कहानी- लिव इन (Short Story- Live In)

“मैं इमोशनल फूल नहीं हूं, जो इन पचड़ों में पड़ूं… मैंने वैभव से पहले ही बोल दिया है कि अगर वो मुझे अपनी ज़िंदगी में शामिल करना चाहता है, तो शादी के लिए मुझ पर दबाव ना बनाए.” हंसी-मज़ाक में हुई बात को पूर्वा भूल भी गई, पर जब वैभव और युक्ता ने उन्हें अपने लिव इन रिलेशनशिप के सेलीब्रेशंस पर बुलाया, तो दोनों दंग रह गए.

 

”आज चाय-वाय देने का इरादा है या नहीं…” अक्षत की आवाज़ से चौंकी पूर्वा की नज़र पतीले पर पड़ी. पानी खौलकर आधा रह गया था. आंखें पतीले पर लगी थी, पर मन कहीं और था. युक्ता की क़ातर आवाज़ पीछा ही नहीं छोड़ रही है. “पूर्वा, डर लगता है. वैभव अगर चला गया, तो मैं ज़िंदा नहीं रह पाऊंगी…”
“युक्ता, इस ज़िदगी का चुनाव तूने ख़ुद किया है, जिसमें न कोई बंधन है न कोई ज़िम्मेदारी, है तो स़िर्फ शर्तें, जिसके मुताबिक़ तुम दोनों चले थे. लेकिन अकेले, न पैरेंट्स साथ थे, न दोस्त…” पूर्वा ये सब उससे कहना चाहती थी, पर न जाने क्यों बोल नहीं पाई. चाय को कप में डालती पूर्वा विचारों के भंवर से बाहर निकली, तो देखा अख़बार को हाथों में पकड़े हुए अक्षत की बेसब्री चाय के लिए छलकी पड़ रही थी. “तुम्हें नाश्ते में क्या खाना है अक्षत?”
“जो आसानी से बन जाए…”
“तो कॉर्नफ्लेक्स या फिर दलिया…” पूर्वा ने शरारत से कहा, तो अक्षत झट से बोले, “ना… ना…इतना भी आसान नहीं यार… आज संडे है तुम्हारे हाथ के आलू के परांठे मिल जाएं, तो संडे सफल हो जाता है.”
“ओ रियली… मैं तो सोच रही थी कि तुम्हारा संडे नौ बजे तक बिस्तर पर पड़े रहने के बाद सफल होता.” पूर्वा की बात पर अक्षत हंसते हुए बोले, “देर तक सोना, अच्छी-सी चाय, तुम्हारे हाथ के बने आलू के परांठे, संडे को सफल बनाते हैं.” अचानक अक्षत ने चाय पीते-पीते पूर्वा से पूछा, “ये आज सुबह-सुबह किसका फोन आ गया था बड़ी देर तक बातें करती
रही थीं.”
“बात नहीं कर रही थी स़िर्फ सुन रही थी.” “हां, पर किसकी…?”
“युक्ता का फोन आया था.” अक्षत चुपचाप अख़बार पढ़ने लगे थे, तो पूर्वा ने कहा, “पूछोगे नहीं क्यों…”
“अरे भाई, बहन है तुम्हारी…”
अक्षत की बात काटते हुए पूर्वा बोली, “बहन नहीं, फ्रेंड है वो मेरी… वो भी पहले हुआ करती थी. अब कुछ नहीं लगती है वो…”
“भई तुम्हें ना लगे, मेरी तो वो पहले भी साली लगती थी और अभी भी मानता हूं..”
“लोगों को जिस रिश्ते में बंधना चाहिए, उसे तो बंधन समझकर ताक पर रख देते हैं और तुम हो कि…” पूर्वा के व्यंग्य से आहत अक्षत गंभीरता से बोले, “एक फ्रेंड से बहन तक की यात्रा पूरी करने के बाद वापस फ्रेंड के तौर पर देखना कुछ अजीब नहीं लगता? ये ठीक नहीं है.” अक्षत ने तकिए की टेक लेते हुए अख़बार में मुंह छिपा लिया, पर पूर्वा आवेश में आ गई थी. “इसमें अजीब क्या है अक्षत… रिश्तों को अपनी मर्यादा में ही रहना चाहिए फ्रेंड फ्रेंड है और बहन बहन, पति-पत्नी… पति-पत्नी हैं, और…” वाक्य जान-बूझकर अधूरा छोड़ा गया था. ये अक्षत समझ रहे थे. ग़ुस्से से उठती पूर्वा का हाथ पकड़कर अक्षत ने बैठा लिया था.
“पूर्वा, युक्ता और वैभव हमारे अच्छे दोस्त हैं. क्या हमारा फ़र्ज़ नहीं बनता कि हम उनके उलझे मसलों की डोर को सुलझा दें. दोनों ने हमेशा हमारे पास आने की कोशिश की, पर तुम्हारा ग़ुस्सा कम नहीं होता है. ज़िंदगी को जीने और देखने का सबका अपना नज़रिया होता है. उसे मान देना चाहिए.”
अब इनकी गहरी दोस्ती और जोड़ी का जवाब नहीं था. पूर्वा की शादी में दौड़-दौड़कर काम करती हुई युक्ता को अक्सर लोग उसकी सगी बहन समझ लेते थे. पारिवारिक दोस्ती के बीच सगा-सा रिश्ता दोनों के बीच देखते बनता था. “मेरी बहन को तंग किया तो देख लेना…” युक्ता अक्षत को छेड़ती, तो अक्षत हंसकर कहते, “जो हुक्म साली साहिबा…” दोनों बहन जैसी सखियों के बीच दरारें तब शुरू हुई, जब युक्ता ने बताया कि वो अक्षत के दोस्त वैभव से प्यार करती है. इस बात पर किसी को कोई आपत्ति नहीं थीं, आपत्ति थी, तो उनके लिव इन रिलेशनशिप पर.
“ये तेरा जोख़िम भरा क़दम है, इसमें मत पड़ वैभव अच्छा लड़का है. यदि प्यार करती है, तो शादी कर ले…” पूर्वा पर युक्ता को समझाने की दोहरी ज़िम्मेदारी थी. वैभव और युक्ता के परिवारवालों ने हार मान ली थी. उन सबकी आशाभरी नज़रें अक्षत और पूर्वा पर टिकी थीं. ख़ुद पूर्वा को भी शर्मिंदगी उठानी पड़ती थी, क्योंकि एक अच्छी सहेली जिसे बहन का दर्जा दिया था, उसके इस क़दम की घर-परिवारवालों को क्या सफ़ाई देती. युक्ता को पूर्वा की दख़लअंदाज़ी नागवार लगी, तो पूर्वा ने ख़ुद को अपनी गृहस्थी में समेट लिया. नाश्ते की मेज पर पूर्वा को चुपचाप बैठा देखकर अक्षत ने कहा, “इतना सोचने की ज़रूरत नहीं है, तुम नहीं चाहती हो, तो हम उनके झमेलों में नहीं पड़ेंगे.”
“ये क्या बात हुई… तुम क्या चाहते हो, इतनी जल्दी अपनी दोस्ती भूला दूं. तुम्हें याद है मेरी प्रेग्नेंसी के आख़िर दो महीने जब मैं बेड पर थी डॉक्टर ने फुल बेड रेस्ट कहा था. तुम टूर पर गए थे. मायके-ससुराल से कोई नहीं आया था. तब ये युक्ता ही थी, जिसने मुझे डिलीवरी तक संभाला था. अब वो मुश्किल में है, तो मैं उसे कैसे छोड़ दूं.” भावावेश में बोलती पूर्वा देख नहीं पाई कि प्लेट उठाने के बहाने अक्षत अपनी छलक आने को आतुर हंसी को रोकते हुए वहां से चले गए थे. पूर्वा ने ऐलान कर दिया था कि शाम को वो दोनों युक्ता से मिलने जाएंगे.

अनेक शंका-आशंकाओं से घिरे दोनों उनके घर पहुंचे, तो दंग रह गए. अपनी-अपनी रुचियों को दर्शाता उनका घर कभी अजायबघर-सा दिखता था, लेकिन आज वो एक घर-सा सुंदर लग रहा था. कुछ देर तो किसी की समझ में नहीं आया कि क्या बात करें. छोटी मल्लिका उस सन्नाटे को तोड़ती रही. उसे याद आया, जब पहली बार मल्लिका को गोद में उठाया था, तो उसके मुंह से शब्द निकले थे, “बाई गॉड इतने दर्द के बाद किसी को अपने बच्चे पर प्यार कैसे आ सकता है.” उसकी टिप्पणी पर पूर्वा ने कहा, “जब तेरी बिटिया होगी, तब पूछूंगी.”
“मैं इमोशनल फूल नहीं हूं, जो इन पचड़ों में पड़ूं… मैंने वैभव से पहले ही बोल दिया है कि अगर वो मुझे अपनी ज़िंदगी में शामिल करना चाहता है, तो शादी के लिए मुझ पर दबाव ना बनाए.” हंसी-मज़ाक में हुई बात को पूर्वा भूल भी गई, पर जब वैभव और युक्ता ने उन्हें अपने लिव इन रिलेशनशिप के सेलीब्रेशंस पर बुलाया, तो दोनों दंग रह गए. वैभव ने अक्षत को बताया कि घरवालों के ख़िलाफ़ उसे युक्ता की ख़ातिर होना पड़ रहा है, वो युक्ता को किसी भी क़ीमत पर खोना नहीं चाहता है. युक्ता नहीं चाहती कि दोनों शादी के बंधन में बंधें… तो यही सही है, प्यार का पहला उसूल है अपने साथी की भावनाओं को समझना और उने ख़ुश रखना. यदि ऐसे ख़ुश है, तो यही सही…
उस दिन जहां एक ओर वैभव के प्रति हमदर्दी जागी थी, वहीं उस पर ग़ुस्सा भी आया था कि युक्ता के प्यार के आगे लाचार वैभव सारे नियम-कायदों व सामाजिक बंधनों को ताक पर रखकर युक्ता को ख़ुश करने चला था.
“पूर्वा, मैं अदरकवाली चाय बना रही हूं.” अतीत और वर्तमान के बीच झूलती पूर्वा वर्तमान में आ गई. “तुम्हें याद है मेरी पसंद…” पूर्वा चाहते हुए अपनी आवाज़ से तल्ख़ी को दूर नहीं कर पाई. उसी व़क्त उसकी नज़र युक्ता के पीले पड़े चेहरे पर पड़ी, तो ख़ुद को उसने संयत किया. “ये क्या, स़िर्फ दो कप? तुम लोग नहीं पी रहे हो क्या?”
“दरअसल वैभव को चाय सूट नहीं करती, उसे एसिडिटी हो जाती है, तो आजकल हम लोग ग्रीन टी लेते हैं.” उसकी बात पर अक्षत ने चुटकी ली, “भई एसिडिटी तो वैभव को है तुम तो साथ दो…” बड़े अटपटे से भाव युक्ता के चहेरे पर आए थे. “मैं किसी के लिए ख़ुद को नहीं बदलूंगी…” का दावा करनेवाली युक्ता आज वैभव के साथ ग्रीन टी पी रही थी. मौक़ा पाकर पूर्वा ने युक्ता से पूछा, “सब ठीक तो है ना?”
“कुछ ठीक नहीं है. वैभव को शायद शादी करनी पड़े.”
“किससे शादी कर रहा है वो…?”
“वो मैं नहीं जानती. हालांकि अभी तो वैभव ने मना कर दिया है, पर बाद में कुछ कह नहीं सकती.”
“कह नहीं सकती मतलब… ये चल क्या रहा है तुम दोनों के बीच…? और ये वैभव इस तरह तुम्हारी केयर का नाटक कर रहा है कि कोई भी धोखा खा जाए.”
“प्लीज़ पूर्वा मेरे प्रति उसके कंसर्न को नाटक मत बोल यार… दो सालों से तो सब ठीक ही था. लेकिन अब उसकी छोटी बहन की शादी के लिए लड़के देखे जा रहे हैं. वैभव की मम्मी चाहती हैं. कि हमारे लिव इन रिश्ते की वजह से कोई अड़चन ना आए…”
“ओके… तो अपनी बहन का घर बसाने के लिए वैभव तुम्हारा उजाड़ दे राइट…”
“इनका घर बसा कब था ये बताओ…?” कहते हुए अक्षत वैभव के साथ कमरे में आ गए थे. वैभव सफ़ाई दे रहा था, “मम्मी ने मेरे लिए कोई लड़की देखी है. वो चाहती हैं कि मैं इस रिश्ते से बाहर आकर शादी कर लूं. मैंने मम्मी से साफ़ कह दिया कि मैं किसी और से शादी नहीं करूंगा, पर पता नहीं क्यों युक्ता मुझ पर भरोसा नहीं कर पा रही है. उसे लगता है कि मैं मम्मी के दबाव में आकर कहीं और शादी के लिए हां कर दूंगा. हां जब तक अवंतिका की शादी नहीं हो जाती है, तब तक मैं युक्ता के साथ नहीं रह पाऊंगा. मेरी बहन अवंतिका के प्रति भी फ़र्ज़ बनता है. हम अपने स्वार्थ के लिए अपनों का जीवन बर्बाद नहीं कर सकते. छह-सात महीने की मोहलत मांगी है युक्ता से… अवंतिका की शादी हो जाने के बाद मैं वापस आ जाऊंगा.” शून्य में ताकती युक्ता के चहेरे को अपनी ओर करते हुए वैभव ने दृढ़ता से कहा, “मैं कोई शादी-वादी करने नहीं जा रहा हूं. तुम्हारे लिए जो कमिटमेंट मैंने किया है उसे पूरा करूंगा.” वैभव की बात सुनकर युक्ता की आंखें आंसुओं से भर गईं. वहीं वैभव हंसता हुआ पूर्वा से बोल रहा था, “मैं अगले हफ़्ते जा रहा हूं, पर वापस आने के लिए प्लीज़ ये बात समझा सको, तो अपनी सहेली को समझाओ, जो पता नहीं क्या-क्या सोचे जा रही है. और तो और ये अब मां बनना चाहती है.”
“युक्ता, तुझे हो क्या गया है इन सब झमेलों से बचने के लिए तो तू शादी जैसे बंधन को नकार रही थी अब वही सब…” पूर्वा हैरानी से बोली, तो अक्षत ने आगे जोड़ा, “ज़िंदगी में ऐसे भावुकतापूर्ण फैसले ग़लत साबित हो जाते हैं. मान लो कल को वैभव के जीवन में कोई और आ गया या तुम्हारी ज़िंदगी में कोई और आ गया तो…” अक्षत की बात सुनकर युक्ता की हिचकियां तेज़ हो गईं, तो पूर्वा ग़ुस्से से अक्षत को घूरते हुए युक्ता को समझाने लगी.
“मेरी तो ये समझ में नहीं आता है कि जब तुम दोनों एक-दूसरे को इतना चाहते हो, तो शादी क्यों नहीं कर लेते. आंटी को बिना शादी के तुम दोनों के रहने में प्रॉब्लम है ना… पर यह बताओ कि तुम्हारा वैभव के प्रति विश्‍वास कमज़ोर क्यों पड़ा?” पूर्वा की बात पर एक सन्नाटा छा गया था, जिसे युक्ता की धीमी-सी आवाज़ ने तोड़ा, “वैभव, शादी करना इतना भी बुरा नहीं है, कम से कम टेंशन में तो नहीं रहेंगे.” उसकी बात पर वैभव और पूर्वा चौंके, वहीं अक्षत ने मज़ाक किया, “यार वैभव तूने आंटी से पता किया कि तुम्हारे लिए कैसी लड़की ढूंढ़ी है.”
“जीजू प्लीज़…” युक्ता चिल्लाई, तो सब हंस दिए.
“वैभव, तुम अभी आंटी को बताओ कि मुझसे शादी कर रहे हो. वो भी कल ही…” उत्तेजना में बोलती युक्ता को अचानक भान हुआ कि कुछ ज़्यादा जल्दी हो गई, तो अपने वक्तव्य में सुधार करते हुए बोली, “एक हफ़्ते का समय लेना, हम सबको बुलाएंगे. पता चलना चाहिए कि हमारी शादी हो रही है.”
इस बार युक्ता ने मानो शादी का ऐलान ही कर दिया था. पलभर में सन्नाटा उत्साह में परिवर्तित हो गया था. दूसरे दिन शाम को युक्ता फोन पर पूर्वा को बता रही थी. “मैं बहुत ख़ुश हूं पूर्वा. आज ही मम्मी के पास जा रही हूं. अब तो गृहप्रवेश शादी के बाद ही करूंगी. सच ऐसा लग रहा है मानो सूने कैनवास पर सबने अपनी ख़ुशी और उल्लास के रंग बिखेर दिए हैं. युक्ता का उत्साह चरम पर था. जैसे ही फोन रखा, तो देखा वैभव सामने खड़ा था और वो अक्षत को थैंक्स बोल रहा था. अक्षत उसे गले लगाते हुए बधाई दे रहे थे और कह रहे थे,
“तुम्हारे लिए कुछ भी करने को तैयार हूं. मैं तुम्हे लेकर बहुत ख़ुश हूं…” वैभव की नज़र पूर्वा पर पड़ी, तो झट से अपने कान पकड़कर धीरे-से कहा, “सॉरी! आपकी सहेली के ज़िद को तोड़ना मुश्किल था, इसलिए थोड़ी कूटनीति ज़रूरी थी.” पूर्वा वैभव के इस खुलासे को सुनकर उसका कान पक़ड़ने का उपक्रम करती हुई बोली, “इस थोड़ी-सी कूटनीति ने उसकी जान निकाल दी थी. अब अगर मेरी बहन को ज़रा-सा भी तंग किया तो…”
“उसके चेहरे की मुस्कान की ज़िम्मेदारी मैं लेता हूं.”
“ये कारस्तानी तुम लोगों की है. कम से कम मुझे बता देते?” पूर्वा बोली, तो दोनों हंस दिए. अक्षत कह रहे थे, “वैभव की मम्मी ने बड़ी समझदारी से हम दोनों की इस योजना में साथ दिया.” वैभव चला गया था. आज के दिन का पूरा घटनाक्रम पूर्वा की आंखों के सामने घूम गया था. विवाह के अस्तित्व को नकारनेवाली युक्ता को सहसा वैवाहिक बंधन में बंधना सुरक्षित लगा.
पूर्वा सोच रही थी कि हर रिश्ता अपने साथ ज़िम्मेदारियां भी ले कर आता है. उन ज़िम्मेदारियों से बचने के लिए या फिर कुछ नया करने के लिए किसी रिश्ते को अनाम छोड़ देना क्या सही है? नाम देने से उस रिश्ते पर एक हक़ बना रहता है, साथ ही उस रिश्ते के वजूद से हम सुरक्षित महसूस करते हैं. हो सकता है इन विचारों से कोई इत्तफ़ाक़ ना रखे. फ़िलहाल तो मुझे युक्ता और वैभव की शादी की तैयारियों में जुटना है और ढेर सारी मौज़-मस्ती का हिस्सा बनना है.
“अरे! भई कहां खो गई हो तुम…?”
अक्षत मुस्कुराकर पूछ रहे थे. शायद समझ चुके थे कि पूर्वा अपनी सहेली के सुखद भविष्य की कल्पना में डूब गई थी.

 

       मीनू त्रिपाठी
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Usha Gupta :
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