कहानी- श्रापमुक्ति (Short Story- Shrapmukti)

 

 

“ऐसा तो मैंने कभी नहीं चाहा था. तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जा सकते. अरे! आज इतने वर्षों बाद तो तुम्हें पाया है और तुम जाने की बात कर रहे हो? कर दिया मैंने तुम्हें माफ़… कर दिया तुम्हें अपने श्राप से मुक्त… पर मुझे छोड़कर मत जाओ रोहन. तुम नहीं जानते कि मैंने मन ही मन तुम्हारे लौटने का कितना इंतज़ार किया है.”

”ड्रायवर गाड़ी रोको, सड़क पर कोई पड़ा है. हम उसे ऐसी हालत में छोड़कर आगे नहीं जा सकते.” मैंने ड्रायवर को रुकने के लिए कह तो दिया, पर साथ ही यह ख़याल भी आया कि क्या मुझे पास जाकर देखना चाहिए? कहीं कोई चोर-लुटेरा हुआ, जो नाटक करके इस तरह पड़ा हुआ हो तो मुसीबत में तो नहीं पड़ जाऊंगी?
लेकिन मैं इतना क्यूं सोच रही हूं? मुझे तो अपना फ़र्ज़ निभाना ही चाहिए. आख़िर मैं एक समाज सेविका हूं. आज पता नहीं क्यों मन में ऐसी आशंका आ गई. ड्रायवर को साथ ले, पहुंच गई उस आदमी के पास. पर इतनी मद्धिम रोशनी में भी वो चेहरा कुछ पहचाना-सा लगा. एक पल में दिल हज़ार बार धड़क गया- ‘क्या ये तुम हो? हां, तुम्हीं तो हो.’
आज वर्षों बाद तुम्हें इस हाल में अपने सामने पाया, तो कहीं भी जीत का एहसास नहीं हुआ, बल्कि अथाह दुख के सागर में डूबती चली जा रही हूं. जब-जब अपनी क़ामयाबी पर नज़र डालती, तो यही लगता रहा कि काश! तुम्हें सामने पा जाऊं. व्यंग्य से, गुरूर से अपनी तिरछी मुस्कान तुम पर डालूं और तुम्हें तिलमिलाते हुए देखूं.
तुम्हारी बर्बादी के क़िस्से तो बहुत सुने, पर अपनी व्यस्त और ख़ुशहाल ज़िंदगी से कुछ पल निकालकर तुमसे मिलने का मन कभी नहीं हुआ. बस, यही चाहा कि किसी दिन तुम्हीं अचानक सामने आ जाओ.
और आज जब तुम सामने हो, तुम्हारा जिस्म मेरी आंखों के सामने बेजान-सा पड़ा है, तो तुम्हारी बेबसी पर मेरा दिल जार-जार रोए जा रहा है. समझ में नहीं आ रहा कि तुम्हें कहां ले जाऊं? मैं तो ये भी नहीं जानती कि तुम रहते कहां हो? सोचती हूं, तुम्हें अस्पताल ले जाना ही ठीक होगा. मैं वहां तुम्हें देख भी सकूंगी. पर आज भी जब तक तुम नहीं चाहोगे, मैं तुमसे नहीं मिलूंगी, क्योंकि ये वादा तो सालों पहले ही मैंने अपने आप से, अपने आत्मसम्मान से किया था. सो तुम्हें अस्पताल में पहुंचा कर चली आई.
आज अतीत बरबस ही मुझे अपनी ओर खींच रहा है. ऐसा लग रहा है, मानो कल ही की बात हो. कोई भी पल ऐसा नहीं, जो व़क़्त के चलते धुंधला गया हो. मन कड़वाहट से भर गया.
बहुत ही साधारण-से परिवार की इकलौती बेटी. देखने में भी साधारण, उस पर रंग भी गहरा मिला. सो न कभी ख़ुद को संवारने का मन हुआ, न ही आईने में कभी ख़ुद को निहारने का. बाबा को कभी-कभी कहते सुना करती, “क्या कमी है मेरी बच्ची में? एकदम मां पर गई है. वही तीखे नैन-ऩक़्श. चिड़िया है मेरे आंगन की. रौनक है इसी से. जिस दिन ससुराल जाएगी, सब सूना कर जाएगी.”
सुनकर सौतेली मां तिलमिला जाती और अपने व्यंग्य-वाणों से मेरी आत्मा तक को लहूलुहान कर जाती. कहती, “ऐसी रंगत पाई है कि कितने भी अच्छे नैन-ऩक़्श हों, पर दिखाई दें तब न.”
कभी-कभी सोचती हूं कि मेरी सगी मां होती तो शायद इसी रंगत में मुझे संवार देती अपने प्यार से, दुलार से. पर जब ऊपरवाले ने ही मेरे साथ अन्याय किया, मेरी मां को, मेरी सबसे अनमोल चीज़ को ही मुझसे छीन लिया तो इस चेहरे का रोना क्या रोऊं?
फिर जैसे तक़दीर मुझ पर कुछ मेहरबान हुई, तुम्हारे घर से रिश्ते की बात चली. जो मध्यस्थ थे, वे पिताजी के पहचानवालों में से थे. तब दहेज के कारण शादियां नहीं रुकती थीं. सो असाध्य बीमारी से ग्रस्त तुम्हारी मां की सेवा के लिए ऊपरवाले ने मुझे ही चुना.
तुम्हारे लिए यह शादी मां की सेवा के लिए किया गया एक समझौता था. सो तुमने मुझे देखना भी ज़रूरी नहीं समझा. उधर पिताजी के मित्र ने तुम्हारे घर में मां के सामने मेरी तारीफ़ों के पुल बांध दिए, “सुंदर है, सुशील है, गृहकार्य में निपुण है. और मध्यमवर्गीय परिवार से है, तो आपके घर में निभ जाएगी. अपने बबुआ के तेवर तो आप जानती ही हैं न. बस, वही सही रहेगी. उसका धैर्य ही बबुआ को बदल सकता है.”
तुम्हारी मां की जैसे मन की मुराद पूरी हो गई. धन-दौलत इतनी कि उन्हें इसकी चाहत ही न रही. बस, अपने बेटे का घर बसाने और एक वारिस के लिए तड़प रही थीं.
इधर मैं अपने भाग्य पर इतरा उठी. शादी में जब भी घूंघट से तुम्हें देखा, तो लगा ख़ुशी से कहीं दम ही न निकल जाए. लंबा क़द, बड़ी-बड़ी आंखें, काले-घने बाल, भरा-भरा चेहरा. तुम्हें पाकर तो मैं जीवन की सारी कमियों को भुला बैठी. नहीं जानती थी कि भविष्य मेरे लिए क्या छिपाए बैठा है.
तुमने पहली रात जो मेरी सूरत देखी, तो कभी सीरत पर ध्यान ही नहीं दिया. तुम्हारी उन नफ़रतभरी निगाहों को नहीं भुला सकी कभी. दिल ने बहुत चाहा कि तुमसे विनती करूं, कहूं कि अपना लो मुझे! संवार दो अपने प्यार से मुझे, शायद मैं भी खिल उठूं. जैसे मुरझाए पौधे को पानी मिल जाए, तो उसका अंश-अंश जी उठता है, खिल उठता है.
पर साहस ही नहीं जुटा सकी तुमसे कुछ कह पाने का. जो लंबे बाल अगर खुलकर संवर जाते, तो शायद घनी ज़ुल्फ़ बनकर तुम्हें अपने आप में कैद कर लेती, वो एक रस्सी की तरह अपने आप में गुंथे रहे, कभी खुलकर सांस भी नहीं ले पाए या मैंने ही नहीं लेने दिया. अपने आपसे इतनी नफ़रत हुई कि अपने अस्तित्व को ही भुला बैठी. कोई स्वाभिमान नहीं, कोई आत्मसम्मान नहीं. करती भी क्या! पति के कमरे में रहने को मिला, इसी को ख़ुशक़िस्मती मान बैठी.
गाहे-बगाहे तुम्हारी जिस्मानी ज़रूरत तुम्हें मेरे क़रीब ले आती और फिर वही अंतहीन दूरियां. देखते-देखते आठ बरस गुज़र गए. इस बीच मैं पांच बेटियों की मां बनी. ये क़िस्मत का एक और मज़ाक था मेरे साथ कि बेटा पैदा न हो सका. इन आठ सालों में तुम्हारी मां की जी-तोड़ सेवा की, पर बेटा न होने से उस सेवा का फल आशीर्वाद न होकर उलाहना ही हुआ.
सोचती थी, शायद मां ही ख़ुश होकर ऐसा आशीष दे डालें, जिससे उनका बेटा सदा के लिए मेरा हो जाए. पर जब ऊपरवाला ही मेरे नसीब में ख़ुशियां लिखना भूल गया, तो किसी और को मुझसे क्या हमदर्दी होती. एक दिन मां भी चल बसीं. मां की चिता जलने के साथ ही मेरे आशियाने में भी जैसे आग लग गई! तुम्हारी सारी ऐयाशियां धीरे-धीरे सामने आने लगीं. और एक दिन तुमने सारी शर्मोहया ताक पर रख दी.
तुम अपनी प्रेमिका को मेरे घर तक ले आए. हां, ये मेरा ही तो घर है. मैंने ही आकर देखभाल की, इसे मकान से घर बनाया. अपने जीवन के आठ वर्ष इस घर को पूरी ईमानदारी से दिए और तुमने क्या किया? मेरे आने के बाद इस घर से ही किनारा कर लिया, धर्मशाला बना दिया! जब मर्ज़ी हुई आ गए, जब नहीं हुई बाहर ही रह गए.
तुम नहीं जानते कि आज मुझ पर आसमान टूट पड़ा है. तुम्हारी प्रेमिका मेरे सामने खड़ी, मुझे मेरी हार का एहसास दिला रही है. उसकी ज़हरीली मुस्कान नस-नस में ज़हर छोड़ गई. पहली बार तुमसे बुरा-भला कहने का साहस बटोर लिया और आत्मा की गहराइयों से तुम्हें श्राप दे डाला. जबकि मैं भी ये जानती हूं कि श्राप जैसा कुछ भी आज के ज़माने में नहीं होता, फिर भी आवेग को नहीं रोक पाई. जो जी में आया, कहती चली गई.
“कभी ख़ुश नहीं रहोगे! मुझ जैसी औरत का अपमान किया है तुमने. अरे इतनी नफ़रत थी तो क्यूं मेरे ज़िस्म को अपने गंदे हाथों से मैला किया? ये थी ही तुम्हारी सारी ज़रूरतें पूरी करने के लिए, तो फिर मेरा इस्तेमाल क्यूं किया? अरे प्यार नहीं दे सकते थे, तो कोई बात नहीं, पर इतना बड़ा अपमान तो न देते. तुम्हारी छोटी से छोटी ख़ुशी पूरी करने के लिए मरती रही हूं मैं. इस जिस्म को तुमने छुआ तो चंदन समझ बैठी ख़ुद को. हर तिरस्कार सहकर भी तुम्हारे लिए दुआ मांगी, पर अब और नहीं.
“आज लग रहा है, जैसे थोड़ा-सा आत्मसम्मान बचा है अभी. आज से ज़िंदगी तुम्हारी मोहताज नहीं रहेगी. जीने के लिए जो भी करना पड़े, करूंगी, पर अब नहीं सहूंगी.
“जाओ, आज से मैंने तुम्हें इस बंधन से मुक्त किया. पर इतना याद रखना कि आज से तुम पल-पल जिओगे, लेकिन हर पल मर-मर कर. तुम्हें ख़ुशी का एक पल भी नसीब नहीं होगा.
“आज सच्चे दिल से चाहती हूं कि तुम्हारी ज़िंदगी नर्क से भी बदतर हो. चले जाओ और अब कभी मेरी आंखों के सामने मत आना. नफ़रत करती हूं मैं तुमसे. समझ लेना, इतने बरसों की सेवा और तपस्या के बदले ये घर मैंने तुमसे मांग लिया. अब कभी इस घर की तरफ़ रुख नहीं करना.”
इतना सुनते ही उसके सामने तुमने मुझे बहुत जलील किया, मुझ पर हाथ तक उठाया. पर उसके बाद मेरे मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला. तुम चले गए और साथ ही मेरे अंदर भी सब कुछ टूटता चला गया. सोचते-सोचते सुबह हो गई, पता ही नहीं चला. पूरी ज़िंदगी एक रात में ही सिमट गई.
आज तुम्हारी तबीयत थोड़ी ठीक है. तुमने डॉक्टर से पूछा कि कौन तुम्हें यहां लाया? जैसे ही डॉक्टर ने मुझे तुम्हारे सामने ला खड़ा किया, तुम्हें तो जैसे चैन मिल गया. ऐसा लगा, मानो तुम मुझे ही तलाश रहे थे. आज इतने वर्षों बाद तुम्हीं से लिपटकर रोने को जी चाह रहा है. नहीं जानती क्यूं?


लेकिन यह क्या? मेरी नहीं, तुम्हारी आंखों से हज़ार आंसू जैसे एक साथ ही बह निकले. मैं समझ नहीं पा रही कि क्यूं एक मज़बूत इंसान इतना कमज़ोर हुआ जा रहा है. सिसकते हुए तुमने बच्चों के बारे में पूछा, “कैसे हैं, क्या कभी मुझे याद करते हैं?”
कैसे कहूं तुमसे कि वो तुम्हारा नाम तक सुनना पसंद नहीं करते? बड़ी बेटी तो अपनी मां का तिरस्कार भूल ही नहीं पाई है. कैसे बताऊं तुम्हें कि तुम्हारा अस्तित्व हमारे लिए न के बराबर है? तुम न तो मेरे और न ही मेरे बच्चों के दिल में हो. तुम हमारे पास तो क्या दूर-दूर तक भी नहीं हो. पर आज तुम सबसे मिलने की ज़िद कर बैठे हो. शायद तुम्हें इस बात का एहसास हो गया है कि तुम्हारा अंतिम समय दूर नहीं है.
पर मैं क्या करूं? कैसे उन सबको तुम्हारी नज़रों के सामने ला खड़ा करूं? सच कहूं तो तुम्हें इस हाल में देख कर मैं तुम्हें ना भी नहीं कर पा रही हूं. पर जानती हूं कि जो बच्चे मेरी किसी भी बात को ज़मीन पर नहीं गिरने देते, वो आज मेरी बात नहीं मानेंगे.
सुनते ही बिफर पड़े बच्चे, “नहीं देखनी ऐसे इंसान की सूरत, जिसने हमारी मां का इतना अपमान किया. और आप मां? आप तो उनसे नफ़रत करती हैं न, फिर आज क्यूं आपके दिल में उस इंसान के लिए अचानक इतनी हमदर्दी आ गई? ऐसा क्या हो गया कि आज अचानक उनसे मिलने गईं?”
उफ़्, मैं तुमसे क्या कहूं कि वो मुझे किन परिस्थितियों में मिले हैं. बस, इतना ही कहा, “नहीं जानती, अब कौन-सा रिश्ता बाक़ी है, जो मुझे उनकी ओर बरबस खींचे ले जा रहा है. पर शायद शादी के बाद तुम स्वयं ही समझ जाओगी कि नारी के जीवन में पति की क्या अहमियत होती है. शायद यही कमज़ोरी या नारी हृदय मुझसे ये सब करवा रहा है. आज मैं तुमसे स़िर्फ इतना कहना चाहती हूं कि अपने पिता से नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान से आख़िरी बार मिल लो, जो तुम्हें देखने की आस में अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है. मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़कर खड़ी हूं.”
आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा, जो थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. बच्चे ज़्यादा देर अपनी मां को इस हाल में नहीं देख पाए और अपनी मां के साथ चल पड़े. पूरे रास्ते हमारे दरमियान एक अजीब-सी ख़ामोशी छाई रही. बच्चों की बेबसी मैं समझ रही थी, पर कुछ नहीं कह पा रही थी, क्योंकि मैं ख़ुद को भी बहुत बेबस महसूस कर रही थी.
जब बच्चों को तुम्हारे सामने लाई, तो तुम्हारी बेबसी मेरे दिल पर हज़ारों प्रहार कर गई. आज समझ ही नहीं आ रहा कि मैंने तुमसे नफ़रत ़ज़्यादा की या प्यार! दर्द से मेरी आत्मा घायल हुई जा रही है.
तुम अपने ही बच्चों के सामने हाथ जोड़े बिस्तर पर पड़े हो. तुम्हारी आंखों से आंसू यूं बहे जा रहे हैं, जैसे कोई झरना निश्छल बहे चला जा रहा हो. बड़ी देर बाद तुमने मेरी तरफ़ देखा है. बहुत कुछ कहना चाहते हो, पर ज़ुबान लड़खड़ा रही है. बमुश्किल इतना ही कह पाए हो, “मैं तुम्हारा बहुत बड़ा गुनहगार हूं शैली. मैं आज तुमसे माफ़ी मांग कर उन गुनाहों को कम करना नहीं चाहता, पर स़िर्फ एक बार बच्चों से कहो कि वे मेरे सीने से लग जाएं, बस एक बार… एक बार…” और फिर शब्द तुम्हारे रुदन में कहीं खो गए.
तुम्हारे पास सांसें कम थीं, ये शायद तुम जान गए थे. तुम्हारी बेबसी मुझे हर पल मार रही थी और मैं अपनी विवशता लिए मौन खड़ी बच्चों को कुछ नहीं कह पा रही थी. रुंधे गले ने एक भी शब्द नहीं बोलने दिया. इतनी पीड़ा तो तब भी नहीं हुई, जब तुम मुझे छोड़ कर चले गए थे. जब से तुम गए, ईश्‍वर से कुछ मांगना ही छोड़ दिया. मेरी तमाम उम्मीदों और ख़ुशियों का गला घोंट कर चले गए थे तुम. तुमसे इतनी नफ़रत थी कि तुम कहां हो, ज़िंदा हो या नहीं, इन सबसे कोई वास्ता ही नहीं रखा.
लेकिन जिस विधाता से प्रण किया था कि उससे कभी कुछ नहीं मांगूंगी, आज उसी के सामने जाकर फिर कुछ मांगने को जी कर रहा है. ऐसा लग रहा है कि उससे कहूं कि तुम्हें मेरी ज़िंदगी की सांसें दे दे, पर अब तुम्हें मुझसे जुदा न करे. आज इतने वर्षों बाद मेरे जीवन में प्यार के दो पल आए हैं, इन पलों को अब कभी ख़त्म न होने दे.
बच्चे शायद मेरी पीड़ा को समझ गए हैं. बिना कुछ कहे, बिना कोई गिला-शिकवा किए, मेरी आंखों के आदेश का पालन कर तुमसे जा लिपटे. जिस दुख को उन्होंने मुझ पर कभी ज़ाहिर नहीं होने दिया, आज वही दुख उनकी आंखों में साफ़ नज़र आ रहा है.
तुम भी फूट-फूट कर रो पड़े. मेरे सामने दोनों हाथ जोड़कर कहने लगे, “शैली, मुझे अपने श्राप से मुक्ति दे दो. मेरे जाने का समय आ गया है. मैं अपनी अंतिम सांसें सुकून की लेना चाहता हूं. भले ही तुम मेरे लिए अपनी नफ़रत को कभी ख़त्म मत करना, पर बस इस श्राप से मुझे मुक्त कर दो. इस श्राप के साथ मैं मरना नहीं चाहता. प्लीज़ शैली, मुक्त कर दो मुझे…”
अब मैं क्या करूं! कैसे कहूं तुमसे कि जाओ मैंने तुम्हें मुक्त किया? क्या मैंने उस दिन एक पल के लिए भी सोचा था कि तुम्हें कभी इस हालत में देखूंगी?
“नहीं, ऐसा तो मैंने कभी नहीं चाहा था. तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जा सकते. अरे! आज इतने वर्षों बाद तो तुम्हें पाया है और तुम जाने की बात कर रहे हो? कर दिया मैंने तुम्हें माफ़… कर दिया तुम्हें अपने श्राप से मुक्त… पर मुझे छोड़कर मत जाओ रोहन. तुम नहीं जानते कि मैंने मन ही मन तुम्हारे लौटने का कितना इंतज़ार किया है. मत जाओ रोहन, मत जाओ मुझे छोड़कर… प्लीज़…”
लेकिन तुमने तो जैसे चैन की सांस ली. आंखों में रुके हुए आंसू छलक आए. फिर मेरे सामने अपने हाथ बढ़ा दिए. मेरे माथे को आज पहली बार तुमने दिल से स्पर्श किया और सदा के लिए चले गए…
रह गया तो बस वही सन्नाटा! वही तन्हाई, जिसे पूरी ज़िंदगी ढोती रही. आज तुम्हें तो श्राप से मुक्त कर दिया, पर मैं तो ये भी नहीं जानती कि मेरी पूरी ज़िंदगी को किसका श्राप लगा है! मैं किससे कहूं कि मुझे भी इस श्राप भरे जीवन से मुक्ति दे दो. काश… मुझे भी कोई मुक्त कर पाता!


         बबिता शर्मा

 

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Usha Gupta :
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