कहानी- कबीरा यह घर प्रेम का (Short Story- Kabira Yah Ghar Prem Ka)

 

 

“जब हमारा अस्तित्व बिखरता है, तो उसकी ज़िम्मेदारी दूसरों से कहीं ज़्यादा हमारी होती है. जो लोग आपसे उम्मीद करते हैं कि आपका दृष्टिकोण उन्हीं जैसा हो, वे स्वयं बहुत असुरक्षित होते हैं. दूसरों पर चाहे वह पति हो, पिता हो या कोई और, दोषारोपण करने से कहीं बेहतर है कि हम स्वयं के आलोचक बनें और अपनी कमियों को ईमानदारी से ढूंढ़ें. जीवन की जीवटता जीने में है, जीवन से भागने में नहीं…”

 

मेरा नाम अमेयविक्रमा है. अमेयविक्रमा अर्थात् मां दुर्गा का वह रूप जो कभी पराजित नहीं हो सकता, पर क्या मैं कभी पराजित नहीं होती? यह एक ऐसा प्रश्‍न है, जो मेरे चारों ओर परिक्रमा करता रहता है और थक-हारकर यही उत्तर ढूंढ़कर लाता है कि मैं जन्म से लेकर आज तक स्वयं से पराजित होती आयी हूं. मेरे पिता हिन्दी के प्रकांड विद्वान, उच्च कोटि के साहित्यकार और दुर्गा मां के अनन्य भक्त हैं और शायद यही कारण है कि उन्होंने मेरा नाम अमेयविक्रमा रखा.
मुझे दुख इस बात का है कि मैं न अपने पिता का सम्मान करती हूं और न ही स्वयं का. कारण कुछ उलझा हुआ-सा है. मैंने जब से होश संभाला, अपने घर को एक युद्ध स्थल के रूप में पाया, जहां एक ओर दादी थीं और दूसरी ओर पिताजी और बीच में मेरी निरीह मां. “तुम्हारी अक्ल घास चरने गयी है. स़िर्फ टर्राने के सिवा तुम्हें और कुछ नहीं आता, बेवकूफ़ औरत.” यह शब्द जब पिताजी ने मां से मेरी चौथी वर्षगांठ पर कहे, तो विस्मय से मैं कभी मां को देखती, तो कभी पिताजी को. मां के बहते आंसू देखकर मैं रोने लगी थी, पर समझ नहीं पायी थी पिताजी की नाराज़गी का कारण.
समय की गति और मेरे पिताजी की जिह्वा की गति कभी नहीं रुकी. जैसे-जैसे मैं समझदार होती गयी, अपने पिता के दोहरे व्यक्तित्व को गहराई से समझने लगी. उनकी क़लम अपनी रचनाओं में नारी को विभिन्न अलंकारों से महिमामंडित करती, परन्तु उनकी वाणी कर्कश एवं तुच्छ शब्दों का प्रयोग करती. जहां तक मैं समझ पायी, पिताजी की दृष्टि में घर तभी सफलतापूर्वक चल सकता है जब औरत की नाक में नकेल डालकर रखी जाए और यही कारण रहा कि उन्होंने अपने इस प्रयास में कभी कमी नहीं छोड़ी.
मां की सुबह पिताजी की फटकार से शुरू होती, जो रात्रि के अंतिम पहर तक बिना थमे चलती रहती. मैं अचंभित यह सोच कर होती कि जो मां एक आज्ञाकारी परिचालिका की तरह स़िर्फ पिताजी के आदेशों का पालन करती, उनके कामों में कमी निकालने की दक्षता पिताजी ने कैसे प्राप्त की? मां को स़िर्फ पिताजी के कोप का भाजन बनना पड़ता हो, ऐसा नहीं था. दादी भी अपने दोनों हाथों में तलवार लिए खड़ी रहती थी. यह बात अलग थी कि मां से उनकी घृणा का कारण कुछ और था. क़िताबी ज्ञान ने मुझे यह तो समझा ही दिया था कि इस देश में एक औरत तभी सम्मानीय समझी जाती है, जब वह ‘बेटे’ की मां हो. दादी के कटाक्षों और पिताजी के अपमानों के बीच मैंने मां को हमेशा शांत देखा.
समय अपनी गति से बहता गया और मैं भी जीवन के उस पड़ाव पर आ गयी, जहां पर डर से कहीं ज़्यादा मन में घुमड़ते हुए प्रश्‍न परेशान करते हैं. एक दिन मैंने मां से पूछ ही लिया, “मां क्या आपको बुरा नहीं लगता? क्या इस जीवन से आप ख़ुश हैं? पिताजी और दादी की इच्छाओं को पूरा करना ही आपके जीवन का उद्देश्य है? क्या आपके ख़ुद के कोई सपने नहीं हैं?”
“आगे और सवाल मत पूछना नहीं तो मैं बेहोश हो जाऊंगी.” मां ने हंसते हुए कहा. “अमेय बेटा, जहां तक तुम्हारे पिताजी के ग़ुस्से की बात है, वह उनका स्वभाव है. अगर वह समझते हैं कि उनके कड़वे शब्दों से मैं उनके प्रभुत्व में रहूंगी, तो इसका विरोध करके घर की और स्वयं की शांति का हनन करने के सिवाय कुछ हासिल नहीं होगा. तुम्हारा दूसरा सवाल मेरे सपनों से जुड़ा है, तो मैं एक आम इंसान हूं और हर व्यक्ति की तरह मेरी आंखों ने भी सपने देखे हैं. मैं तुम्हारी ही उम्र की थी. मेरी साहित्य में बहुत रुचि थी और मेरे सपने मेरी लेखनी से जुड़े थे. तुम्हारे नाना चाहते थे कि मेरे सपने यथार्थ का रूप लें और उनका यह विश्‍वास तब और भी दृढ़ हो गया था, जब मैंने कॉलेज में हुई ‘युवा कथाकार प्रतियोगिता’ को जीता. समाज में घट रही हर घटना मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती. धीरे-धीरे मेरी कहानियां विभिन्न पत्रिकाओं में छपने लगीं. मेरे सपने पंख लगाकर उड़ रहे थे, पर नियति को कुछ और ही स्वीकार्य था. किसी समारोह में तुम्हारे नाना की मुलाक़ात तुम्हारे पिताजी से हुई. पिताजी को तुम्हारे पिता की विद्वता और नम्रता दोनों ही भा गयीं और यह सोचकर कि दो विचारधारा के लोग जब एक धरातल पर आकर खड़े होंगे, तो उन्नति और ख़ुशियां चारों ओर से आएंगी, उन्होंने मेरा हाथ तुम्हारे पिता के हाथों में सौप दिया. शादी के कुछ दिनों के बाद जब मैंने तुम्हारे पिता को अपनी एक कहानी दिखायी, तो वह बोले, “यह क्या बकवास है. ख़ुद को सरस्वती का अवतार समझती हो? लेखन तो ईश्‍वर का वरदान होता है. यह तुम्हारे बस की बात नहीं है. औरतों का काम घर संभालना होता है. उसे ही ढंग से कर लो, वही मेरे लिए बहुत है.” यह कह वह तो उठकर चले गए, पर मुझे कभी भी ख़त्म न होनेवाली ख़ामोशी दे गए. ऐसा नहीं था कि मैंने उसके बाद लिखना बंद कर दिया. तुम्हारे पिताजी के शब्दों ने मुझे दुख ज़रूर पहुंचाया था, पर जीने की एक राह भी दी थी…”
“वो क्या मां?” मैंने मां से उत्सुकता से पूछा, “वह यह कि मैं अच्छे से अच्छा लिखूं. अमेय, मेरे पिता कहा करते थे कि जिस पल से तुम स्वयं को दूसरे की दृष्टि से आंकने लगोगे, तुम स्वयं बिना किसी प्रयास के समाप्त हो जाओगे. तुम क्या हो, यह आंकलन तुम्हारा स्वयं का होना चाहिए. यह बात मेरा जीवन-सूत्र थी. मैं तुम्हारे पिताजी से छुपकर लगातार लिखती रही. हर वह दर्द, हर वह शब्द जो मेरे अंदर तीर की तरह चुभाया जाता, उसे मैंने शब्दों का आकार दिया. तुम देखना चाहोगी?” और ये कहकर मां उठीं और अपनी आलमारी से एक मोटी- सी डायरी लेकर आयीं. ‘मेरी बेटी उमा को, उसके सपनों को साकार करने के लिए ढेर सारे आशीर्वाद के साथ, तुम्हारे पिता की ओर से भेंट.’ डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था. “यह तुम्हारे नाना ने मुझे मेरी शादी पर दी थी.” मां ने डायरी की ओर इशारा करते हुए कहा.
मैं एक-एक करके डायरी में लिखे शब्दों को पढ़ने लगी और कब रात से सुबह हो गयी, मुझे पता ही नहीं चला. यह सुबह मेरे लिए आम सुबह से बिल्कुल अलग थी. मेरी मां की लेखनी न केवल मुझे गौरवान्वित कर रही थी, बल्कि जीवन जीने की प्रेरणा भी दे रही थी. मेरे भीतर कहीं आत्मविश्‍वास का बीज रोपित हो गया था. मैंने मां की वह डायरी संभाल कर अपने पास रख ली. मेरे आत्मविश्‍वास का परिणाम बहुत जल्द ही मेरे सामने आया. वह अमेयविक्रमा जो किसी के सामने ढंग से अपनी बात को नहीं रख सकती थी, उसी अमेय ने कॉलेज में ‘बेस्ट डिबेटर’ का अवार्ड जीता. अपनी इस ख़ुशी में जब मैंने पिताजी और दादी को शामिल करना चाहा, तो उनकी प्रतिक्रिया अचंभित करनेवाली थी. “अभय, तेरी बेटी भाषणबाजी करने लगी है. कॉलेज तक तो ठीक है, कल को घर में ही यह सब शुरू न हो जाए. हमें पढ़ा-लिखाकर करना भी क्या है. ब्याह लायक हो गयी है. कोई ठीक-ठाक लड़का देखकर हाथ पीले कर दे छोरी के.” दादी की बात को सुनकर मां जो मेरे पास ही खड़ी थीं, बोलीं, “अम्मा, अभी तो कॉलेज का पहला साल है, कम से कम बीए तो कर ले.”
“तुमसे किसी ने सलाह मांगी. जहां खड़ी होती हो, अपनी बक-बक शुरू कर देती हो. पढ़-लिख कर तुमने कौन-सा तीर मार लिया? टर्राना बंद कर, जा… चाय बना ला.” पिताजी ने जब मां से कहा, तो न जाने मुझमें कहां से हिम्मत आ गयी और मैं बोली, “पिताजी, इंसान नहीं मेंढक टर्राते हैं और आप सही कह रहे हैं पढ़-लिखकर मैं कर भी क्या लूंगी. जब हम मानवता तक सीख नहीं पाते, तो पढ़ने का फ़ायदा भी क्या. हां, पढ़ने का एक फ़ायदा ज़रूर है, हम बहरूपिए की भूमिका अच्छी तरह निभा पाते हैं. आपको ही देखिए सारी दुनिया के सामने आप औरत को देवी, धरती और न जाने किन-किन उपाधियों से बुलाते हैं और घर पर मां को इंसान होने का भी अधिकार…” इसके आगे की बात मैं कह ही नहीं पायी, क्योंकि पिताजी ने मेरे गाल पर ज़ोर से थप्पड़ मार दिया.
मैं उठकर अपने कमरे में चली गयी. “अमेय, तुमने यह अच्छा नहीं किया. अपने पिता से इस तरह बात करना शोभा देता है क्या?” मां ने मुझसे कहा. “मां, मैं खुद भी ऐसा नहीं करना चाहती थी, पर क्या स़िर्फ जन्म देने से ही कोई पिता बन जाता है या फिर सात फेरे लेने से कोई पति. मां ऐसा नहीं होता. पिता, पति, बेटा इन सभी रूपों के साथ कुछ कर्त्तव्य भी जुड़े होते हैं. स़िर्फ दो समय का खाना देकर यदि पिताजी अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री समझते हैं तो वह ग़लत हैं. जब से मैंने रिश्तों को समझना शुरू किया है, आपके हिस्से में स़िर्फ तिरस्कार और अपमान ही देखा है. हर आदमी औरत को अपनी जागीर समझता है और यही कारण है कि मैं शादी नहीं करना चाहती.” यह कहते-कहते मेरी आंखों से आंसू बहने लगे.
“अमेय, तुम्हारी सोच ग़लत है. हर पुरुष एक जैसा नहीं होता. मेरी दृष्टि में तो यहां पुरुष शब्द का प्रयोग करना ही गलत है, क्योंकि चारित्रिक विशेषताएं सभी इंसानों की अलग-अलग होती हैं. यह सोचकर कि शादी करने के बाद कोई तुम पर अत्याचार करेगा, शादी के लिए मना करना अनुचित है. तुम्हारे नाना तुम्हारे सामने उदाहरण हैं. एक पिता के रूप में उन्होंने मुझे हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया. मैं छह साल की थी, जब मेरी मां यानी तुम्हारी नानी को कैंसर हो गया था. उनकी बीमारी का पता कैंसर के आख़िरी स्टेज पर चला. मुझे याद है पिताजी मां को एक बच्चे की तरह संभालते थे. वह जब तक जीवित रहीं, उनकी दिन-रात सेवा की और उनके इस दुनिया से जाने के बाद मुझे कभी मां की कमी खलने नहीं दी.” मां की इन बातों को सुनकर भी मैं संतुष्ट नहीं थी. “मां, ऐसा सौ में से एक बार होता है. पुरुष हमेशा से ही घर में सत्ता और स्त्री पर प्रभुत्त्व का इच्छुक होता है.”
“नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. सत्ता की चाह स़िर्फ पुरुष में ही नहीं होती. क्या एक स्त्री सत्ता की इच्छुक नहीं होती? क्यों भूलती हो कि तुम्हारी दादी भी तुम्हारे पिता के समानांतर खड़ी हैं. जहां तक मेरी चुप्पी की बात है, यह मैंने अपनी इच्छा से चुनी है. ख़ामोशी सदैव कायरता हो, ऐसा नहीं होता. हर मनुष्य के जीवन में कभी न कभी ऐसा पल आता है, जब उसे दो में से किसी एक का चुनाव करना पड़ता है. मेरे जीवन में भी ऐसा पल आया था. जब एक ओर मेरे सपने थे, दूसरी ओर मेरा घर. मैंने अपने लिए घर चुना, क्योंकि मैं एक पत्नी और मां बनकर रहना चाहती थी. हां, यह सच है कि यदि मेरे सपनों को पूर्ण करने में तुम्हारे पिता का सहयोग मिलता, तो मुझे बहुत ख़ुशी होती, पर मैंने असंतुष्ट जीवन कभी भी नहीं जीया. इसका कारण बहुत साधारण-सा था. मैंने स्वयं को न तो तुम्हारे पिता की नज़रों से, न ही तुम्हारी दादी की नज़रों से तोलने की कोशिश की, क्योंकि अगर मैं ऐसा करती, तो स्वयं की दृष्टि में ख़ुद को ‘छोटा’ पाती और ऐसी स्थिति में न तो मैं ख़ुद का सम्मान कर पाती और न ही किसी और का.” मैं मां के तर्क के आगे निरुत्तर थी.
पिताजी के साथ मेरा जो व्यवहार था, वह सही था या ग़लत, यह तो मैं नहीं जानती, लेकिन पिताजी में मैंने एक परिवर्तन ज़रूर देखा. उन्होंने हर समय मां को नीचा दिखाने की मुहिम कम कर दी. एक दिन कॉलेज जाते हुए मैंने देखा कि हमारे पड़ोस का घर जो पिछले छह महीने से खाली पड़ा था, वहां ट्रक से सामान उतारा जा रहा था. शाम को जब कॉलेज से लौटी, तो पिताजी को प्रसन्नचित्त देखकर चकित थी. “अम्मा, एक अच्छी ख़बर सुनाऊं. अपने पड़ोस में ‘साहित्य लोचन’ की उच्च अधिकारी रहने आयी हैं. एक बार ढंग से जान-पहचान हो जाए, फिर देखना अगला अवॉर्ड मुझे ही मिलेगा. आजकल के ज़माने में बिना पहचान के कुछ नहीं मिलता.” पिताजी ने उत्साहित होते हुए दादी से कहा. इस बात को लगभग तीन महीने बीत गए कि एक दिन पिताजी ग़ुस्से से आगबबूला होते हुए घर के अन्दर आए, “दो टके की औरत… अपने आपको समझती क्या है? कहती है, मेरी रचनाएं उस स्तर की नहीं हैं. अरे, ये औरतें ऊपर तक पहुंचती कैसे हैं, क्या मैं जानता नहीं हूं. ख़ुद को टके भर का ज्ञान नहीं, लगी मुझ पर उंगली उठाने.” यह कहते-कहते पिताजी का ग़ुस्से के मारे चेहरा लाल हो गया. दादी बोलीं, “अभय, हुआ क्या है? तू किसे कोस रहा है?”
“अरे अम्मा, वही अपनी पड़ोसन डॉ. अक्षरा शर्मा. अरे काहे की ‘डॉक्टर’. साहित्य का ज़रा-सा ज्ञान नहीं और साहित्य में पीएचडी… गया था उसके ऑफिस कुछ दिन पहले अपना कहानी-संग्रह लेकर. ओछी औरत कहती है…” पिताजी आगे कुछ कहते-कहते रुक गए, शायद उन्हें मेरे चेहरे को देखकर आभास हो गया कि मुझे यह सब सुनना अच्छा नहीं लग रहा था.
समय बीतता गया और वसंत पंचमी का दिन आ गया. हमारे कॉलेज में भाषण-प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जिसकी मुख्य अतिथि साहित्य लोचन की निदेशक डॉ. अक्षरा शर्मा थीं. कड़ी प्रतियोगिता हुई. ‘वर्तमान समय में महिला अपने अस्तित्व की खोज में’ इस विषय पर समस्त प्रतियोगियों ने महिला को शोषित और पुरुष को शोषक के रूप में चित्रित किया. मैं भी शायद यही कहती, पर जब मैं मंच पर खड़ी हुई तो ऐसा लगा कि मां के कहे हर शब्द मेरी जिह्वा पर आ गए. “जब हमारा अस्तित्व बिखरता है, तो उसकी ज़िम्मेदारी दूसरों से कहीं ज़्यादा हमारी होती है. जो लोग आपसे उम्मीद करते हैं कि आपका दृष्टिकोण उन्हीं जैसा हो, वे स्वयं बहुत असुरक्षित होते हैं. दूसरों पर चाहे वह पति हो, पिता हो या कोई और, दोषारोपण करने से कहीं बेहतर है कि हम स्वयं के आलोचक बनें और अपनी कमियों को ईमानदारी से ढूंढ़ें. जीवन की जीवटता जीने में है, जीवन से भागने में नहीं…” मेरी बात जब ख़त्म हुई तो हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. “तुम तो छोटी-सी उम्र में बड़ी परिपक्व बातें करती हो.” डॉ. अक्षरा ने मेरे हाथों में शील्ड देते हुए कहा. “जी बहुत-बहुत धन्यवाद, पर मैं आपको सच बताना चाहती हूं. मैंने जो कुछ कहा, वे मेरी मां के शब्द हैं, मैं तो मन के किसी कोने में अब भी यह मानती हूं कि पुरुष शोषक होता है.” मेरी बात को सुनकर डॉ. अक्षरा ने हैरानगी से मेरी ओर देखा. “तुम्हारी ईमानदारी से मैं प्रभावित हूं. कभी हमारे घर आओ. मुझे अच्छा लगेगा.”
डॉ. अक्षरा के व्यक्तित्व में न जाने कैसा आकर्षण था कि मैं उनके प्रथम निमंत्रण पर ही उनके घर पहुंच गयी. घर का हर कोना सुरुचिपूर्ण ढंग से सजा हुआ था. “अमेयविक्रमा, बड़ा ही अच्छा नाम है तुम्हारा. इस नाम का मतलब जानती हो?” डॉ. अक्षरा के इस प्रश्‍न को सुनकर मैंने ‘हां’ में गर्दन हिलायी. “मैडम, आपसे क्या मैं कुछ पूछ सकती हूं?” मैंने हिचकते हुए कहा. “हां-हां क्यों नहीं.” डॉ. अक्षरा ने बड़ी ही सहजता से कहा. “आपको इतने उच्च पद पर रहकर कैसा लगता है?” मेरे इस सवाल को सुनकर डॉ. अक्षरा बोलीं, “अच्छा लगता है, पर आज मैं जिस जगह हूं, वह मेरे पति समर्थ के सहयोग के बिना संभव नहीं होता. अमेय जब मेरी शादी हुई थी, मैं स़िर्फ बारहवीं पास थी. उस समय मेरे पति एक प्राइवेट फर्म में एकाउंटेन्ट थे. सुसराल में जहां मुझे मेरी सास की ममता मिली, वहीं समर्थ का प्यार. मैंने जब समर्थ से आगे पढ़ने की इच्छा व्यक्त की, तो उन्होंने न केवल स्वीकृति दी, बल्कि मेरी पढ़ाई अच्छे तरी़के से हो सके, इसके लिए घर के हर काम में सहयोग दिया. मैंने बीए कर लिया और फिर हिन्दी साहित्य में एमए. जब मैंने एमए में गोल्ड मेडल हासिल किया, तो समर्थ की ख़ुशी देखने लायक थी.
सच कहूं तो इससे आगे मैंने कुछ सोचा भी नहीं था, पर समर्थ ने मुझे पीएचडी करने के लिए प्रेरित किया. जिस दिन मुझे डॉक्टरेट की उपाधि मिली, वह दिन मेरे लिए स्वर्णिम था. मेरे जीवन में ईश्‍वर ने ढेर सारी ख़ुशियां दी थीं, पर हर दिन एक जैसा नहीं होता. दुख के पल की शुरुआत मेरी सास की हृदयगति रुक जाने से हुई मृत्यु से हुई. अभी इस आघात से मैं उबरी भी नहीं थी कि समर्थ की फर्म घाटे में चलने की वजह से बंद हो गयी. इन सब परेशानियों ने मुझे व्यथित कर दिया था. तभी समाचार पत्र में ‘साहित्य लोचन’ में नौकरी का विज्ञापन प्रकाशित हुआ. मैंने इन्टरव्यू दिया और सिलेक्ट हो गयी.”
“मैडम, सर को जॉब मिल गया था?” मैंने पूछा तो वह बोलीं, “नहीं, इससे भी मैं बहुत परेशान थी. यह परेशानी आंतरिक कम और बाहरी ज़्यादा थी. चाहे वह भारतीय समाज हो या पाश्‍चात्य्, आदमी का घर पर बैठना सभी को खलता है. मुझे नौकरी करते हुए छह महीने ही बीते थे कि ईश्‍वर ने मेरी कोख में अनन्या और शांतनु को भेज दिया. जुड़वां बच्चों का जन्म जहां ढेर सारी ख़ुशियां लाया, वहीं ढेरों समस्याएं भी. परिस्थितियां ऐसी थीं कि एक तरफ़ बच्चों की ज़िम्मेदारी और दूसरी ओर नयी नौकरी, पर इस मानसिक उलझन से मुझे समर्थ ने उबारा. उन्होंने सामाजिक परंपराओं को दरकिनार करते हुए बच्चों को संभालने की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ली. यह निर्णय मेरे लिए भी आसान नहीं था.”
“मैडम, क्या इन सबसे सर के अहम् को ठेस नहीं पहुंची?” मेरे इस सवाल पर वह बोलीं, “बेटा, ‘अहम्’ परिवारों को तोड़ता है, स्वयं के विकास को रोकता है, अहम् मनुष्य के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा दुर्गुण है. दुख की बात यह है कि हम सभी स्वाभिमान और अभिमान में अंतर नहीं कर पाते. समर्थ के दोस्त उनको ‘बीबी-जमाई’ कहकर बुलाया करते, पर वह अपने दोस्तों की बातों को भी बड़ी सहजता से लेते. अमेय, समय बदला. आज मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं और समर्थ ने भी ख़ुद की एक छोटी फर्म खोल ली है. तुम्हीं सोचो क्या समर्थ की परिपक्व सोच के बगैर मेरा घर और मैं ख़ुद इस जगह होती, जिस जगह आज हूं.” डॉ. अक्षरा ने मेरी ओर देखा शायद वह मेरी ओर से फिर किसी सवाल की प्रतीक्षा कर रही थीं, पर मेरी ख़ामोशी देखकर वह बोलीं, “अमेय, तुम बहुत छोटी हो, पर फिर भी मैंने तुम्हें आज अपने जीवन का सारांश इसलिए बता दिया, ताकि तुम समझ सको कि पुरुष का दूसरा नाम खलनायक या शोषक नहीं है.” डॉ. अक्षरा की इस बात पर मैं बोली, “आप ठीक कहती हैं, बिल्कुल मेरी मां की तरह.”
“क्या करते हैं तुम्हारे माता-पिता.” डॉ. अक्षरा के इस प्रश्‍न पर मैं एक पल को झिझकी, कैसे बताती अपने पिता का नाम, क्योंकि मैं जानती थी कि कुछ दिनों पहले ही उनके और पिताजी के बीच क्या हो चुका है, पर फिर भी कब तक टालती, इसलिए बोली, “जी, मेरे पिता लेखक हैं श्री. अभय दीक्षित और मां गृहिणी हैं, पर वह बहुत अच्छा लिखती हैं.” यह कहते हुए मेरी आंखों में चमक थी.
“तुम्हारे पिता से तो मैं मिल चुकी हूं. भले इंसान हैं.” डॉ. अक्षरा की इस बात को सुनकर मैं चकित थी. मैं कुछ कहती, इससे पहले वह बोलीं, “अपनी मां को लेकर कभी घर आओ और उनकी रचनाएं भी लेकर आना.”
“मैडम, क्या आप वह रचनाएं देखेंगी? मैं अभी लाती हूं.” और यह कहकर मैं तुरंत उठ गयी. बिना उनके उत्तर की प्रतीक्षा किए दौड़ते हुए घर में आयी. आलमारी से डायरी निकाली और चुन्नी में छुपाकर वापस डॉ. अक्षरा के घर पहुंच गयी. “मैडम, ये रही मेरी मां की रचनाएं.” मैंने डॉ. अक्षरा को मां की डायरी देते हुए कहा. “अमेय, अगर तुम्हें कोई परेशानी न हो, तो इस डायरी को मेरे पास छोड़ दो, मैं इसे पढ़ना चाहूंगी.” डॉ. अक्षरा की बात पर मैंने तुरंत स्वीकृति दी.
दो दिन के बाद मैं डॉ. अक्षरा के घर गयी, तो उन्होंने मुझसे जो कहा, वह सुनकर मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा.
“अमेय तुम्हारी मां एक संवेदनशील लेखिका हैं. अगर तुम चाहो तो साहित्य लोचन इसे छापना चाहेगा.”
दो महीने के बाद नाना की पुण्यतिथि पर मैंने मां के हाथ में वह ‘कबीरा यह घर प्रेम का’ क़िताब रखी. ‘मेरी मां को उनकी निधि, उनके सपनों के साथ- अमेयविक्रमा’. क़िताब के पहले पृष्ठ पर लिखे शब्दों को पढ़कर मां कभी मुझे, तो कभी उन पंक्तियों को देखतीं. मां निशब्द थीं और उनके सपने बोल रहे थे.

      डॉ. ऋतु सारस्वत
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Usha Gupta :
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