कहानी- बहूरानी 1 (Short Story- Bahurani 1)

डॉक्टर ने कुछ टेस्ट वगैरह करके यह नतीज़ा निकाला कि श्रीमतीजी घोर डिप्रेशन यानी अवसाद की स्थिति में हैं. यदि उन्हें शीघ्र ही इससे न निकाला गया तो मुश्किल आ सकती है, सुनकर मेरे तो जैसे हाथ-पैर ही फूल गए. किंतु प्रणव ने सही राय दी कि मैं उसे लेकर आबोहवा बदलने किसी नैसर्गिक जगह पर निकल जाऊं. जाने की सोच ही रहा था कि मुझे अपने पुराने दोस्त कर्नल उपप्रेती का ख़याल आया. रिटायरमेंट के बाद वह अपने घर देहरादून चला गया था. कई बार उसने हमें बुलाया, पर किसी न किसी वजह से हम जा न सके थे. आज इस मुसीबत की घड़ी में मुझे वहीं जाना उचित जान पड़ा.

… ॐ नमः शिवाय! अहा! शाम की ताज़ा हवा, बरसाती मिट्टी की सोंधी-सोंधी महक, घर लौटते परिंदों की चहचहाहट… कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं… ख़ासकर वे, जो मनुष्य को प्रकृति से जोड़ती हैं.’ यही सब सोचते-सोचते मैं घर की ओर लौट रहा था. मैं यानी रिटायर्ड ब्रिगेडियर अर्जुन अहलावत. क़रीब 36 साल भारतीय सेना की सेवा करने के पश्‍चात्, तीन साल पहले ही रिटायर हुआ हूं. हालात कुछ ऐसे बने कि रिटायरमेंट के बाद दिल्ली में अपना मकान होते हुए भी सब बेच-बाचकर देहरादून श़िफ़्ट होना पड़ा. क्यों? यह मैं आपको बाद में बताऊंगा. फ़िलहाल तो आप इतना ही जान लीजिए कि सेना में उम्रभर नौकरी करने के बावजूद मैं एक बेहद ख़ुशमिज़ाज, सरल व उदार व्यक्ति हूं.

परिवार में कृष्णा है. जी हां, मेरी धर्मपत्नी- कृष्णा अहलावत. नाम रखने में मां-बाप ने अवश्य जल्दबाज़ी की होगी, क्योंकि कृष्णा कहीं से भी कृष्णवर्ण की नहीं है. दूध-धुला रंग, सामान्य क़द-काठी और हल्का भूरापन लिए हुए घुंघराले बाल. एक स्वस्थ जाट परिवार की स्वस्थ पुत्री व बहू, मेरे दोनों बच्चों- प्रणव व प्रज्ञा की ममतामयी मां व मेरे लिए एक धर्मभीरु, गृहकार्य दक्ष पत्नी. उसके व मेरे बाहरी व्यक्तित्व की समानताएं छोड़ दें, तो हमारे विचारों में ज़मीन-आसमान का अंतर मिलेगा. यह दीगर बात है कि ़ज़्यादातर हिंदुस्तानी विवाह इस अंतर के बावजूद सफलता की सिल्वर व गोल्डन जुबली मनाते आ रहे हैं. उसे देहरादून लाने में मुझे कितनी दिमाग़ी मश़क़्क़त करनी पड़ी, यह मैं ही जानता हूं.

अब आपसे क्या छिपाना? ज़िंदगीभर की कमाई लगाकर दिल्ली के शालीमार बाग में अपना दोमंज़िला मकान खड़ा किया था. कुछ दिन उसमें रहे भी, पर भाग्य को कुछ और ही मंज़ूर था. बेटी उन दिनों मेडिकल करके यू. एस. जाने की तैयारी में थी व प्रणव आर्किटेक्चर के प्रथम वर्ष में. अचानक हम पर प्रकट हुआ कि प्रज्ञा अपने विजातीय सहपाठी से प्रेमविवाह करना चाहती है. सुनकर मैं तो संयत रहा, पर कृष्णा तो आपा ही खो बैठी. उसकी नज़रों में बेटी की इस साज़िश के पीछे मेरा हाथ था. अब मैं उसे क्या कहता कि मेरी बला से एक करियरशुदा, परिपक्व लड़की करियप्पा से विवाह करे या कुमावत से, मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. लेकिन कृष्णा की हाय-तौबा से घबराकर प्रज्ञा ने कोर्ट मैरिज कर ली और मैं यह अपराध कर बैठा कि नवविवाहित दंपति को एयरपोर्ट तक सी-ऑफ करने चला गया. इसकी सज़ा यह मिली कि एक महीने तक कृष्णा न मुझसे बोली, न ही उसने ढंग से कुछ खाया-पिया. कुछ रोज़ तो मैंने बर्दाश्त कर लिया, पर जब उसके स्वास्थ्य पर असर पड़ने लगा तो मुझे बड़ी चिंता हुई. डॉक्टर ने कुछ टेस्ट वगैरह करके यह नतीज़ा निकाला कि श्रीमतीजी घोर डिप्रेशन यानी अवसाद की स्थिति में हैं. यदि उन्हें शीघ्र ही इससे न निकाला गया तो मुश्किल आ सकती है, सुनकर मेरे तो जैसे हाथ-पैर ही फूल गए. किंतु प्रणव ने सही राय दी कि मैं उसे लेकर आबोहवा बदलने किसी नैसर्गिक जगह पर निकल जाऊं. जाने की सोच ही रहा था कि मुझे अपने पुराने दोस्त कर्नल उपप्रेती का ख़याल आया. रिटायरमेंट के बाद वह अपने घर देहरादून चला गया था. कई बार उसने हमें बुलाया, पर किसी न किसी वजह से हम जा न सके थे. आज इस मुसीबत की घड़ी में मुझे वहीं जाना उचित जान पड़ा.

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मैं पत्नी सहित बोरिया-बिस्तर बांध देहरादून चला आया. यहां आकर कृष्णा की हालत में आश्‍चर्यजनक गति से सुधार हुआ. एक तो उपप्रेती का खुला हवादार बंगला, दूजे उसकी हंसमुख गढ़वाली पत्नी का साथ, दोनों मिलकर कृष्णा के लिए जैसे रामबाण सिद्ध हुए. कर्नल मुझे किचन गार्डन में उलझाए रखता और उसकी पत्नी कृष्णा को दवाइयां कम और बातों की खुराक अधिक देती. लिहाज़ा हुआ यह कि तीन-चार ह़फ़्तों में ही कृष्णा कुर्सी छोड़ बैडमिंटन खेलने लगी, रसोई में पकौड़े तलने लगी और जब एक दिन उसने अचानक बगीचे से गुलाब तोड़कर जूड़े में खोंसा तो मैं चालीस साल पहले की कृष्णा को याद कर बैठा, जो हमेशा अपने जूड़े में फूल लगाए रहती थी.

जाने का समय निकट जान मैंने उपप्रेती से दिल्ली की टिकटें रिज़र्व कराने को कहा. किंतु आशा के विपरीत, उसे मेेरे निर्णय से कोई ख़ास ख़ुशी नहीं हुई, बल्कि जो कुछ उसने कहा, वह शब्दशः मुझे आज तक याद है. “जाना है तो चले जाओ अर्जुन, पर दिल्ली में तुम अपने बंगले के कैदी होकर रह जाओगे. बच्चे आजकल अपनी ज़िंदगियां संभाल लें, यही बहुत है. हमारी किसे पड़ी है? मेरी मानो तो इसी लेन में एक प्रॉपर्टी हाथोंहाथ बिक रही है. ज़्यादा नहीं तो 12 से 15 लाख में सौदा तय है. मेरे पास यहीं बस जाओ. बुढ़ापे में साथ देंगे एक-दूसरे का, साथ-साथ सुख-दुख बांटेंगे.” मैं आश्‍चर्यचकित था कि उसने इतनी दूर की सोच डाली, पर कृष्णा की मनः स्थिति ने मुझे भी सहमा रखा था. अब यदि दूसरी दफ़ा कुछ गफ़लत हुई तो मैं क्या करूंगा?

कृष्णा को मनाना सहज नहीं था, पर मेरी ज़िद के आगे उसे भी झुकना ही पड़ा. प्रणव हॉस्टल में था ही, उसे हमारे निर्णय से कोई ऐतराज़ नहीं हुआ और हम उपप्रेती के सहारे देहरादून बस ही गए. दिल्ली से उत्तरांचल का स्थानांतरण हमें महंगा नहीं, बल्कि सुविधाजनक ही पड़ा था. घर तुरत-फुरत व्यवस्थित कर डाला उपप्रेती के पहाड़ी नौकर ने, उसी ने एक नौकर हमारे लिए भी जुटा दिया था.

कृष्णा का अधिकांश समय बागवानी में बीतता या मिसेज़ उपप्रेती के साथ… और मैं?

कहानी- बहूरानी 1 (Short Story- Bahurani 1)

        सोनाली गर्ग

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