कहानी- बहूरानी 2 (Short Story- Bahurani 2)

“सुनो कृष्णा, तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें अब एक बहू की ज़रूरत है?” कृष्णा मेरी बात सुनकर फीकी हंसी हंस दी, “मुझे या तुम्हें? थक गए हो मेरी सेवा करते-करते?”

“अरे नहीं यार.” मैं हंस दिया था.

“आजकल बहुएं पति सेवा के लिए लाई जाती हैं, सास-ससुर के लिए नहीं. वह आकर प्रणव को संभाल ले, यही बहुत है.”

कृष्णा की सहमति ले हमने प्रणव से बात की तो पाया कि अनेक महिला मित्रों के बावजूद शादी के मामले में वह पैरेंट्स पर ही निर्भर है. इस बात की हमें ख़ुशी ही हुई थी, किंतु शीघ्र ही हमें पता चल गया कि हमने बिन बुलाई आफत मोल ले ली है.

मुझे तो कर्नल ने वापस पुराने दिनों में खींच लिया था, जहां था फौजी बिरादरी के रिटायर्ड मेम्बर्स का साथ, क्लब की फुर्सत भरी शामें, लॉन के ताज़े फल, सब्ज़ियों की ल़ज़्ज़त और शिवालिक की ठंडी मस्त बयार. मैं हर चिट्ठी में प्रणव को लिखता कि कैसे देहरादून उसकी मां व पिता को रास आया है व कैसे हमें उसका बड़ी शिद्दत से इंतज़ार है. लीचियों की सौग़ात भेजता रहता और प्रणव से भी सुनता कि कैसे उस तक पहुंचने से पहले ही पार्सल गायब हो जाता है.

कुल मिलाकर हम मियां-बीवी हर तरह से सुखी व संतुष्ट थे, पर कहते हैं न कि अपनी नज़र ख़ुद को ही लग जाती है. कुछ-कुछ वैसा ही हमारे साथ भी हुआ. प्रणव… नहीं-नहीं, उसकी आज्ञाकारिता की क्या तारीफ़ करूं? कोर्स पूरा होते ही हमारे पास देहरादून में ही सेटल होने की कोशिश करने लगा. हमने कहा भी कि दिल्ली उसे ़ज़्यादा सूट करेगा, पर उसने हमें अकेले छोड़ने से साफ़ मना कर दिया. प्रणव के आते ही हमारे शांत, घरौंदे में जैसे बहार आ गई. युवा लड़के-लड़कियों का जमावड़ा हर पल हमारे आशियाने को गुलज़ार किए रहता. मैं तो ख़ुश था, पर कृष्णा को कुछ ही दिनों में खीझ होने लगी, क्योंकि उसका अनुशासित स्वभाव उसे आवश्यकता से अधिक किसी से घुलने-मिलने नहीं देता था.

प्रणव की इस बेपरवाह-सी जीवनशैली को देखकर मेरे मन में एक ख़याल आया और मैंने कृष्णा को भी मन की बात कह डाली, “सुनो कृष्णा, तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें अब एक बहू की ज़रूरत है?” कृष्णा मेरी बात सुनकर फीकी हंसी हंस दी, “मुझे या तुम्हें? थक गए हो मेरी सेवा करते-करते?”

“अरे नहीं यार.” मैं हंस दिया था.

“आजकल बहुएं पति सेवा के लिए लाई जाती हैं, सास-ससुर के लिए नहीं. वह आकर प्रणव को संभाल ले, यही बहुत है.”

कृष्णा की सहमति ले हमने प्रणव से बात की तो पाया कि अनेक महिला मित्रों के बावजूद शादी के मामले में वह पैरेंट्स पर ही निर्भर है. इस बात की हमें ख़ुशी ही हुई थी, किंतु शीघ्र ही हमें पता चल गया कि हमने बिन बुलाई आफत मोल ले ली है.

प्रणव की नौकरी बेहद आकर्षक न सही, किंतु उसकी क़द-काठी और चेहरा अनदेखा करना असंभव था. हमारे जान-पहचानवाले यह जानकर कि हम बहू की तलाश में हैं,  बिन बादल बरसात की तरह टपक पड़े थे और मैं व कृष्णा असहाय से, समझ ही नहीं पा रहे थे कि किसे हां करें और किसे ना. किसी की लड़की उच्च शिक्षित, गृहकार्य दक्ष, संगीत-विशारद  थी, तो कोई केवल इस बूते पर अकड़ता था कि प्रणव को सोने में तोल देगा. मेरी अपनी अपेक्षाएं न के बराबर थीं, पर कृष्णा का कहना था कि और कुछ हो, न हो लेकिन बहू सुंदर तो होनी ही चाहिए. प्रणव ने सब कुछ हम पर छोड़ दिया था, इसलिए हमारी ज़िम्मेदारी और बढ़ गई थी.

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सबसे पहले मुझे पसंद आई मेजर शर्मा की बड़ी बेटी, जो लखनऊ से बी.एड. कर इसी साल लौटी थी. बेहद सुशील व घरेलू क़िस्म की, किंतु कृष्णा का कहना था कि वह प्रणव के सामने बहुत मैच्योर लगेगी. अब मैं इस मैच्योरिटी को क्या नाम देता, समझ नहीं पाया, पर जान गया कि मेरी पत्नी मुझे इस समस्या से जल्दी उबरने नहीं देगी. ऐसा नहीं कि उसे कोई न भाया हो, पर उसकी पसंद की हुई चंपा सिन्हा जैसी चतुर, आकर्षक, स्टेट लेवल की वॉलीबॉल खिलाड़ी को देखते ही मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता था. यूं जान पड़ता था जैसे किसी भी पल वह हमें भी वॉलीबॉल की भांति उछाल देगी और प्रणव को ले उड़ेगी.

और तभी एक दिन प्रणव ‘उसे’ लेकर घर आया. ‘उसे’ यानी इस एपिसोड की प्रधान नायिका को. अब रहस्य बढ़ाने से क्या फ़ायदा? लड़की हर तरह से अच्छी दिख रही थी- प्रणव के कंधों को छूता क़द, गेहुंआ रंग, बड़ी-बड़ी आंखें और रेशमी लहराते खुले बाल. देखते ही मेरी और कृष्णा की बांछें खिल उठीं. कृष्णा तो शायद उसकी नज़र भी उतार बैठती, वह तो प्रणव ने उसे रोक दिया.

“आप ग़लत समझ रही हैं मम्मी. रिया इज़ जस्ट ए फ्रेंड. हम थोड़े दिनों पहले ही मिले हैं. असल में इसके पापा भी आर्मी में हैं- पूना पोस्टेड हैं. इसे पढ़ाई पूरी करते ही देहरादून में जॉब मिल गया, पर रहने की समस्या है. मैंने कहा कि हमारे घर के ऊपर का पोर्शन खाली पड़ा है, वहां पेइंग गेस्ट की तरह रह लो. आप लोगों की परमिशन हो तो…” कहकर उसने बात अधूरी छोड़ दी.

मुझे ‘हां’ कहते ़ज़्यादा देर नहीं लगती और कृष्णा को ‘ना’ कहते. पर इस बार उस लड़की का आर्मी का ठप्पा काम कर गया. आख़िर अपनी बिरादरीवाली की मदद तो हमें करनी ही थी. इस तरह रिया दत्त हमारे आशियाने में पेइंग गेस्ट बनकर आ गई. पेइंग गेस्ट मेरे हिसाब से एक अजीब विरोधाभास है, क्योंकि जो ‘पे’ करे, वह ‘गेस्ट’ कैसे हुआ और जो गेस्ट नहीं, वह तो घरवाला ही माना जाएगा. रिया ने हमें डिनर की पेमेंट भी की थी, पर महीना बीतते-बीतते कृष्णा ने वह ‘क्लॉज़’ स्वयं ही उड़ा डाला.

Short Story, Bahurani kahani

      सोनाली गर्ग

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