कहानी- मुखौटे के भीतर (Short Story- Mukhote Ke Bheetar)

बाबूजी की वे कातर निगाहें एवं फैली हथेलियां क्या कभी भूली जा सकती हैं?

“बेटा मुझे छोड़कर न जाओ…” उनके अंतिम शब्द रात-दिन मुझे दिग्दिगंत से आते  महसूस होते हैं. कनपटियां घमघमाती हैं? क्या कृष्ण को कुछ महसूस नहीं होता? सिर हिलाते हुए इनकार किए जा रही हूं, “बाबूजी बच जाएंगे. देखना वे आयेंगे एक दिन. ऐसा नहीं हो सकता. वे जीवित हैं. यह शांतिपाठ किसलिए? भोज क्यों कर रहे हो? हमारे घर पर किसी की मृत्यु नहीं हुई है.”

प्रभा ने मुझे झकझोर कर चिंतातुर स्वरों में कृष्ण को पुकारा.

अभी हम हवन करके उठे थे. हवन में मेरे साथ मेरे पति कृष्ण, दोनों पुत्र प्राण एवं पूर्ण भी बैठे थे. यह शांति हवन हमने बाबूजी के लिए रखा था. सभी रिश्तेदार, मित्र एवं परिचित भी इस अवसर पर आए हुए थे. पूजन-हवन के पश्‍चात् भोज का आयोजन किया गया था. हलवाई अपने सहयोगियों के साथ पकवान, खीर, पूरी, मिठाइयां तैयार कर रहा था.

हमारे द्वारा हाथ जोड़कर आग्रह करने के पश्‍चात लोग पंक्तिबद्ध होकर भोजन हेतु बैठने लगे. तभी एक बुज़ुर्ग ने सलाह दी कि सर्वप्रथम बाहर इकट्ठे भिखारियों को पेटभर भोजन कराना चाहिए. बाबूजी की आत्मा की शांति के लिए भूखों व भिखारियों को तृप्त करने हेतु पत्तलें लगाकर ले जायी जाने लगीं, तत्पश्‍चात बैठे हुए सभी लोगों के लिए भोजन परोसा जाने लगा. अंदर भंडार में मेरी व मेरे पति की बहनें, भाभियां रखी हुई भोज्य सामग्री निकाल कर देने एवं अफ़सोस ज़ाहिर करने आई महिलाओं को भोजन परोसने का कार्य कर रही थीं. पुरुष वर्ग में भी भाई-भतीजे लग गए थे. भोजन की ख़ुशबू मेरे नथुनों में प्रवेश करती, न जाने कितना कुछ बीता हुआ याद दिला रही थी.

इस तरह के भोजन बाबूजी को कितने पसंद थे. वह खाने के लिए मांगते हुए कभी-कभी तो गिड़गिड़ाने की हद तक उतर आते थे. मगर कृष्ण ने उन्हें ये सब देने से या तो मना कर रखा था या देते तो बहुत थोड़ा-सा, जिससे बाबूजी कभी संतुष्ट नहीं हो पाते थे. इतनी सारी सामग्री औरों को खिलाकर क्या अब हमें सुख प्राप्त हो सकेगा या बाबूजी की आत्मा को तृप्ति मिल सकेगी? यही सब सोचकर मैं बेचैन हो उठी. जो हुआ वह सही था या ग़लत, इसकी विवेचना करने का व़क़्त अभी कहां था? मगर मन भी गुज़रे व़क़्त को किसी ज़िद्दी बच्चे की भांति बार-बार धकेल कर नज़रों के सामने ला खड़ा करता था. मैं विवश-सी वहीं रखी चटाई पर बैठ गई. छोटी बहन प्रभा ने मुझे गुमसुम-सा बैठा देखा तो वह समझी कि मैं अपने पितातुल्य ससुर की मृत्यु पर अफ़सोस कर उदास हो उठी हूं. वह मुझे समझाने लगी, “धैर्य रखो दीदी. ऐसे कैसे चलेगा? उधर जीजाजी भी विह्वल हो रहे हैं और इधर आप ऐसे बैठी हैं. बाबूजी तो देवतुल्य पुरुष थे. लेकिन अच्छे व्यक्तियों की तो भगवान के घर में भी ज़रूरत रहती है न. उठो और अपनी संपूर्ण संवेदना, श्रद्धा के साथ उन्हें विदा करो.” प्रभा के साथ-साथ दीप्ति भी मुझे समझा रही थी. दीप्ति मेरी रिश्ते की ननद थी. मैं स्वयं को रोक न सकी, रूंधे कंठ से बिलख उठी. जो ये कह रही हैं, क्या वही मैं भी सोच रही हूं? मेरे अफ़सोस का कारण तो कुछ और ही था. बाबूजी की ऐसी मुक्ति की कामना मैंने कभी नहीं की थी. उधर कृष्ण ऐसे व्यवहार कर रहे थे, जैसे अपने पिता के श्रवण कुमार एक वही थे. अभी मेरे दोनों जेठ भी आए हुए थे. उनमें से बड़े व उनकी पत्नी डॉक्टर थे. दोनों मिलकर शहर में अपना बड़ा-सा नर्सिंग होम चला रहे थे. 25-30 लोगों का स्टाफ था और बड़ी-सी इमारत शहर के बीचोंबीच जेठानी के पिता की दी हुई ज़मीन पर बनी हुई थी. छोटे जेठ दूसरे शहर में एक निजी बहुराष्ट्रीय कंपनी में इंजीनियर थे. कंपनी की दी हुई गाड़ी-बंगला एवं समस्त सुविधाएं उपलब्ध थीं. जेठानी नहीं आ सकी थीं, कारण बच्चों की परीक्षाएं निकट थीं. कृष्ण श्‍वेत धोती-कुर्ता पहने कई लोगों से घिरे बैठे थे. लोग मातमपुरसी के लिए आ रहे थे. वे थोड़ी देर रुककर हमें सांत्वना देते, फिर भोजन करके चले जाते.

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किसी को भी पता न था कि सत्य क्या है? कृष्ण के पिता कैसे मरे? उन्हें हुआ क्या था? मृत्यु पूर्व क्या वाक्या घटा था. जो कृष्ण के द्वारा बताया जा रहा था, वे उसे ही सच मान रहे थे. शक की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. ‘होनी को कौन टाल सका है? अमरफल खाकर कौन आया है?’ सुनते-सुनते मेरे कान पक गए. क्या इस छल-छद्मवेशी, मुंहदेखी कहनेवालों की दुनिया में कुछ लोग भी ऐसे नहीं हैं, जो खरी-खरी कह सकें कि कृष्ण तुमने अपने पिता को कितना तरसाया? उनके साथ क्या-क्या सुलूक किया. जब जानते थे कि उनकी शारीरिक एवं मानसिक स्थिति इस लायक नहीं थी तो उन्हें कुंभ में ले जाने की क्या आवश्यकता थी? वहां वे कैसे मृत्यु को प्राप्त हुए? क्या आज पिता और पुत्र के मध्य शाश्‍वत विश्‍वास, स्नेह एवं सहानुभूति की उष्मा को पैसे एवं स्वार्थ का घुन चट कर गया है? सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु का होना और बात है, मगर छलपूर्वक ला दिया जाना एक घनघोर अपराध. परिवार-समाज के लिए एक व्यक्ति का होना, न होना, उसका जीवन-मृत्यु बहुत कुछ मायने रखता है, सुख-दुख का कारण बन सकता है. मैं अंतर्यात्रा करती मौन बैठी थी.

क्या मैं भूल सकती हूं वह सब? मन-ही-मन मैं स्वयं को इस गुनाह में शामिल मान रही थी. न मानती तो अपराधबोध से क्यों ग्रसित होती? लेकिन कृष्ण के तो वे जनक थे. उनके सुख-दु:ख की परवाह, उन्हें मुझसे अधिक होनी चाहिए थी. कृष्ण की रगों में उनका ही रक्त दौड़ रहा था. मेरे दोनों जेठ तो और भी निश्‍चिंत व दायित्वमुक्त थे. माता-पिता के प्रति बच्चों का कोई कर्त्तव्य भी बनता है, वे तो सोचना-समझना भी नहीं चाहते थे. अम्माजी यानी मेरी सास की मृत्यु पूर्व तक तो सब कुछ ठीक था. अम्मा स्वयं इतनी सक्षम थीं कि बाबूजी के साथ-साथ अपनी भी पूरी परिचर्या कर लेती थीं. यह सब तो अम्मा के दिवंगत होने के बाद हुआ. पत्नी की मृत्यु के पश्‍चात बाबूजी को न जाने क्या हुआ कि वे मानसिक एवं शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो उठे. कभी स्वाद लेकर खाते-पीते तो कभी थाली फेंक देते. कभी धीमे-धीमे बड़बड़ाते तो कभी अवसादग्रस्त हो दो-दो दिन तक पड़े रहते. अनियमित दिनचर्या, रखरखाव की कमी से जल्द ही वे बीमार, चिड़चिड़े व कमज़ोर हो गए थे. तंद्रा में पड़े-पड़े ऊलजलूल बातें करते, चिल्लाते भी.

बुढ़ापा तो यूं भी शारीरिक बल को पस्त कर देता है, ऊपर से बाबूजी की ऐसी अजब स्थिति थी. अम्मा के हाथ के पुओं-पकौड़ों का स्वाद उन्हें बेतरह याद आता, तो कभी चीले-चटनी की याद में लार टपकाते वे मौक़ा पाते ही रसोई घर में पहुंच जाते और कांपते-हांफते बनाने के आधे-अधूरे प्रयास करने लग जाते. सच कहा है कि बूढ़े और बच्चे बराबर होते हैं. बाबूजी की पाचन शक्ति को जानते हुए हम अक्सर उनकी उचित-अनुचित मांग नकार देते थे. ऐसे समय बाबूजी की बेबसी भरी दृष्टि मैं क्या भुला पाऊंगी? कभी-कभी मैं पिघल जाती तो बाद में गंदगी और बदबू से दो-चार होना ही पड़ता. डॉक्टर की ज़रूरत पड़ जाती, साथ ही कृष्ण शंकालु हो मुझसे तकरार पर उतारू हो उठते और साफ़-सफ़ाई के लिए मदद के व़क़्त झुंझलाते-झल्लाते बाबूजी के साथ-साथ मुझे भी कोसते.

कितने अफ़सोस की बात है कि जिन बाबूजी ने अपने बेटों एवं परिवार के लिए अपना स्नेह, प्यार एवं समस्त पैसा-रुपया कमाई ख़र्च कर दी थी, उन्हें हम सबके बीच ख़ुशी के पलों में शरीक तक करना किसी को गवारा न था. एक बार तो बाज़ार से मंगाकर कुछ खा-पी लेने पर बाबूजी की चाय में कृष्ण ने दस्त लगने वाली गोलियां ही मिला दी थीं, जिसके कारण वे खाट से लग गए एवं कुछ भी अंट-शंट न खाने के लिए बार-बार माफ़ी मांगते रहे थे.

कृष्ण मेरे पति थे, उनके विरोध की कल्पना मेरे अंदर बैठी भारतीय संस्कारी नारी कैसे कर सकती थी. मगर कृष्ण के अंदर छिपी शैतानियत को अनुभव कर मैं कांप जाती. क्या इसी दिन के लिए बाबूजी ने अपने बच्चों को पिट्ठू चढ़ाया होगा. चलना, बोलना और दुनियादारी को समझने की शक्ति का अनुभव कराया होगा? क्या ये व्यक्ति यही सब कुछ बूढ़े, अशक्त, बीमार या अचेत होने पर मेरे साथ भी कर सकता है? तब मुझे कृष्ण अनजाने, अजनबी, क्रूर व हिंसा के पुतले दिखते. मेरे मन में उमड़ते-घुमड़ते विचारों के चलते पति के प्रति प्रेम, प्यार व मान-सम्मान धीरे-धीरे नफरत में बदलने लगा. कल को हमारे बेटे प्राण व पूर्ण हमारे साथ यही सब या इससे भी बढ़कर करने लगें तो क्या होगा? मैं चिंतातुर रहती, मगर कृष्ण में हैवानियत के साथ-साथ धूर्तता भी कम न थी. जो भी वे करते, प्राय: बेटों से छिपकर ही करते.

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मेरे दोनों जेठों को रुपया-पैसा मकान के साथ ही बाबूजी की भी दरकार न थी, अतएव बाबूजी हमारे ही होकर रह गए थे और अपनी समस्त चल-अचल संपत्ति कृष्ण के ही नाम लिख दी थी. अभी परिचितों-स्वजनों के सामने घर के सब लोग ऐसा दिखावा कर रहे थे कि बाबूजी के जाने का सबसे अधिक ग़म उन्हीं को हो रहा है. लेकिन मन-ही-मन सब निश्‍चिंत थे कि चलो अच्छा हुआ, बाबूजी की मुक्ति हुई. मगर मुक्ति का सवाल बड़ा पेचीदा है. हम सब तो बाबूजी सहित कुंभ के मेले में स्नान के लिए गए थे. लोग तो आंख मूंद कर मान लेते हैं कि तीर्थ क्षेत्र में हुई अकाल मृत्यु भी मोक्ष के लिए काफ़ी है. मगर इंसानियत के नाते सोचकर देखिए कि एक वृद्ध जिसके भीतर अदम्य जिजीविषा मौजूद है, जो अच्छा खाना-पीना एवं परिवार की ख़ुशियों के बीच रहकर उन्हें महसूस करता हुआ जीवित रहना चाहता है, वो अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाए, यह क्या गहन अपराध नहीं? क्या इसकी कोई सज़ा तजवीज़ कर सकते हैं आप? क्या समाज का ढांचा अब इतना चरमरा गया है कि कोई पिता अपने पुत्र पर भी विश्‍वास न करे. आनेवाले समय में नैतिकताबोध स़िर्फ क्या किस्से-कहानियों में बचेगा या अपवाद स्वरूप कहीं नज़र आएगा? आप यह तो मानते होंगे कि प्रत्येक इंसान के अंदर दैवीय एवं आसुरी शक्ति का वास होता है. यह हमारे अपने ऊपर निर्भर होता है कि हम किसको जगाए रखते हैं. अपने निर्दोष निष्कलुष मन की दैवीय शक्ति के सामने अपने अच्छे-बुरे प्रत्येक कर्म का लेखा-जोखा सभी को देना होता है. इसीलिए मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे में ईश्‍वर के समक्ष हम खड़े होते हैं.

तभी प्रभा ने फिर आकर मेरी तंद्रा भंग कर दी. “दीदी, ज़रा सुनना तो…”

पश्‍चाताप और ग्लानि से भरे अपने विचारों में व्यवधान आते ही मैं घबरा उठी, “नहीं… नहीं… मैंने तो कुछ भी नहीं किया. किया तो कृष्ण ने है, बाबूजी का हाथ नदी की गहरी धारा में कृष्ण ने छोड़ा था. मैं तो प्राण व पूर्ण के साथ तट पर थी.” बाबूजी की वे कातर निगाहें एवं फैली हथेलियां क्या कभी भूली जा सकती हैं?

“बेटा मुझे छोड़कर न जाओ…” उनके अंतिम शब्द रात-दिन मुझे दिग्दिगंत से आते  महसूस होते हैं. कनपटियां घमघमाती हैं? क्या कृष्ण को कुछ महसूस नहीं होता? सिर हिलाते हुए इनकार किए जा रही हूं, “बाबूजी बच जाएंगे. देखना वे आयेंगे एक दिन. ऐसा नहीं हो सकता. वे जीवित हैं. यह शांतिपाठ किसलिए? भोज क्यों कर रहे हो? हमारे घर पर किसी की मृत्यु नहीं हुई है.”

प्रभा ने मुझे झकझोर कर चिंतातुर स्वरों में कृष्ण को पुकारा. कृष्ण आकर आग्नेय नेत्रों से मुझे तकते हुए डपटे, “क्या उल्टा-सीधा बके जा रही हो?” फिर मेरा हाथ थामकर मेरे आंचल को व्यवस्थित करते हुए स्नेह-प्रदर्शन करने लगे और भीतर बाबूजी के कमरे में ले जाकर बैठा दिया. क्या मैंने बाबूजी के स्थान की प्रतिपूर्ति की है? क्या मेरे प्राण और पूर्ण, जिन्हें मैंने अपने हृदय से लगा कर पल-पल बड़ा किया है. रक्त, मज्जा, आंचल की धार से सींचा है, क्या वे भी कृष्ण की तरह एक दिन मुझसे तंग आकर कहीं किसी कुंभ में मुझे मोक्ष प्रदान कर देंगे? मैं भयभीत-सी बाबूजी के बिस्तर पर सिकुड़ी बैठी हूं. कृष्ण ने द्वार की कुंडी बाहर से बंद कर दी. बाहर बाबूजी की मुक्ति का अनुष्ठान चल रहा था. मैं सोच रही हूं, बहुत से लोगों के दो चेहरे होते हैं एक मुखौटे पर, दूसरा उसके भीतर. अदम्य शांति ऊपर बरसती रहती है और भीतर असली चेहरा वीभत्सता का पर्याय होता है.

– शोभा मधुसूदन

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Usha Gupta :
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