कहानी- कुछ तुम चलो, कुछ हम चलें…...

कहानी- कुछ तुम चलो, कुछ हम चलें… (Short Story- Kuch Tum Chalo, Kuch Hum Chale…)

शमिक उस पर जब-तब नाराज़ हो जाता है कि उसे कुछ नहीं आता. उसे ही क्यों आना चाहिए, वह समझ नहीं पाती. उसने भी तो बारहवीं के बाद बाहर रह कर पढ़ाई की है. उसी की तरह जॉब कर रही है. वह शमिक की तरह ही बाहर के सभी काम कर लेती है, फिर शमिक घर के काम क्यों नहीं कर सकता.

रियाना विचारों के दलदल में गुम थी. खिड़की से बाहर शून्य में निहारती उसकी आंखें स्थिर थीं.
“रियाना…” शमिक की ज़ोर की पुकार सुन कर वह किचन की तरफ़ दौड़ी. दूध गैस पर चढ़ा कर वह बेडरूम में गई और स्मृतियों में गुम हो गई. दूध उफन-उफन कर पूरे किचन में फैल कर बह रहा था और शमिक गैस बंद करके कमर पर हाथ रखे खड़ा था.
“तुम्हें कितनी बार कहा कि तेज आंच पर दूध चढ़ा कर इधर-उधर मत जाया करो.”
रियाना का दिल टका सा जवाब देने को हुआ, पर चुप रह कर स्लैब साफ़ करने लगी. शमिक भी नीचे गिरे दूध को साफ़ करने को तत्पर हो गया.
इंजीनियर, एमबीए, दोनों कुशाग्र बुद्धि के विद्धार्थियों का पढ़ाई करते समय सिर्फ़ एक ही ध्येय था, एक अच्छी जॉब पाना. शमिक अगर इकलौता लाड़ला बेटा था, तो रियाना इकलौती लाड़ली बेटी. इंजीनियरिंग करते समय यह तो नहीं सीखा था न कि दूध कैसे गरम करते हैं… लौकी छील कर काटते हैं या बिना छीले पकाते हैं… प्रेशर कुकर का ढक्कन बिना गास्केट के नहीं लगाते, क्योंकि सीटी नहीं बजेगी और जो चढ़ाया है वो जल जाएगा.
कोरोना, लॉकडाउन, वर्क फ्रॉम होम… ये भी कहां जाना था. ज़िंदगी बिना कामवाली, बिना कुक के, बिना बाहर से खाना ऑर्डर करे भी कभी बितानी पड़ सकती है. ये भी कहां सोचा था. ये शिक्षा कहां पाई थी कि बाथरूम भी साफ़ करने पड़ते हैं और बिस्तर की चादर भी बदलनी पड़ती है. सुबह बिस्तर भी ठीक करना पड़ता है. यह सब तो सिखाया ही नहीं गया था न.
फर्नीचर पर लगी धूल दो नहीं तो चार दिन में साफ़ करनी ही पड़ती है. फ़र्श पर पोंछा दो-चार दिन में लगाना ही पड़ता है और बरतन तो रोज़ ही धोने पड़ते हैं. चाय, मैगी और ब्रेड ऑमलेट के सिवाय दोनों को कुछ ठीक से बनाना आता ही नहीं था.
बड़ी-बड़ी कंपनियों के दोनों मैनेजर इस समय उफने हुए दूध को साफ़ करते हुए अपने-अपने उफानों को दबा रहे थे. कोरोना, लॉकडाउन, वर्क फ्रॉम होम… ये तीन शब्द किसी शिक्षित या उच्च शिक्षित को ही नहीं, अपितु गली-मुहल्ले में झाड़ू लगाने वाले, घर में काम करने वालियों को भी रट गए थे.
इसलिए अगर कुछ वर्क फ्रॉम होम’ कर रहे थे, तो कुछ वर्क ऑफ होम कर रहे थे और कुछ दोनों कर रहे थे. रियाना व शमिक की विवाह पश्चात घर और ऑफिस के बीच सैंडविच बनी ज़िंदगी बेस्वाद होती जा रही थी. उसे स्वादिष्ट बनाने का, तड़का लगाने का न उनके पास समय था और न ही हिम्मत. इसलिए वर्क फ्रॉम होम का ऑफर शुरू-शुरू में ज़िंदगी में रस घोल गया, चटपटा बना गया. आने-जाने की भागदौड़ व तैयार होने की जद्दोज़ेहद से मुक्त शुरूआती कुछ दिन बहुत अच्छे बीते.
लेकिन होम में सिर्फ़ वही नहीं थे. उनके कामवाले भी थे. होम में सिर्फ़ वर्क फ्रॉम होम ही नहीं… वर्क ऑफ होम भी था और कोरोना का चीर तो बढता ही जा रहा था.
“सोचा था कुछ दिन की बात है, हो जाएंगे सारे काम…” रियाना स्लैब साफ़ कर चुकी थी, बुझी आवाज़ में बोली.
“तुम भी तो कुछ काम ख़ुद ही बढा देती हो अपनी लापरवाही से…”
“मैंने कभी किचन के काम नहीं किए… फिर भी कोशिश कर रही हूं न…” रियाना का लरजता स्वर कुछ तीखा था.
“मैं भी तो कोशिश कर रहा हूं…” शमिक का स्वर भी रोषपूर्ण था.
“लेकिन फिर भी तुम घर के अधिकतर कामों के लिए मुझ पर ही डिपेंड हो जाते हो… जैसे यह सब मेरी ज़िम्मेदारी है.” इस बात का शमिक ने कोई जवाब नहीं दिया.
“उस दिन लौकी बनानी थी तो तुमने सोचा, मुझे तो बनानी आनी ही चाहिए.” रियाना शिकायती स्वर में बोली.
“आजकल तो हर चीज गूगल और यू-ट्यूब पर उपलब्ध है. वहां से देख कर भी तो बनाई जा सकती थी.” शमिक तीखे स्वर में बोला.
“तो तुमने क्यों नहीं वहां से देख कर बना ली?” रियाना बोली.
“ऑफिस के काम के साथ इतनी फ़रसत रहती कहां है?”
“तो मुझे कैसे रहेगी… मम्मी से पूछा, तो उन्होनें कहा कि कुकर में तेल तड़का कर मसाला, नमक, टमाटर डाल कर चढ़ा दो…”
“तुमने सब कुछ वही किया, पर यह नहीं पूछा कि लौकी छील कर काटनी है या बिना छीले. तुमने छिलके सहित पका दी.”
“तुमने भी तो याद नहीं दिलाया. उस दिन सॉस के साथ कच्ची-पक्की चपाती खानी पडी थी. अंडे-ब्रेड भी खत्म हो गए थे. तुम ये भी याद नहीं रख सकते हो.” रियाना झुंझला कर बोली.
“तुम्हें तो रोटी भी ठीक से बनानी नहीं आती.” शमिक ने भी अपनी भड़ास निकाली.
“तो तुम्हें कौन सी आती है.” रियाना चिढ़ गई.
“मुझे क्यों आएगी..?”
“तुम्हें क्यों नहीं आएगी?” रियाना ने सवाल दागा. शमिक चुप हो गया और रियाना भड़क कर बेडरूम में चली गई.
वह फिर पहले की तरह चुपचाप खिड़की के सामने बैठ गई. दिल्ली कि यह एक धुंध वाली सुबह थी. आज रविवार था. कई महीने हो गए थे और वह इस दिनचर्या से बुरी तरह थक गई थी. उसने एक नज़र अस्त-व्यस्त बिस्तर पर डाली. सुबह दोनों ही इस बिस्तर से उठे हैं, लेकिन बिस्तर ठीक करने की ज़िम्मेदारी उसी की है. बाथरूम का पॉट साफ़ करना तो उसे याद ही नहीं रहता. शमिक भी साफ़ करने की जहमत नहीं उठाता.


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शमिक पहले नहाता है, वह बाद में, तो ज़ाहिर है बाथरूम में वाईपर उसे ही चलाना है. जिन कामों के बारे में उन्होंने सोचा भी नहीं था. वे भी करने पड़ते हैं. सिंक साफ़ करना, किचन का स्लैब साफ़ करना, डस्टिंग करना… शमिक को काम नहीं लगते.
वह सिर्फ़ मदद करता है… और उसी को बहुत समझता है. गीला तौलिया जहां-तहां छोड़ देना, कपड़े धोने के नाम पर जो कपड़े सामने दिखे, मशीन में डाले और चला दी. यह ज़िम्मेदारी नहीं की रियाना की आलमारी से भी गंदे कपड़े निकाल ले. जब वह मशीन चलाती है, तो शमिक की आलमारी खोलकर गंदे कपड़े ढूंढ़-ढांढ़ कर निकाल लेती है… शर्ट के कॉलर व कफ हाथ से धो लेती है.
आख़िर ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उसी की क्यों है और मदद सिर्फ़ शमिक को करनी है. ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि ज़िम्मेदारी शमिक उठाए और वह मदद करे. मदद करने वाला जितनी चाहे मदद करे, लेकिन जिसके ऊपर ज़िम्मेदारी है जवाबदेही उसी की हो जाती है.
शमिक उस पर जब-तब नाराज़ हो जाता है कि उसे कुछ नहीं आता. उसे ही क्यों आना चाहिए, वह समझ नहीं पाती. उसने भी तो बारहवीं के बाद बाहर रह कर पढ़ाई की है. उसी की तरह जॉब कर रही है. वह शमिक की तरह ही बाहर के सभी काम कर लेती है, फिर शमिक घर के काम क्यों नहीं कर सकता.
खिड़की के सामने से दिखाई देने वाली बिल्डिंग में निर्माण कार्य चल रहा था. मजदूरों के साथ अक्सर मजदूरनियां भी दिख जाती थीं. तभी उसे सामने से एक मजदूर औरत बोझा ढोती हुई दिखी. रियाना के विचारों की श्रृंखला एकाएक भंग हो गई. क्या फर्क़ है इसमें और मुझमें. ये भी तो काम कर रही है. घर में जाकर भी पूरा काम करेगी. सोच-सोच कर रियाना के अंदर अजीब सी खिन्नता पसर रही थी.
प्रेम विवाह किया था उन्होंने, लेकिन इन बातों पर कभी कहां गौर किया था. मनपसंद साथी के साथ बस एक मस्त-सी ज़िंदगी के बारे में सोचा था. मम्मी जब भी कुछ सीखने के बारे में लेक्चर देती. “यह आपका ज़माना नहीं है…” कहकर वह एक कान से सुन दूसरे से निकाल देती. लेकिन सच तो यह है कि व्यावहारिक जीवन में यह इतना सरल नहीं है. जब कोरोना नहीं था, तब भी अगर कुक या कामवाली ना आए, तो खाना या तो बाहर से मंगाना पड़ता या फिर उसे ही जैसा-तैसा बनाना पड़ता. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि शमिक ने किसी दिन अकेले ही किचन संभाल लिया हो.
तभी उसका मोबाइल बज उठा. मम्मी का कॉल था. उसने फोन ऑन कर हैलो बोला, “कैसी है मेरी गुड़िया…”
“ठीक हूं.” मम्मी की आवाज़ सुनते ही उसकी आवाज़ भावुक होकर भीग गई थी.
“अरे क्या हुआ… तबीयत तो ठीक है न?” मम्मी की आवाज़ में चिंता उतर आई. आजकल वैसे ही कोरोना का डर भी था.
“नहीं, कुछ नहीं हुआ… तबीयत ठीक है.” कहते-कहते वह रो पड़ी. मम्मी ने उसे थोड़ा रोने दिया. कुछ देर रोकर रियाना चुप हो गई.
“अब बता क्या बात है. शमिक से झगड़ा हो गया क्या?”
“नहीं.”
“फिर क्या बात है बेटा, मुझे बता.” रियाना थोड़ी देर चुप रही, फिर बोली. वह सब बोलती रही और मम्मी सुनती रही.
“आप ही बताओ मम्मी… सब मेरी ज़िम्मेदारी है क्या… मुझे कुछ ठीक से बनाना आता ही नहीं है, तो शमिक ताना मार देता है… एक दिन कह रहा था कि ‘मैं अपने पैरेंट्स को इसलिए नहीं बुला पाता हूं, क्योंकि तुम्हें कुछ बनाना ही नहीं आता और कुक भी इतना बुरा खाना बनाता है कि वे खा नहीं पाएंगे. फिर मम्मी को काम करना पड़ेगा.”
“आप ही बताओ मम्मी कि मुझे ही क्यों और कैसे आना चाहिए?”
“लेकिन कुक को गाइड भी तो किया जा सकता है.” मम्मी ने रास्ता सुझाया.
“लेकिन वह भी मुझे ही करना है.”
“हूं…” मम्मी ने लंबी सी हुंकार भरी.
“उस दिन प्रेशर कुकर में बिना गास्केट लगाए ही मैंने दाल चढ़ा दी. सारी दाल जल गई थी. कितना ग़ुस्सा हुआ था शमिक. कहा कि मैं कितनी लापरवाह हूं, मेरी वजह से फ्लैट में आग लग जाती. मुझे ही क्यों पता होना चाहिए सब कुछ… उसे क्यों नहीं..?”
“हां बात तो ठीक है…” रियाना क्योंकि रो रही थी, इसलिए मम्मी ने उसकी हां में हां मिलाई. वे थोड़ी देर उसके चुप होने का इंतज़ार करती रहीं. फिर धीरे से बोली, “लेकिन ज़्यादा नहीं, तो थोड़ा-बहुत घर के काम की आदत तो तुम्हें भी होनी चाहिए. बाहर का भी कब तक खाओगे. और पूरी तरह से कुक के भरोसे भी कहा चलता है.”
वे आगे बोलना चाहती थीं कि यह कहां लिखा है कि लड़की अगर नौकरी कर रही है, तो उसे घर के साधारण काम भी नहीं आने चाहिए और लड़का सिर्फ़ बाहर के ही काम करे, घर या किचन के काम की उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है. लेकिन इस समय कुछ कहना, रियाना का मूड ख़राब करने जैसा था, इसलिए चुप रहीं.
“ठीक है बेटा अपना ख़्याल रखना. फिर कॉल करती हूं.” कहकर मम्मी ने फोन ऑफ कर दिया.


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सोमवार से दोनों का ऑफिस शुरू हो गया. देर से सो कर उठते और ऑफिस टाइम शुरू होते ही दोनों अपने-अपने लैपटॉप में घुस जाते. घर किचन सब अस्त-व्यस्त पड़े रहते. रियाना जो थोड़ी-बहुत कोशिश करती भी थी, अब ज़िद में आकर नहीं कर रही थी. शमिक भी रियाना की ज़िद देखकर ज़िद में आ रहा था.
अभी दोनों इस शीत युद्ध से गुज़र ही रहे थे कि एक शाम को शमिक के मम्मी-पापा अचानक आ धमके. वे फरीदाबाद में रहते थे.
“अरे मम्मी-पापा आप लोग अचानक. फोन भी नहीं किया. कोरोना के समय इतना ख़तरा क्यों मोल लिया.”
“कोरोना अपनी जगह पर और बच्चों का मोह अपनी जगह पर. तुम्हारी बहुत याद आ रही थी. बहुत दिन हो गए थे देखे हुए. फोन करते तो तुम आने के लिए मना कर देते.” शमिक की मम्मी चित्रा सोफे पर बैठते हुए बोलीं.
“शमिक, ज़रा अच्छी सी चाय बना कर तो पिला.” शमिक ने रियाना की तरफ़ देखा, लेकिन तब तक चित्रा उसको प्यार से अपने पास खींच चुकी थीं. रियाना गिरती-पड़ती सी चित्रा की गोद में गिर पड़ी. चित्रा ने उसे अपने से चिपका लिया. रियाना मन से काफ़ी दिन से भरी हुई थी, इसलिए सास का दुलार करना इस समय उसे बहुत भला लग रहा था. पापा भी सिर पर प्यार से हाथ फेर रहे थे. उसका मन अंदर से उमड़-घुमड़ रहा था.
तभी शमिक चाय बना कर ले आया.
“बिस्किट भी ले आ.” पापा बोले, “अगर है तो.”
“बिस्किट कहां रखे हैं रियाना?” उसने रियाना की तरफ़ देखा. रियाना उठने लगी, तो चित्रा ने उसे पकड़ लिया, “तू ले आ न. तुझे अपने घर का ही नहीं पता. उसे मेरे पास बैठने दे थोड़ी देर.” कहकर उन्होंने उसे और भी कसकर चिपका लिया. खिसिया कर शमिक बिस्किट ढूंढ़ने लगा.
शाम के लगभग सात बज रहे थे. रियाना को रात के खाने की फ़िक्र होने लगी. किचन के झंझट के कारण ही तो वह सास-ससुर को अपनी तरफ़ से आने के लिए नहीं कहती थी. फरीदाबाद उनके घर से दो-ढाई घंटे की दूरी पर था. जिस वजह से शमिक का मुंह भी फूला रहता था. पर अब तो आ ही गए हैं. सास के प्यार से जिस उत्साह का संचार अभी-अभी हुआ था. वह गायब होने लगा. सास खाना बनाएगी तो भी शमिक का मुंह फूलेगा. दिनभर ऑफिस के काम से थक कर खाना बनाने का बिल्कुल भी मन नहीं था. कोरोना के कारण बाहर से भी ऑर्डर नहीं कर सकते. वे दोनों तो कुछ भी खा लेते, पर अब तो प्रॉपर डिनर बनाना पड़ेगा. बुझे मन से उठते हुए वह बोली,
“डिनर में क्या बनाऊं मम्मी..?”
“डिनर मैं बना कर लाई हूं. तू बैठ.” रियाना ने राहत की सांस ली. वह वापस बैठ गई. चारों के बीच में ख़ूब गप्पें हो रही थीं. कोरोना काल में अकेलेपन से थके शमिक और रियाना को इस समय मम्मी-पापा की उपस्थिति बहुत सुखद लग रही थी.
काफी गप्प हो जाने के बाद शमिक ने रियाना को खाना गरम करके टेबल पर लगाने के लिए कहा. लेकिन पापा बोले, “खाना तू गरम करके लगा दे शमिक. रियाना से ज़रा मैं बिजली का बिल भरवा दूं ऑनलाइन. कितना भी सीखने की कोशिश की, पर हो ही नहीं पाता है. अबकी बार रियाना से अच्छे से सीख कर जाऊंगा.”
“मैं कर देता हूं पापा. सिखा भी दूंगा.” शमिक बोला.
“एक ही बात है. तू खाना लगा दे. रियाना बिल भर देगी. सिखा दूसरे दिन देना. अभी तो थकान हो रही है.” पापा बोले.
शमिक किचन में चला गया और रियाना ने मोबाइल उठा लिया. बिल पे करके रियाना मम्मी-पापा का रूम ठीक करने चली गई. खाना खाकर सब सोने चले गए. रियाना और शमिक अपने-अपने कारणों से मम्मी-पापा के बारे में सोच रहे थे.
मम्मी-पापा दोनों को सुबह उठने की आदत थी. जब तक रियाना और शमिक उठे. वे चाय बना कर पी रहे थे. शमिक और रियाना की चाय केटल में रखी थी. आज दोनों ने इत्मीनान से सुबह की चाय पी. चाय वाकई बहुत टेस्टी बनी थी.
“रियाना भी चाय बहुत अच्छी बनाती है.” अचानक शमिक के मुंह से निकला. रियाना चौंकी और फिर तनावग्रस्त हो गई. सुबह की चाय बनी हुई मिल जाती, लेकिन अब कहीं उसके सिर चाय बनाना भी न पड़ जाए. लेकिन उम्मीद के विपरीत चित्रा बोलीं, “और तुझे क्या अच्छा बनाना आता है?” यह सुन कर शमिक भी चौंक गया.
“मुझे? मुझे क्या आना चाहिए?”
“कुछ भी, जो तू बना सकता है. नाश्ते में बना दे.” चित्रा बिना उसकी तरफ़ देखे नहाने चली गईं. शमिक हक्का-बक्का सा देखता रह गया.
पापा ने भी एक किताब के पीछे मुंह छिपा लिया. कोरोनाकाल में तो कई बार उनकी भी ऐसी की तैसी हो जाती थी. इसलिए उन्होंने‍ सीन से हटने में ही भलाई समझी.
रियाना भी चुपके से खिसक कर बेडरूम में जाकर बिस्तर ठीक करने लगी. शमिक ने घड़ी देखी, ‘बिना बात कि बहस में उलझेगा तो ऑफिस के लिए टाइम से ऑनलाइन नहीं हो पाएगा.
उसने पोहे का पैकेट निकाला और बनाने की कोशिश करने लगा. लेकिन ठीक से बनाना आ नहीं रहा था. एक बार सोचा रियाना से पूछे, लेकिन मम्मी… ‘मम्मी से ही पूछ लेता हूं’ सोच कर वह पीछे मुड़ा, तो मम्मी खड़ी उसे ही देख रही थी.
“क्या हुआ? बनाना नहीं आ रहा…”
“जी मम्मी…” उसने बहुत उम्मीद से मम्मी की तरफ़ देखा.
लेकिन मम्मी, “जैसा भी आता है, बना दे… हम खा लेंगे.” कहकर पापा के पास बैठ गईं.
‘अब क्या करे… हां यू-ट्यूब किसलिए है’. सोच कर उसने जल्दी से मोबाइल निकाला. थोड़ी देर में यू-ट्यूब से देखकर आख़िर पोहा बना ही लाया. पोहा वाकई स्वादिष्ट बना था. सबने बहुत चाव से खाया. शमिक को आज ख़ुद नाश्ता बना कर अच्छा लग रहा था. हल्की-फुल्की चीज़ें बनाना इतना भी मुश्किल नहीं है, उसने सोचा.
नाश्ता निबटाने के बाद तैयार होने बेडरूम में गया, तो सब कुछ व्यवस्थित था. उसकी शर्ट भी रियाना ने अपने कपड़ों के साथ प्रेस कर दी थी. ‘वाह, इतना बुरा अनुभव भी नहीं रहा नाश्ता बनाना.’ वह जल्दी से बाथरूम में घुस गया. नहाते समय सोच रहा था. उसने नाश्ता बनाया, तो रियाना ने इतनी देर में घर ठीक कर दिया, डस्टिंग कर दी, फ़र्श भी साफ़ कर दिया. अपने कपड़ों के साथ मेरे कपड़े भी प्रेस कर दिए. अगर नाश्ता रियाना बनाती, तो वह उतनी देर तक सिर्फ़ मम्मी-पापा के साथ गप्पें लड़ाता रहता. अपने कपड़ों के साथ रियाना के कपड़े प्रेस करने का तो वह कभी सोचता भी नहीं.


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दोनों तैयार हो कर अपनेअपने लैपटॉप में घुस गए. लंच टाइम में भूख लग आई. आज तो मम्मी ने बढ़िया लंच बनाया होगा, सोच कर दोनों बाहर निकले, तो मम्मी-पापा दोनों अपने कमरे में अधलेटे गपशप कर रहे थे. शमिक कमरे में चला गया.
“मम्मी, लंच में क्या बनाया… बड़ी भूख लगी है.”
“लंच में? मैंने तो कुछ नहीं बनाया. तुमने न कुछ बताया था, न कुछ तैयारी ही की हुई थी.” मम्मी एकदम सरल भाव से बोलीं.
“अरे, कुछ भी नहीं बनाया… मुझे तो बहुत भूख लगी है.” शमिक उत्तेजित सा हो गया.
“हां हां… भूख तो रियाना को भी लग गई होगी और हमें भी लग रही है. चलो सब मिल कर जल्दी से कुछ बनाते हैं.” मम्मी उठ खड़ी हुईं.
“अब क्या बनेगा इतनी जल्दी… लंच टाइम ख़त्म हो जाएगा… ऑमलेट ब्रेड दे दो.” शमिक मायूसी से बोला.
“अरे नहीं. तू किचन में चल तो सही. सब मिल कर करेंगे, हो जाएगा.” मम्मी के साथ पापा भी किचन में चले गए. किचन में खाना न बना देख कर रियाना मतिभ्रम वाली स्थिति में खड़ी थी. सुबह पता होता मम्मी खाने के लिए कुछ नहीं बनाएंगी, तो कुछ तैयारी कर लेती. वैसे डिनर में ज़्यादा बना देती थी, वही लंच में काम आ जाता था. लेकिन कल मम्मी डिनर ले कर आई थीं.
“चलो सब एक-एक मोर्चा संभाल लो. अभी बन जाएगा.” चित्रा ने दाल-चावल निकाले और रियाना को धोने के लिए दे दिए. गोभी निकाल कर पापा को काटने को कहा और आटा निकाल कर शमिक के सामने रख दिया. ख़ुद कढ़ाई गैस पर चढ़ा कर सब्ज़ी छौंकने का उपक्रम करने लगीं. पापा को तो पत्नी के साथ सब्ज़ी काटने की बढ़िया प्रैक्टिस हो गई थी. इसलिए उन्होंने फटाफट गोभी काट दी. चित्रा ने गोभी छौंक दी. रियाना ने दाल-चावल धो कर सलाद काटा और टेबल लगाने लगी. चित्रा ने दाल-चावल भी चढ़ा दिए. लेकिन शमिक अभी भी आटे में ही उलझा हुआ था. आटा गीला हो गया था और शमिक के पूरे हाथ में लिपट गया था. वह बड़ी बेचारगी से मम्मी की तरफ़ देखने लगा. उन्होंने थोड़ा सूखा आटा उसमें डाल दिया.
“अब गूंथ ले. आटा गीला हो जाए, तो यही उपाय है.” रियाना को शमिक के हालात पर दया भी आ रही थी, पर सास कि दबंगता के कारण चुप थी. आख़िर शमिक ने आटा गूंथ ही लिया.
“रियाना मैं दाल छौंकती हूं. तुम तब तक रोटी सेंक लो.” चित्रा एप्रिन उसे पकड़ाती हुई बोलीं. रियाना बिना किसी प्रतिवाद के रोटी बनाने लगी. हालांकि उसे अपने मतलब की ही बनानी आती थी, पर अभी तो कुछ भी कहना मुश्किल था.
आनन-फानन में लंच बन गया था और टेबल पर लग भी गया था. सबको भूख लग गई थी और ताज़ा लंच खाना सबको अच्छा लग रहा था.
“कुछ भी मुश्किल नहीं होता, अगर ठान लो तो.” चित्रा खाना ख़त्म करते हुए बोलीं. ऑफिस टाइम हो गया था, “मम्मी बरतन बाद में धो देंगे… आप रेस्ट कीजिए.” कह कर रियाना अपने कमरे में चली गई. अब उसे विश्वास था कि उसे अकेले कुछ नहीं करना पड़ेगा. शमिक भी अपनी जगह पर जाकर लैपटॉप में घुस गया.
मम्मी-पापा सच में ही रेस्ट करने चले गए. चित्रा ने तब तक कुछ नहीं किया, जब तक रियाना और शमिक अपने कमरे से बाहर नहीं आ गए. चारों ने फिर उसी तरह मिलजुल कर डिनर बनाया. बरतन धोए. अब यह रोज़ की दिनचर्या थी. चित्रा कोशिश करती कि शमिक किचन के काम ज़्यादा करे और रियाना बाहर के. तभी एक दिन गैस का सिलेंडर ख़त्म हो गया.
दूसरा सिलेंडर लगाने के लिए रियाना शमिक की तरफ़ देखने लगी. लेकिन चित्रा ने ताड़ लिया. जान-बूझकर शमिक को दूसरा काम बता कर वहां से हटाते हुए बोलीं, “रियाना, ज़रा सिलेंडर चेंज कर दो.” रियाना ने आश्चचर्य से उनकी तरफ़ देखा, “मम्मी, मुझे कहां आता सिलेंडर लगाना. हमेशा शमिक ही लगाता है.”
“तुम्हे क्यों नहीं आता. शमिक को ही क्यों आएगा?“ इस प्रश्न का रियाना के पास कोई जवाब नहीं था.
“उस दिन भी तुम कह रही थी कि वॉटर सप्लाई का कुछ गड़बड़ है, शमिक नीचे जाकर देख आए. क्या तुम नहीं जाती हो कभी नीचे.” चित्रा आश्चर्य से बोलीं.
“मैं तो सिलेंडर भी बदल देती हूं और कारपेंटर, बिजली वाले किसी से भी काम करवा लेती हूं. अब कहां ज़माना रहा कि लड़कियों की नफ़ासत लड़के संभालें और लड़कों का लाड़लापन लड़कियां.” चित्रा बहुत प्यार करने वाली शख्सियत थीं, लेकिन वसूलों की पक्की थीं. रियाना से कुछ बोला नहीं गया.
“लगाना नहीं आता तो सीखो बेटा. ऐसा कौन-सा काम है, जो आज के पढ़े-लिखे बच्चे नहीं कर सकते. हां अगर मन में यही सोच लो कि हमने तो इंजीनियरिंग, एमबीए या डॉक्टरी की है, तो फिर ज़िंदगी के प्रति तुम्हारा जोड़-घटाव ही ग़लत है. चलो मिल कर लगाते हैं. मैं सिखा दूंगी.”
चित्रा ने रियाना को ही लगाने दिया. ख़ुद बस सिर्फ़ निर्देश देती रहीं. तभी शमिक भी किचन में आ गया. उसने भी मम्मी की बात सुन ली थी. डिनर टाइम था.
“शमिक, अब तो तुम भी अच्छी रोटी बनाने लगे हो. आज खिला दो. कल तो हम फरीदाबाद चले जाएंगे.” चित्रा शमिक से बोलीं. दाल-सब्ज़ी डोंगे में डालती रियाना भी चौंक गई.
“इतनी जल्दी मम्मी. अभी यहीं रहिए.” रियाना को इस बार मम्मी का रहना पहली बार बहुत अच्छा लगा था. चित्रा ने कोई जवाब नहीं दिया. चुपचाप खाना टेबल पर लगाने लगीं. शमिक रोटी बनाने लगा.
डिनर निबटा कर बैठे, तो शमिक बोला, “ मम्मी, रियाना कुछ कह रही थी आपसे. क्यों जा रहे हो आप. यहीं रहो. वहां अकेले क्या करोगे.”
“फिर आएंगे बेटा, पर इस बार तुम्हें कुछ सबक सिखा कर जा रही हूं उम्मीद है कि भूलोगे नहीं.”
“जी मम्मी.” शमिक बोला.
“बैठो रियाना. तुम दोनों से कुछ बात कर लूं.” कह कर चित्रा ने रियाना को अपने पास खींच लिया.
“हमें कुछ कारणों से इस समय आने का प्रोग्राम बनाना पड़ा.” चित्रा पल भर रुकीं, फिर बोलीं, “दरअसल, रियाना की मम्मी का फोन आया था. वे रियाना के लिए बहुत चिंतित थीं, लेकिन पूना से तुम्हारी मदद के लिए यहां आना सरल नहीं था, इसलिए हमें आना पड़ा.”
“मेरी मम्मी का?” रियाना समझ गई. उसकी मम्मी क्यों चिंतित हो गई होगी. शमिक भी इस बात से हतप्रभ था. ‘ऐसा क्या हो गया था, जिससे रियाना की मम्मी को उसकी फ़िक्र हो गई थी. लेकिन शायद उसे सब समझ में आ रहा था.
“बात ही ऐसी थी. सबसे पहले तो मैं एक बात आज अपने बच्चों के सामने स्वीकार करना चाहती हूं कि बच्चों के पालन-पोषण में हमारी पीढ़ी भी चूक कर गई.”
“ऐसा क्यों कह रहीं हैं आप.” दोनों ने अपनी निगाहें मम्मी के चेहरे पर जमा दी.
“ऐसी ही बात है बेटा. जब हमने अपनी बेटियों को बाहर के कामों में पारंगत किया. उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया, तो बेटों को घर के काम क्यों नहीं सिखाए और बेटी से घर के काम क्यों छुड़ाए. जबकि लड़कों से बाहर काम नहीं छुड़ाए. क्या सोचा हमने की दोनों कमा लेंगे, तो घर के काम अपने आप हो जाएंगे. घर के काम कौन करेगा? खाना कौन बनाएगा? क्या रुपए खाकर पेट भरा जा सकता है..?”


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चित्रा पल भर रुकीं, “आज हर युवा पाश्चात्य सभ्यता की नकल करने की होड़ में है, लेकिन वे तो घर का काम ख़ुद करते हैं. बच्चे भी पैदा करते हैं और विवाह भी. लेकिन हमारे युवा क्या सीख रहे हैं- शादी मत करो, बच्चे मत पैदा करो, घर के काम मत करो… मैं तुम दोनों से पूछती हूं, यह कौन-सा कल्चर है बेटा..?”
चित्रा ने दोनों बच्चों पर अपनी प्रश्नात्मक निगाह घुमाई, “तुम दोनों में से किसी की भी मां आकर कुछ दिन तुम्हारा घर संभाल लेगी, तो क्या समस्या का समाधान हो जाएगा? और ये भी सिर्फ़ हमारी पीढ़ी कर पाएगी. तुम्हारी नहीं. क्या हमारी पीढ़ी को जीने का हक़ नहीं है. क्या हमारे लिए बच्चों की ज़िम्मेदारियां कभी ख़त्म नहीं होंगी… तुम हमारे पास आओ तब भी तुम्हें प्लेट लगा कर दें और हम तुम्हारे पास आएं तब भी… आख़िर जिस पेट के लिए इतनी भागदौड़ मची है… उसे ही भरने के लिए साधन करने का तुम्हारे पास टाइम क्यों नहीं है?”
रियाना-शमिक दोनों ने निगाहें झुका ली.
“मैं यह नहीं कहती कि घर या किचन के काम में बहुत परफेक्शन हो, पर इतना तो आना चाहिए की जीवन सुगमता से चल सके…दोनों में से कोई भी, कोई सा भी काम कर सकता है. वैवाहिक जीवन का गणित बिल्कुल अलग होता है बेटा. यहां माइनस माइनस प्लस… प्लस प्लस प्लस तो होता ही है, लेकिन प्लस माइनस भी प्लस ही करना पड‌ता है, तब ही सवाल हल होते हैं. शमिक मैं पहले तुम से पूछ्ती हूं. किचन के व घर के काम के नाम पर पत्नी की ही तस्वीर क्यों उभरती है ज़ेहन में… और रियाना, तुम भारी काम के लिए यहां तक कि गैस सिलेंडर खिसकाने के लिए जब शमिक की तरफ़ देखती हो, तब क्या सोचती हो कि ये काम सिर्फ़ पति के ही हैं…” रियाना चुप रही.
“पति-पत्नी सहयोगी हैं, कोई प्रतिद्वंदी नहीं हैं कि एक-दूसरे से कोई उम्मीद नहीं कर सकते… स्त्री-पुरुष की समानता का मतलब समान अधिकार होता है, एक समान होना नहीं. प्राक्रतिक रूप से ही कुछ काम स्त्री जल्दी करती है, तो कुछ पुरुष. हां अपवाद हर जगह होते हैं. किचन में सिर्फ़ गैस पर खाना बनाना ही काम नहीं होत और भी काम होते हैं. मिलजुल कर क्यों नहीं हो सकते, जैसे आजकल हुए… अभी अगर यहां पर दो लड़कियां या दो लड़के रह रहे होते, तो मिलजुल कर सब कर लेते. लेकिन पति-पत्नी के बीच प्रतिद्वंदिता न जाने कहां से घुस जाती है.”
चित्रा चुप हो गईं और उठ कर बेडरूम में चली गईं. चारों को ही उस दिन बहुत देर से नींद आई. बहुत सी बातें थीं, जो शमिक व रियाना की सोच को उद्देलित कर रहे थे.
महसूस कर रहे थे दोनों कि घर, घर के प्रत्येक सदस्य की एक-दूसरे के प्रति ज़िम्मेदारी, समर्पण व जवाबदेही से बनता है, दोषारोपण से नहीं. जीवन सिर्फ़ एक-दूसरे से उम्मीद करने का नाम नहीं, बल्कि एक-दूसरे की उम्मीद पर खरा उतरने का है.
दूसरे दिन वे फरीदाबाद जाने के लिए तैयार थे. रविवार था. रियाना व शमिक ने मिलजुल कर नाश्ता बनाया. घर ठीक किया. सफ़ाई की. बर्तन धोए. चित्रा सब महसूस कर रही थीं.
अपना बैग लेकर जब मम्मी-पापा बाहर आए, तो शमिक ने एक पैकेट हाथ में उठा लिया. चारों पार्किंग में आ गए थे. पापा ड्राइविंग सीट पर बैठ गए, तो शमिक मम्मी को पैकेट देता हुआ बोला, “ये आपका लंच है मम्मी. आपका पढ़ाया सबक अब हम कभी नही भूलेंगे. माता-पिता को हाथ में प्लेट पकड़ाना बच्चों को भी आना चाहिए.”
“और हां मम्मी ‘प्लस माइनस भी प्लस कैसे करना है. ये भी कभी नहीं भूलेंगे.” कहकर दोनों मम्मी के गले लग गए. भरी आंखों से चित्रा ने उन्हें एक साथ गले लगा लिया.

Sudha Jugran
सुधा जुगरान

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Photo Courtesy: Freepik

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