कहानी- खूंटे से बंधी (Short Story- Khute Se Bandhi)

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कितना अजब है न हमारे समाज में विवाह संबंध तय करने का तरीक़ा! लड़की को एक बार लड़के से मिलवाकर हुकुम हो जाता है कि तुम्हें अब उम्रभर इसी व्यक्ति से प्यार करना है. वह क्रूर हो, तुम्हारी परवाह न करे, तो भी उसकी लंबी उम्र की दुआ मांगनी है. उसके लिए व्रत-उपवास रखने हैं.

एक ही जीवन में कितने रंग बदल लेती है यह ज़िंदगी! कभी अरुणोदय का नव उल्लास लिए सामने आ खड़ी होती है, तो कभी थकी-हारी अस्पताल की ओर क़दम बढ़ाती संध्या-सी. सांझ गहराकर काली रात बन जाए चाहे, परंतु एक विश्‍वास अडिग रहता है कि अंधियारा छंट ही जाएगा, अरुणोदय फिर होगा. पर मेरे जीवन में तो नव अरुणोदय की कोई गुंजाइश ही नहीं बची है. दंड भोग रही हूं बिना अपराध किए. नहीं! अपराध तो किया था मैंने, अपनी ख़ुशियों के ख़्वाब देखकर. स़िर्फ देखे ही नहीं थे ये ख़्वाब, उन्हें पूरा करने की उम्मीद भी की थी.

मैंने भी आपको किस बेकार के दर्शन में उलझा दिया. चलो शुरू से ही बताती हूं. पिता सरकारी नौकरी में थे, तो उनका अक्सर तबादला होता रहता था. स्कूल तक तो चल गया, पर कॉलेज के लिए उन्होंने मुझे चंडीगढ़ के एक होस्टल में डाल दिया. होस्टल के तीन वर्ष मेरी रूम पार्टनर रही गौरी से मेरी ख़ूब पटती थी और बीए करने के बाद हमने एक संग बीएड करने का फैसला लिया. यहां होस्टल तो था नहीं, सो एक कमरा किराए पर ले लिया. मां ने कहा, “हर रोज़ बाहर खाने से अच्छा है दोनों मिल-जुलकर बना लिया करो. इसी बहाने सीख भी जाओगी.” गौरी की मम्मी ने भी इसी बात का अनुमोदन किया. गौरी को रसोई का बिल्कुल शौक़ नहीं था, सो वह काट-पीटकर देती और मैं बना देती. शुरू में तो कुछ दिक़्क़तें आईं. कभी दाल में नमक ज़्यादा हो जाता, तो कभी चावल कच्चे रह जाते, लेकिन मज़ा आ रहा था. मैं व्यंजन सीखने की किताबें भी ख़रीद लाई. नए-नए प्रयोग करने लगी.

गौरी के बड़े भाई कपिल चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में व्याख्याता बनकर आ गए और छुट्टी के दिन बहन से मिलने आते, तो हम उन्हें भोजन के लिए रोक लेते. घर का बना भोजन उन्हें भी अच्छा लगता था और मेरी पाक कला की तारीफ़ हो जाती. पहले तो मैं सकुचा जाती थी, प1314र धीरे-धीरे मेरी झिझक दूर होने लगी. हमारी बातें अक्सर किताबों को लेकर ही होतीं. उन्हें पढ़ने-पढ़ाने, दोनों का ही बहुत चाव था. हम दोनों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते. हमें कोर्स के इतर भी पढ़ने की प्रेरणा देते. नई किताबें लाकर देते. उन दिनों लड़कियों पर बहुत प्रतिबंध थे और वह हमारे अनेक काम कर आते. कोई अच्छी मूवी लगने पर वह भी दिखा लाते. उनके साथ हम स्वयं को बहुत सुरक्षित महसूस करतीं.

मेरे साथ उनकी मैत्री बढ़ रही थी, मज़बूत हो रही थी. हमारा अलग-अलग प्रांतों से होना इसमें आड़े नहीं आ रहा था. कपिल में उद्वेग और उन्माद नहीं, सच्चाई और निश्‍चय था. गौरी गवाह थी हमारी मैत्री की, सहमत और ख़ुश भी. मैं आश्‍वस्त थी अपने भविष्य के प्रति. मुझे विश्‍वास था मां-पापा को मैं मना लूंगी.

परीक्षा देकर घर लौटी, तो कपिल के संग मेरी मैत्री की ख़बर मुझसे पहले वहां पहुंच चुकी थी. पापा बहुत क्रोध में थे. पापा की तबादलेवाली नौकरी के कारण दादाजी सदैव चाचाजी के घर एक ही स्थान पर रहना पसंद करते आए थे, पर इन दिनों वह भी हमारे घर आए हुए थे. इन लोगों ने मेरे लिए चार-पांच लड़के पहले से ही छांट रखे थे. हफ़्ता-दस दिन में मिलना-मिलाना कर जिस लड़के ने ‘हां’ की, उसी से रिश्ता तय कर दिया गया और दो महीने बाद की विवाह की तारीख़ भी पक्की कर दी गई. उसके लंबे समय बाद तक कोई शुभ मुहूर्त नहीं था.

मैंने मां को कपिल की पूरी बात बता दी थी. यह भी कहा कि एक बार पापा उससे मिल लें. उन्हें मंज़ूर नहीं होगा, तो मैं हठ नहीं करूंगी. मां तो राज़ी हो गईं, पर दादाजी की उपस्थिति के कारण उनकी एक न चली. हम जैन और वह अग्रवाल. यहीं कपिल का सबसे बड़ा अपराध हो गया. विभिन्न धर्म का होना ही एकमात्र अड़चन नहीं होती विवाह संबंध स्थापित करने के लिए. और भी बहुत सारे व्यवधान खड़े किए जा सकते हैं और दादाजी की दबी चेतावनी के अनुसार तो ‘मेरा स्वयं अपने लिए वर ढूंढ़ लेना मेरे दुश्‍चरित्र होने का प्रमाण था’ और यथाशीघ्र मुझे विवाह बंधन में बांधना उसका एकमात्र उपाय. दादाजी के आगे मां का वजूद न के बराबर रह जाता. मेरे कारण उन्हें बहुत कुछ सुनना पड़ा था. सारा कुसूर ही दरअसल उनके सिर पर मढ़ दिया गया… लड़की को वश में न रखने का.

अब मुझे क्या फ़र्क़ पड़ना था कि मेरा रिश्ता किससे तय हुआ है. पापा ने अपने हिसाब से तो सब जांच-पड़ताल कर ही ली होगी. फ़र्क़ बस यह है कि ऐसी जांच-पड़ताल में दूल्हे की शिक्षा, खानदान, रंग-रूप ही देखे जाते हैं. पूरी उम्र साथ रहने के लिए एक-दूसरे के विचार, पसंद-नापसंद जैसी बातों को अहमियत नहीं दी जाती. सो विवाह हो गया. मेरी मोहब्बत निःशब्द छटपटाती रह गई.

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चंडीगढ़ के अपने अध्याय को मैंने अपनी यादों से पूरी तरह से मिटा दिया.  मुश्किल यह है कि जीवन किसी कंप्यूटर पर लिखी इबारत नहीं कि डिलीट पर हाथ रखते ही सब साफ़ हो जाए. बहुत गहरे पैठे होते हैं हमारे जज़्बात. पक्की स्याही से लिखे हुए. उसे मिटाने की कोशिश में जो निशान छूट जाता है, कुछ उसी तरह अधूरी रह गई कामनाएं भी गहरे घाव छोड़ जाती हैं मन पर, जिन्हें समय भी भरने में विफल रह जाता है. उम्र भर टीसते हैं, दर्द करते हैं ये घाव.

कितना अजब है न हमारे समाज में विवाह संबंध तय करने का तरीक़ा! लड़की को एक बार लड़के से मिलवाकर हुकुम हो जाता है कि तुम्हें अब उम्रभर इसी व्यक्ति से प्यार करना है. वह क्रूर हो, तुम्हारी परवाह न करे, तो भी उसकी लंबी उम्र की दुआ मांगनी है. उसके लिए व्रत-उपवास रखने हैं. मुस्कुराकर अपने सब कर्त्तव्य निभाने हैं. रमण नहीं चाहते थे कि मैं नौकरी करूं, तो मैंने नौकरी का विचार छोड़ दिया, पर उनकी हर ख़ुशी का ख़्याल रखने पर भी तो रमण को मेरे

दुख-दर्द से कोई सरोकार नहीं था. पहला गर्भ मिसकैरेज हो गया. स्थिति गंभीर थी, मुझे अस्पताल छोड़कर रमण काम पर चले गए… “डॉक्टर तुम्हारा इलाज करेंगे, मुझे बैठकर क्या करना है.”

अगले वर्ष जब बिटिया हुई, तो पांच दिन मैं रही अस्पताल में. साफ़ कह दिया, “मैं रोज़-रोज़ नहीं आऊंगा. यहीं किसी आया का इंतज़ाम कर लेना.” सास नहीं थी, पर मां तो आने को तैयार थीं, उन्हें भी मना कर दिया. बिटिया एक माह की हुई, तो मित्रों संग घूमने जाने का कार्यक्रम बना डाला. बहाना था, “रात को ठीक से सोने नहीं देती तुम्हारी बेटी.”

ईश्‍वर ने स्त्री को दिल और दिमाग़ क्यों दे दिए? न दर्द महसूस होता, न दुख होता उसे.

मेरे सुख-दुख से बेख़बर समय चक्र चलता रहा. बिटिया पांच वर्ष की होने को आई कि एक सांझ चार बजे के लगभग टेलीफ़ोन बजा. कपिल की आवाज़, “तुम्हारे शहर आया हुआ हूं. तुमसे मिलना चाहता हूं एक बार.” वर्षों से मृतप्राय पड़ा दिल धड़कने लगा, अचानक… ज़ोर-ज़ोर से.

सवाल यह नहीं था कि मेरे मना करने से वह मानेगा कि नहीं? सवाल यह था कि मैं स्वयं को कपिल से मिलने से रोक सकती थी क्या? सो मैंने उसे अगले दिन सुबह ग्यारह बजे आने को कह दिया.

कितना बदल चुके थे कपिल! बाहर कहीं देखती, तो पहचान भी न पाती शायद. उत्साहविहीन, थके-हारे-से. छह वर्ष में दस वर्ष बुढ़ा गए से.

धीरे से पूछा, “कैसी हो?” मुझे नहीं लगता उन्होंने उत्तर पाने के लिए प्रश्‍न किया था. कुछ पल ख़ामोश रहे, इधर-उधर नज़र घुमाई. धीमे से कहा, “तुमने ठीक ही निर्णय लिया अनुभा. कॉलेज का एक प्रोफेसर तुम्हारे लिए ये सारे ऐशो-आराम कहां से जुटा पाता. दुख बस यही है कि तुमने मुझे समय काटने का माध्यम बनाया, जिसे मैं तुम्हारा प्यार समझ बैठा और वास्तव में प्यार करने लगा तुम्हें.”

कपिल के प्यार की सच्चाई पर न मुझे तब संदेह था, न आज ही है, पर उन्होंने मेरे प्यार को खिलवाड़ कैसे मान लिया? क्यों नहीं समझ पाए मेरी मजबूरी को? बिना मेरा पक्ष जाने मुझे दोषी करार दिया. नहीं जानते थे क्या कपिल कि लड़कियों के विवाह में घर के बड़ों का निर्णय ही अंतिम रहता है? शहरों के कुछ अपवादों को छोड़कर, आज भी.

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परंतु उनका क्रोध भी तो यही दर्शा रहा था कि उनके मन में आज भी मेरे लिए विशेष स्थान है. नहीं चाहती थी कि यह संदेह उम्रभर बना रहे. नाश्ते का प्रबंध तो मैंने पहले ही कर रखा था. फ़टाफ़ट चाय भी बना लाई, ताकि इत्मीनान से बैठकर बातें कर सकूं.

“मेरा पक्ष जाने बग़ैर ही आपने मुझे दोषी करार दिया कपिल और मैं यह माने बैठी थी कि आपने ज़रूर मेरी मजबूरी समझी होगी. गौरी ने भी मुझसे नाता तोड़ लिया. एक बार तो पूछ लिया होता कि ऐसा क्यों हुआ आख़िर!”

उनके चेहरे पर उदासी एवं पश्‍चाताप की एक मिली-जुली-सी लहर गुज़र गई.

“चंडीगढ़ से लौटी, तो घर का माहौल बदला हुआ था. पापा और दादू दोनों ही क्रोध में थे. मां की सहानुभूति मेरे साथ थी और दादाजी वहां न होते, तो पापा को मनाना उतना कठिन न होता. परंतु दादाजी के सामने बोलने की हिम्मत किसी में नहीं थी. मां की आंखों में जब-तब आंसू आ जाते, जिन्हें वह ‘आंख में कुछ पड़ गया है’ कहकर मुझे भरमाने का असफल प्रयत्न करती रहतीं. भाई के स्कूल का अंतिम वर्ष था. उसकी पढ़ाई में हर्जा हो रहा था. उस पर मेरे दुर्भाग्य से पड़ोस की एक लड़की अपने सहकर्मी के संग भाग गई. बाद में पता चला कि वह पुरुष तो पहले से ही विवाहित था. आस-पड़ोस का माहौल गर्म था और मुझे बिना लड़े ही हार स्वीकार कर लेनी पड़ी.

क्यों हमारे सामाजिक कर्णधारों ने स्त्री की स्थिति इतनी निर्बल बना दी. किसी गाय की तरह एक खूंटे से खोलकर दूसरे से बांध दो. गाय को कोई पूछता है भला कि तुम्हें

कौन-से घर जाना है? शहरों में स्थिति कुछ बदल रही है, पर अभी सदियां लगेंगी स्त्री को अपनी इच्छानुसार जी पाने में.”

जाते समय कपिल ने मेरा हाथ लेकर अपने माथे से लगा लिया. बोला कुछ नहीं, बस, नज़रभर देखा और उस नज़र ने स्पष्ट कर दिया कि उन्होंने मुझे माफ़ कर दिया है. न ही मैं उनके बारे में कुछ पूछ पाई, न ही फिर मिलने की बात हुई. मैं इतने में ही संतुष्ट थी कि मैंने उनकी ग़लतफ़हमी दूर कर दी है.

सामाजिक व्यवस्था को कुबूल कर उसी में रच-बस गई थी मैं. बचपन में बेजान गुड़ियों के संग खेलती थी, अब तो जीती-जागती गुड़िया थी मेरे पास. मैंने दूसरों द्वारा खींची लीक पर चलकर जीवन जिया था. अपनी बेटी को इस क़ाबिल बनाऊंगी कि वह अपनी लीक ख़ुद तय करे.

दस वर्ष और बीत गए इस बात को कि एक हादसा हो गया. रमण की मृत्यु हो गई. मित्रों के संग पहाड़ों पर घूमने निकले थे कि नदी के पुल से गुज़रते वक़्त रेल पटरी से उतर गई और रेलिंग तोड़ती नदी में गिरने लगी. बहुत-सी बोगियां हवा में लटकती रह गईं. कुछ सवारियां बचा ली गईं, परंतु मरनेवालों की संख्या अधिक थी और उनमें एक नाम रमण का भी था. शायद मुझे मेरे अपराध का ही दंड मिला था. शायद मैं उस तरह का समर्पण नहीं कर पाई थी, जितना उन्हें अधिकार था.

मैंने घर में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया. पढ़ाने का शौक़ तो मुझे था ही. बिटिया स्कूल पास कर कॉलेज आ गई थी, आत्मविश्‍वास से भरपूर. अब वह मेरी बेटी नहीं, मेरी सहेली बन गई थी. रमण ने तो कभी अपना सुख-दुख बांटने के क़ाबिल नहीं समझा था मुझे, पर बिटिया कॉलेज से लौटती, तो बैठकर दिनभर के क़िस्से सुनाती. लड़कों से मिलनेवाले कॉम्पलीमेंट तक बताती. मुझे तसल्ली थी कि मैं सब जानती हूं उसके बारे में. पर वह कुछ नहीं जानती थी मेरे बारे में. मैंने उसे बताया ही कब था?

अपनी नानी से उसकी ख़ूब पटती थी. जब तक पति जीवित थे, तो वह केवल

तीज-त्योहार देने ही आती थीं हमारे घर. पर अब यदा-कदा आकर हमारे पास रह भी जातीं. हमारा मन भी लगा रहता. बिटिया ने सहसा अपनी सखी निशा के घर चंडीगढ़ जाने का कार्यक्रम बना लिया, तो नानी को मेरे पास रुकने के लिए बोल गई. चार दिन बाद लौटी, तो उसके संग मेरी बिछुड़ी सखी गौरी! मैं आश्‍चर्यचकित. गले मिली, तो मेरी अश्रुधारा ही बह निकली. आंसू गौरी से मिलने की ख़ुशी के थे अथवा नसीब पलट जाने के ग़म में, कह नहीं सकती. मैंने बिटिया से पूछा, “तुम तो निशा से मिलने गई थी, यह कहां मिल गई तुम्हें?” तो बड़े चैन से बैठते हुए बोली, “इन्हीं भाई-बहन को खोजने तो गई थी मैं चंडीगढ़, निशा की मदद से.”

मैं एकदम से सब के सामने पूछ नहीं पाई कि ‘तो फिर भाई कहां है?’

मां से ही पता चली थी उसे पूरी बात. उम्र का अंतर भूल दोनों सहेलियों-सी ही बतियाती रहतीं. उस दिन हम सब देर तक बैठे बात करते रहे. कपिल का जब भी नाम आता, गौरी भेदती नज़र से मेरी ओर देखती. क्या पढ़ना चाहती थी वह मेरे चेहरे पर? उम्र गुज़ार दी मन मारकर जीते हुए. अभी भी मेरे चेहरे पर कोई भाव उभरता था क्या? पर फिर भी मैं मन का चोर छुपाने इधर-उधर देखने लगती.

रात को गौरी को मेरे कमरे में ही सोना था. एकांत पाते ही मैंने उससे कपिल के बारे में पूछा. मेरे मन में तो कपिल के लिए सदैव दुआएं ही निकली थीं. वह स्वस्थ और प्रसन्न रहे यही चाहती थी मैं. यह सोचा भी नहीं था जो गौरी ने बताया, “कुछ माह पूर्व उसे डॉक्टरों ने कोलन कैंसर बताया था. ऑपरेशन तो हो चुका है और ठीक होने की पूरी संभावना है, किंतु इलाज अभी लंबा चलना है. मैं अपनी तरफ़ से पूरी देखभाल कर रही हूं, परंतु स्कूल जाते बच्चे, बीमार सास-ससुर और पति. चाहकर भी तो दिन में एक ही चक्कर लगा पाती हूं. एक केयरटेकर रखा हुआ है, वही देखभाल कर रहा है.”

“…पर उनके अपने परिवार के लोग? पत्नी, बच्चे?” मैंने बीच में ही टोकते हुए पूछा.

“अरी पगली! उसने विवाह ही कब किया कि आज उसे देखनेवाला कोई होता. बहुत कोशिश की मम्मी-पापा ने, आख़िरी दम तक, पर भैया माने ही नहीं. न ही कभी कारण बताया. कारण तो बस मैं ही जानती थी…”

मैंने उसी क्षण एक निर्णय लिया और अपना सामान अटैचीकेस में डालने लगी. गौरी को सुबह पहली बस से जाना था और उसके साथ मुझे भी.

Usha Vadwa

      उषा वधवा

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