कहानी- क़िस्मतवाली (Short Story- Kismatwali)

“मेरे पति स़िर्फ मेरे प्रति पूर्ण समर्पित हैं, ये ख़्याल मुझे आभासी ख़ुशी देता है, मेरे होंठों पर मुस्कान लाता…

“मेरे पति स़िर्फ मेरे प्रति पूर्ण समर्पित हैं, ये ख़्याल मुझे आभासी ख़ुशी देता है, मेरे होंठों पर मुस्कान लाता है. लोग जो मेरे प्रति ईर्ष्या महसूस करते हैं, क्या ये सब सुशांत से अलग होने पर संभव होगा. सब मेरे प्रति दया भाव रखना शुरू कर देंगे या फिर क्या पता, कोई फ़ायदा उठाने की सोचे.”

मनस्वी, कितना सुंदर मौसम है, बेकार ही ऑफिस आ गई. सुशांत ने कितना कहा कि मत जाओ. आज इस भीगे मौसम का मज़ा लेंगे, पर हाय री क़िस्मत.”

सुकन्या के अंदाज़ पर मनस्वी फीकी मुस्कान के साथ सुबह-सुबह अपने पति के साथ हुई नोंकझोंक में खो गई.

ज़रा-सी बात और पतिदेव झुंझला पड़े. क्या करे वह अगर बरसात के दिनों में उनके अंडरवियर और बनियान नहीं सूखे तो.

कितना भी ड्रायर चला लो, पंखे में भी डाल लो, नमी तो रह ही जाती है. इसमें बेवजह उखड़ जाने की क्या ज़रूरत थी. शाम को तो बरसात में चहक-चहककर पकौड़े और चाय की मांग हो रही थी, तब तो बरसात बड़ी अच्छी लगी. मोहम्मद रफ़ी के गाने भी ज़ुबां पर चढ़ गए, पर सुबह होते ही?

“अरे! कहां खोई हुई है.” सुकन्या की बात पर लंबी सिसकारी लेते मनस्वी बोली, “तेरी बातों में खोई हूं और कहां? काश! हमारे पति भी तेरे सुशांत जैसे रूमानी होते, तो क्या बात होती. सच बता सुकन्या, कौन-सा जादू चलाया है तूने, जो सुशांत जी तुझ पर लट्टू रहते हैं.”

यह सुनकर सुकन्या मुस्कुराई, “कवि हैं पति मेरे. उनकी पेन की नोंक मुझ पर घूमकर नित नए विषय उठा लेती है. उनके रोमांटिक स्वभाव की सीधी वजह मैं ही हूं, और क्या.”

उसके सांवले-सलोने चेहरे पर चमक उभरी, फिर वह कहीं खो-सी गई. वह अक्सर ऐसे ही जब-तब खो जाती है.

कंप्यूटर बैकलॉग करते सुकन्या को धौल जमाती हुई वह बोली, “तू और तेरा कवि पति, ये ऑफिस है मैडम, यहां खोना मना है.”

“अरे! इसमें खोने जैसा क्या है, मेरे सुशांत हैं ही ऐसे. इन बरसाती बूंदों में उनके साथ के सामने अपनी नौकरी को चुनकर पाप किया है. इन मस्त नज़ारों में मेरा साथ पाकर वह जाने क्या-क्या लिख जाते मुझ पर…”

सुकन्या मादक अंगड़ाई लेते हुए बोली, तो मनस्वी उसे देखती रह गई. सांवला रंग, बोलती-सी मुस्कुराती मोटी-मोटी आंखें, शरीर दुहरा, गले में एक चकत्ता, जो शायद जन्मजात ही था. ऐसा कुछ भी नहीं था उसमें, जो किसी को बांधे रख सके. फिर भी पति की उस पर अतिशय आसक्ति दर्शाती थी कि बाह्य सुंदरता पर आंतरिक सौंदर्य हावी पड़ता है.

“ऐ, ऐसे क्या देख रही है. बोल न, आधी छुट्टी लेकर चली जाऊं.” वह शरारत से एक बार फिर बोली, तो मनस्वी माथा पकड़कर स्वांग जनित स्नेह से बोल पड़ी, “हे भगवान! तू और तेरा कविराज रांझा. अब चल, कैंटीन में चाय पीकर मौसम का लुत्फ़ उठाएंगे. यहां ऑफिस में भी बरसात का मज़ा कुछ कम नहीं.”

वह शायद कुछ ज़ोर से बोल पड़ी थी. तभी आसपास के लोग भी मुस्कुरा पड़े.

ये कोई आज की बात नहीं थी. ऑफिस में अक्सर ये चर्चा होती है कि सुकन्या जाने कौन-सी कलम-दवात से क़िस्मत लिखवा कर आई है, जो उसे इतना प्यार करनेवाला पति मिला है. प्रेम से लबरेज़ दांपत्य का किसी को उदाहरण देना होता, तो हमेशा सुकन्या का उदाहरण दिया जाता.

वह स्वयं भी तो अपने प्रेमिल क्षणों को बांटने से नहीं चूकती. रोज़ ही कोई न कोई रोमांटिक क़िस्सा उसके हिस्से रहता.

मसलन- कल रात  सुशांत ने चांदनी रात में मधुर वार्तालाप के बीच ये पंक्तियां उसको नज़र कीं. कल शाम साथ-साथ खाना बनाया. ये साड़ी सुशांत ने दी है. ये अंगूठी उन्होंने देते हुए ये कहा- वो कहा… उफ़्फ़! कितना कुछ था उसके पास कहने को. रोज़ एक नया प्रसंग होता सुनाने को. वह कम पड़ता, तो उसकी लिखी रूमानी ग़ज़लों और मतलों को सुनाते हुए ऐसे भाव देती जैसे उन भाव भरी इबारतों का पेटेंट करवाकर आई हो.

अपने रूमानी दाम्पत्य की क़िस्सागोई करती और सबके होंठों पर मुस्कान की रेखा घिर आती. उसकी कजरारी स्वप्नीली आंखें पति के प्यार से लबलबातीं, तो लोगबाग   जल-भुनकर ख़ाक हो जाते, पर मनस्वी  उसकी सबसे अच्छी श्रोता थी. कभी-कभी उसे भय भी लगता कि सुकन्या-सुशांत के प्रेम को कहीं किसी की नज़र न लग जाए.

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ऑफिस से शाम को मनस्वी उस दिन  घर पहुंची, तो पतिदेव ने उसके लिए चाय बनाकर रखी थी. पतिदेव के हाथों  की चाय और मिज़ाजपुर्सी से सुबह की झड़प से उपजी तल्खी गायब हो गई, तो एकबारगी मनस्वी को ग्लानि हो आई.

क्या हुआ जो विजय सुशांत जैसा भावुक कवि हृदय नहीं रखते, पर जैसे भी हैं,  केयरिंग है. उसकी जगह और कोई भी होता, तो ऑफिस जाने की हड़बड़ी में नम बनियान देख चिड़चिड़ा जाता. जाने-अनजाने विजय और सुशांत की तुलना कर बैठने पर मन अपराधबोध से भर उठा.

क़रीब 10 दिन बीतते न बीतते सुकन्या एक बार फिर दफ़्तर से नदारद हुई. फोन किया, तो पता चला मैडमजी माउंटआबू  की ख़ुशनुमा वादियों में हैं. उसकी प्रफुल्लित आवाज़ उसकी ख़ुशी ज़ाहिर कर रही थी.

“क्या करूं मनु, सुशांत ने एकदम से प्रोग्राम बना लिया. क्या करती आना ही पड़ा, पर सच कहूं, बड़ा मज़ा आ रहा है. इतना  ख़ूबसूरत मौसम है कि क्या कहूं… मेरे कमरे के ठीक सामने पहाड़ियां हैं, जिन्हें बादलों ने ऐसे ढंका है कि…”

“सुन मुझे थोड़ा काम है.” मनस्वी ने स्वर भरसक संभाला, कहीं ईर्ष्या ज़ाहिर न हो जाए, पर सुकन्या अपनी दुनिया में मस्त बोल रही थी,

“मनु, अपने रोज़मर्रा के जीवन की रेलमपेल से छुटकारा पाना ज़रूरी है. जो पल हमने यहां जीए हैं, बस वही ज़िंदगी है. जानती हूं तेरा समय ख़राब कर रही हूं, पर क्या करूं, तुझसे अपनी ख़ुशी बांटती हूं, तो ख़ुुशी और बढ़ जाती है…”

“अरे, नहीं सुकन्या इतना भी बिज़ी नहीं हूं. तुम्हारे जीवन में ख़ुशियों के पल यूं ही आते रहें और क्या चाहिए. और हां, अब की बार आना तो असली ख़ुशी लेकर आना, मतलब दो से तीन की तैयारी करके आना…” यह सुनकर वह ज़ोर से हंस दी, फिर ‘अच्छा रखती हूं’ कहकर उसने फोन काट दिया.

हो न हो, इस बार सुकन्या ज़रूर ख़ुशख़बरी लेकर आएगी. मनस्वी सोच के घोड़े दौड़ा रही थी. एक हफ़्ते बाद सुकन्या का फिर फोन आया, “मनस्वी मेरी दो दिन की छुट्टी बढ़वाने की अर्ज़ी दे देना यार. मैं गिर पड़ी. सुशांत ट्रेकिंग पर ले गए थे, रस्सी हाथ से छूट गई. वो तो इन्होंने मुझे संभाल लिया, वरना जाने क्या होता. चेहरे और हाथ में चोट आई है, दो-चार दिन बाद ऑफिस जॉइन करूंगी. बॉस को बता देना…” इस ख़बर के बाद दो दिन बाद दाएं हाथ में क्रेप बैंडेज बांधे आई, तो उसकी दशा देख मनस्वी चौंक पड़ी. चेहरे के दाईं तरफ़ कालापन देख वह घबरा गई. सुकन्या सबको हैरान-परेशान देखकर चिर-परिचित अंदाज़ में बोली, “अरे, बस पूछ मत, ये सुशांत हैं न… आज यहां चलेंगे, कल वहां… डिनर, ट्रेकिंग-बोटिंग… बस पूछ मत मनस्वी… ख़ूब मज़े किए. ट्रेकिंग में गिर पड़ी. सुशांत से अपनी जी भरकर सेवा करवाई है.

सुकन्या अभी भी ख़ुश थी. और क्यों न होती. सच है, दुख-तकलीफ़ में पति का प्यारभरा स्पर्श कितना सुखद लगता है. पति का साथ-दुलार बड़े से बड़े घाव का मरहम बन जाता है. सुकन्या का मुस्कुराता चेहरा देखकर मनस्वी को तीन दिन पहले पैर में लगी वो  मोच याद आई, जिसे कितनी लापरवाही से विजय ने अनदेखा कर दिया. बाद में केमिस्ट को फोन पर पूछकर पेनकिलर मंगवाकर दे दी.

“ऐ कहां खो गई?” सुकन्या के कहने पर मनस्वी उसके चेहरे को ध्यान से देखने लगी. सांवले चेहरे पर चोट का कालापन घुल-मिल गया था. कुछ ऐसे ही सुकन्या का दर्द पति के प्रेम में घुल-मिल गया होगा. शारीरिक पीड़ा दांपत्य प्रेम में घुलकर विलुप्त-सी लगी.

मनस्वी सरसरी नज़र डालते हुए बोली,  “कुछ नहीं, तू अपना हाल बता. तेरे पास माउंटआबू की ढेर सारी बातें होंगी. तू सुना, सच कहूं, तो तेरी बातों से हमारे हृदय के सोये तार भी झनझना उठते हैं.”

और समय होता, तो सुकन्या शुरू हो जाती, पर आज वह कराह उठी, शायद दर्द था. बैलेंस चार्टशीट में पिछले दिनों का लेखा-जोखा भरने के प्रयास में वह खो-सी गई.

“तू कुछ ठीक नहीं लग रही.  कुछ दिन और आराम क्यों नहीं कर लेती.” मनस्वी के कहने पर वह मुस्कुराने की कोशिश करती कहने लगी. “नहीं यार, बहुत काम पेंडिंग है… करना तो है ही…” कहते हुए वह सिसकारकर अपने चोटिल हाथ को सहलाने लगी.

“हाथ में दर्द है ना, ला मैं तेरी मदद करती हूं.” मनस्वी के कहने पर वह “तू बस डाटा डिक्टेट कर दे…” कहते हुए कुछ देर आंखें मूंदे बैठी रही, फिर लंबी और गहरी सांस लेकर काम शुरू किया.

इस बात को महीना भी नहीं बीता था कि वह फिर अनुपस्थित हुई, पर इस बार बॉस के साथ पूरा स्टाफ उससे नाराज़ था, क्योंकि वार्षिक क्लोज़िंग में ऐसे ही काम की अधिकता थी, उसके हिस्से का भार भी सबके सिर पर पड़ गया.

बॉस ने भी आर-पार बात करने का मन बना लिया, आख़िरकार प्रोफेशनलिज़्म भी कुछ होता है. ज़रा-ज़रा-सी बात पर यहां देखना न वहां, पति के पीछे आंखें मूंदें चल पड़ना सही नहीं था. बॉस उसके लिए चार्टशीट बना रहे हैं.

मनस्वी उसके लिए परेशान थी और कुछ हद तक नाराज़ भी. पर जो भी हो, उसकी नौकरी बचाना ज़रूरी था. फोन से संपर्क नहीं हो पाया, तो एक बार उसके घर जाने के लिए मन यह सोचकर बनाया कि शायद अड़ोस-पड़ोस में कोई कुछ जानता हो. कोई हो, जो बता सके कि वह कहां गई है. स्क्वायर मॉलवाली रोड पर पहुंचकर एकता अपार्टमेंट का पता किया. गेट पर सुकन्या सुशांत मीणा तीसरे माले में रहते हैं, यह आसानी से पता चल गया. पांच मिनट के भीतर ही वह तीसरे माले पर पहुंच गई. सुशांत मीणा के नाम की नेमप्लेट देखी, तो वह हैरान रह गई. घर खुला था. बाहर कई चप्पलें रखी थीं. एकबारगी मन किसी आशंका से धड़का, पर अंदर से आती हंसी-खिलखिलाहट की आवाज़ से आशंका निर्मूल सिद्ध हुई. दरवाज़ा खटखटाना नहीं पड़ा, बैठक में ही नीचे कई लोग बैठे दिखे. सुशांत को वह तस्वीर में देख चुकी थी, सो पहचानने में उसे कोई परेशानी नहीं हुई.

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‘जी कहिये?’ के कर्कश स्वर के साथ सुशांत खड़ा अजीब ढंग से घूर रहा था.

“सुकन्या…” उसके मुंह से निकला, तो “वह किचन में देखो…” कहते हुए वह वहां बैठे लोगों के बीच बैठ गया. उसका उपेक्षाभरा अभद्र व्यवहार देखकर मनस्वी विस्मित थी. बैठक में काव्य गोष्ठी चल रही थी. रसोई से सुकन्या चाय के कप लेकर निकलती दिखी. मनस्वी को देख वह हकबकाकर पास आई और सामने बने कमरे में ले गई.

खिसियाई-सी मुस्कराहट लाते बोली, “आज काव्य गोष्ठी है. सुशांत के ख़ास लोग आए हैं, सो ऑफिस नहीं आ पाई, पर तू यहां क्यों चली आई? ”

उसके लापरवाहीभरे प्रश्‍न पर ग़ुस्से से ज़्यादा उसे उस पर दया आई. वह पागल थी या इतनी भोली कि यह भी न समझ सकी कि उसके ग़ैरज़िम्मेदाराना रवैये से नाख़ुश बॉस उसे इस्तीफ़ा पकड़ाकर बाहर का रास्ता दिखा सकता है.

सुकन्या भरसक सामान्य दिखने का प्रयास कर रही थी, पर मनस्वी की आंखें बैठक के उस असामान्य दृश्य पर टिकी थीं, जहां  छह-सात  स्त्रियां और लगभग इतने ही पुरुष  गद्दे-मसनद के साथ बैठे काव्य पाठ के नाम पर हंसी-ठठ्ठा अधिक कर रहे थे.

एक महिला सुशांत से सटी बैठी हंस-हंसकर उस पर गिर पड़ रही थी. सस्ता-सा माहौल देखकर मनस्वी से और बैठा नहीं गया. वह तो सोचकर आई थी कि शायद इस बार फिर सुकन्या अपने सपने के राजकुमार के साथ कहीं सैर पर निकली होगी या कहीं बीमार न पड़ गई हो. पर यहां तो दोनों स्थितियों से इतर कुछ और ही दिखा.

“तू ऐसे एकदम से कैसे चली आई?” सुकन्या के पूछने पर सख़्त लहज़े में मनस्वी बोली, “तेरा फोन नहीं लग रहा था, क्या करती. अपनी नौकरी बचाना चाहती है, तो कल आ जाना. मैं चलती हूं. तू इनकी मिज़ाजपुर्सी कर…” सुकन्या की झुकी गर्दन और झुक गई जब एक महिला का इठलाया-सा स्वर आया, “सुशांतजी, काव्य में ऐसा रसिकभाव, जो मन को सहज उद्वेलित कर दे… सूखे उपवन में मलय सुगंध उठा दे… ऐसा मर्मस्पर्शी भाव कहां से आता है आपकी कविताओं में.”

यह सुनकर सुशांत बोला, “अजी, आप जैसी सखी हों इस सखा की, तो कामदेव उतर ही आते हैं वाणी में. अब घरवाली की मुटियाई कमर और काले रंग पर तो कुछ लिख नहीं सकते. उनको देखकर तो आते विचार भाग जाएं.”

यह सुनकर सुशांत से लगभग चिपकी औरत हंसकर उस पर लदती हुई, ‘अजी, अब ऐसा भी न बोलिए’ कहकर हंस दी. बेशर्मी भरी हंसी के बीच सुशांत की वासनायुक्त लोलुप आंखें एक-दो से मिलती साफ़ दिखीं.

सुकन्या मनस्वी को खींचकर बाहर ले आई. आंखों में आंसू उतर आए, तो कमज़ोर शब्दों में बोली, “वह रीमा है, क्या करूं. जब घर आती है, तो ऑफिस आने को जी नहीं करता. डरती हूं.” अनपेक्षित माहौल और उसकी दशा देख मनस्वी ‘चलती हूं कल बात करेंगे’ बोलकर भारी मन से बाहर निकल आई.

काव्य गोष्ठी का दृश्य याद कर मन वितृष्णा से भर उठा. क्या सोचा था उसने सुशांत के बारे में और वह क्या निकला.

रातभर सुकन्या की कही बातों और देखे गए दृश्य को जोड़ती रही, पर कोई साम्यता नहीं दिखी. दूसरे दिन बॉस के ऑफिस से बाहर निकलती सुकन्या को उसने पकड़ लिया. वह भी शायद बहुत कुछ भीतर भरे थी, इसीलिए मनस्वी के देखने मात्र से उसके आंसू ढुलकने आरंभ हो गए. जो बताया, वह उस पर विश्‍वास न करती, पर कल का देखा दृश्य उसकी बातों का सत्यापन कर रहा था. वह हिचक-हिचककर बोल रही थी, “सुशांत का कवि होना मेरे जीवन में नासूर है. क्या कहूं, इतनी औरतों से मित्रता है, कोई भाई, तो कोई यार मानती है. सुशांत तो वैसे ही दिलफेंक रहे हैं. कवि होने से महिला मित्रों के संग-साथ… यारी-दोस्ती, रूप-सौंदर्य की बातें करने का लायसेंस मिल गया है. कोई  यकीन नहीं कर सकता है कि बाहर की स्त्रियों को आभार आदरणीय माननीय जैसे शब्दों से संबोधित करनेवाले सुशांत वास्तव में काम वासना के कीचड़ से लथपथ हैं. घिन आती है मुझे कभी-कभी अपने आप से कि मैं ऐसे आदमी के संसर्ग में हूं. सच कहूं, तो बाहर स्त्री पर आदर-सम्मान पर ग्रंथ लिखनेवाले सुशांत अपनी पत्नी को अपने घर में अपनी जूती समझते हैं.

कभी नेहा, तो कभी तूलिका… कल्पना-चंद्रिका… हे ईश्‍वर किस-किस का नाम लूं… आजकल रीमा नाम की औरत से उनके संबंध हैं. मैं सब कुछ जानकर भी चुप हूं.  माउंट आबू इनकी काव्य गोष्ठी में गई थी. रीमा को लेकर विवाद हुआ, तो ये तैश में आ गए. मुझे धक्का दिया और नतीजा टूटा हाथ लेकर मैं यहां आई. कविता और औरतों का इन्हें नशा है.”

“तूने यह सब पहले क्यों नहीं कहा? क्यों जताती रही कि तुम आदर्श दंपत्ति हो?”

उत्तेजना से मनस्वी बोली, तो वह फूट-फूटकर रो पड़ी. कुछ संभली तो कहने लगी, “पागल हूं न, क्या करूं. जो नहीं मिला, उसे कल्पना में ही जी लेती थी. यथार्थ में तो कवि की पत्नी होने की प्रताड़ना मिली है, सो सह रही हूं. सत्य की कठोर भूमि पर चलते-चलते पांव में छाले पड़ जाते, तो कुछ देर मिथ्या झूठे रूमानी मधुर दाम्पत्यिक क़िस्सों के सलोने झूले में सुस्ता लेती.”

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“मत सह. अपनी नौकरी संभाल और ख़ुद को संभाल. जो नहीं मिला, उसके पीछे मृगतृष्णा-सी मत भाग.”

“कहना आसान है, पर सहना तो पड़ेगा ही अपने बूढ़े माता-पिता के लिए, जिन्होंने बड़ी मुश्किल से मेरे साधारण रंग-रूप के चलते बड़े श्रम से सुशांत को ढूंढ़ा है.”

“तो क्या, जब तक माता-पिता हैं, तू सहेगी?”

“हां, और तब तक ही क्यों, शायद हमेशा के लिए सुशांत मेरा हो जाए… हो सकता है हम दो से तीन हो जाएं. मेरी तरफ़ से प्रयास जारी है, शायद आनेवाला अपनी क़िस्मत के साथ मेरी क़िस्मत भी लेकर आए.”

“तू पागल है, मृगतृष्णा में जी रही है. चल अभी, सुशांत का असली चेहरा सबके सामने ला.”

“नहीं-नहीं, ऐसा मत बोल, तू किसी को कुछ नहीं बताएगी. जो तिलिस्म मैंने अपने रिश्ते का बनाया है, सबके सामने उसे टूटते मैं नहीं देख सकती. सब मुझ पर हंसेंगे. मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी. मनस्वी तुझे मेरी  क़सम, जो किसी से कुछ कहा.”

“हे भगवान, तू इन हालात में भी किसी तीसरे के बारे में सोच सकती है. मुस्कुरा और हंस सकती है, ये सब मेरी कल्पना से परे है.”

“मेरे पति स़िर्फ मेरे प्रति पूर्ण समर्पित हैं, ये ख़्याल मुझे आभासी ख़ुशी देता है, मेरे होंठों पर मुस्कान लाता है. लोग जो मेरे प्रति ईर्ष्या महसूस करते हैं, क्या ये सब सुशांत से अलग होने पर संभव होगा? सब मेरे प्रति दया भाव रखना शुरू कर देंगे. या फिर क्या पता, कोई फ़ायदा उठाने की सोचे. बेचारी का तमगा लगाकर मैं नहीं घूम सकती. मेरी क़सम खा मनस्वी कभी किसी को कुछ नहीं बताएगी.” सुकन्या हाथ जोड़े प्रार्थना कर रही थी. मनस्वी वहां और ठहर नहीं पाई.

कौन कह सकता था कि वह आज के ज़माने की अपने पैरों पर खड़ी आधुनिक महिला की बात सुन रही थी, जो छलावे के बुलबुले के संग खेलकर अपना मन बहला रही थी. बुलबुला फूट चुका था. वह और ताक़त से फूंककर बुलबुला बनाने में जुटी थी.

जब तीन दिन बाद अख़बार में सुशांत की तस्वीर छपी थी. ‘नारी गौरव’ की रक्षा हेतु पढ़े काव्य पाठ में उनकी कविता सर्वश्रेष्ठ कविता के रूप में चुनी गयी थी. ऑफिस में फुसफुसाहट थी, कितनी क़िस्मतवाली है न सुकन्या, कितनी सुंदर कविता है दोहरी ज़िम्मेदारी निभाती नारी का क्या सुंदर वर्णन हुआ है. मन से श्रद्धानत होते हुए पत्नी पर क्या ख़ूब लिखा है. ‘सुकन्या, लगता है तू शब्द दर शब्द कविता में ढल गई है.’… ‘यू आर सो लकी, पति कितना सोचते हैं…’

कोई कह रहा था, तो किसी ने कहा ‘भई, भावुक कवि… पति शब्दों और भावनाओं की कमी कहां.’ मनस्वी का जी चाहा अपने कान बंदकर ज़ोर से चीखे. नहीं, ये पंक्तियां सुकन्या के लिए नहीं हैं.  वह संस्कारविहीन इंसान कहलाने लायक नहीं है. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उसने सिर उठाया, तो सुकन्या के चेहरे पर एक अभूतपूर्व चमक देखी.

“तो आज जलेबी-समोसा सुकन्या मैडम की तरफ़ से.”

“हां-हां, क्यों नहीं.” सुकन्या प्रफुल्लित-सी कह रही थी.

सुकन्या के चेहरे का ओज उगते सूरज-सी लाली दे रहा था, सब भ्रमित थे, पर वो जानती थी, अंधेरा होनेवाला है. वह उसके चेहरे को ध्यान से देख रही थी और सुकन्या सतर्क-सी उसे सावधान कर रही थी, कहीं उसके चेहरे पर हंसी की रेखा धूमिल न हो.

       मीनू त्रिपाठी

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Usha Gupta

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