कहानी- परवरिश (Short Story- Parvarish)

“उसके जाने के बाद मैंने यह बगिया बसाई. इन पौधों को रोपकर मैं हर्षित होती हूं, सींचकर परितृप्त होती हूं और इन्हें बढ़ता देखती हूं, तो मन में उल्लास की हिलोरें उठने लगती हैं. मैं सच कहती हूं बेटी, मेरे मन में न इनसे फल पाने की इच्छा है और न ही छाया की चाहत. कभी-कभी सोचती हूं, हम अपने बच्चों को भी इसी तरह बिना किसी अपेक्षा के पालें, तो ज़िंदगी कितनी सुकूनभरी हो जाए. ज़रा सोचो, यदि उस दिन मैं बंटी को रोक लेती, तो वह कुछ कहता या नहीं, यह मैं नहीं जानती, पर मेरी अंतरात्मा तो मुझे मेरे स्वार्थी हो जाने के लिए मरते दम तक धिक्कारती रहती.”   रीमा दोनों बच्चों को लेकर सोसायटी पार्क में दाख़िल हुई, तो माला आंटी बेंच पर बैठी सुस्ता रही थीं. कनी तो आते ही अपने ग्रुप में शामिल हो खेलने लगी थी. बच्चों के पास जाने के लिए मचलते दो वर्षीय हनी को लेकर रीमा माला आंटी के पास आकर बैठ गई. “बहुत दिनों बाद नज़र आ रही हो. कहीं बाहर गई थी क्या?” “हां आंटी, ससुराल गई थी. हनी, उधर नहीं बेटा, गिर जाओगे. देखिए न आंटी, कितना परेशान करने लग गया है. वहां भी मुझे सारा दिन इसके पीछे लगे रहना पड़ता था. सास और जेठानी दोनों हंसती थीं मुझ पर.” “क्यों भला?” माला आंटी ने आश्‍चर्य व्यक्त किया. “सासूजी कह रही थीं कि हमने तो घर का सारा काम करते हुए 6-6 बच्चे पाल लिए और इनसे एक नहीं संभल रहा. मेरे बच्चे तो इतने…

“उसके जाने के बाद मैंने यह बगिया बसाई. इन पौधों को रोपकर मैं हर्षित होती हूं, सींचकर परितृप्त होती हूं और इन्हें बढ़ता देखती हूं, तो मन में उल्लास की हिलोरें उठने लगती हैं. मैं सच कहती हूं बेटी, मेरे मन में न इनसे फल पाने की इच्छा है और न ही छाया की चाहत. कभी-कभी सोचती हूं, हम अपने बच्चों को भी इसी तरह बिना किसी अपेक्षा के पालें, तो ज़िंदगी कितनी सुकूनभरी हो जाए. ज़रा सोचो, यदि उस दिन मैं बंटी को रोक लेती, तो वह कुछ कहता या नहीं, यह मैं नहीं जानती, पर मेरी अंतरात्मा तो मुझे मेरे स्वार्थी हो जाने के लिए मरते दम तक धिक्कारती रहती.”

 

रीमा दोनों बच्चों को लेकर सोसायटी पार्क में दाख़िल हुई, तो माला आंटी बेंच पर बैठी सुस्ता रही थीं. कनी तो आते ही अपने ग्रुप में शामिल हो खेलने लगी थी. बच्चों के पास जाने के लिए मचलते दो वर्षीय हनी को लेकर रीमा माला आंटी के पास आकर बैठ गई.

“बहुत दिनों बाद नज़र आ रही हो. कहीं बाहर गई थी क्या?”

“हां आंटी, ससुराल गई थी. हनी, उधर नहीं बेटा, गिर जाओगे. देखिए न आंटी, कितना परेशान करने लग गया है. वहां भी मुझे सारा दिन इसके पीछे लगे रहना पड़ता था. सास और जेठानी दोनों हंसती थीं मुझ पर.”

“क्यों भला?” माला आंटी ने आश्‍चर्य व्यक्त किया.

“सासूजी कह रही थीं कि हमने तो घर का सारा काम करते हुए 6-6 बच्चे पाल लिए और इनसे एक नहीं संभल रहा. मेरे बच्चे तो इतने सयाने थे कि मैं आंगन धोती थी, तो एक-एक बच्चे को खुली आलमारीकी एक-एक ताक में बिठा देती थी.

मजाल है, जो आंगन सूखने से पहले कोई बच्चा नीचे उतर आए और ज़मीन पर पांव रख दे. और एक इसके हनी को देखो, एक सेकंड टिककर बैठ ही नहीं सकता. कभी यह खींचेगा, तो कभी वह. जाने क्या खाकर पैदा किया है इसकी मां ने इसे?” रीमा रुआंसी हो उठी, तो माला आंटी की हंसी फूट पड़ी.

“इसमें तुम्हारा दोष नहीं है. पहले बच्चे वाक़ई सीधे होते थे. माता-पिता से डरते थे और दबकर भी रहते थे. अब तो सारे ही कंप्यूटर दिमाग़वाले पैदा हो रहे हैं. उनका न दिमाग़ स्थिर रहता है, न हाथ-पांव. पर मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि यह पीढ़ी बहुत आगे तक जाएगी.”

लेकिन रीमा मानो सुन ही नहीं रही थी. उसका मन अभी तक ससुराल और गांव में ही झूल रहा था. “एक और चीज़ मुझे बहुत परेशान कर रही है आंटी. सासूजी और जेठानी के अनुसार कनी और हनी ज़रूरत से ज़्यादा ही नाज़ुक हैं. जब भी मैं ससुराल जाती हूं, दोनों बच्चे बीमार पड़ जाते हैं. वहां वॉटर प्यूरिफायर तो है नहीं, बच्चों को पानी उबालकर, छानकर देती हूं, पर फिर भी उन्हें खांसी, बुख़ार व पेटदर्द हो ही जाता है. पेट की समस्या तो मुझे भी हो जाती है, पर लाज-शरम के मारे चुप रहती हूं. अब वही खाना-पानी जेठजी के बच्चे खाते-पीते हैं और वही हनी-कनी. क्या सच में मेरे बच्चों का इम्यून सिस्टम इतना कमज़ोर है आंटी?”

“तू बेकार ही घबरा रही है बेटी. वे बच्चे वहां के वातावरण के अभ्यस्त हैं, लेकिन हनी-कनी उसके आदी नहीं हैं. हवा-पानी बदलने से तो अच्छे-अच्छों का स्वास्थ्य डगमगा जाता है, फिर ये तो छोटे-छोटे बच्चे हैं.”

हनी फिर उठकर खेल रहे बड़े बच्चों के पास जाने लगा, तो रीमा फिर उसे पकड़कर ले आई. आंटी की शह पाकर उसका हौसला बढ़ गया था.

“जेठानी की बेटी कनी की हमउम्र है. वह पूरा खाना बना लेती है. रोटियां तो इतनी गोल कि मैं भी नहीं बना पाऊं. कनी तो स़िर्फ नूडल्स बना पाती है. वहां जाकर तो आंटी अमित भी मानो मेरे नहीं रहते. अपने घरवालों के साथ मेरी खिंचाई करने लग जाते हैं. कहते हैं, मैं बच्चों को लेकर ओवर प्रोटेक्टिव हो जाती हूं. कभी पढ़ाई के लिए, कभी दूध के लिए, तो कभी च्यवनप्राश के लिए बच्चों के पीछे ही पड़ी रहती हूं. बच्चे तो अपने आप बड़े हो जाते हैं. हर व़क़्त उनके पीछे डंडा लेकर घूमने की कहां ज़रूरत है?”

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“बहुत ज़्यादा पीछे पड़ने की ज़रूरत नहीं है, यह तो मैं भी मानती हूं. लेकिन एक बात समझने और ग़ौर करने की है और यह बात अपने उनको भी समझा देना कि खर-पतवार हर कहीं उग आती है, वह भी बिना प्रयास के, लेकिन अच्छी नस्ल का गुलाब यदि उगाना है, तो उसे अच्छी खाद और अच्छी मिट्टी देनी होगी. समय-समय पर कटिंग, ग्राफ्टिंग आदि सब करना होगा.”

रीमा का चेहरा गुलाब की मानिंद खिल उठा था. वह आंटी से बच्चों की परवरिश के और भी टिप्स जुटाना चाहती थी, पर तभी हनी के रोने की आवाज़ से वह घबरा गई. शरारती हनी आख़िर बच्चों के बीच चला ही गया था और उनसे टकराकर गिर भी गया था. रीमा ने फटाफट उसे उठाया और कनी को भी खेल से छुड़ाकर ज़बरदस्ती हाथ पकड़कर घसीटते हुए अपने साथ ले गई.

माला आंटी उन्हें तब तक जाते निहारती रहीं, जब तक वे उनकी आंखों से ओझल नहीं हो गए. उन्हें अपनी जवानी के दिन याद आ गए, जब वे भी रीमा की तरह दिनभर बिन्नी और बंटी के पीछे लगी रहती थीं. एक गहरी सांंस भरकर उन्होंने भी क़दम अपने फ्लैट की ओर बढ़ा दिए.

इसके अगले ही दिन की बात है. रिमझिम बारिश हो रही थी. रीमा शाम के खाने की तैयारी करने रसोई की ओर जा ही रही थी कि डोरबेल की आवाज़ सुनकर उसके क़दम मुख्यद्वार की ओर बढ़ गए. माला आंटी को देखकर वह सुखद आश्‍चर्य से भर उठी.

“अजवायन के पत्तों के पकौड़े बनाए थे. तुम्हारे लिए भी ले आई.” उन्होंने प्लेट आगे बढ़ा दी थी.

“अरे वाह! ये तो मुझे बहुत पसंद हैं. लेकिन आप अजवायन के पत्ते लाई कहां से? मुझे तो पूरे मुंबई में नहीं मिले.”

“मैंने अपने घर में उगाए हैं. छोटा-सा टेरेस गार्डन है मेरा. कभी फुर्सत में हो तो आना, दिखाऊंगी.”

“बिल्कुल, बिल्कुल आंटी! कल छुट्टी है. मैं कल ही आती हूं.”

वादे के मुताबिक़ रीमा अगले ही दिन माला आंटी के यहां पहुंच गई थी. बच्चे अपने पापा के संग टीवी देखने में व्यस्त थे, इसलिए रीमा उन्हें लेकर बिल्कुल निश्‍चिंत थी. माला आंटी उसे देखकर बहुत ख़ुश हुईं और सीधे टेरेस पर ले गईं. पूरा टेरेस छोटे-बड़े गमलों और तरह-तरह के पौधों से सजा हुआ लहलहा रहा था. इस लुभावने दृश्य ने रीमा का मन मोह लिया.

“आंटी, मुझे इतना अच्छा लग रहा है यहां पर! यह हरियाली दिल को इतना सुकून दे रही है कि मैं आपको बता नहीं सकती.”

“मैं समझ सकती हूं. घर का यह हिस्सा ख़ुद मेरे दिल के सबसे क़रीब है. इधर देखो, यह मनीप्लांट! इसे छाया में रखना पड़ता है और यह ऑरेंज रेड गुलाब. इसका यह शेडेड कलर पाने के लिए मुझे ख़ूब मेहनत करनी पड़ी थी. बार-बार कटिंग, ग्राफ्टिंग, कीटनाशक, खाद- जाने क्या-क्या. और यह देखो संतरे का बोनसाई, कितना प्यारा है न? पता नहीं इसमें संतरे कब आएंगे? आएंगे भी या नहीं, पर मुझे यह बहुत प्रिय है. जब इसके पास जाती हूं, तो ऐसा लगता है अपनी छोटी-छोटी डालियां फैलाकर यह मुझे बांहों में भर लेना चाहता है.”

रीमा अवाक् हो आंटी को सुन रही थी. आंटी वैसी ही उत्साहित लग रही थीं, जैसे घर में किसी मेहमान के आने पर वह हनी-कनी को लेकर उत्साहित हो जाया करती थी. ‘हनी बेटे, आंटी को वो पोयम सुनाओ. अच्छा बताओ क्लाउन कैसे करता है. कनी बेटी, आंटी को अपनी क्राफ्ट डायरी तो दिखाओ.’

“आंटी, आप तो इन पौधों को बिल्कुल अपने बच्चों की तरह प्यार करती हैं और वैसे ही साज-संभालकर रखती हैं.”

“हां बेटी, और क्या? जैसे हर बच्चा एक अलग व्यक्तित्व का होता है, उसकी अलग ज़रूरतें होती हैं, वैसे ही हर पौधे की भी अपनी अलग ज़रूरत है. किसी को धूप ज़्यादा चाहिए, तो किसी को पानी. कुछ पौधे अपने आप ही पनप आते हैं. उन पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, तो कुछ का बहुत ज़्यादा ध्यान रखना पड़ता है.”

रीमा बहुत प्रभावित हो रही थी, “आंटी, मैं दावे के साथ कह सकती हूं, आपने अपने बच्चों की भी बहुत अच्छी परवरिश की होगी. कहां हैं वे?”

“चल, अंदर बैठकर चाय पीते हैं. वहीं गपशप भी हो जाएगी.”

“वो सामने तस्वीर देख रही हो न? वो हैं मेरे बच्चे बिन्नी और बंटी. बिन्नी शुरू से ही मेरे दिल के बहुत क़रीब रही है. मैंने उसे बेटी से ज़्यादा सहेली माना. ख़ुद इतनी बंदिशों में रही थी, इसलिए उसे पूरी आज़ादी दी. दोनों बच्चे पढ़ाई में बहुत अच्छे थे. बिन्नी को विदेश में पढ़ने के लिए स्कॉलरशिप का ऑफर आया, तो मैं ख़ुशी से झूम उठी. नाते-रिश्तेदारों ने जवान बेटी को अकेले विदेश भेजने का जमकर विरोध किया, पर मेरा मन उसे तितली की तरह उड़ते देखना चाहता था.”

“और आपके पति?” रीमा ने झिझकते हुए पूछा.

“उन्होंने मेरा साथ दिया. हमारा आशीर्वाद लेकर बिन्नी विदेश चली गई. पढ़ाई पूरी हुई, तो उसे वहीं एक अच्छी नौकरी का ऑफर मिल गया. वह वहीं बस गई. एक एनआरआई से हमने उसका ब्याह रचा दिया. पर… पर उसके बाद कुछ ऐसा घटा कि मेरी सोच बदलने लग गई. बच्चों के पापा अचानक चल बसे. बिन्नी के जाने के बाद मैं वैसे ही बहुत अकेलापन महसूस कर रही थी और अब यह आघात! मैं अंदर से बहुत टूट गई थी. बंटी की ख़ातिर ख़ुद को ऊपर से संभाले रहती, पर मन ही मन ख़ुद को बहुत अकेला और असहाय महसूस करने लगी थी. बंटी को ज़रा-सी भी देर हो जाती, तो मैं तुरंत फोन मिला देती. उसका फोन नहीं मिलता, तो उसके दोस्तों या टीचर्स तक को लगा देती. उसका खाना लिए बैठी रहती. उसके घर में घुसते ही प्रश्‍नों की झड़ी लगा देती. वह अक्सर झुंझला जाता था.

‘आपको हो क्या गया है मां? छोटा बच्चा नहीं हूं मैं कि गुम हो जाऊंगा. सब कितना मज़ाक बनाते हैं मेरा! दीदी पर तो कभी इतनी पाबंदियां नहीं लगाईं आपने?…’ फिर मेरा सहमा हुआ चेहरा देख ख़ुद ही चुप हो जाता और हम खाना खाने लगते. वह देर तक मुझे समझाते रहता कि मैं उसका खाने के लिए इंतज़ार न किया करूं. व़क़्त पर खाकर दवा वगैरह ले लिया करूं. मैं सब कुछ समझ जाने की मुद्रा में सिर हिलाती रहती. फिर एक दिन वही हुआ, जिसकी मुझे आशंका थी. बंटी को भी उच्च शिक्षा के लिए स्कॉलरशिप मिली और विदेश जाने का कॉल आया, तो मैं सिहर उठी थी. अगर यह भी चला गया, तो मैं किसके सहारे ज़िंदा रहूंगी? फिर मेरी ही अंतरात्मा मुझे धिक्कारती कि मैं इतनी स्वार्थी कैसे हो गई हूं? गहरे मानसिक अंतर्द्वंद्व के बाद मैंने निश्‍चय कर लिया कि बंटी विदेश जाएगा. दिल ख़ून के आंसू रो रहा था, पर मैंने उसे हंसते हुए विदा किया.

उसके जाने के बाद मैंने यह बगिया बसाई. इन पौधों को रोपकर मैं हर्षित होती हूं, सींचकर परितृप्त होती हूं और इन्हें बढ़ता देखती हूं, तो मन में उल्लास की हिलोरें उठने लगती हैं. मैं सच कहती हूं बेटी, मेरे मन में न इनसे फल पाने की इच्छा है और न ही छाया की चाहत. कभी-कभी सोचती हूं, हम अपने बच्चों को भी इसी तरह बिना किसी अपेक्षा के पालें, तो ज़िंदगी कितनी सुकूनभरी हो जाए. ज़रा सोचो, यदि उस दिन मैं बंटी को रोक लेती, तो वह कुछ कहता या नहीं, यह मैं नहीं जानती, पर मेरी अंतरात्मा तो मुझे मेरे स्वार्थी हो जाने के लिए मरते दम तक धिक्कारती रहती.”

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व़क़्त काफ़ी हो गया था. रीमा को बच्चों की चिंता सताने लगी थी. माला आंटी के प्रति श्रद्धा से अभिभूत रीमा ने जाने की आज्ञा मांगी. परवरिश के इस नए अध्याय ने उसे अंदर तक मथ डाला था.

मंथन अभी जारी ही था कि एक दिन ऑफिस जाते व़क़्त रीमा को ऊपर बालकनी से आंटी की पुकार सुनाई दी. उनके संतरे के बोनसाई में एक फल आया था. हर्षोल्लास से उनका चेहरा दमक रहा था.

“मैंने तो कल्पना भी नहीं की थी कि इसके फल मुझे देखने और चखने को मिलेंगे.”

रीमा ने शाम को देखने आने का वादा किया. पूरे रास्ते रीमा यही सोचती रही कि अनपेक्षित फल सचमुच कितना सुख देता है! उसे चखने का मज़ा ही कुछ और है.

शाम को वादे के मुताबिक़ वह आंटी के टेरेस पर हाज़िर थी. डाल पर गोल-मटोल छोटा-सा संतरा वाक़ई बहुत प्यारा लग रहा था. आंटी ने चहकते हुए बताया कि उन्होंने उसके न जाने कितने फोटो खींच डाले थे और दोनों बच्चों को भेज भी दिए थे. रीमा कुछ प्रतिक्रिया व्यक्त करे, इससे पूर्व आंटी का मोबाइल बज उठा. वे वार्तालाप में संलग्न हो गईं.

“हां, हां बेटा… पर… पर तू तो कह रहा था… अच्छा… ठीक है. ठीक है, मैं इंतज़ार करूंगी.” फोन रखते-रखते आंटी की आंखों से आंसू बहने लगे थे. रीमा घबरा उठी.

“क्या हुआ आंटी? सब ठीक तो है न?”

“बंटी का फोन था. वह इंडिया आ रहा है. यहीं रहकर जॉब करेगा.”

“पर उस दिन तो…”

“मैंने भी यही कहा. कह रहा है कि हां, जॉब ऑफर था, पर मैंने स्वीकारने की बात कब कही?” मैं तो आपको बता रहा था… मैं यहां स़िर्फ पढ़ने आया था. रहूंगा तो अपने देश में ही. सेवा तो अपनी मां और अपने देश की ही करूंगा. वह आ रहा है,

हमेशा के लिए. मुझे तो विश्‍वास ही नहीं हो रहा.” भावविभोर आंटी ने नए-नवेले संतरे को चूम लिया.

    अनिल माथुर

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Usha Gupta

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