कहानी- सबक (Short Story- Sabak)

मुझे तो अभी-अभी जीवन का एक सबक मिला था कि चाहे रिश्ता जो भी हो, कभी एक तरफ़ की बात सुनकर किसी के बारे में कोई राय नहीं बना लेनी चाहिए, पता नहीं सच क्या हो.

सोसायटी के गार्डन में अपनी सहेलियों- तनु और रश्मि के साथ शाम की सैर करती हुई मैंने कोने में स्थित एक बेंच पर गुमसुम बैठी माया आंटी पर उड़ती हुई नज़र डाली. वे किसी सोच में गुम कुछ गंभीर व उदास लगीं. आंटी अक्सर यहीं मिलती हैं, ख़ूब बातें करती हैं. अंकल की पांच साल पहले मृत्यु हो गई थी. वे अपनी बेटी सोनल के साथ रहती हैं. सोनल की बेटी दसवीं क्लास में है और बेटा आठवीं में.

सोनल के पति अनिल की दस साल पहले एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी, तब से आंटी और सोनल से तीन साल छोटा उनका बेटा अनुज सोनल के साथ ही रहते हैं. गार्डन का हर चक्कर पूरा करने पर मेरा ध्यान आंटी की तरफ़ जा रहा था. वे आज कुछ ज़्यादा ही गंभीर थीं, नहीं तो हमें आवाज़ देकर बुला लिया होता. तनु और रश्मि तो सैर करके घर चली गईं, पर मेरा मन नहीं माना.

“हेलो आंटी!” कहते हुए मैं उनके पास ही बैठ गई. आंटी फीकी-सी हंसी हंसते हुए बोलीं, “आओ शुभा, कैसी हो?”

“मैं ठीक हूं आंटी. आज आप अकेली क्यों बैठी हैं? बाकी आंटी कहां हैं? आपकी सहेलियां?”

“वे सब सैर करके घर चली गईं.”

“आप नहीं गईं?”

“घर जाने का मन नहीं हुआ.”

“ओह! सोनल नहीं है घर पर?”

“नहीं, मूवी गई है बच्चों के साथ.”

“आप नहीं गईं?”

“मुझे कौन ले जाता है?” इससे ज़्यादा किसी के जीवन में हस्तक्षेप करना मुझे ठीक नहीं लगा, मैं चुप रही. पर आंटी ने ख़ुद ही अपने मन का गुबार निकालना शुरू कर दिया. जैसे-जैसे आंटी अपने मन की पीड़ा बांट रही थीं, मेरा दिल उनके प्रति असीम सहानुभूति से भरता जा रहा था.

आंटी कह रही थीं, “इस सोनल को सहारा देने के लिए सालों से इसके साथ रह रही हूं. आज जब इसके बच्चे बड़े हो गए, इसे मेरी ज़रूरत ही नहीं रही. कभी भी दोनों बच्चों को लेकर बाहर चली जाती है. कभी मूवी, कभी डिनर. मैं अनुज को नौकरी मिलते ही उसके साथ चली जाऊंगी. बेसहारा-सी पड़ी हूं, कोई और ठिकाना नहीं है न! नहीं तो इसके इतने नखरे क्यों उठाती. अभी तक उसके बच्चे छोटे थे. उसे हमारी ज़रूरत थी. उसका पति इतना पैसा छोड़कर गया है, तब भी उसे मुझ पर और अनुज पर ख़र्च करने में तकलीफ़ होती है.” मैं हैरान, दुखी-सी आंटी की बातें सुन रही थी.

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सोनल ऐसी है! मुझे तो जब भी मिली, सभ्य, कोमल स्वभाव की लगी. घर में अपनी मां के साथ उसका व्यवहार ऐसा है? मुझे मन-ही-मन उस पर ग़ुस्सा आया. अंधेरा होने लगा, तो आंटी को ज़बर्दस्ती वहां से उठाकर घर भेजकर मैं भी अपने घर लौट आई. फिर किसी काम में मन ही नहीं लगा. यही सोच रही थी कि वृद्धावस्था तो बहुत परेशानी की चीज़ है. अपनी बेटी पर आश्रित रहकर दिन-रात अपमान सहन करना आसान तो नहीं है, पर कोई बेटी अपनी मां के साथ दुर्व्यवहार कैसे कर पाती है! रह-रहकर आंटी का उदास चेहरा मेरी आंखों के आगे आ रहा था.

मुझे क्या करना चाहिए? सोनल से बात कर उसे समझाना ठीक रहेगा क्या? पर आजकल किसी के जीवन में हस्तक्षेप करना समझदारी तो नहीं है न! दो-चार दिन और निकल गए. आंटी उसके बाद भी मुझे गार्डन में दिखीं, पर बैठकर बातें करने का मौक़ा नहीं मिला. एक दिन आंटी नहीं थीं गार्डन में, अचानक सोनल दिखी. मैं हैरान हुई, वह भी मुस्कुराई. मैंने कहा, “तुम आज काफ़ी दिन बाद दिखी. आज आंटी नहीं आईं.”

“मां की किटी पार्टी है आज!”

“अच्छा?”

“हां, आज बच्चे भी बर्थडे पार्टी में गए हैं. मैंने सोचा मैं भी सैर पर निकल जाऊं.”

“अच्छा किया.” मैंने कहा तो उसने भी मेरे साथ क़दम बढ़ा दिए. वह मेरे बच्चों की पढ़ाई के बारे में पूछती रही. उसका सभ्य स्वभाव मुझे हमेशा अच्छा तो लगा था, पर आंटी की बातों के बाद मैं काफ़ी दुविधा में थी और उससे आंटी के बारे में बात करना चाहती थी. सैर के बाद मैंने कहा, “सोनल, पांच मिनट बेंच पर बैठें?”

“हां, क्यों नहीं!” हम दोनों बैठ गए. कैसे बात शुरू करूं, मैं सोच रही थी. आख़िर मैंने पूछ ही लिया, “अनुज को कहीं जॉब मिला?” सोनल के चेहरे पर दुख का एक साया-सा लहराता साफ़-साफ़ देखा मैंने. ठंडी सांस लेकर बोली, “मिलेगा उसे न जो ढ़ूंढ़ना चाहता हो! क्या बताऊं शुभा, घर-घर की कहानी है. छोड़ो, आज इतने दिनों बाद तुमसे मिली हूं. क्या अपना रोना लेकर बैठूं.”

“अरे नहीं, तुम मुझे अपने दिल की बात बता सकती हो, कुछ परेशानी है?”

“तुम्हें तो पता ही है, मेरे पति मेरा साथ बहुत जल्दी छोड़ गए, तब बच्चे कितने छोटे थे! मां अनुज और पिताजी के साथ मेरे पास रहने आ गई थीं कि मुझे सहारा रहेगा. पर मैं आज भी उस दिन को कोसती हूं, जब मां मेरे साथ रहने आई थीं.” मैं बुरी तरह चौंकी, “सच? क्या हुआ?”

“हमारा एक फ्लैट और दो दुकाने हैं. वहां से जो किराया आता है, उससे और मेरे पति की जो बीमा रक़म मिली, उससे मैंने घर-गृहस्थी और बच्चों की पढ़ाई संभाली हुई है. किसी तरह मैनेज कर ही लेती हूं.

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एक-दो बार मैंने कहीं जॉब भी किया, पर मुझे एक महीने में ही छोड़ना पड़ गया, क्योंकि अनुज और मां ने बच्चों को संभालने के लिए

साफ़-साफ़ मना कर दिया था. पिताजी नहीं रहे, तो मैं ही अपनी परेशानियां एक तरफ़ रख मां को संभालती रही. तुम्हें पता है शुभा, मां के तीन फ्लैट्स हैं, तीनों किराए पर दिए हैं. किराए का और पिताजी का काफ़ी पैसा मां के पास आता है, पर मां एक रुपया भी कभी मुझ पर या मेरे बच्चों पर ख़र्च नहीं करतीं. उनका सब कुछ अनुज के लिए है और अनुज! वह इतना कामचोर और निकम्मा है कि दिनभर बस टीवी या कंप्यूटर पर लगा रहता है. बच्चों को पढ़ना होता है, तो यही कहती रहती हूं कि टीवी की आवाज़ धीमी कर लो. फिर मां को यह इतना बुरा लगता है कि पूछो मत. खाने में मां और अनुज के इतने नखरे हैं कि बता नहीं सकती. मेड से भी दोनों बहुत किटकिट करते हैं. अपने ही घर में दम घुटता है मेरा, तो निकल जाती हूं कभी बच्चों को लेकर.

तीन-तीन किटी पार्टी है मां की. अपने और अनुज के लिए, सब तरह के मनोरंजन के लिए पर्याप्त धनराशि है मां के पास, पर कभी उनका हमारे ऊपर कुछ ख़र्च हो जाए, तो दिनभर सुनाती हैं. काश, सहारा देने के नाम पर मां हमारे पास न आतीं. मैं ज़्यादा चैन से जी लेती. वे कभी अपने फ्लैट में रहने के बारे में सोचती भी नहीं, क्योंकि वहां उनके ख़र्चे होंगे.

शुभा, आज सुबह मां ने बहुत सुनाया था, दिल भरा हुआ था. आज तुमसे सब कह दिया. पर प्लीज़, किसी को कहना मत. अपनी परेशानियां आज तक किसी को नहीं कही, कोई जल्दी यक़ीन भी तो नहीं कर पाएगा. जो सामने दिखता है, वही सच नहीं होता, बहुत कुछ अनदेखा रह जाता है. चलें?” आंखें पोंछते हुए सोनल ने कहा, तो मुझे भी अपनी आंखों की नमी का एहसास हुआ. हम दोनों अपनी-अपनी बिल्डिंग के रास्ते की तरफ़ बढ़ गए. मैंने उसे मुड़कर देखा. उसके थके सुस्त क़दमों से उसके दिल की उदासी महसूस हो रही थी मुझे. और मैं? मुझे तो अभी-अभी जीवन का एक सबक मिला था कि चाहे रिश्ता जो भी हो, कभी एक तरफ़ की बात सुनकर किसी के बारे में कोई राय नहीं बना लेनी चाहिए. पता नहीं सच क्या हो. दूसरा अपने अंदर पता नहीं कितने दुख समेटकर जी रहा हो. बुज़ुर्ग माता-पिता भी तो कर देते हैं न ग़लतियां! स़िर्फ बड़े होने से ही तो उनकी हर बात सही, सच नहीं हो जाती न!

    पूनम अहमद

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