कहानी- विश्‍वास (Short Story- Vishwas)

 

             पमा मलिक

सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था कि अचानक इस काली आंधी ने मेरे जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया. जो व्यक्ति सुगंधा की अनुपस्थिति में इतना दीवाना-सा घूमता रहता था, वह उसे अपने पास पाकर कितना मोहित हो जाएगा, क्या पता? इन संशयों के बीच हमारे प्रेम-विश्‍वास की एक क्षीण-सी प्रकाश रेखा भी थी.

सुबह के सौ कामों के बीच मैं लगातार बजने वाली कॉलबेल को अनसुना कर रही थी, लेकिन जब किसी ने भी दरवाज़ा नहीं खोला, तो मुझे ही गैस बंद करके जाना पड़ा. वहां मैंने जिसे देखा, उसे देखकर तो जैसे मुझे सांप ही सूंघ गया. दरवाज़े से हटने की सामान्य औपचारिकता भी भूल गई मैं. वह सुगंधा थी, मेरी जेठानी की छोटी बहन. वर्षों बाद मैं उसे देख रही थी. वह पहले से अधिक ख़ूबसूरत और आकर्षक लग रही थी. टाइट जींस और शॉर्ट टॉप पहने उसने घने बालों का एक बेतरतीब जूड़ा बना रखा था, जो उसे और सुंदर बना रहा था.
“रीमाजी, मैं अंदर आ जाऊं?” उसने च्युइंगम चबाते हुए पूछा. वह शायद मेरी मनोदशा भांप रही थी.
“हां-हां, क्यों नहीं?” अंदर आते ही वह जेठानी की खुली बांहों में जा गिरी.
“ओह दीदी! एक अर्से बाद तुम्हें देख रही हूं.”
“तू तो यहां का रास्ता ही भूल गई?”
“याद तो सबकी आती थी, बस मौक़ा ही नहीं मिला. जीजाजी कहां हैं? हंसी और ख़ुशी किस कोने में छुपी हैं और आपके लाडले देवर?”
‘लाडले देवर’ की जिज्ञासा ने मेरा मूड चौपट कर दिया. मैं शंकित थी. कुछ ही देर में हंसी-ख़ुशी, रुचि, मॉन्टी सब उसे घेरकर बैठ गए. जेठजी सुगंधा की पसंद की दुकान से गरम कचौड़ी और गुलाब जामुन लाने चल दिए. मैं चाय बनाने लगी, बच्चे उससे चिपके बैठे थे. सुगंधा ने उनका स्कूल जाना कैंसल कर दिया. तभी मेरे पति प्रीतम वहां आए. सबने उनका स्वागत किया. सुगंधा बोली, “प्रीतम, तुम्हारी देर से सोकर उठने की आदत अब तक नहीं गई?”
“कुछ आदतें ज़िंदगीभर नहीं छूटतीं.” प्रीतम बोले.
“सचमुच?” वह रहस्यपूर्ण अंदाज़ में खिलखिलाई. बातें करते-करते बेख़्याली में सुगंधा ने बालों की क्लिप निकाल दी. झप् से ढेर सारे काले बाल उसके चेहरे, कंधों व पीठ पर गिर आए. बीच में उसका गौरवर्ण अंडाकार चेहरा बादलों के बीच चांद का भ्रम उत्पन्न करने लगा. प्रीतम ने उस पर एक भरपूर नज़र डाली. सुगंधा शायद यही चाहती थी. वह विजयी भाव से मुस्कुराने लगी.
मेरा दिल किसी अनहोनी की आशंका से कांपने लगा. मैं सबके बीच अनिच्छित रूप से खिसियानी मुस्कुराहट लिए बैठी थी. फिर उठकर रसोई में आ गई, जहां मेरा एकछत्र साम्राज्य था. जेठानी आकर सुगंधा की पसंद बता गई थीं. बच्चे तो स्कूल गए नहीं थे. सुगंधा, जेठजी और प्रीतम से भी न जाने का अनुरोध करने लगी, किंतु वे दोनों खा-पीकर क्षमायाचना करके ऑफ़िस चले गए.
उनके जाने के बाद मैंने राहत की सांस ली कि चलो अब प्रीतम सुगंधा के बाणों से घायल नहीं हो पाएंगे.
दोपहर में सब आराम करने चले गए. जेठानी ने मुझे रोक लिया, “छोटी, तेरी तबियत तो ठीक है?” जेठानी ने मेरा मलिन रूप देखकर पूछा.
“दीदी, सुगंधा क्यों आई है?” मैंने साफ़-साफ़ पूछा.
“अरे, हम सबसे मिलने आई है, यह भी कोई बात हुई पूछने की? तू निश्‍चिंत रह, वो बस घूमने-फिरने आई है. कोई ऐसी बात नहीं है, जैसा तू सोच रही है.” जेठानी मेरी मनोदशा समझ रही थीं.
मैं अपने कमरे में आ गई. सुगंधा अक्सर अपनी बहन और जीजाजी से मिलने पहुंच जाती थी. उसी दौरान उसे प्रीतम से प्यार हो गया. प्रीतम भी उस पर जान छिड़कने लगे थे. उनके प्यार को पूरे परिवार की स्वीकृति मिली, बस विवाह की मुहर लगनी बाकी थी. मगर इसी बीच उन दोनों में झगड़ा हो गया. कारण कोई अरबपति व्यवसायी था, जो न्यूयॉर्क में रहता था. झगड़े ने इतना तूल पकड़ा कि सुगंधा चट मंगनी पट ब्याह करके उस व्यवसायी के साथ न्यूयॉर्क चली गई.
प्रीतम सुगंधा की याद में पागल-से हो गए थे. अक्सर ऑफ़िस से छुट्टी लेकर निरुद्देश्य घर में पड़े रहते. इस बीच लंबी बीमारी के बाद पिता की मृत्यु ने उन्हें अंदर तक झिंझोड़ दिया. पिता की मृत्यु से बिस्तर पकड़ चुकी उनकी मां ने उनसे शादी का वचन लिया और बेमन से प्रीतम ने मुझसे शादी कर ली. मैंने भी धैर्य का परिचय दिया. प्यार व सहानुभूति का मरहम प्रीतम के दिल पर रखा. छोटे-छोटे वाक्यों से हमारी बोलचाल शुरू हुई. उनके सभी काम में उनकी मदद करते-करते मैंने उनके अभेद्य किले में सेंध लगानी शुरू की. फिर घर की छोटी-बड़ी हर चीज़ के लिए वे मुझ पर निर्भर हो गए.
तभी प्रीतम की माताजी गुज़र गईं और बुरी तरह से टूटे प्रीतम को मैंने संभाला. वे छोटे बालक की तरह मेरी बातें सुनते, समझते और धीरे-धीरे उन्होंने स्वयं को ज़िंदगी की लय में ढाल लिया.
प्रीतम मेरे धैर्य और समझदारी के कायल हो गए थे और शादी के दस महीने बाद आख़िरकार उन्होंने मुझे स्वीकारा. वे टूटकर चाहनेवाले पति और बहुत परवाह करनेवाले साथी सिद्ध हुए. उन्होंने मुझे रुचि और मॉन्टी के रूप में प्यार की दो सौग़ातें भी दीं.
सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था कि अचानक इस काली आंधी ने मेरे जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया. जो व्यक्ति सुगंधा की अनुपस्थिति में इतना दीवाना-सा घूमता रहता था, वह उसे अपने पास पाकर कितना मोहित हो जाएगा, क्या पता? इन संशयों के बीच हमारे प्रेम-विश्‍वास की एक क्षीण-सी प्रकाश रेखा भी थी.
शाम को देखा, तो सुगंधा आकर्षक साड़ी, ज़ेवर व मेकअप में थी. सामने प्रीतम और जेठजी बैठे थे. जेठानी चाय के साथ पकौड़े तलकर ला रही थी. ऑफ़िस से लौटे दोनों भाइयों को सुगंधा इसरार से पकौड़े खिला रही थी. एक की विगत प्रेमिका और एक की साली, भला महफ़िल में जान क्यों न पड़ती?
“अरे रीमा, तू उठ गई? आ, चाय पी.” जेठानी ने बुलाया, पर पता नहीं क्यों मुझे लगा कि सुगंधा को मेरा आना अच्छा नहीं लगा. बोली, “आप सो रही थीं, इसलिए हमने आपको जगाया नहीं.”
सुगंधा के पॉलिश्ड डायलॉग का छिपा अर्थ था, “तुम्हारी यहां कोई ज़रूरत ही नहीं थी.” सजी-धजी सुगंधा के सामने मैं फीकी लग रही थी. सिलवटग्रस्त साड़ी, बेतरतीब बाल और रंग उड़ा चेहरा.
घूमने का प्रोग्राम बना. मैं सिरदर्द का बहाना बनाकर कमरे में आ गई. अचानक हवा की तरह प्रीतम अंदर आए, “तुम्हें क्या हो गया है? सुबह से मुंह उतारे घूम रही हो? चलो तैयार हो जाओ.”
“मैं रंग में भंग डालना नहीं चाहती. आप लोग हो आइए.”
इस बीच प्रीतम-प्रीतम रट लगनी शुरू हो गई, जिसमें सबसे ऊंची आवाज़ सुगंधा की थी. प्रीतम मुझे ग़ुस्से में घूरते हुए चले गए. मुझे रोना आने लगा.

कई दिन बीत गए. रोज़ ही पिकनिक, शॉपिंग व मूवी देखने का कार्यक्रम बनता. सुगंधा पर मेरा संदेह बढ़ने लगा और एक दिन मेरा संदेह सच में बदल गया. शाम को मुझे याद आया कि छत पर सूखे कपड़े पड़े हैं. मैं छत पर पहुंची, उसके तुरंत बाद मैंने देखा, सुगंधा प्रीतम का हाथ पकड़कर लगभग उसे घसीटते हुए लेकर चली आ रही है. मैंने तुरंत स्वयं को तार पर फैली चादर की ओट में कर लिया.

“क्या बात है सुगंधा, यहां क्यों लेकर आई हो तुम मुझे?” यह प्रीतम थे.

“तुमसे कुछ व्यक्तिगत बातें करनी हैं.” सुगंधा ने कहा.
“व्यक्तिगत बातें?” प्रीतम के स्वर की उत्सुकता ने मेरे मन में शंकाओं के तूफ़ान खड़े कर दिए. रिश्तों की किरचियां मेरे अंग-प्रत्यंग में नश्तर चुभो रही थीं.
सुगंधा प्रीतम से कहने लगी, “प्रीतम, विवेक से शादी मेरे जीवन की बहुत बड़ी भूल थी. यह मुझे बाद में पता चला. सात वर्ष असफल वैवाहिक जीवन काटे हैं मैंने और तुमने भी तो मेरे बिना ये सात वर्ष अप्रिय वातावरण में ही बिताए हैं न? अब हम नए सिरे से जीवन शुरू करेंगे.” सुगंधा के स्वर में प्रीतम को तुरंत पा लेने की व्याकुलता थी.
“अप्रिय वातावरण? किसने कहा सुगंधा? मेरे दो प्यारे बच्चे हैं, पत्नी है और मैं उनके साथ बहुत ख़ुश हूं.”
“इस तरह झूठ बोलकर तुम स्वयं को धोखे में रख सकते हो, मुझे नहीं.”
“सुगंधा, मैं अपने संसार में सुखी और संतुष्ट हूं. तुम एक विवाहिता स्त्री हो मेरे लिए, उससे ़ज़्यादा कुछ भी नहीं.”
“प्लीज़ प्रीतम, ऐसे मत कहो, मैं तुम्हारे बिना मर जाऊंगी. क्या तुम वो पल भूल गए, जब मुझसे एक मिनट की दूरी भी बर्दाश्त नहीं होती थी तुम्हें?”
“जब एक पल बर्दाश्त न होने जैसी बात थी, तब तो तुम विदेश में बसने और धन के लालच में किसी और से शादी करके चली गई थी.”
“तुम्हारा ग़ुस्सा जायज़ है, पर मैं नहीं समझ पा रही हूं कि एक लादे हुए रिश्ते को तुम क्यों ढो रहे हो? क्या मजबूरी है तुम्हारी? मैंने सोचा था कि मेरे प्रस्ताव पर तुम ख़ुशी से मुझे गले लगा लोगे.”
“यह ख़ुशफ़हमी है तुम्हारी, तुम अपने रूप का गर्व दिखा रही हो. इसके अलावा तुम्हारे पास कुछ है भी नहीं. तुम दोनों की यदि तुलना की जाए, तो रीमा तुमसे बहुत आगे निकल जाएगी. तुम आत्मकेंद्रित, स्वार्थी व मौक़ापरस्त हो और वह त्याग, स्नेह व प्रेम की प्रतिमूर्ति है.”
“तुम मेरा अपमान कर रहे हो.”
“तुमने सम्मान की गुंजाइश ही कहां रखी. रीमा से मेरी शादी मेरी अनिच्छा से ज़रूर हुई, पर उसने अपने धैर्य, प्रेम और सहनशक्ति से मुझे जीत लिया. उसने मुझे अवसाद, निराशा से उबारा. मुझे जीवन की सौग़ात दी और तुम मेरे बसे-बसाए घर को उजाड़ने आई हो? मैं सोचता था कि तुम निश्छल मन से अपनी बहन के घर आई हो, किंतु उसके पीछे क्या उद्देश्य था, यह तो आज पता चला.”
सुगंधा के सारे अस्त्र नाकाम हो गए. वह फूट-फूटकर रोने लगी. प्रीतम आराम से नीचे आ गए.
मेरे विश्‍वास की जीत हुई. मेरे तो जैसे पंख निकल आए थे. बेवजह हंस और मुस्कुरा रही थी. अब मैं सजी-धजी थी और सुगंधा रंग उड़े चेहरे और बेतरतीब वस्त्रों में, अन्य सभी सामान्य थे.
अगले दिन अपने जाने की घोषणा करके सुगंधा ने सबको चकित कर दिया.
पूरे घटनाक्रम के बारे में प्रीतम ने मुझे कुछ बताया नहीं, न ही मैंने उनसे कुछ पूछा. घर के सदस्य भी सारी बातों से अनभिज्ञ थे कि किस तरह मेरी दुनिया बिखरने से बच गई. सब कुछ वैसे ही चलता रहा, प्रीतम के प्यार में दिनोंदिन बढ़ोतरी हुई, मेरा विश्‍वास और अधिक पुख्ता हो गया.

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Meri Saheli Team :
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