थी, वह गिनती रही- एक…दो…तीन…नौ और दस. इन चार घंटों में उसका बेटा दस उल्टियां कर चुका था. अस्पताल की घड़ी ने भी दस बजाए. एक घंटा और बीता. नर्स बाहर निकल कर आई. वह गौरी को देखकर सहानुभूति वाले अंदाज़ में मुस्कुराई, गौरी को विश्‍वास हो गया कि अब सब ठीक है.
गौरी को लगा कि उसका दुर्भाग्य हार गया है. मुश्किल का समय बीत चुका है. जिस बीमारी ने दस साल पहले उसके पति को मौत के मुंह में ढकेल दिया था, आज गौरी के बेटे ने उस पर विजय पा ली है.
कल्पना में खोई गौरी ने मुदित मन से आईसीसीयू में झांक कर देखा. डॉक्टर उसके बेटे का ऑक्सीजन मास्क निकाल रहा था. वह बदहवास-सी अंदर भागी. उसने देखा कार्डियोग्राम मशीन पर जीवन की रेखाएं ठहर गई थीं. उसकी नज़र बेटे की ओर घूमी. विजय का चेहरा तेज़ विहीन हो गया था. स्तब्ध गौरी एक बालू घड़ी की तरह खड़ी थी, जिसमें उसके बेटे की ज़िंदगी रेत की तरह फिसल कर मौत के खाने में गिर चुकी थी.

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              सुमन सारस्वत