कहानी- छोटी-सी बात

                 सुषमा मुनीन्द्र

 

कमाल की बात सुन विकास और सारा ने एक-दूसरे को देखा. लगा एक अलग दुनिया में आ गए हैं. यह यात्रा सचमुच एक हादसा साबित होनेवाली है. ये मुन्ना नहीं कमाल है. वह आसिफ है. वह फरहत. कमाल हमारे लिए अजनबी है.

 

सेल फोन पर नवल का कॉल है. “विकास, मैं नवल बोल रहा हूं.”
“ओ… नवल… यूएस में अभी कितना बजा है?”
“मैं छुट्टियों में समस्तीपुर आया हूं. सुनो, मेरे पास एक प्लान है. चंडाल चौकड़ी मेरे घर में धमाल मचाएगी. प्रसून और शिव अपनी गर्लफ्रेंड्स के साथ आ रहे हैं. तुम भी अपनी पत्नी को लेकर आओ. मैं उनके साथ थोड़ा फ्लर्ट कर लूंगा और हम सब यहां से नेपाल घूमने जाएंगे.”
विकास को लगा वह ऐसे ही किसी प्रस्ताव का इंतज़ार कर रहा था. उसे छात्रावास की याद आ गई. वह और नवल रूम पार्टनर थे. ठीक बगल के रूम में प्रसून और शिव रहते थे. चारों में ऐसी दोस्ती हो गई कि विद्यार्थी इन्हें चंडाल चौकड़ी कहने लगे थे. अब पूरे पांच साल बाद चारों मित्रों से मुलाक़ात होगी. सारा वैसे भी कहती है कि हम कभी आउटिंग पर नहीं जाते. अच्छा मौक़ा है. विकास ने ब्रोकर को कॉल करके तीन तारीख़ नोट करा दी कि जिस तारीख़ का आरक्षण मिल जाए, वह उसी दिन समस्तीपुर चल पड़ेगा.
“सर, एक अप्रैल का
रिज़र्वेशन मिला है. एक अप्रैल को रविवार है. रविवार को पवन एक्सप्रेस मुज़फ्फरपुर तक ही जाती है.
मैंने समस्तीपुर तक आपका रिज़र्वेशन करा दिया है. पवन रात बारह-एक बजे मुज़फ्फरपुर पहुंचेगी. सुबह समस्तीपुर के लिए कई ट्रेन हैं.
एक-डेढ़ घंटे में आप पहुंच जाएंगे.” ब्रोकर ने कहा.
घर पहुंचकर विकास ने सारा को पूरी बात बताई. “नेपाल तो ठीक है, लेकिन ये रिज़र्वेशन मेरी समझ में नहीं आ रहा है. हम आधी रात को मुज़फ्फरपुर में उतरेंगे. सुना है कि मुज़फ्फरपुर सेफ जगह नहीं है.” सारा ने शंका जताई.
“सब हो जाएगा. स्टेशन पर चार-छह घंटे किसी तरह बिता लेंगे. सुबह समस्तीपुर के लिए ट्रेन पकड़ लेंगे.”
सुबह आठ बजे विकास और सारा पवन एक्सप्रेस में बैठ गए. सामने की लोअर और अपर बर्थ के यात्री सो रहे थे. साइड अपर बर्थ का यात्री कंबल तानकर सो रहा था, जबकि साइड लोअर बर्थ पर तनकर सजगता से बैठा यात्री एक-एक दाना चना उछालकर
मुंह में लपक रहा था. वह लंबा-सांवला युवक, कपड़ों से एसी टू कोच में यात्रा करने के योग्य नहीं लग रहा था. सारा हिकारत से भर गई. ऐसे लोग एसी कोच में यात्रा करने लगे हैं, जिन्हें न तमीज़ है, न तरीक़ा. युवक ने सहसा सारा पर नज़र डाली. सारा दूसरी ओर देखने लगी. युवक ने ऊंची आवाज़ में साइड अपर बर्थ पर सोये यात्री से कहा, “फूफा चना खाओगे?”
“नहीं.” फूफा ने करवट बदल ली.
युवक ने शेष बचे चनों को झोले में रख दिया और सारा की बर्थ के ठीक पीछेवाली बर्थ में जाकर उस बर्थ के यात्रियों से ऊंची आवाज़ में बात करने लगा. उसकी तेज़ आवाज़ ने सारा की हिकारत बढ़ा दी. एसी कोच की एक सभ्यता और शांति होती है, जिसे ये युवक तोड़ रहा है.
विकास को यात्रा में बहुत नींद आती है. बोला, “सारा, खाना खा लें. फिर मैं सोऊंगा.”
सारा ने खाना निकाला. पूरी-अचार की महक से शायद फूफा की भूख जाग गई. वह बर्थ से नीचे उतरा. युवक नदारद. इधर-उधर देखते हुए ज़ोर से बोला,
“मुन्नाऽऽऽ…”
युवक अर्थात् मुन्ना लपकती-सी चाल से आ गया. “हां फूफा.”
“खाना निकालो.”
मुन्ना और फूफा खा रहे थे, तभी वहां तीन-चार साल की बच्ची आ गई. मुन्ना ने उसे दो पूरियां दीं, “गुड़िया, पूरी खा.”
गुड़िया हंसते हुए पूरी छीनकर भाग गई.
फूफा ने खाना जल्दी ख़त्म कर लिया. मुन्ना बोला, “फूफा, और थोड़ा खा लो. फिर हाजीपुर पहुंचकर ही खाओगे.”
“तुम खाओ. तुम इस तरह झोला भरकर सामान बांध लाए हो, जैसे महीनेभर के समुद्री सफ़र के लिए निकले हो.”
“ट्रेन में हमको बहुत भूख लगता है फूफा.”
हाजीपुर का नाम सुन विकास सारा से अंग्रेज़ी में बोला, “तुम मुज़फ्फरपुर को लेकर डरी हुई हो. मुन्ना बिहारी जान पड़ता है. गाइड लाइन लेनी चाहिए.”
“पूछो.” सारा ने अनायास मुन्ना को देखा.
मुन्ना अंग्रेज़ी भाषा नहीं जानता, पर कुछ वर्षों से मुंबई में रहने से समझने लायक अर्थ निकाल लेता है. उसने समझ लिया मुज़फ्फरपुर की बात हो रही है. उसे बात करने का अच्छा शौक़ है. उसने पहल करते हुए कहा, “तब से आप लोग चुप बैठे हैं. अब थोड़ा-सा बोले हैं. आपके पहले इस बर्थ पर दो जनाना थीं. हमारे साथ कुर्ला से ट्रेन में चढ़ी थीं. इतना बोल रही थीं कि हमको तो नींद नहीं आया.”
विकास ने पूछा, “आप समस्तीपुर जा रहे हैं?”
“दरभंगा. हाजीपुर से फूफा को उतरना है. मैं मुंबई में रहता हूं. सिनेमा हॉल में गेट कीपर हूं. एसी डिब्बा में पहली बार बैठा हूं. बहुत दिनों से पैसा जोड़ रहा था कि इस बार घर एसी डिब्बा से जाऊंगा. इतना महंगा टिकट, लेकिन मज़ा नहीं आ रहा है. सब लोग इस तरह सो रहा है, जैसे सोने ही आया है. सफ़र में थोड़ा झंझट, थोड़ा परेशानी न हो, तो लगता है सफ़र नहीं किए हैं. मज़ा नहीं आ रहा है. उधर एक फेमिली बैठा है, वह गुड़िया जिसको हम पूरी दिया, उस फेमिली से और उधर, दो-चार लोगों से फ्रेंडशिप हुआ. आप कहां जा रहे हैं?”
“समस्तीपुर, पर हमको मुज़फ्फरपुर उतरना होगा. सुनते हैं मुज़फ्फरपुर में कुछ डिस्टर्बेंस रहता है.”
“लोग जैसा बताते हैं, बिहार में वैसा बदहाली नहीं है. बाकी तो बताइए डिस्टर्बेंस कहां नहीं है?”
सारा को मुन्ना सीधा-सरल लगा. आवाज़ तीखी है, लेकिन एक सोच और मिठास है. चेहरे में न जाने किस बात की कामयाबी-सी दिख रही है. बोली, “इतनी रात को मुज़फ्फरपुर के स्टेशन में रुकना पड़ेगा, सोचकर परेशानी-सी लग रही है.”
मुन्ना ने समझाया, “मुज़फ्फरपुर में थोड़ा-बहुत बदमासी होती है. आधी रात को स्टेशन से बाहर होटल ढूंढ़ने नहीं जाइएगा.”
सारा ने दहशत में कहा, “प्लेटफॉर्म पर ही पड़े रहना होगा क्या?”
मुन्ना ने तसल्ली दी, “देखो बहिनजी, हमको मुज़फ्फरपुर में रुकना पड़ेगा. दरभंगा के लिए सुबह गाड़ी मिलेगा. वो जो फेमिली है… वह गुड़िया, वो भी दरभंगा जा रहा है. ऊ लोग रेलवेवाले हैं. पास लिए हैं. रिटायरिंग रूम में रुकेंगे. मैं उनके साथ एडजस्ट हो जाऊंगा. आप भी हो जाना. चार-पांच घंटा का बात है. स्टेशन में या वेटिंग रूम में बैठना ठीक नहीं़ होगा. आलतू-फालतू लोग घूमता रहता है.”
सारा को तसल्ली मिली, “मुन्ना भाई, आप अच्छे मिल गए.”
मुन्ना खुलकर हंसा, “चार दिन की ज़िंदगी है. प्यार-मोहब्बत से जी लें. हमको लोगों से बात करना अच्छा लगता है.”
“चलो थोड़ा सो लिया जाए.” कहकर विकास ने कंबल ओढ़ लिया.
सारा भी लेट गई. सारा और विकास जब शाम को जागे, तो मुन्ना ने कहा, “सर उठ गए आप? मैं उस फेमिली से आपकी मुलाक़ात करा देता हूं.”
मुन्ना एक समवयस्क युवक को बुला लाया. विकास की ओर संकेत कर बोला, “इन लोगों को भी मुज़फ्फरपुर में रुकना है. आप इंतिजाम कर दोगे न?”
“हां, कोई द़िक्क़त नहीं है.”
मुन्ना प्रसन्न हो गया. “बहिनजी, आपकी परेशानी दूर हो गई. बिहार जंग का मैदान नहीं है कि साबूत लौट नहीं पाएंगे.”
युवक अपनी बर्थ पर चला गया. मुन्ना संतरा छीलकर खाने लगा. बीच-बीच में जानकारी भी देता रहा, “थोड़ी देर में हम हाजीपुर पहुंच जाएंगे. पहले एक बड़ा पुल पड़ेगा. पुल से गाड़ी गुजरती है, तो मार भड़… भड़ कर सोर होने लगता है… बड़े पुल के बाद हाजीपुर. मुज़फ्फरपुर अभी दूर है. अरे! पुल निकल गया? एसी डिब्बा में बैठे हैं, तो कुछ बुझाता नहीं है.” मुन्ना की कॉमेन्टरी मुज़फ्फरपुर पहुंचकर बंद हुई. सारा और विकास अपना सामान लेकर प्लेटफॉर्म पर आ गए. पीछे से फुर्तीली छलांग लगाकर मुन्ना कूदा, “सर, आप लोग यहीं ठहरें. आपको इधर का कुछ मालूम नहीं है. मैं बताता हूं किधर चलना है.”
ऊंघता हुआ प्लेटफॉर्म. आधी रात का डर, विकास और सारा पूरी तरह मुन्ना पर निर्भर हो गए. युवक के साथ काफ़ी सामान था. ट्रेन से उतारने में मुन्ना ने मदद की. रेशमी सलवार-कुर्ता पहने, सिर पर दुपट्टा डाले हुए गुड़िया की मां ने गुड़िया को गोद में संभाल रखा था. गुड़िया की मां दुपट्टा ठीक करने लगी और इसी बीच गोद से छूटकर गुड़िया इधर-उधर भागने लगी. युवक ने गुड़िया की मां को सतर्क किया, “फरहत, गुड़िया को पकड़ो. पटरी में गिर जाएगी.”
फरहत गुड़िया को आवाज़ देने लगी.
मुन्ना युवक से बोला, “आसिफ भाई, आप चलो. रूम का इंतजाम करो. मैं सबको लेकर आता हूं.”
“ठीक है कमाल.”
आसिफ दो भारी बैग लेकर चला. कमाल अर्थात् मुन्ना विकास से बोला, “रिटायरिंग रूम उधर है. वो उधर पुल पार कर प्लेटफार्म एक पर जाना पड़ेगा. आइए.”
कमाल की बात सुन विकास और सारा ने एक-दूसरे को देखा. लगा एक अलग दुनिया में आ गए हैं. यह यात्रा सचमुच एक हादसा साबित होनेवाली है. ये मुन्ना नहीं कमाल है. वह आसिफ है. वह फरहत.
कमाल हमारे लिए अजनबी है. अजनबी ही नहीं, मुसलमान है. इतनी आत्मीयता जो दिखा रहा है, क्या पता कोई चाल हो. चाल न भी हो, पर इनके साथ एक रूम में रुकना सुरक्षित नहीं है. सारा विकास के पास आकर अंग्रेज़ी में फुसफुसाई, “ये लोग मुस्लिम हैं. हम इनके साथ नहीं ठहर सकते. अलग रूम मिल सकता है?”
“पता नहीं.”
“वेटिंग रूम, प्लेटफॉर्म पर कहीं भी बैठे रहेंगे.” सारा ने कहा.
विकास बोला, “सेफ नहीं होगा. इनके साथ चलते हैं. देखें रिटायरिंग रूम कहां है?”
कमाल ने दख़ल दिया, “मुज़फ्फरपुर का बदनामी सुन आप कितना परेशान हैं. आइए हमारे साथ.”
“आइए.” आग्रह कर रही फरहत के चेहरे पर नर्म हंसी थी. सारा को वह हंसी साज़िश की तरह लग रही थी, लेकिन कमाल के साथ जाने के अलावा दूसरा विकल्प न था.
पुल पार कर मुख्य प्लेटफॉर्म से लगे ब्लॉक रूम के सामने जाकर कमाल थम गया. सामान वहीं रख कर बोला, “देखता हूं आसिफ भाई क्या इंतजाम कर रहे हैं.”
कमाल क्लॉक रूम में चला गया. उसके ठीक पीछे था विकास. क्लॉक रूम में नाइट शिफ्ट कर रहे बाबू से आसिफ कुछ बात कर रहा था. विकास ने पूरी तरह अधीर होकर बाबू से कहा, “मुझे अलग रूम मिल सकता है?”
सुनकर कमाल भ्रमित हो गया. “सर, आप तो हमारे साथ… आसिफ भाई, इन जनाब (बाबू) से बात कर लिए हैं.”
विकास ने कमाल को उपेक्षित कर बाबू से कहा, “मुझे अलग रूम चाहिए.” विकास के व्यवहार पर कमाल और आसिफ एक-दूसरे को देखने लगे. आधी रात को नींद ख़राब होने से बाबू खीझा हुआ था. विकास की बात सुन उसने तीखे स्वर में कहा, “अभी तो ये बताए कि आप लोग एक साथ हैं या अलग?”
“एक साथ हैं.” कमाल ने दोहराया.
व्यक्तित्व का अपना एक प्रभाव होता है. कमाल बहुत साधारण जान पड़ता था, जबकि विकास एलीट क्लास का लग रहा था. बाबू ने अपनी खीझ कमाल पर उतारी, “आप अजीब आदमी हैं. ये साहब कुछ कह रहे हैं. आप कुछ कह रहे हैं.”
“मैं ठीक कह रहा हूं.” कमाल अड़ा रहा.
आसिफ शांत था. मानो वह उसका नहीं, कमाल और विकास का मतभेद है. विकास ने तेज़ी से फॉर्म भरा और सारा के साथ रूम की ओर चला गया. सारा बाथरूम में गई. पानी नहीं था. “विकास, बाथरूम में पानी नहीं है, लेकिन इस अलग रूम में आराम है. उनके साथ एक कमरे में रहने की कल्पना भी करूं, तो बेचैनी होती है. बस, सुबह किसी तरह समस्तीपुर पहुंच जाएं.”
नींद नहीं आनी थी, नहीं आई.
टूटती-बिखरती झपकी ज़रूर आई. उसी झपकी में लगा कोई दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है. विकास हड़बड़ा गया, “कौन है?”
“मैं मुन्ना. हमारे बाथरूम में पानी नहीं है. आपके बाथरूम में भी नहीं होगा. एक बाल्टी पानी लाया हूं.”
रोशनदान से दिन होने का आभास मिल रहा था. रात के अंधेरे वाला डर ख़त्म हो रहा था. विकास ने दरवाज़ा खोल दिया. कमाल जल्दी-जल्दी कहने लगा, “आसिफ भाई बोले रेलवे में बड़ी बदइंतजामी है. पानी सात बजे चालू होगा. लेकिन आपका ट्रेन जल्दी आएगा. जल्दी तैयार हो जाएं. मैं आपको ट्रेन में बैठा दूंगा. दरभंगावाला हमारा ट्रेन नौ बजे आएगा.”
“थैंक यू यार.” कहते हुए विकास ने कमाल को देखा. कमाल की आवाज़ की मिठास और चेहरे की कामयाबी गायब थी. विकास को अपने आचरण पर शर्म आई. सलीके से कह सकता था कि कमाल एक रूम में इतने सारे लोगों को असुविधा होगी. रूम उपलब्ध है, इसलिए मैं अलग रूम ले लेता हूं. लेकिन उसने कमाल को पूरी तरह अनदेखा, बल्कि उपेक्षित कर अलग रूम की मांग की और चलता बना. उसे अब कमाल का सामना करने में शर्म आ रही है.
“सारा, जल्दी तैयार हो जाओ. निकलना है.” विकास ने कहा.
सारा और विकास प्लेटफॉर्म पर आ गए. कुली से समस्तीपुर जानेवाली ट्रेन की जानकारी ली. कुली ने बताया यह जो ट्रेन सामने खड़ी है समस्तीपुर जाएगी. दोनों ट्रेन में बैठ गए. ट्रेन चले, तो कमाल से पीछा छूटे. इतने में ही हांफता हुआ कमाल चला आया.खिड़की के पास बैठी सारा को देखकर कोच में दाख़िल हो गया. “अरे आप… मैं आपके रूम में गया. चौकीदार औरत बताई आप चले गए. मैं पूरा प्लेटफार्म देख आया. फिर सोचा यह ट्रेन समस्तीपुर जाएगी, सायद आप इसमें बैठ गए होंगे…. खिड़की से बहिनजी दिखीं. अब जल्दी से उतरिए.”
“क्या हुआ?” कमाल को देखकर विकास और सारा इस तरह चौंक गए मानो वह बर्थ के नीचे बम रखे होने की सूचना दे रहा है.
“ये पैसेंजर गाड़ी है. कब चलेगी कुछ नहीं मालूम. उधर ऊ प्लेटफार्म पर एक्सप्रेस गाड़ी लग गया है. चलिए.”
विकास किसी झांसे में नहीं आना चाहता. “ठीक है न. एक-डेढ़ घंटे में समस्तीपुर पहुंच जाएंगे.”
“कहिए पांच घंटे में भी न पहुंचें.”
कमाल ने उनका ट्रॉली बैग उठा लिया. “चलिए, एक्सप्रेस छूट जाएगा.”
कमाल ने उन्हें एक्सप्रेस ट्रेन में बैठाकर ही विश्राम पाया. “ अब आराम से समस्तीपुर जाइए.”
“थैंक यू यार.” विकास को कहना पड़ा.
कमाल सामने की बर्थ पर बैठ गया, “सर, आप हमारी तरफ़ आए हैं, तो चाहता हूं आप यहां से अच्छा तजुर्बा लेकर जाएं. रात में मुझे लगा कि आप लोग कुछ परेशान हैं. थोड़ी-बहुत अंग्रेजी मैं समझ लेता हूं. समझ गया था कि हम मुसलमान हैं, इसलिए आप हमारे साथ नहीं ठहरना चाहते. आपने पूरे सफ़र में हमारा कोई ग़लत बात देखा क्या? हम छोटे आदमी हैं सर. हमको कुछ नहीं मालूम. यह भी नहीं मालूम रिटायरिंग रूम रेलवेवालों के अलावा किसी को मिल सकता है. इसलिए कहा मैं आसिफ भाई के साथ एडजस्ट हो जाऊंगा. आप भी हो जाना. आसिफ भाई बता रहे थे रिटायरिंग रूम खाली होते हैं, पर बाबू कह देता है कि खाली नहीं है, क्योंकि वह अपनी नींद नहीं ख़राब करना चाहता, तो मैंने सोचा…”
सारा को कुछ नहीं सूझा कि क्या कहे? “आप बताएं सर, आपको नुक़सान पहुंचाकर मुझे क्या फायदा होगा? मैं वह काम क्यों करूंगा, जिसमें कोई फायदा नहीं होना है.”
विकास किसी तरह बोला, “सुनो तो मुन्ना… मुझे लगा एक रूम में इतने लोगों को असुविधा होगी… तुमको बुरा लगा, तो माफ़ी चाहता हूं.”
विकास नहीं जानता क्या कहना चाहता है, क्या कहना चाहिए और क्या कह रहा है. अपनी बेव़कूफ़ी में इन लोगों को भड़का देने जैसी कोशिश कर बैठा, लेकिन कमाल का बड़प्पन देखो. ज़ाहिर न होने दिया कि उसे बुरा लगा है. कमाल के चेहरे में बड़ी बेचारगी-सी थी, “बुरा लगा. मानता हूं कुछ लोग हैं, जो नहीं चाहते हमारे मुल्क में अमन-चैन रहे, पर उन्हें किसी धर्म सेे जोड़कर देखना ग़लत है. यक़ीन जानिए पूरा देस में ज्यादातर लोग चाहते हैं कि हम सब अमन-चैन से रहें. सर, गड़बड़ी हमारे भीतर है… नजरिए में है. हम एक-दूसरे पर इसी तरह सक (शक) करते रहे, तो कैसे होगा…? चलूं… आपका ट्रेन का साइरन हो गया है…”
विकास ने कहा, “माफ़ करो कमाल भाई.”
“माफी का क्या बात?”
“शुक्रिया तो कह सकता हूं.”
“शुक्रिया का क्या बात? हमने आपका मदद किया. हमारी तरफ़ का कोई आपकी तरफ़ आए, आप मदद कर देना. छोटी-सी बात सर.”
कमाल ट्रेन से उतर गया. विकास और सारा हतप्रभ थे. सच्ची बात को कमाल कितनी सादगी से कह गया.

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Meri Saheli Team :
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