कहानी- अजनबी 1 (Short Story- Ajnabee 1)

 

परिमल शिवानी के प्रति एक अजब-सा खिंचाव महसूस करने लगा. उसने स्वयं पर पूरा नियंत्रण रखा. न कभी कुछ कहा, न कुछ इंगित ही किया, पर रात को बिस्तर पर लेटते ही वह जागी-मुंदी आंखों के समक्ष साकार हो उठती और बहुत चाहकर भी वह उस छवि को अपने मस्तिष्क से दूर न कर पाता…

 

कुछ अजब-सी उलझन में थे परिमल उन दिनों. उच्च जीवन मूल्योंवाले संस्कारयुक्त परिवार में पले-बढ़े परिमल को अपने आस-पास की दुनिया अति विचित्र लगती. अपने सहपाठियों की बातें, उनका व्यवहार अचम्भित करता था उन्हें. उस समय की पीढ़ी, जो आज पुरातनपंथी कहलाती है, वही तब उन्हें बहुत आधुनिक लगा करती थी.
मां-बाऊजी देहात छोड़ शहर आ बसे थे, ताकि बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला सकें. बच्चे सब होनहार निकले, माता-पिता की आकांक्षाओं पर खरे उतरे, फिर भी घर का वातावरण सीधा-सरल ही बना रहा. काम के प्रति निष्ठा, सत्य बोलना, ईमानदारी आदि संस्कारों की ही विरासत मिली थी परिमल और उसके भाई-बहन को.
ऐसे संस्कारी व्यक्ति को एक बेहद आम बीमारी हो गई. प्यार हो गया था उसे. वह भी अपनी ही छात्रा से. वह अपने मन की बात कहे भी तो किससे! यही उलझन थी.
परिमल का प्यार उस सैलाब की तरह भी तो नहीं उमड़ा था, जो सीमाएं तोड़, वर्जनाओं को नकारता हुआ, दीवानावर आगे बढ़ता है. ऐसा प्यार तो अपना ढिंढोरा स्वयं ही पीट आता है, किसी से कहने-सुनने की ज़रूरत ही कहां पड़ती है. लेकिन परिमल का प्यार तो एक सुगन्धित पुष्प की तरह था. उस फूल की ख़ुशबू स़िर्फ उसी को सम्मोहित कर रही थी. और कोई नहीं जानता था, स्वयं शिवानी भी नहीं. जान भी कैसे सकती थी, परिमल उसे बताए तब न!
हुआ यूं कि परिमल ने एमए कर लिया, तो आगे पीएचडी करने की चाह भी हुई, ताकि किसी कॉलेज में व्याख्याता का पद पा सके. परंतु वह अपने माता-पिता पर बोझ नहीं बनना चाहता था. घर में एक छोटा भाई व बहन और थे. उनके प्रति माता-पिता की ज़िम्मेदारियां अभी बाकी थीं. सो, परिमल ने तय किया कि वह नौकरी करके घर की सहायता न भी करे, पर अपना ख़र्च तो निकाल ही सकता है. अतः उसने अपनी डॉक्टरेट की पढ़ाई करने के साथ-साथ सायंकाल ट्यूशन पढ़ाने की ठानी.
उसने अंग्रेज़ी साहित्य में एमए किया था और मध्य प्रदेश के उस छोटे से शहर में अंग्रेज़ी पढ़ानेवालों की ख़ूब मांग थी. परिमल के ही प्रो़फेसर ने उसे अपने एक परिचित की बेटी को पढ़ाने का काम दिलवा दिया.
शिवानी के महलनुमा घर में घुसते, पहली बार तो परिमल को कुछ हिचक-सी हुई. पर थोड़े ही दिनों में वह उस माहौल का आदी हो गया. घर के सभी सदस्यों का व्यवहार बहुत शालीन और स्नेहयुक्त था. किसी में भी अपने वैभव का दर्प नहीं. कारण था गृहस्वामिनी का स्वस्थ दृष्टिकोण. शिवानी से दस वर्ष ज्येष्ठ शशांक की अधिकांश शिक्षा मुंबई में हुई थी. उसका विवाह भी हो चुका था और अब वह पारिवारिक व्यवसाय संभाल रहा था.
शिवानी की शिक्षा चूंकि उसी शहर में आस-पास के स्कूलों में ही हो पाई थी, इसलिए उसे अब कॉलेज में अंग्रेज़ी को लेकर द़िक़्क़त आ रही थी. इसके अलावा माता-पिता को लगा कि अंग्रेज़ी का अच्छा ज्ञान न होने पर उसका रिश्ता किसी बड़े शहर के आधुनिक परिवार में संभव न हो पाएगा.
अतः परिमल को उसे पढ़ाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई.
अब तक जिन लड़कियों से भी परिमल का परिचय हुआ था, उन सब से शिवानी एकदम भिन्न थी. मासूम और निश्छल. उसका यही सरल स्वभाव उसके चेहरे को अनोखी मुग्धता प्रदान करता था, जो बरबस मन को आकर्षित करती थी.
कुछ माह पढ़ाने के पश्‍चात् ही परिमल शिवानी के प्रति एक अजब-सा खिंचाव महसूस करने लगा. उसने स्वयं पर पूरा नियंत्रण रखा. न कभी कुछ कहा, न कुछ इंगित ही किया, पर रात को बिस्तर पर लेटते ही वह जागी-मुंदी आंखों के समक्ष साकार हो उठती और बहुत चाहकर भी वह उस छवि को अपने मस्तिष्क से दूर न कर पाता…

   

 

 

 

                                                                                                                                    उषा वधवा

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