कहानी- यही सच है (Short Story- Yahi Sach Hai)

मन का वर्चस्व तो हर काल में रहा है. सही है, हमने हाथों में हाथ डाल कभी डांस नहीं किया, होटल के एकान्त कोने में बैठ कभी कॉफ़ी नहीं पी… पर क्या प्यार इन सबके बिना नहीं हो सकता? और यदि ये सब करके ही एक-दूसरे को समझा जा सकता तो फिर आज के प्रेमविवाह टूटते ही क्यों?

जनरेशन गैप…? पीढ़ियों का अन्तराल…? और वह भी मेरे घर में…? मैंने तो सदा इसी बात पर फ़ख्र किया है कि मैंने अपने बच्चों के साथ सदैव मित्रवत् व्यवहार ही किया है. वह दोनों कॉलेज से लौटते तो नाश्ते के साथ-साथ वहां के ढेरों क़िस्से सुनाते. मैं उन्हें सलाह-मशविरा देती तो अनेक बातों में उनसे सलाह-मशविरा लेती भी.

पर आज मेरी ही बेटी ने यानी बात-बात पर हंसने वाली अनिता ने ऐलान कर दिया, “ममा, तुम मेरी बात नहीं समझोगी. तुम्हारे समय में तो मां-बाप ने जहां शादी तय कर दी, चुपचाप कर ली. किसी ने पूछी भी न होगी तुम्हारी पसंद. तुम प्यार-मोहब्बत की बात कैसे समझोगी? पर मैं विवाह करूंगी तो स़िर्फ सुमित से. मैं उसे तुमसे मिलवा भी चुकी हूं. तुम्हें वह ठीक नहीं लगता, पर वह मुझे बहुत चाहता है, समझता है. ममा, तुम्हारे और

आज के समय में बहुत अंतर है. पूरी एक जनरेशन का गैप…”

वह आगे भी शायद बहुत कुछ बोली होगी. पर मेरे कानों में वही शब्द अटक गए. रिकॉर्ड की मानिंद बजते रहे जनरेशन गैप… जनरेशन गैप…

वह क्या सोचती है कि हमारी पीढ़ी में प्यार का ज़ज़्बा ही नहीं था. मां-बाप की पसन्द शिरोधार्य कर ली, पर क्या सचमुच निष्प्राण था हमारा मन. प्रीत-प्यार पर किसी एक जनरेशन, किसी एक पीढ़ी का एकाधिकार होता तो राधा-कृष्ण के प्रेम की दास्तान आज भी हमारी संस्कृति का एक हिस्सा नहीं होती. मन का वर्चस्व तो हर काल में रहा है. सही है, हमने हाथों में हाथ डाल कभी डांस नहीं किया, होटल के एकान्त कोने में बैठ कभी कॉफ़ी नहीं पी… पर क्या प्यार इन सब के बिना नहीं हो सकता? और यदि यह सब करके ही एक-दूसरे को समझा जा सकता तो फिर आज के प्रेमविवाह टूटते ही क्यों?

एक तो सुबह से ही मूड ख़राब था, उस पर मेरी छोटी बहन सरोज भी आ गई. मन तो यूं ही जला बैठा था, फिर भी मैंने उसके आगे अनिता की बात रख दी. सोचा, वही मलहम लगाएगी, पर उसने तो ताज़े ज़ख़्म पर चिकोटी काट दी.

“ठीक ही तो कह रही है, मैं नहीं जानती क्या? कॉलेज के दिनों में तुम और श्रीपत एक-दूसरे को कितना चाहते थे. लेकिन हुआ क्या? तुम्हारा विवाह तय हो गया तो उसने रोका क्या? हिम्मत ही नहीं जुटा पाया. मां-बाप की आज्ञा मान कहीं और शादी कर ली होगी. बस, कहानी ख़त्म. चलो यह भी छोड़ो, इतने वर्षों में कभी उसने तुम्हारी सुध ली? कभी आकर पूछा कि कैसी हो सुधा? ख़ुश तो हो ना…?”

पर श्रीपत के नाम पर मेरी डबडबा आई आंखों को देखकर वह रुक गई. पर अब जब चोरी पकड़ी ही गई थी तो मैं भी स्वयं को संयत न कर पाई. फफक कर रो पड़ी. बरसों का बांध टूट गया.

वह कुछ और कहती, इससे पहले ही मैंने उसे रोक दिया.

“कहानी का एक ही दृश्य देखकर अपना फैसला मत दो सरोज. न ही श्रीपत बुज़दिल था और न ही हमारे प्यार में कुछ कमी थी. क़िस्मत ने ही हमारे साथ एक क्रूर मज़ाक किया था, जिसे हमने सिर नवाकर स्वीकार कर लिया.

बाल विवाह के आंकड़े आज भी समाचार-पत्र में पढ़ती हो न? यह भी जानती हो कि राजस्थान में यह सबसे अधिक है, बस, इसी प्रथा का शिकार था श्रीपत. यह बात उसके एक-दो अभिन्न मित्र ही जानते थे या फिर मैं. तुम्हें तो पता है कि हमारे कॉलेज में कुछ न कुछ चलता ही रहता था. कभी वाद-विवाद का रिहर्सल तो कभी नाटक, कभी खेल प्रतियोगिता तो कभी समाज-सेवा का कोई अभियान… और तुम तो जानती ही हो कि उसे इन सब चीज़ों में हिस्सा लेने का कितना शौक़ था. हो सकता है शुरू में मैंने ही उसे एक-दो बार कहा हो कि मुझे घर तक छोड़ दे. पैदल का ही रास्ता था, पर अंधेरे में अकेले जाना भी ख़तरे से खाली नहीं था. हो सकता है, उसका विवाहित होना ही मुझे उसके साथ जाने में सुरक्षा का एहसास देता हो.

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फिर तो यह नियम ही बन गया. मुझे उसको बताने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती कि आज मुझे देर तक रुकना है. जाने कहां बैठा वह मेरा इंतज़ार कर रहा होता और मेरे बाहर निकलते ही मेरे साथ हो लेता. हमारे माता-पिता ने तो हमें उचित मूल्य दिए ही थे, पर वह तो मुझ से भी अधिक आदर्शों का पक्का था. दो वर्ष की इस मैत्री में हाथ छूना तो दूर, कभी ऐसा भी न हुआ होगा कि मेरे दुपट्टे का कोई कोना भी उसके कपड़ों को छू गया हो. उसकी साइकिल हमेशा हम दोनों के बीच रहती. मेरी ख़ातिर वह हमारे घर तक पैदल ही चलता और फिर साइकिल पर सवार होकर अपने घर चला जाता था, उसका और हमारा घर एकदम विपरीत दिशा में थे. उसने मेरे लिए बहुत कुछ किया. उसके बहुत से एहसान हैं मुझ पर. किस-किस चीज़ का शुक्रिया अदा करूं?

हमारे बीच कभी किसी सीमा का उल्लंघन नहीं हुआ. पर इस मन का क्या करे कोई? न यह कोई तर्क समझता है, न धौंस. हठीले शिशु की तरह अपनी राह ही चलता है. बहुत कम बोलता था वह, पर प्यार का कोमल एहसास तो महसूस हो ही जाता है ना एक भीनी सुगन्ध की तरह, शीतल बयार की तरह, एक मुग्ध दृष्टि द्वारा, छोटी-छोटी बातों द्वारा.

तुम उसे निर्मोही कह लो, बुज़दिल समझ लो, पर मैं उसका बहुत सम्मान करती हूं. उसने कभी हमारे साथ होने का फ़ायदा उठाने की कोशिश नहीं की, शब्दों द्वारा भी नहीं. कभी अपने प्यार का इज़हार भी नहीं किया. बस, एक बार चलते-चलते बीच राह रुक कर बोला था, “तुम्हारी और मेरी राह बहुत अलग-अलग है सुधा.” उसके स्वर में निराशा थी, हताशा थी और यही उसके प्यार का इज़हार भी था और यही हमारी विवशता भी. कभी पल भर को भी उसने स्वयं को कमज़ोर नहीं होने दिया. क्या आज के युवा, प्यार का दम भरनेवाली यह पीढ़ी निभा पाएगी इतना पवित्र रिश्ता, अपनी भावनाओं पर इतना संयम?

हमने तो बस परिवारवालों का ़फैसला शिरोधार्य कर लिया था. मन के ऊपर बुद्धि की, जन्मगत संस्कारों की विजय हुई थी. यहां तक कि सम्पर्क बनाए रखने का भी प्रयत्न नहीं किया. बोलो, कुछ ग़लत किया था क्या?

याद होगा तुम्हें विवाह की तैयारियां चल रही थीं. कार्ड बंट चुके थे. बड़ी बुआजी तो आ भी गई थीं रसोई संभालने. उसी रोज़ राजलक्ष्मी आई थी. यह ख़बर लेकर कि श्री की पत्नी की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई है. एक बार फिर विधि का क्रूर मज़ाक ठठा कर हंस रहा था मेरी वेदना पर. जब मैं स्वतंत्र?थी तो वह बंधन में था और अब जब मुझे सामाजिक तौर पर आजीवन कारावास का दण्ड सुना दिया गया था तो वह आज़ाद था. पर इतने कम समय में कुछ नहीं हो सकता था. उसके घर में मातम का माहौल था और मैं उस व़क़्त मुंह खोलती भी तो बखेड़ा होता, जग हंसाई होती. हासिल कुछ होता कि नहीं, पता नहीं. मुंह तो मैं सी गई, पर आंसू न पी सकी. बहुत रोई थी मैं उस रात. तुम हैरान-परेशान थी कि अकस्मात् इसे हो क्या गया है. पर घर में अन्य सभी ने यही मान लिया कि विवाह का तनाव है, घर छोड़ने का दर्द है. असली दर्द तो मैं दफ़ना गई सीने में. सदैव के लिए.”

“पर अब तो इतने वर्ष हो गए सुधि. कहती हो सम्पर्क भी नहीं रखा. अभी भी उसे याद करती हो क्या?”

“भूली तो मैं उसे कभी भी नहीं. जब भी मुझे किसी भावनात्मक सहारे की ज़रूरत पड़ी, मैंने उसे क़रीब ही पाया. जब कभी मन निराश हुआ मैंने उसे याद करके अपना मनोबल बढ़ाया. अपने जीजू को तो जानती हो ना. खैर, अपना-अपना स्वभाव है, पर दु:ख-तकलीफ़ में कोई सम्बल बन जाए तो अच्छा लगता है. फिर भी चलो जाने दो, ठीक से ज़िंदगी जी ली. आज समाज में इ़ज़्ज़त है, सुख-सुविधा है. वैसे भी मुक़म्मल जहां किसे मिला है आज तक? गिला भी तो किसी से नहीं है. न एक-दूसरे से, न मां-बाप से. सहरा में ही चलने की आदी हो गई थी मैं कि श्री से मुलाक़ात हो गई अचानक. याद है, पिछले महीने राजलक्ष्मी के बेटे के विवाह में गई थी. बस, वहीं मिल गया वह. यूं इतना अचानक भी नहीं था. एक ही शहर में रहते हैं और जानती थी कि राजलक्ष्मी से उसकी मुलाक़ात होती रहती है. हां, अभी तुमने पूछा था ना कि उसने कभी मेरी सुधि क्यों नहीं ली? बात यह है कि राजलक्ष्मी द्वारा हमें एक-दूसरे का हाल-चाल मिल जाता था. बस, इसके आगे बढ़ने की कोशिश कभी नहीं की. वह चाहता तो राजलक्ष्मी से मेरा पता पूछ मुझ तक पहुंच सकता था. मैं भी अनेक बार गई हूं उस शहर में. चाहती तो टेलीफ़ोन डायरेक्टरी उठाकर उसका फ़ोन नम्बर भी पा लेती और घर का पता भी. पर हमारे बीच एक अलिखित समझौता था, जिसका हमने मान रखा था. अभी भी विवाह में जाने से डर रही थी, पर एक तो राजलक्ष्मी के घर जाना आवश्यक ही था और शायद आख़िरी बार उसे देख लेने की इच्छा भी बलवती हो आई थी.

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राजलक्ष्मी  के घर के क़रीब ही था उसका घर. विवाह के दूसरे दिन उसने आठ-दस पुराने परिचितों को अपने घर आमन्त्रित किया हुआ था. हम सभी अपने सहपाठी-सहपाठिनों ने मिलकर ख़ूब जम कर पुरानी यादें ताज़ा कीं. मैंने तो ख़ैर इन्हीं यादों के सहारे ज़िंदगी काटी थी. उसकी बातों से भी लगा कि वह अपनी अनेक उपलब्धियों के बावजूद पुराना कुछ भूला नहीं था. हर छोटी-सी बात याद थी उसे. कुछ अलग ही होता है इस उम्र का आकर्षण. बाह्य कुछ नहीं दिखता. एकदम हृदय के भीतर से जुड़ता है- अंतर्मन से.

मज़ेदार बात यह थी कि वह अब भी मेरा ख़्याल उसी तरह रख रहा था जैसा कि वर्षों पूर्व रखा करता था. तुम्हें तो पता है कि छह महीने पूर्व गिरने से मेरे सिर में चोट लगी थी और फलस्वरूप अभी तक मेरा संतुलन कुछ डगमगाया-सा है. सीढ़ी उतरते हुए, ऊंची-नीची जगह पर चलते हुए कोई सहारा खोजती हूं और इसी कारण उसके बरामदे की सीढ़ियां उतरते समय मैंने उसकी पत्नी की ओर हाथ बढ़ा दिया था. मैं उसी से बात करती हुई चल रही थी और श्रीपत अन्य मित्रों के संग था. पर उसकी छठी इन्द्रीय मानों मेरी ही सुख-सुविधा देखती रहती है. छोटे शहरों में लम्बे-चौड़े घर होते हैं और उसके घर से बाहरी गेट तक का रास्ता. वह भी नीम रोशनी में. मैं बहुत संभल कर चल रही थी. यह कहीं उसने देख लिया था शायद, तभी तो जाने कब वह आकर ठीक मेरे पीछे हो लिया. नीचे देख-देख कर क़दम रखते हुए यह मैंने जाना ही नहीं. पर गेट पर पहुंचते ही ज्यों ही मैंने गेट को थामने के लिए हाथ बढ़ाया तो उसका भी हाथ मुझसे थोड़ी ही दूरी पर गेट पर आन रुका. यही ख़ासियत है उसकी. मुझे उसके अपने एकदम पीछे होने का आभास तक नहीं मिला, पर यदि मुझे ज़रूरत पड़े तो मुझे सहारा देने को वहीं मौजूद था वह. जीवन बीमा का चित्र देखती हो न! दीपशिखा को दोनों हाथों से ओट किए हुए, ताकि तेज़ हवा उसे बुझा न पाये. बस, कुछ वैसा ही एहसास. कैसी विडम्बना है ना. जीवन में मुझे ठीक उसका विपरीत ही मिला. मुझे तो उसी जीवन की आदत हो गई थी. तपते रेगिस्तान में चलने की, बिना किसी साए की उम्मीद किए. कभी-कभी लगता है कि मेरा मन भी एक विशाल रेगिस्तान बन गया है. उस पर अब शीतल जल की नन्हीं-सी, अस्थाई-सी फुहार फिर से प्यास जगा गई है. पिछला महीना मैंने कैसे बिताया यह मैं ही जानती हूं. बौरा नहीं गई बस. यही समझ नहीं आता कि रोऊं या हंसूं. खुलकर रो भी तो नहीं सकती. कई बार तो चुपके से रोई हूं और ना जाने कितनी ही बार उसे याद कर मुस्कुराने लगती हूं.

और इस बार तो मैंने स्वयं ही ख़ुद को परीक्षा में झोंका था.”

“तुम्हें यह सोचकर अच्छा नहीं लगता कि इस उम्र में भी कोई तुम्हें इस शिद्दत से अपना समझता है? उसकी मधुर यादें हैं तुम्हारे पास?”

“हां सरोज, जो आत्मविश्‍वास डगमगाने लगा था, वह फिर से पा गई हूं. अपनी भी कुछ अहमियत है किसी की नज़र में, यह सोच कर ही अच्छा लगता है. अपेक्षा तो कुछ भी नहीं थी इस मैत्री में, शुरू से ही मेरी उम्मीदों से कहीं बढ़कर मिला. कुछ अधिक ही मांग लिया था ज़िन्दगी से- और वह मिल गया, झोली भर मिल गया. बहुत रुलाया है उसकी यादों ने, पर विडम्बना तो यह है कि मुझे उसकी उपेक्षा नहीं उसका अपनापन ही रुला देता है बार-बार.

दो प्रश्‍नों के उत्तर ख़ासतौर से खोजती हूं, एक तो यह कि तमाम उम्र एक सही और उसूल भरी ज़िंदगी जीने का प्रयत्न किया. मन को कभी हावी नहीं होने दिया. फिर वह ऐसा विद्रोही, ऐसा बेकाबू कैसे हो गया अचानक? कुछ दबी-बुझी इच्छाएं थीं, वो बेकाबू हो गईं क्या? दूसरा यह कि जानती हूं मैं ग़लत सोच रही हूं. उसे यूं याद करना, हर समय उसी के बारे में सोचना ग़लत है, हर हिसाब से ग़लत. तो फिर मन को इतना सुकून क्यों है? अब मुझे किसी की कड़वी से कड़वी बात भी बुरी नहीं लगती. सब कुछ माफ़ कर सकती हूं. कहां से आया यह तृप्ति का एहसास?

अब मैंने यही फैसला किया है कि उससे फिर कभी नहीं मिलूंगी. दो महीने लग गए मुझे सामान्य होने में. यह मन लगता है अब उतना मज़बूत नहीं रहा. अनेक बार प्रश्‍न कर उठता है ‘तमाम उम्र तो औरों के लिए जी ली, अब इस उम्र में भी क्या अपने लिए नहीं जीओगी?’

पर सवाल केवल अपनी ही ख़ुशी का नहीं है, सच तो यह है कि बरगद के पेड़ों की तरह हो गए हैं हम दोनों. अनेक जड़ों से अपनी-अपनी भूमि से जुड़े.

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आज के माहौल में पली, आज की पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती अनिता क्या समझ पायेगी कि पा लेना ही सदैव प्यार की नियति नहीं होती. वर्षों एक-दूसरे की सुधि न पाकर, फिर मिलने की एक छोटी-सी उम्मीद  न रखकर भी याद की लौ जलाए रखना- इसे प्यार नहीं तो और क्या कहोगी अनिता? मेरी दिली तमन्ना है कि तुम्हें इस आग में न जलना पड़े, पर सच तो यह है कि प्यार देह आकर्षण से बहुत परे, बहुत ऊंचा, कुछ आलौकिक तत्व लिए होता है, एक जीवन काल से अधिक विस्तृत, अधिक विशाल.

तुम्हें सुनकर कुछ अजीब लगे शायद, पर यह सच है सरोज कि मैं आज भी उसे उतनी ही शिद्दत से चाहती हूं. पर जिसे हम प्यार करते हैं, उसे तो हम ख़ुश ही देखना चाहते हैं ना! और मैं जानती हूं कि उसकी ख़ुशी वहीं अपने परिवार के संग है. मैं स्वार्थी नहीं हूं. वह अपने परिवार के संग हर मुमकिन ख़ुशी पाये यही मेरी कामना है, मेरे लिए सर्वोच्च है. मैं भी तो अपने परिवार में रमी हूं न!

बड़ी भली लगी श्रीपत की पत्नी. बहुत ख़याल रखती है उसका. मैं ग़ौर कर रही थी वह जब भी श्री की तरफ़ देखती, उसकी नज़रें प्यार से सराबोर होतीं. चेहरे पर मुस्कुराहट होती. संपूर्ण श्रीपत की अधिकारिणी है वह. बंटे हुए की नहीं. उसके एक भी आंसू का मैं कारण नहीं बनना चाहती.

न ही श्रीपत ने उसे नाम से पुकारा और न ही मैंने उसका नाम पूछा, पर आते समय जब मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर विदा ली तो मन ने कहा- कान्हा का असली सच तो यही उसकी रुक्मिणी है. मैं तो उसके अतीत की, एक नासमझ उम्र की राधा मात्र ही हूं. यादों के सहारे जीना ही जिसके हिस्से आया है.

अलग-अलग राह पर ही चले थे कन्हैया और उसकी राधा, पर इस कारण उनके प्यार में कुछ कमी रह गई क्या?

        उषा वधवा

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Usha Gupta :
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