कहानी- अजनबी 2 (Short Story- Ajnabee 2)

‘वह मुझे पढ़ाने आते थे. झा अंकल के परिचित थे, सो पिताजी ने बिना झिझक उन्हें मुझे पढ़ाने के लिए हामी भर दी. बहुत उसूलों वाले थे परिमल सर. अन्य युवकों से एकदम भिन्न. नैतिकता की साक्षात् प्रतिमूर्ति. दो वर्षों में बहुत क़रीब से जाना उन्हें और वह मन को भाने लगे. उनके कारण पढ़ने में रुचि आने लगी. जाने क्यों मन को विश्‍वास था कि मैं भी उन्हें अच्छी लगती हूं. नहीं! कहा किसी ने भी कुछ नहीं. एक बार भी नहीं. पर बिना शब्दों में बांधे भी तो बहुत कुछ सुन-समझ और कह लिया जाता है न?

कभी-कभी शशांक से भी मुलाक़ात हो जाती. वह परिमल से तीन-चार वर्ष ही बड़ा था और दोनों में अच्छी पटने लगी थी. तीव्र बुद्धि शशांक उसके मनोभावों को थोड़ा-बहुत समझने लगा था. परिमल की विद्वता व उसके संयमित व्यवहार से प्रभावित भी था वह. शायद इसीलिए जब उसने परिमल को बताया कि मां-पिताजी शिवानी के विवाह की सोच रहे हैं और एक चार्टर्ड अकाउंटेंट से रिश्ते की बात भी चल रही है, तो यह कहते हुए उसने परिमल के चेहरे की ओर एक आशाभरी नज़र से देखा भी. शायद वह परिमल की प्रतिक्रिया जानना चाह रहा था, पर मन में घुमड़ते अवसाद को परिमल चुपचाप पी गया. उसके लिए शिवानी की ख़ुशी ही सर्वोपरि थी, उसकी अपनी चाहत से भी बढ़कर.
वह जानता था कि अभी उसे अपने पैरों पर खड़ा होने और विवाह लायक धन जुटाने के लिए पांच-सात वर्ष और संघर्ष करना होगा. तब भी वह शिवानी को वह सब सुविधाएं नहीं दे पाएगा, जिनकी वह आदी है या जो एक सीए पति से उसे मिल सकती हैं. इसके अलावा वह दोनों परिवारों के आर्थिक और सामाजिक अंतर को भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था.
परिमल की स्मृति में ताउम्र अंकित रही वह आख़िरी सांझ. सात बजने को थे कि शशांक आकर चुपचाप बैठ गया. उसने जैसे ही पढ़ाना समाप्त किया, तो शशांक ने बताया कि शिवानी का रिश्ता तय हो चुका है और अगले रविवार को सगाई की रस्म है, जिसके लिए उसे कुछ ख़रीददारी इत्यादि करनी होगी. अतः अब वह आगे और नहीं पढ़ पाएगी.
दरक गया था परिमल का मन. पर उसने मुबारक़बाद देते हुए भी शिवानी की तरफ़ नहीं देखा. अतः जान नहीं पाया कि वह किस कठिनाई से स्वयं को रोके खड़ी थी.
एक पूरा कालखंड ही बीत गया इस बात को. वर्षों की गिनती करें, तो चालीस वर्ष से कुछ ही कम. शिवानी की बेटी का विवाह हो चुका और वह नानी भी बन चुकी. पर कुछ चित्र स्मृति में आज भी यूं अंकित हैं, मानो पत्थर पर खुदे ऐतिहासिक शिलालेख हों. लेख नहीं, चित्र- अमिट-से शिलाचित्र.
वयःसंधि पर खड़ी थी तब वह. पहली बार मन में प्यार की कोपल फूटी थी. परिचित नहीं थी वह इस विचित्र-से एहसास से. लगा था, जैसे एक सुवासित बयार सहलाने लगी हो तन-मन को. शिवानी जब भी उदास होती है, हताश होती है, ऊर्जा पाने उसी बीते कल में पहुंच जाती है. बेटी के ब्याह के बाद से तो और भी अकेली पड़ गई है वह. प्रायः स्वयं से बातें करती रहती है.
‘ज़माना कितना बदल गया है. कितनी समझदार है आज की पीढ़ी. अपने फैसले लेने में सक्षम, अपने हक़ों के बारे में सचेत. और एक मैं थी, कितनी नादान. सच कहूं तो मैं बेवकूफ़ ही थी. उस समय के मापदंड से भी. विवाह होने तक भी यही समझती रही कि विवाहित स्त्रियां बहुत से जेवर पहन लेती हैं, तभी उनके बच्चे हो जाते हैं. सरल हृदया मां ने कुछ बताया नहीं था. तब ऐसा प्रचलन भी नहीं था. इसी सादगी में एकदम आदशर्र् जीवन जीने का ही प्रयत्न किया.
‘वह मुझे पढ़ाने आते थे. झा अंकल के परिचित थे, सो पिताजी ने बिना झिझक उन्हें मुझे पढ़ाने के लिए हामी भर दी. बहुत उसूलों वाले थे परिमल सर. अन्य युवकों से एकदम भिन्न. नैतिकता की साक्षात् प्रतिमूर्ति. दो वर्षों में बहुत क़रीब से जाना उन्हें और वह मन को भाने लगे. उनके कारण पढ़ने में रुचि आने लगी. जाने क्यों मन को विश्‍वास था कि मैं भी उन्हें अच्छी लगती हूं. नहीं! कहा किसी ने भी कुछ नहीं. एक बार भी नहीं. पर बिना शब्दों में बांधे भी तो बहुत कुछ सुन-समझ और कह लिया जाता है न?
‘मां-पिताजी ने यहां विवाह तय कर दिया. कुछ नहीं कह पाई. हिम्मत ही नहीं जुटा पाई. कहती भी तो मानते क्या? पिताजी को अपने वैभव पर गर्व भले ही कभी नहीं रहा, पर मेरे सुखद भविष्य की उन्हें चिंता थी, सीए दामाद को छोड़कर मात्र एमए पढ़े एक बेरोज़गार युवक से अपनी बेटी का विवाह करने की बात पर राज़ी हो जाते क्या?
‘विवाह के उपरांत जीवनसाथी स़िर्फ अपने ही हित की सोचे, केवल अपनी ही इच्छाओं, ज़रूरतों व सुविधाओं का ख़याल हो उसे, तो कैसा होगा जीवन? पुरुष रूप में पैदा होने के कारण शक्ति और अधिकार, सब तो जन्म से ही मिले हैं उन्हें. मन की उलझन और परेशानी को वे क्या बांट सकेंगे? बुख़ार से तप रही होऊं तो पलभर पास खड़े होकर हालचाल ही पूछ लें, इतनी भी उम्मीद नहीं.
दुख-तकलीफ़ में नितान्त अकेली पड़ जाती हूं. ख़ासकर बिटिया के ब्याह के बाद से. ख़ैर, ज़िंदगी तो गुज़र ही रही है, गुज़र ही गई समझ लो, अगर ज़िंदा रहना भर काफ़ी मान लिया जाए तो. कभी मन उदास होता है, तो सोचती हूं कि क्या स़िर्फ पैसा ही ख़ुशियों की गारंटी हो सकता है? हीरे-मोती पहनने की चाह नहीं की थी, एक संवेदनशील साथी मिल गया होता, बस.’
भूल नहीं पाई परिमल को शिवानी. पति जब भी कोई कड़वी बात कह देते, जब कभी वह स्वयं को अवांछित-सा महसूस करती, तो परिमल को याद कर अपना मनोबल बढ़ा लेती. कल्पनाओं में जाने कितनी बार परिमल के कंधों पर सिर रखकर ढेर-से आंसू बहाए हैं उसने, अपनी हर तकलीफ़ उससे बांटकर अपना जी हल्का किया है.
समय तो स्वचलित क्रिया है, सो चलता ही रहता है. शिवानी के भैया-भाभी के विवाह की पचासवीं वर्षगांठ आने को है- गोल्डन एनिवर्सरी, जिसे उनके बेटे ने धूमधाम से मनाने की योजना बनाई है.
पिता तो बेव़क़्त चल बसे थे और मां का भी देहांत हो चुका, पर भाई-भाभी ने कभी शिवानी को मां-बाप की कमी महसूस नहीं होने दी. भैया के लिए आज भी वह प्यारी-सी छोटी बहना है. उसे भी इंतज़ार है आगामी उत्सव में सम्मिलित होने का. पति काम के बहाने जाना टाल गए और बिटिया-दामाद भी दूर की पोस्टिंग पर हैं, अतः वह अकेली ही पहुंची भाई के घर.
पार्टी अपने पूरे ज़ोरों पर है. वह सारे नाते-रिश्तेदारों से मिल चुकी. भाई के मित्र भी बारी-बारी से अभिवादन कर गए. उनमें ज़्यादातर नए थे, जिनसे वह नाममात्र को ही परिचित है. बहुत बोलनेवाली तो वह वैसे भी कभी नहीं रही, अतः सब से मिल-मिलाकर वह एक कोनेवाली मेज़ पर आ बैठी.
भैया से उसे पता चला है कि आज के उत्सव में सम्मिलित होने परिमल भी आनेवाले हैं और वह उनसे मिलने की अनुभूति को पूर्णतः महसूस करने के लिए पूरा एकांत चाहती है.
उसकी दृष्टि मुख्य द्वार पर टिकी है, ताकि वह परिमल के भीतर आते ही उन्हें देख सके और एक पल भी व्यर्थ न जाए. वह जानती है कि वह बहुत बदल चुके होंगे, पर कुछ भी हो, वह उन्हें पहचान लेगी. यादों में सदैव ही तो उसके साथ रहे हैं वह…

 

    उषा वधवा

अधिक कहानी/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां पर क्लिक करेंSHORT STORIES

कहानी- पासवाले घर की बहू