कहानी- विस्थापन

                  अनुपमा शर्मा

 

जबलपुर जाने के लिए बिल्लू को लेकर ट्रेन में बैठी, तो वीरा को लगा, जैसे फिर से विदाई हो रही है. दिल कड़ा करके वाहे गुरु का नाम लेकर सफ़र पूरा किया.

वीरा का पूरा जीवन संघर्षों से भरा रहा. जीवन में कभी एक जगह टिककर नहीं रह पाई वो. जब कभी लगता कि अब जीवन में ठहराव आ गया, तब हालात कुछ इस तरह बन जाते कि वीरा को दूसरे पड़ाव के लिए यात्रा शुरू करनी पड़ती. उनका जीवन मानो विस्थापन का पर्याय बन गया था.

घर-गृहस्थी, बच्चों की परवरिश, उन्हें स्थायी ठौर-ठिकाना देने के चक्कर में उनका अपना जीवन विस्थापित ही रहा. घर में पहले अमन-चैन हुआ करता था. दारजी की सरकारी नौकरी थी. क्लर्की के अलावा वे भाटियाजी की किराने की दुकान पर 5 घंटा शाम से रात तक कमा भी आते थे. बड़े मेहनती बंदे थे. सरदारनी भी कोई कम नहीं थी. स्वेटर बुनकर, फॉल-पीको करके बड़ी मेहनत से पति-बच्चों के साथ अपने छोटे-से घरौंदे में रहती थीं. जैसे-तैसे बड़ी बेटी को चंबा, मंझली को लखनऊ और तीसरी का कनाडा ब्याह किया.
कभी-कभी अतीत के पन्ने भी पलट लेतीं. 14 साल की उम्र में वो दुल्हन बनकर लुधियाना से अमृतसर और फिर दिल्ली आई थी और इसी दिल्ली ने उन्हें कभी न भरनेवाले ज़ख़्म भी दिए. जब उनका सबसे दुलारा छोटा बेटा निहाल व उसकी पत्नी 1984 के दंगों की भेंट चढ़ गए, तब तो वीरा को पूरी दुनिया ही दुश्मन लगने लगी थी. जीवन फिर जीवन नहीं रहा. वीरा के जीवन में समस्याओं का सूत्रपात हो गया था. अमृतसर से दारजी बड़े बेटे के परिवार के साथ लौटे, तो बेटे-बहू की लाशें उनका इंतज़ार कर रही थीं. समय के ज़ख़्म इतने गहरे थे कि दारजी को निगल गए. पर वीरा निहाल के मासूम बेटे बिल्लू के कारण मर भी न सकी.
समय के साथ-साथ बढ़ती महंगाई, जगह की तंगी और बिल्लू की ज़िम्मेदारी के बोझ ने बड़े बेटे भगवान सिंह की पत्नी के स्वभाव को भी बदल दिया. रोज़-रोज़ के झगड़े-तकरार से तंग आकर वीरा ने गुड़गांव जाने का फैसला कर लिया. बरसों पहले दारजी ने दफ़्तर के दूसरे लोगों के साथ मिलकर छोटी-सी ज़मीन ख़रीदी थी. लोन लेकर घर भी बनाया था. वहां बसाए अपने घर से किराएदार को निकालकर वीरा बिल्लू के साथ वहीं रहने लगीं.
जिन डीटीसी की बसों की तरफ़ वीरा कभी देखती भी नहीं थीं, अब उसी से अक्सर पाला पड़ने लगा था. भला बेटे-बेटियों का मोह कैसे छोड़ सकती थीं? बिल्लू भी धीरे-धीरे बचपन की दहलीज़ लांघ रहा था, उसकी ज़रूरतें भी बढ़ती जा रही थीं. वीरा का शरीर भी थक रहा था. कनाडा से रविन्दर का भी पिछले हफ़्ते फ़ोन आया था. जुलाई में वो भी बच्चों के साथ भारत आ रही थी. समय जाते देर ही कितनी लगती है. भगवाना हवाई अड्डे से रविन्दर को ले आया था. दो दिन उसके यहां रुककर वह वीरा के पास गुड़गांव आ गई.
पहला दिन तो बातों में ही बीता. रविन्दर ने घर की हालत, वीरा का स्वास्थ्य और बिल्लू को देखते हुए सलाह दी कि अगले महीने रोजी और उसके जेठ जबलपुर में घर-दुकान लेकर वहीं बस रहे हैं. तो क्यों न वो भी यहां का मकान बेचकर जबलपुर बस जाए? वहां मकान-दुकान ख़रीदकर बाकी पैसे बैंक में जमा कर दें. वहीं पर रोज़ी भी रहेगी, तो सभी को वीरा की चिंता भी नहीं रहेगी और बिल्लू भी अच्छे स्कूल में पढ़ लेगा.
वीरा को रविन्दर की सलाह भा गई. आनन-फानन में भगवान को बुलावा भेजा. साथ में उसकी घरवाली भी दौड़ी चली आई. पहले तो दोनों ने बहुत विरोध किया, पर जब वीरा को अडिग देखा, तो एक शर्त रख दी कि मकान बेचने पर उन्हें अपने हिस्से के आधे रुपए चाहिए, ताकि वे दिल्ली में छोटा-सा फ्लैट ख़रीद सकें. उन्हें जबलपुर में नहीं बसना. वीरा राजी हो गई. हफ़्ते भर में ब्रोकर ने मनचाहा सौदा करवा दिया.
जबलपुर जाने के लिए बिल्लू को लेकर ट्रेन में बैठी, तो वीरा को लगा, जैसे फिर से विदाई हो रही है. दिल कड़ा करके वाहे गुरु का नाम लेकर सफ़र पूरा किया. स्टेशन पर रोजी और मनप्रीत खड़े थे. जिस मोहल्ले में उन्होंने वीरा को मकान दिलवाया था, उसके कुछ ही दूर एक गुरुद्वारा था. ये देखकर वीरा के मन को बड़ी शांति मिली. घर में घुसने से पहले गुरुद्वारे में मत्था टेका. बिल्लू को अच्छे स्कूल में दाख़िल करवा दिया. धीरे-धीरे वीरा मोहल्ले में रमने लगी थी.
खाली बैठना वीरा को कभी अच्छा नहीं लगा. उन्होंने फॉल-पीको का काम भी शुरू कर दिया. उसके मोहल्ले में काफ़ी सिख थे. गुरुद्वारे जाना लगा ही रहता था और इसी तरह दिन, महीने व साल गुज़रने लगे. वीरा का शरीर बीमार रहने लगा था. बच्चे आते और ख़ैर-ख़बर लेकर चले जाते. भगवान कई बार साथ चलने को कह चुका था, लेकिन वो ही मना कर देती थीं. बिल्लू की चिंता उन्हें घुन की तरह खा रही थी. आजकल एक और डर सताने लगा था- युवाओं का गुमराह होना, ख़ासकर विदेश जाने का मोह. कनाडा व अमेरिका में काम मिलने की आस में बहुत से लोग अपना सब कुछ लुटा चुके थे. मोहल्ले के पास चौक था, जहां मुण्डीजी की टेलरिंग की दुकान थी. ख़ूब चलती थी, पर अब उस पर मानो ग्रहण लग गया था. उनकी सबसे छोटी बेटी सिमरन शादी के बाद एक बार भी अमेरिका नहीं गई. गुरुद्वारे में ख़ूब धूमधाम से शादी हुई थी. पर दूल्हा शादी के दूसरे ही दिन दहेज के बदले नगद पैसे लेकर जो गया, तो वापस लौटा ही नहीं. उसके मां-बाप ने भी हाथ खड़े कर दिए थे. सिमरन को तलाक़ दिलाने में बहुत दिक़्क़तें आईं. गुरुद्वारे में सिमरन अक्सर दिख जाती थी. पिता की दुकान पर भी अक्सर बैठने लगी थी. साथ ही ड्रेस डिज़ाइनिंग भी सीख रही थी.
आजकल वीरा का दिन जपजी साहब से शुरू होकर रात को माला फेरते हुए बीतता है. बिल्लू आजकल झुंझला जाता है. ख़ुद काफ़ी काम जो करने पड़ते हैं. मुण्डीजी की दुकान के पासवाली दुकान लेकर उसने रेडीमेड गार्मेंट्स और प्रॉपर्टी का धंधा भी शुरू कर दिया है.
बिल्लू की नेक नियती, अच्छी आदतें और बिज़नेस चलाने की लगन ने मुण्डीजी को बहुत प्रभावित किया और कई बार वे घर भी आ चुके थे. कल ही वे सिमरन का रिश्ता लेकर आए थे. और वैसे भी बिल्लू अब 25 साल का हो गया है. वीरा सोच रही थी कि बिल्लू दुकान से आए, तो रजामंदी लेकर रिश्ता पक्का कर ही दे. सिमरन चंगी कुड़ी है.
“देख बिल्लू! मेरी तबीयत बहुत ख़राब रहती है. मेरी आंखें मुंद जाएंगी, तो फिर तेरा ख़्याल कौन रखेगा? सिमरन अच्छी लड़की है. क़ानूनन तलाक़ भी हो चुका है.” वीरा की बात को बिल्लू टाल न सका.
दूसरे ही दिन सुबह वीरा अपने सभी बच्चों को फ़ोन पर सूचना देने लगी. मारे उत्साह के रोज़ी के घर गई और उसे साथ लेकर मुण्डीजी के यहां सिमरन को मिठाई का डिब्बा और सूट का कपड़ा दे आई. वापस लौटते वक़्त रिक्शे पर बैठकर उन्हें लगा, मानो वो उड़ रही हों. घर कब आया उन्हें होश ही नहीं रहा. रिक्शेवाला रोज़ी से पैसे मांग रहा था और अचानक उन्हें ज़ोर का चक्कर आया और वो रोज़ी की बांहों में लुढ़क गईं. आंखें मानो पत्थर की हो गई थीं, खुल ही नहीं रही थीं. धीरे-धीरे उनकी चेतना लुप्त होती चली गई. वीरा का अंतिम विस्थापन हो चुका था.

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

Meri Saheli Team :
© Merisaheli