कहानी- अजनबी 3 (Short Story- Ajnabee 3)

 

मन ही मन ख़ुद से बातें करने लगी है शिवानी, ‘कल्पना में तुम मेरे संग ही रहे इन तमाम वर्षों में. तुम्हारी उपस्थिति मैं सदैव अपने आस-पास महसूस करती रही. अपने मन की हर बात, हर उलझन और परेशानी तुमसे बांटती रही, पर सच तो यह है कि कुछ भी नहीं जानते तुम मेरे बारे में…

 

स्टेज पर कुछ कलाकार पुरानी फ़िल्मों के गीत हल्के स्वरों में गा रहे हैं, जो माहौल को उसी 40-50 वर्ष पूर्व के काल में ले गए हैं और शिवानी भी अपनी तमाम बीमारियां और दर्द भूलकर अपने ख़यालों में उसी यौवन के द्वार पर आकर जैसे ठिठक गई है.
आज वह अपनी यादों के साथ अकेली ही रहना चाह रही है. उस विगत काल में पहुंच चुकी है वह, जब यौवन ने नई-नई दस्तक दी थी. दुनिया एकाएक ख़ूबसूरत लगने लगी थी. पूरे परिवार का स्नेह पाती थी वह, पर उसे शाम का वह एक घंटा ही अज़ीज़ लगने लगा था, जब ‘सर’ उसे पढ़ाने आते थे.
धीरे-धीरे उस के मुख से ‘सर’ कहना भी छूटता जा रहा था. उनसे बात करते व़क़्त बिना सम्बोधन के ही काम चलाती. मन ही मन वह उन्हें चाहने लगी थी, पर शर्मीली और मितभाषी शिवानी किसी को नहीं बता पाई थी अपने मन की बात.
मुख्य द्वार से भीतर आनेवाले प्रत्येक व्यक्ति को वह बड़े ध्यान से देख रही है. अधिकांश पुरुष गंजे अथवा स़फेद बालों वाले हैं. हां, स्त्रियां अनेकरूपा हैं. कुछ अपनी उम्र छिपाने के लोभ में सौन्दर्य प्रसाधनों से रंगी-पुती व गहनों से लदी-फंदी होने पर भी फूहड़ ही लगती हैं और कुछ बिना साज-शृंगार व सामान्य कपड़ों में भी शालीन.
कुल मिलाकर माहौल कुछ ऐसा है, जैसा विवाह के अवसरों पर होता है, सिवाय इसके कि अधिकतर अतिथि बड़ी उम्र के हैं. विवाह के अवसर पर चढ़ती उम्र की रौनक होती है. वर-वधू के संगी-साथी, चचेरे-ममेरे भाई-बहन धमाचौकड़ी मचाए रखते हैं, पर आज तो दूल्हा-दुल्हन स्वयं ही सत्तर पार कर चुके हैं और उनके मित्र-परिचित भी. रिश्तेदारों में जो बहुत नजदीकी हैं और परिवार समेत आए हैं, उन्हीं में से कुछ उभरती पीढ़ी के भी हैं.
भैया-भाभी अपने शुभचिंतकों से घिरे खड़े हैं. कुछ लोग हटते हैं तो दूसरे घेर लेते हैं. सबसे मिलना है उन्हें, सब की मुबारक़बाद स्वीकार करनी है. ऐसा क्यों न हो, दोनों ने कितना अच्छा समय एक संग गुज़ारा है. सहपाठी थे दोनों और विवाह भी जल्दी ही कर लिया था. भाभी स्नेहमयी और सहृदया. भैया भी सदैव ख़ुद से पहले दूसरों की प्रसन्नता की सोचनेवाले, भाभी की हर ख़ुशी पूरी करने की कोशिश करनेवाले. जीवन ऐसा बीते, तभी इस जश्‍न का औचित्य है.
शिवानी अपने ही ख़यालों में खोई है. दृष्टि उसकी द्वार पर ही है. उसने देखा ही नहीं कि भैया किसी को साथ लिए उसी की तरफ़ आ रहे हैं. जब उन्होंने पास पहुंच कर शिवानी को पुकारा, तभी जाना उसने. पर जब तक वह अपने साथी का परिचय करा पाते, उन्हें कोई अन्य अतिथि दिख गया और वह उसका स्वागत करने आगे बढ़ गए.
शिवानी ने एक सरसरी निगाह आगंतुक पर डाली और फिर से अपनी दृष्टि द्वार पर टिका दी. एक पल भी नहीं खोना चाहती वह परिमल को देखने के लिए. पर उसका ध्यान फिर भंग हुआ, जब आगंतुक ने उसे नाम लेकर पुकारा. शिवानी ने निगाहें उस ओर उठाईं, तो उस व्यक्ति के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कुराहट तैर गई और उसका चेहरा स्वतः ही ज़रा-सा बायीं ओर झुक गया. पहचान गई शिवानी और हड़बड़ाकर उठ खड़ी हुई.
सब कुछ वैसा ही तो हो रहा है, जैसा शिवानी ने चाहा था, जैसी उसने कल्पना की थी. वह परिमल के सान्निध्य में बैठी है और कोई भी नहीं है उनके आस-पास.
नहीं, परिमल उसे भूला नहीं है. पिछली अनेक बातें याद हैं उसे. अरसे बाद मिले किसी पुराने स्नेही मित्र की ही तरह वह उससे बातें कर रहा है, उसका और उसके घर-परिवार का हालचाल जानना चाह रहा है. वह ही क्यों उसके हर प्रश्‍न का उत्तर बहुत औपचारिक और संक्षिप्त रूप में दे रही है? क्यों खुलकर बात नहीं कर पा रही वह?
मन ही मन ख़ुद से बातें करने लगी है शिवानी, ‘कल्पना में तुम मेरे संग ही रहे इन तमाम वर्षों में. तुम्हारी उपस्थिति मैं सदैव अपने आस-पास महसूस करती रही. अपने मन की हर बात, हर उलझन और परेशानी तुमसे बांटती रही, पर सच तो यह है कि कुछ भी नहीं जानते तुम मेरे बारे में, सिवाय भैया से सुनी कुछ मुख्य बातों के… और मैं ही क्या जानती हूं तुम्हारे बारे में, सिवा इसके कि गत वर्ष तुम्हारी पत्नी की मृत्यु हो गई और दोनों बेटे विदेश जा बसे हैं. अलग-अलग राहों पर चलते हुए इतिहास अलग हो चुके हैं हमारे. विवाह के समय भूल ही गई थी तुम्हें अपने जीवन से अलग करना.
भीतर से सदैव ही जुड़ी रही तुम्हारे संग. आज जाना, कितना बेमानी था वह सब.’
कंधे पर सिर रख कर रोने की बात तो उठी ही नहीं शिवानी के मन में. सामने बैठा व्यक्ति तो नितांत अजनबी था.

 

उषा वधवा

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