कहानी- कुछ बात है उसमें (Short Story- Kuch Baat Hai Usme)

उसने ख़ुद नोट किया है कि वह सबको बहुत प्यार करती है. बहुत ध्यान रखती है हर बात का. वह…

उसने ख़ुद नोट किया है कि वह सबको बहुत प्यार करती है. बहुत ध्यान रखती है हर बात का. वह कहां इन बातों में तनु की बराबरी कर सकता है. प्यार और चिंता वह भी करता है, पर जिस तरह तनु ख़ुद तकलीफ़ उठाकर, अतिरिक्त मेहनत करके घर में सबके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहती है, वह नहीं कर पाता है.

राहुल अपनी पढ़ाई में व्यस्त था. उसकी परीक्षाएं चल रही थीं. डोरबेल बजी, तो मन मारकर उठा. वह घर पर अकेला था, तो उठकर देखना ही था. कुरियर था. उसने साइन करके कुरियर लिया. बाहर से देखने पर ही समझ आ रहा था कि कोई पत्रिका है. उसने लिफ़ा़फे को खोलकर पत्रिका निकाली, उल्टा-पल्टा, कहानियों में लेखकों के नाम देखे, अपनी मम्मी वसुधा शर्मा का नाम दिखा, तो होंठों पर एक भली-सी मुस्कुराहट आई. वह बेड पर लेटकर कहानी पर नज़र डालने लगा.

पढ़ते-पढ़ते उसकी मुखाकृति बदलती चली गई. चेहरा तन गया. यह क्या बात हुई, मम्मी की हर कहानी में पात्रों का बेटी के प्रति इतना स्नेह क्यों उमड़ता है? बेटियों की इतनी तारीफ़ क्यों करती हैं मम्मी हर कहानी में? बाहरी व्यक्ति समझे या न समझे, पर हम तीनों तो अक्सर समझ ही जाते हैं न कि कहानी किस पर लिखी है. और यह तनु! अभी कॉलेज से आएगी, आते ही कहानी पढ़ेगी और फिर मुझे चिढ़ाएगी, “अरे, मम्मी ने फिर इस कहानी में एक बेटी की तारीफ़ कर दी.” हर कहानी में मम्मी तनु की किसी बात की तारीफ़ करती हैं. राहुल को इतना ग़ुस्सा आया कि उसने पूरी कहानी पढ़ी ही नहीं. वसुधा इस समय किटी पार्टी में गई हुई थी, तनु कॉलेज और कपिल ऑफिस में थे. तीन बज रहे थे, राहुल का मूड बुरी तरह ख़राब हो गया था.

वसुधा सात-आठ वर्षों से लेखन में सक्रिय है. अक्सर राहुल मां की प्रकाशित कहानियां नहीं पढ़ता है, पर कभी-कभी मूड होता है, तो उठा लेता है. कई बार उससे दो वर्ष बड़ी बहन तनु ही ज़बर्दस्ती उसके हाथ में पत्रिका पकड़ाकर कहती है, “लो राहुल, पढ़ लो. बढ़िया कहानी लिखी है मम्मी ने.” और जब वह पढ़ता है, तो सिर पकड़ लेता है और चिढ़कर कहता है, “मां, आप कभी मेरी तारीफ़ नहीं लिख सकतीं क्या, बस इसके ही क़िस्से लिखती रहती हैं. ऐसा क्या है तनु में?” वसुधा हंसकर उसके बाल सहलाते हुए कहती है, “ओह बेटा, बुरा क्यों मानते हो? कहानी ही तो है, इतना सीरियसली क्यों ले रहे हो?”

“बाहरवाले समझेंगे कहानी ही है, पर हमें तो पढ़कर ही समझ आ जाता है न कि तनु की किस बात की तारीफ़ आपने कर दी है.” वसुधा के लिए राहुल को समझाना हर बार मुश्किल ही होता है. चार बजे तक तनु भी घर आ गई. राहुल का फूला मुंह देखकर पूछा, “क्या हुआ? भूख लगी है क्या?” राहुल ने ‘ना’ में गर्दन हिलाई. तनु फ्रेश होकर फिर पूछने लगी, “क्या हुआ? तैयारी नहीं हुई क्या पेपर की?”

“नहीं, पढ़ रहा हूं. थोड़ी बाकी है.” कहकर वह पढ़ने बैठ गया. तनु भी पास रखी पत्रिका उठाकर उत्साहित-सी मां की नई प्रकाशित कहानी पढ़ने लगी, तभी राहुल के मोबाइल पर वसुधा का फोन आया, “राहुल, हमारी एक फ्रेंड बीमार है. हम सब उसे देखने जा रहे हैं. थोड़ी देर हो जाएगी आने में.”

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“ओके मम्मी.” कहकर राहुल ने फोन रखा, पास में लेटी आराम कर रही तनु को मां के देर से आने के बारे में बताया, तनु ने पलभर सोचा, फिर कहा, “अच्छा, मम्मी देर से आएंगी.” फिर झटके से उठकर बैठ गई, “राहुल, आज डिनर मैं तैयार करके मम्मी को सरप्राइज़ दूं, वे थकी हुई आएंगी, तो उन्हें कुछ आराम मिल जाएगा.”

खाने-पीने के शौक़ीन राहुल की आंखें चमक उठीं, “तनु, बाहर से ऑर्डर कर लें?”

“नहीं, पापा भी आनेवाले हैं, उन्हें घर का ही पसंद है न!”

“फिर क्या बनाएगी?”

“बता क्या बनाऊं, पर कुछ आसान बताना, पुलाव और रायता बना लूं?”

“पुलाव खाने का तो मूड नहीं है, पूरी-सब्ज़ी बनाएगी?”

“ठीक है, कोशिश करती हूं.” तनु झटपट उठकर किचन में गई, आलू उबालने रखे और काम शुरू किया. मां को सरप्राइज़ देने के लिए वह उत्साहित थी, कपिल भी ऑफिस से आ गए. वसुधा के कुछ देर से आने की जानकारी उन्हें भी थी. तनु ने उत्साहित स्वर में बताया, “पापा, आज डिनर मैं तैयार कर रही हूं.”

“वाह! गुड. वसुधा तो ख़ुश हो जाएगी. आज उसे किचन से ब्रेक मिल ही गया.” पिता-पुत्री की स्नेहभरी बातचीत चलती रही. राहुल का ध्यान फिर कहानी की तरफ़ चला गया था, उसका मूड फिर ख़राब हो गया.

वसुधा आई, तो आम बातचीत के बाद फ्रेश होकर बोली, “चलो, अब तुम लोगों के लिए कुछ बनाया जाए.” वसुधा का हाथ पकड़कर तनु ने कहा, “मम्मी, आओ न किचन में.”

“चलो.” कहते हुए किचन में गई, तो सब्ज़ी बन चुकी थी, एक थाली में टेढ़ी मेढ़ी पूरियां बेलकर रखी हुई थीं. वसुधा ने हैरान होते हुए तनु को बांहों में भरकर कहा, “ओह बेटा, तुमने तो बहुत कुछ कर लिया.” पास खड़े राहुल के गंभीर चेहरे पर नज़र डालते हुए वसुधा ने पूछा, “क्या हुआ बेटा?”

“कुछ नहीं.”

तनु ने कहा, “मम्मी, आज इसका मूड ख़राब है, बता नहीं रहा है.”

वसुधा ने फिर पूछा, “क्या हुआ बेटा?”

“बाद में बताऊंगा.” कहकर राहुल अपने रूम में चला गया. काफ़ी काम तो तनु कर ही चुकी थी. तीनों को बिठाकर वसुधा ने खाना खिलाया, उसका खाना तो किटी में ही हो गया था. डाइनिंग टेबल पर भी राहुल का उखड़ा मूड सबने महसूस किया था. सोने से पहले तनु और कपिल दोनों ड्रॉइंगरूम में बैठे अपने फोन में व्यस्त दिखे, तो वसुधा चुपचाप राहुल के कमरे में गई. उसके सिर पर जैसे ही हाथ रखा, राहुल उसका हाथ हटाते हुए तुनका, “रहने दो मम्मी.”

“अरे, क्या हुआ? बताओ तो.”

राहुल जैसे तैयार ही बैठा था, “आज ही नहीं, हर बार सोचता हूं आपसे पूछूंगा, पर ख़ुद ही टाल जाता हूं. आज फिर आपकी कहानी छपी है. कहानी भले ही किसी और परिवार की है, पर उसमें भी एक बेटी के बारे में पढ़ते हुए यही लगा कि वह तनु पर है. आपकी हर कहानी में तनु क्यों आ जाती है, मैं क्यों नहीं? आज तो मुझे बहुत ग़ुस्सा आया आप पर. उस कहानी में मैं साफ़ समझ गया कि तनु की किस बात की तारीफ़ हो रही है, ऐसा क्या है तनु में!” बेहद गंभीर, शांत स्वर में वसुधा ने कहा, “बस इतनी-सी बात है? राहुल, मैं कुछ नहीं कहूंगी, मन शांत हो जाए, दिमाग़ ठंडा हो जाए, तो थोड़ा समय निकालकर ख़ुद ही सोचना कि ऐसा क्या है तनु में.” कहते-कहते वसुधा की आंखें भीग उठीं और गला रुंध-सा गया, तो राहुल चौंक गया, शर्मिंदगी-सी हो आई थी अचानक. राहुल का कंधा थपथपाकर वसुधा चुपचाप उठकर अपने बेडरूम में चली गई, कपिल भी सोने आ गए थे.

तनु भी सो चुकी थी, पर आज राहुल की आंखों में नींद नहीं थी. वह मां की कही बात पर ग़ौर करने लगा, ऐसा क्या है तनु में, जो उसमें नहीं है. यह उसे ही सोचना है. वह शांत, ठंडे मन से अपनी और तनु की तुलना करने लगा और एक-एक करके न जाने तनु की कितनी बातें उसे याद आती गईं, जो उसके मन पर छाई धुंध को साफ़ करती चली गईं. हां, वह नहीं है तनु की तरह, उसमें वो सब ख़ूबियां कहां हैं, जो तनु में हैं.

उससे दो साल बड़ी तनु कितनी समझदार है. घर में सबका कितना ध्यान रखती है. मां की हर ख़ुशी में उसकी ख़ुशी छुपी होती है. उसने आज की ही बात से सोचना शुरू किया, वह भी तो कॉलेज से आई थी. मां को आराम मिल जाए, यह सोचकर फ़ौरन किचन में जाकर जो कर सकती थी, करने लगी थी. बेचारी पुलाव-रायता सोच रही थी, जो आसानी से बन भी जाता, पर वह पुलाव ज़्यादा पसंद नहीं करता. उसने कहां इस बात की चिंता की कि पूरी-सब्ज़ी बनाना तनु के लिए कितना मुश्किल होगा. उसने तो बस फ़रमाइश कर दी. यह जानते हुए भी कि मां भी तलने का काम तनु से नहीं करवातीं. और तनु, उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं आई. मां को अक्सर कमरदर्द रहता है. तनु हर काम में इस बात का ध्यान रखती है कि मां के ऊपर अतिरिक्त काम का बोझ न पड़े और वह, किसी भी स्थिति में अपना खाना भी ख़ुद लेकर नहीं खाता, यह कहकर कि उसे ख़ुद लेना पसंद नहीं है. वह तो साफ़-साफ़ कह देता है कि उसे घर का कोई काम करना पसंद नहीं है और अगर कोई उसे बाहर का काम बताता है, तो भी वह टाल जाता है. उसे किसी काम में रुचि नहीं रहती. वह स़िर्फ अपने बारे में सोचता है. अपने दोस्त, कॉलेज, फुटबॉल, फोन, टीवी… बस, वह प्यार तो घर में सबको करता है, पर कोई भी काम करने से वह पीछे हटता है.

किसी का बर्थडे हो, मम्मी-पापा की मैरिज एनिवर्सरी हो, मदर्स डे हो या फादर्स डे- तनु कितने दिन पहले से ही उससे सलाह-मशवरा करके गिफ्ट्स के बारे में सोचती है, अपनी पॉकेटमनी का सारा पैसा ख़र्च कर देती है. और वह ख़ुद? ‘हां-हूं’ के अलावा कोई रुचि नहीं दिखाता, तनु भी दुखी होकर कह ही देती है, “मैं तुझसे कौन-सा पैसा मांग रही हूं, इंट्रेस्ट तो दिखा ही सकता है न राहुल?” उसने ख़ुद नोट किया है कि वह सबको बहुत प्यार करती है. बहुत ध्यान रखती है हर बात का. वह कहां इन बातों में तनु की बराबरी कर सकता है. प्यार और चिंता वह भी करता है, पर जिस तरह तनु ख़ुद तकलीफ़ उठाकर, अतिरिक्त मेहनत करके घर में सबके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहती है, वह नहीं कर पाता है. किसी भी अवसर पर किसी के लिए कोई गिफ्ट लाने के लिए वह घंटों बाज़ार में भटकती है, पर उसके कहने पर भी वह कभी साथ नहीं जाता. अस्वस्थता के चलते मां जो कुछ खाना प्लेट में लगाकर तनु को देती है, वह बिना शिकायत के ख़ुशी-ख़ुशी खा लेती है और वह? किसी चीज़ से कोई समझौता नहीं. जो नहीं पसंद, वह नहीं खाना, चाहे कुछ भी हो जाए, चाहे उसके लिए भयंकर कमरदर्द से पीड़ित मां को दोबारा खड़े होकर कुछ अलग से बनाना पड़े. आत्ममंथन के साथ-साथ राहुल की आत्मग्लानि बढ़ती जा रही थी. पता नहीं, तनु की कितनी बातें याद आती जा रही थीं. बराबर के बेड पर गहरी नींद में सोई बहन के निश्छल चेहरे पर नज़र पड़ते ही राहुल के होंठों पर मीठी-सी मुस्कान आ गई. हां, कुछ बात है उसमें, सोचकर वह मन ही मन मुस्कुरा उठा. अचानक किचन में उसे कोई आवाज़ सुनाई दी. जाकर देखा वसुधा पानी पीने उठी थी. राहुल ने कहा, “क्या हुआ मां, सोई नहीं?”

“नहीं, नींद नहीं आ रही, तुम नहीं सोए?”

“नहीं.”

“क्यों?”

“बस, कुछ सोच रहा था.”

“क्या?”

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राहुल मुस्कुराते हुए बोला, “यही कि कुछ बात है उसमें.” वसुधा ने भी मुस्कुराते हुए उसका गाल थपथपा दिया, “तुम में भी तो है कुछ बात, जो इतनी रात तक बहन के बारे में सोच रहे हो. मेरा प्यारा बच्चा.” कहकर वसुधा ने अपने से ऊंचे होते बेटे के कंधे पर सिर रख दिया. राहुल की बातों से मन में एक मायूसी-सी आ गई थी, अब उसकी जगह निश्‍चिंतता ने ले ली थी.

“क्या सोच रही हो मां?”

“यही कि एक कहानी तो तुम पर लिखनी ही पड़ेगी.” ज़ोर से हंस पड़ा था राहुल.

पूनम अहमद

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