कहानी- कुछ ख़ास है हम सभी में (Short Story- Kuch Khas hai hum sabhi me)

 

       

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“चंचल बालक, भविष्य में अधिक नहीं झांकना चाहिए. मनुष्य भाग्यवादी हो जाता है. स्वभाव में अकर्मण्यता आती है. अपने हाथों पर भरोसा करो. निराशा और कुंठा से बचो. जो अपना उत्साह खो देता है वह दिवालिया हो जाता है. किसी काम को छोटा न समझो. अपनी योग्यता, क्षमता, कर्मठता पर ध्यान दो. सफल होने का मूलमंत्र यही है.”

 

भूपति ने आज अपने दोस्तों को लंच पर बुलाया है, क्योंकि उसके माता-पिता बड़े बेटे के साथ इन दिनों तीर्थाटन पर गए हैं. खाली घर का लाभ उठाते हुए भूपति ने यदुवंश, लक्ष्मी निवास और पांडे को खाने पर बुला लिया. कभी इन्हें घरवाले जिगरी दोस्त की तरह देखते थे, पर अब चांडाल चौकड़ी कहते हैं. पहले इनकी मंडली में फहीम भी था, जो वन विभाग की पोस्टिंग पर चला गया. ये चारों अच्छी डिग्री, अच्छी श्रेणी और बेकारी का कलंक ढोते हुए अस्तित्व विसर्जन के कगार पर हैं. भूपति के घर जाना है, इसलिए यदुवंश जल्दी जाग गया. वैसे घरवालों की नज़रों से ख़ुद को बचाए रखते हुए आठ बजे तक बिछौने में छिपा रहता है. उसे देख, अपने विवाह की बाट जोह रही छोटी बहन नित्या ने चाय पकड़ा दी. यदुवंश और नित्या की स्थिति निराश्रितों-सी है. घर की हर समस्या और तनाव को नित्या के विवाह में हो रहे विलंब और यदुवंश की बेरोज़गारी से जोड़ दिया जाता है.

“जाने कैसे ग्रह हैं लड़की के ? और यदुवंश को तो जन्मभर बेकार रहना है…” नित्या नहीं चाहती अनब्याही रहना, यदुवंश नहीं चाहता बेकार रहना, पर… यदुवंश ने चाय देती नित्या को देखा. यही है, जो उसे चाय और खाना परोस देती है, दोनों भाभियां तो अपने में ही रमी रहती हैं. यदुवंश चाय पीने लगा. चाय अभी गरम है. आठ बजे उठता है, तब तक उसके हिस्से की चाय ठंडी हो जाती है. नित्या चाय गरम करना चाहती है. लेकिन बड़ी भाभी आड़े आ जाती है, “नित्या, तुम्हारे बड़े भैया को व़क़्त पर ऑफ़िस पहुंचना होता है. मुझे खाना बनाने की जल्दी है. गैस चूल्हा खाली नहीं है.”
यदुवंश नित्या को पुकारता है, “नित्या, ठंडी चाय ही दे दो.” कभी यदुवंश ठंडी चाय तो क्या, दुबारा गरम की गई चाय भी नहीं पीता था. ताज़ी बनवाता था. अम्मा हंसती, “यदु, तुम बचपन से ही नखरेबाज़ हो.”
बेरोज़गारी ने हक़ की लड़ाई भुला दी. बेरोज़गार के लिए ताज़ी चाय नहीं बनाई जाती और स्नानगृह का प्रयोग वे पहले करते हैं, जिन्हें काम पर जाना होता है, जैसे- बड़े भैया, मझले भैया, मझली भाभी. पहले बाबूजी कमाऊ सदस्य थे और घर के प्रत्येक अणु में पहला हक़ उनका था. अब वे सेवानिवृत्त हैं. लेकिन पेंशन उनके महत्व को किसी सीमा तक बचाए हुए है. चाय पीकर यदुवंश स्नानघर की ओर जा रहा था कि मझली भाभी ने पुकारा, “यदु, तरकारी-भाजी ले आओ.”
“आज नहीं. मुझे नौ बजे भूपति के घर जाना है. खाना वहीं खाऊंगा.” यदु बोला.
यह सुनकर बाबूजी अख़बार की किसी परत से बाहर आए और बोले, “भूपति! उस लफंगे के चक्कर में न पड़ो यदु. क़िताबें पढ़ो. काम-धंधा ढूंढ़ो. वे स़िर्फ दो भाई हैं. बाप के पास पैसा है. भूपति छोटा-मोटा व्यापार कर लेगा. पर तुम्हारी आंखें क्यों नहीं खुलतीं? तुम्हारी डिग्री में इस घर का सबसे अधिक पैसा फुंक चुका है.”
बड़े भैया की बार-बार कही गई बात, “हम कमा कर ले आए, भाभियों ने बनाकर दे दिया, साहबजादे ने गटक लिया. बस, हो गया…”
बाबूजी ने बड़े पूत की मुंह देखी की, “दोनों बड़े लड़के तो एक दिन खाली नहीं बैठे. एक तुम हो. नौकरी नहीं मिल रही है, तो गांव जाकर खेती-बाड़ी करो. खेत अधिया-तिहरा में दिए हैं.”
सपने सुहाने देखे थे, अब हल जोतने की बात. यदुवंश की आंखें भर आईं, जो स्नानघर में बहते पानी के साथ ख़ूब बहीं. स़फेद शर्ट पहन वह भूपति के घर पहुंचा. स़फेद शर्ट उसे पसंद थी. इस शर्ट में वह ख़ुद को चुस्त और स्वस्थ महसूस करता है. लक्ष्मी निवास और पांडे, भूपति के साथ रसोई में तल्लीन थे. भूपति प्याज़ कतरते हुए आंसू बहा रहा था, “यदु जब हम लोग टनों पसीना बहा चुके, तब तुम डकारने पहुंच रहे हो.”
सुचींद्र, जो पांडे के नाम से विख्यात है, बोला, “यह शुरू से कामचोर रहा है.” यदुवंश ने चारों ओर दृष्टिपात किया, “क्या बना रहे हो भूपति?”
“ख़ास नहीं. आलू-परवल, पुलाव, पूरी, रायता और सलाद. मां की परमानेंट बीमारियों ने मुझे और बड़े भाई को इतना अच्छा कुक बना दिया है कि कहते नहीं बनता. लो, चावल बीन डालो.” भूपति ने थाली में चावल डालकर यदुवंश को पकड़ा दिया.
लक्ष्मी निवास उसे छेड़ते हुए बोला, “भूपति, तुम किसी होटेल में शेफ़ बन जाओ. अच्छा वेतन और खाना बिल्कुल मु़फ़्त मिलेगा.”
“बन जाऊं, पर पिताजी की ऊंची नाक का ख़याल आ जाता है. वे मुझे तलाक़ दे देंगे.” कहकर भूपति यदुवंश की ओर पलटा, “यदुवंश, तुम्हारा क्या प्लान है? सुनते हैं आत्महत्या की प्लानिंग है. बुरा न मानो तो भीख मांगना आत्महत्या से भला रहेगा. हॉस्टल में भी तुम यही करते थे. लड़कों के सामने शर्ट फैलाते थे. बाबा, एक फ़िल्म का सवाल है, रुपिया-आठ आना ग़रीब को मिल जाए. सप्ताह भर में कुछ पैसे झाड़ लेते थे और फ़िल्म देख आते थे, तो इसी धंधे में लग जाओ.”
“आइडिया बुरा नहीं है और तुम क्या करोगे लक्ष्मी? रक्षाबंधन पर तुम सीज़नल कमाई करते थे. दर्जन के भाव सूतवाली राखी लड़कों को बांधकर रुपिया-आठ आना झटक लेते थे. सबकी बहन बनते फिरते थे.” यदुवंश ने लक्ष्मी निवास की खिंचाई की.
लक्ष्मी निवास हंसा और बोला, “बहन नहीं, ब्राह्मण. रक्षा बांधने का हक़ पहले ब्राह्मणों को ही था. पता नहीं, कब बहनों ने यह हक़ हमसे छीन लिया.”
“बस तो फिर, त्योहार पर रक्षा बांधकर कुछ नोट-पानी कमा लिया करो.” भूपति ने मज़ाक किया.
लक्ष्मी निवास ने याद दिलाया, “रक्षा बंधन क्यों भूपति? मैं तो ज्योतिष विद्या से भी नोट पानी कमा सकता हूं. भूल गए, मैं तुम लोगों की हाथ की रेखाएं देखा करता था. इधर मैंने ज्योतिष का ख़ूब अभ्यास किया. रेखाएं देखकर सबका भविष्य बता सकता हूं. मैं आज अपनी विद्या का प्रदर्शन करूंगा.”
“तुम सचमुच हस्तरेखा विज्ञान जानते हो लक्ष्मी?” पांडे को कौतुक हुआ.
“हां, दिखाओ दाहिना हाथ. याद है हॉस्टल में तुम मेरे हाथ-पैर कितनी अच्छी तरह दबाते थे? चंपी, तेल मालिश तो ऐसी करते थे कि कोई नउआ क्या करेगा. रेखाएं बताती हैं, तुम सैलून खोलने का इरादा कर सकते हो.”
लक्ष्मी निवास की बात पर आलू-परवल छौंकता हुआ भूपति कुपित हुआ, “पहले भोजन बनवाओ लक्ष्मी. पांडे अपना हाथ लेकर भाग नहीं जाएगा.”
पांडे बोला, “सैलून खोलने का इरादा तो कर सकता हूं. लेकिन किसी भी काम के लिए थोड़ी-सी पूंजी चाहिए और मेरे बापू कहते हैं कि तुम्हारे पीछे इतना पैसा मिट्टी किया, अब नहीं करेंगे.”
यदुवंश चावल बीनते हुए बोला, “पैसे अपनी स्टेट बैंकवाली से मांगो. तुम्हारी जेब वही चलाती है न.”
“मेरा इश्क़ पहले ही मंदा चल रहा है, यदु. तुम तो सब कुछ भंग करके ही दम लोगे.”
पांडे को रोज़गार नहीं मिल रहा है, इसलिए उसकी और स्टेट बैंकवाली की शादी खटाई में पड़ी है. भूपति ने पांडे को बिल्कुल दुख के सागर में डुबो दिया.
“पांडे, तुम कुंवारे ही रह जाओगे. फहीम अच्छा रहा. पट्ठा पढ़कर निकला और नौकरी मिल गई. सुनते हैं ख़ूबसूरत बीवी को बगल में दबाए शान से चलता है.”
लक्ष्मी निवास ने स्मरण कराया, “हां, वे भी क्या दिन थे. हम लोग आसमान से तारे तोड़कर लाने का दम भरते थे. घरवाले तब हमें पैसा, पकवान और हिदायतें ख़ूब भेजते थे.”
यदुवंश सिंक में हाथ धोते हुए बोला, “तब हम बादशाह थे. अब अम्मा कहती हैं तुम्हें बाहर पढ़ने न भेज, यहीं के किसी साधारण-से कॉलेज में पढ़ाते, तो पैसा बर्बाद न होता. बेरोज़गारी लगता है आत्महत्या करवा लेगी मुझसे.”
भूपति ने सहानुभूति जताई, “यदु, यह हमारी ज़िंदगी का क्रूशियल जंक्शन है. लड़के को रोज़गार न मिले, लड़की का ब्याह न हो, तो घर में बिल्कुल इ़ज़्ज़त नहीं मिलती.”
यदुवंश ने अनुमोदन किया, “ठीक बात. मैं और नित्या रोज़ बेइ़ज़्ज़त होते हैं. वही कमज़ोर पर शासन करने की पुरानी आदत.”
लक्ष्मी निवास कनस्तर से पूरियों के लिए आटा निकालते हुए बोला, “मेरे घर कोई चोर-उचक्का भी आ जाए, तो पिताजी कहने लगते हैं लक्ष्मी को कुछ काम दिलाओ. हमें मुक्ति मिले. यार, जो मां-बाप मेरे पीछे जान देते थे, अब ज़रा-सा प्रोत्साहन भी नहीं देते.”
पुलाव की तैयारी करते हुए भूपति बोला, “बिल्कुल. मेरे मम्मी-पापा जब चार धाम जाने की योजना बना रहे थे, तो मैंने कहा- जो हज़ारों रुपए आप तीर्थ में लगाएंगे, मुझे दे दो. मैं छोटे स्तर पर टेंट हाउस का काम शुरू करूंगा. मम्मी बोली, तुम जैसे पापी को पैदा कर हमने जो पाप किया है, उसे ही धोने जा रहे हैं.”
“तुम पापी हो?” पांडे ने भूपति को लपेटा.
“पांडे, मेरे दिल को चोट लगती है यार. दो साल हुए मेरी मौसी के लड़के ने आत्महत्या कर ली. बेरोज़गार था, ऊपर से मौसी के ताने. अब भाभी बेचारी अपने करम को रोती है.”
लक्ष्मी निवास ने पूछा, “भूपति, वह बेरोज़गार था, तो शादी क्यों की?”
“मौसी ने ही ज़ोर देकर करवाई थी. शादी कर लो, नौकरी तो मिलती रहेगी. वह इतना लाचार हो गया कि जान ही दे दी.”
यदुवंश भावुक होने लगा, “भूपति, किसी दिन तुम लोग अख़बार में पढ़ोगे कि बेरोज़गारी से तंग आकर यदुवंश आत्रेय ने ख़ुदकुशी कर ली.”
कुकर में पुलाव का चावल चलाते हुए भूपति ने निंदा की, “मर जाओ यदु, तुम्हारे मरने से देश को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा.”
पांडे ने प्रारूप बनाया, “एक के मरने से सचमुच कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. चलो, हम चारों बेरोज़गारी के नाम पर सामूहिक आत्महत्या करें. मीडिया से लेकर मंत्रियों तक बवाल मचेगा. मंडल आयोग के विरोध में छात्र आत्मदाह कर रहे थे. प्रधानमंत्री को संदेश देने टीवी पर आना पड़ा था.”
भूपति तेज़ स्वर में बोला, “पांडे चुप. हम जब भी मिलते हैं, हौसला तोड़ने की बात करते हैं. हम बातें तो ढंग की कर सकते हैं.”
“ऊंचे ओहदे, बंगले, गाड़ी की.” लक्ष्मी निवास ने जोड़ा.
यदुवंश आत्महत्या पर अड़ा रहा. “भूपति, तुम हम लोगों के साथ मरना नहीं चाहते.”
“नहीं.”
“प्राण बहुत प्यारे हैं?”
“बहुत.”
“मत मरो. हम तीनों के लिए कोई रोने वाला बचना चाहिए.”
भूपति भड़ककर बोला, “यदु, हम लोग यहां एंजॉय करने के लिए इकट्ठा हुए हैं, मातमपुर्सी के लिए नहीं. बेरोज़गारी पर जो बोलेगा उस पर फ़ाइन लगेगा.”
पांडे हंसते हुए बोला, “पैसा होगा तब फ़ाइन देंगे.”
भूपति कुकर का ढक्कन बंद करते हुए बोला, “पांडे, मूड न बिगाड़ो. हरदम निराशा की बातें. निराशा में हम वह भी नहीं कर पाते हैं, जो कर सकते हैं. बताओ कितने दिनों से तुमने क़िताबों को हाथ नहीं लगाया? दो अक्षर पढ़ते हो कभी?”
जवाब यदुवंश ने दिया, “नौकरी मिली नहीं, घरवाले जीने नहीं देते. क़िताबें पढ़ने की ऊर्जा कहां से लाएं?”
लक्ष्मी निवास ने जोड़ा, “ऊर्जा बची नहीं, इसलिए सामूहिक आत्महत्या की योजना बनाई जा रही है. सुनो यदु, तुम आत्महत्या की बात कर हमें बरगला रहे हो. मैं आत्महत्या को हार मानता हूं.”
पांडे सलाद बनाते हुए बोला, “फिर क्या करें? फॉर्म पर फॉर्म भरे जाते हैं, पर वही भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद… हमें कोई नहीं पूछता. हमारी बड़ी डिग्रियां जी का जंजाल बन गई हैं. छोटा काम करते शर्म आती है, क़ायदे का काम मिलता नहीं.”
“भगवान हमें लड़की बना देता तो ठीक था. मां-बाप दहेज दे हमें कहीं ठिकाने लगा देते. हमारे साथ की लड़कियां मौज से शादी कर सुख-चैन से मुन्ना-मुन्नी खिला रही हैं.” यदुवंश ने दोनों हाथों को हिलाकर बच्चे को झुलाने का अभिनय किया.
भूपति झिड़ककर बोला, “पहले शांति से खाना खा ले, फिर दुखड़ा सुनाते रहना.”
पांडे बोला, “भूपति, तुम्हारी पोज़ीशन हम लोगों से बेहतर है. दो भाई हो. तुम्हारे पापा के पास पैसा है, कुछ बिज़नेस कर लेना.”
“टेंट हाउस.” लक्ष्मी निवास ने सलाह दी.
भूपति ने स्वीकार किया, “बुरा क्या है? मैं तकलीफ़ सह लूंगा, पर आत्महत्या नहीं करूंगा. बच जाऊं, तो पुलिस पकड़े, मर जाऊं, तो भूत बनूं. लक्ष्मी, बहुत हुआ. प्लेटें, कटोरियां निकालो, वो उधर से.”
थालियां सज गईं. स्वभाव के अनुरूप यदुवंश बड़े-बड़े कौर खाने लगा. भूपति ने व्यवधान डाला, “धीरे खाओ. जानवरों की तरह क्यों खाते हो?”
“यह मेरी ओरिजनल स्टाइल है.”
लक्ष्मी निवास ने कहकहा लगाया, “अभी जॉब नहीं मिल रहा है, यही स्टाइल रही, तो कहो सौभाग्यवती भी न मिले. कुंवारे रह जाओगे.”
यदुवंश अब थोड़ा मुस्कुराया, “सौभाग्यवती को मारो गोली. अभी तो खाना दिख रहा है. भूपति खाना बढ़िया बना है. बड़े दिन बाद मुंह का ज़ायका ठीक हुआ.”
लक्ष्मी निवास ने अच्छी बात कही, “मुंह का ज़ायका ठीक हो गया. अब मैं तुम लोगों के दिमाग़ के जाले साफ़ करूंगा. यह मत सोचना कि मैं इन दिनों ख़ाक छानता रहा. मैंने ज्योतिष और हस्तरेखा विज्ञान की तमाम पुस्तकें पढ़ डालीं. खाना ख़त्म करो, फिर मैं तुम लोगों की रेखाएं बांचूंगा.”
पांडे ने मखौल उड़ाते हुए कहा, “और हम विश्‍वास कर लेंगे?”
“यदि करो, तो मैं बता सकता हूं कि तुम्हारे भाग्य के सितारे चमकेंगे या नहीं.”
यदुवंश का फलसफ़ा, “सितारे ऐसे डूबे हैं कि नहीं चमकेंगे. तुम लोग आत्महत्या नहीं करने दे रहे हो, तो अब भगवा धारण करूंगा. अच्छी कमाई होती है.”
लक्ष्मी निवास ने बुरा-सा मुंह बनाया, “भगवा से आत्महत्या भली. वैसे यदु, तुम्हारे ललाट की रेखाएं बताती हैं कि तुम साधु नहीं बनोगे.”
पांडे हंसते हुए बोला, “हाथ के साथ ललाट की रेखाएं देखना भी सीख गए लक्ष्मी?”
“हां, पुराना शौक़ है. अब तो काफ़ी कुछ सीख गया हूं.”
“भाग्य-भविष्य जानने की उत्सुकता विकट होती है.”
अविश्‍वास जाहिर करते हुए सभी लक्ष्मी निवास को घेरकर बैठ गए. लक्ष्मी निवास ने सबसे पहले यदुवंश का हाथ देखा.
“वाह! सुंदर रेखाएं हैं. विद्या की प्रगाढ़ रेखा बताती है कि तुम उच्च शिक्षा ग्रहण कर चुके हो. लेकिन अभी गुरु की दशा ठीक नहीं चल रही है, इसलिए बेरोज़गार हो. एक-डेढ़ वर्ष के भीतर भाग्योदय होगा. सुबह पक्षियों को एक मुट्ठी मोटा अनाज डाल दिया करो. पक्षियों का पेट भरेगा और तुम्हारा चित्त प्रसन्न रहेगा. आयु रेखा विकसित है. दीर्घायु होगे. पत्नी सुदर्शना होगी और साली से तुम्हारा चक्कर चलेगा.”
ऐसे सुंदर अनुमान पर यदुवंश को भरोसा नहीं, पर उसने पाया उसके दिल में हिलोरें उठ रही हैं.
भूपति ने यदुवंश को कोहनी मारी, “क्या क़िस्मत पाई है यदु, साली का मज़ा लूटेगा.”
सुनकर यदुवंश ऐसा लजाया मानो साली वाला चक्कर घटित हो रहा है.
तभी भूपति बोला, “लक्ष्मी, मेरा हाथ देख. अच्छा-अच्छा बताना, कहे देता हूं.”
लक्ष्मी निवास, पढ़ाकू की तरह धीर-गंभीर बना रहा, “अच्छा, नहीं सत्य बताऊंगा. तुम्हारे हाथ में व्यवसाय की रेखा है. भाग्य-रेखा के इधर यह जो रेखा है न…”
पांडे बीच में बोल पड़ा, “ढाबा या टेंट हाउस? यह चिरकुट इसी लायक है.”
लेकिन लक्ष्मी निवास ने बताया, “लकड़ी का धंधा अच्छी सफलता देगा. निकट भविष्य में एक्सीडेंट हो सकता है. भूपति, सावधान.”
भूपति ने विरोध किया, “मैं बेहद सतर्क प्राणी हूं. एक्सीडेंट नहीं होगा.”
“तो अच्छी बात है. मैं तो स़िर्फ अनुमान लगा सकता हूं.” लक्ष्मी निवास ध्यान से भूपति के हाथ की रेखाएं बांचता रहा, “तुम्हें बचपन में शरारती लड़कों की संगत भाती थी. पढ़ाई में ध्यान नहीं लगता था.”
भूपति ने करतल ध्वनि में कहा, “सच है. मैं बचपन से पांडे और यदु की कुसंगत में रहकर करियर चौपट कर चुका हूं. एक हीरा था फ़हीम. नौकरी पर चला गया. बचे ये राहू-केतु.”
भूपति की मुख मुद्रा का पांडे ने भरपूर आनंद लिया, “लक्ष्मी, देखो तो मेरा भाग्य चमक रहा है या सफाचट है.”
लक्ष्मी निवास ने पांडे की हथेली थाम ली, “पांडे, तुम्हें मेहनत के अनुरूप फल नहीं मिलेगा, पर जल्दी ही एम.एन.सी. में काम मिलेगा.”
“मंदी का दौर है.”
“फिर भी मिलेगा और प्रेम-विवाह का योग है.”
सुनकर ठहाका लगा. ठहाके से उबरकर पांडे ने चुहल की, “लक्ष्मी, अब तुम अपना हाथ देखो और बताओ क्या गुल खिलाने जा रहे हो?”
लक्ष्मी निवास ने अपनी रेखाओं पर ध्यान केंद्रित किया, “मेरा नाम ‘ल’ अक्षर से शुरू होता है. मैं बेरोज़गार हूं. पिता पुलिस विभाग से रिटायर हुए हैं. नौकरी मिलने में थोड़ा व़क़्त और लगेगा, पर संभव है मुझे ओवरसीज़ जॉब मिले.”
भूपति ने आपत्ति की, “बकवास.”
लक्ष्मी निवास हंसा, “बकवास नहीं. हम तो ईश्‍वर भक्त हैं बालक. प्रभु की मर्ज़ी बताते हैं.”
“तो बताओ, मेरी शादी कब होगी और पत्नी गोरी या काली.” लक्ष्मी निवास ने तथास्तु की मुद्रा बनाकर भूपति से कहा, “चंचल बालक, भविष्य में अधिक नहीं झांकना चाहिए. मनुष्य भाग्यवादी हो जाता है. स्वभाव में अकर्मण्यता आती है. अपने हाथों पर भरोसा करो. निराशा और कुंठा से बचो, जो अपना उत्साह खो देता है, वह दिवालिया हो जाता है. किसी काम को छोटा न समझो. अपनी योग्यता, क्षमता और कर्मठता पर ध्यान दो. सफल होने का मूल मंत्र यही है. बाकी मुझे रेखाएं बांचना नहीं आता.”
यदुवंश हंसा. “लक्ष्मी, मैं पत्नी और साली, दो-दो महिलाओं का प्राण प्यारा बनूंगा, सोचकर मुझे गुदगुदी होने लगी है और तुम कहते हो तुम्हें रेखाएं देखना नहीं आता?”
लक्ष्मी निवास ठग की सी चतुराई से यदुवंश को ताकते हुए बोला, “नहीं आता. लेकिन तुम्हें इतने दिनों बाद आज इस तरह हंसते देखकर अच्छा लग रहा है. तुम इधर जिस तरह आत्महत्या की बात करने लगे हो, मुझे और भूपति को तुम्हारी चिंता होने लगी है. इसीलिए मैंने और भूपति ने लंच रखा कि तुम निराशा से बाहर आओ और कुछ अच्छा सोचो.”
यदुवंश की आंखें भर आईं, “सचमुच, मैं बेवकूफ़ हूं. लेकिन मानता हूं भूपति के भोजन और तुम्हारी ज्योतिष गणना ने मुझे ख़ुशी के कुछ पल ज़रूर दिए.”
भूपति ने यदुवंश को सांत्वना पहुंचाई, “यदु, समस्या इतनी जटिल नहीं है, जितना हम मान बैठे हैं. यह एक परिस्थिति है, जिससे हमें जूझना है. ठान लो तो बहुत कुछ न सही, थोड़ा कुछ तो हो सकता है.”
“हां भूपति, मैं अपने भीतर एक कतरा ही सही, पर स़्फूर्ति पा रहा हूं.”
लक्ष्मी ने इस तरह सांस ख़ारिज की मानो बोझ उतरा हो, “यदु, तुम स़्फूर्त हुए वरना तुम्हारी निराशा की छूत हमें भी लगती जा रही थी. मेरी मानो तो कोई भी इंसान किसी से कम नहीं होता. सभी में कुछ ख़ास होता है. हमें उस ख़ास को पहचानना है. आशावादी बनना है. सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना है.”
भूपति ने उम्मीद जताई, “कुछ न हुआ, तो टेंट हाउस ही सही. हम चारों मिलकर चलाएंगे. कुछ तो करेंगे यार.”
“हम होंगे क़ामयाब.” यदुवंश ने नारा बुलंद किया.
“क़ामयाबी कितनी मिलेगी, यह तो लक्ष्मी बता सकता है. रेखाओं का ज्ञाता जो है.” पांडे ने तिरछी नज़र से लक्ष्मी निवास को देखा.
“भविष्य का तो मुझे पता नहीं पांडे, पर तुम सबको ख़ुश देखकर सचमुच मुझे अच्छा लग रहा है. तुम लोग इतना तो मानोगे न, बहुत दिनों के बाद आज हमने किसी दिन को अपनी तरह से जिया है.”
“बात में दम है.” यदुवंश हंस रहा था. हंस रहे थे सभी. •

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             सुषमा मुनींद्र

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