कहानी- बहूरानी 3 (Short Story- Bahurani 3)

कहना न होगा, शादी में सबकी नज़रें उसी पर जमी रहीं. साथ ही लोगों के स्पष्ट इशारे थे कि हमने उसे बहू के रूप में चुन लिया है. हम ख़ुद भी इसी खुमार में डूबते-उतराते घर पहुंचे और ख़्वाबों को हक़ीक़त में बदलने का तसव्वुर लिए सो गए.

अगली सुबह, जी हां, वही हवा, वही भीगी महक, वही चहचहाहट सुनता हुआ मैं रिया के इंतज़ार में था कि अचानक कृष्णा हाउसकोट में अस्त-व्यस्त-सी प्रकट हुई. उसे इतनी सुबह जगा देखकर मेरा माथा ठनका.

“क्या हुआ, तबियत तो ठीक है न?” मेरे पूछते ही उसने एक मुड़ा-तुड़ा पर्चा मेरी ओर बढ़ाया और मुझे सिसकियों से दहला दिया. बेहद सुंदर कॉन्वेंटी लिखावट में, अंग्रेज़ी में लिखा ख़त था. अनुवाद ही पेश कर रहा हूं-

‘डियर अर्जुन अंकल व आंटी, आपके साथ जो व़क़्त मैंने गुज़ारा, वह मुझे हमेशा याद रहेगा.

कारण भी कुछ सहज ही थे. एक तो रिया चूज़े जितना खाती, उसमें भी चार दिन नागा रहता. फिर जिस दिन उसका मन होता, ज़िद करके सारा दिन रसोई में डिनर की तैयारी करती रहती. क्या कहूं, कढ़ी और पालक पनीर तो वह इतना लज़ीज़ बनाती थी कि मैं कृष्णा के हाथ का स्वाद ही भूल गया. और भी कई बातें थीं, जो उसे गेस्ट से गृह सदस्य में तब्दील कर गईं. अब सुबह का अख़बार बहादुर नहीं, रिया ही मुझे लाकर देती और साथ रहता हरी चाय का सेहत से लबलबाता प्याला. ठीक आठ बजे वह नहा-धोकर गेट पर ऑफ़िस जाने को तैयार खड़ी मिलती और मेरा फौजी हृदय उसकी नियमबद्धता को मन ही मन सराहने लगता. कृष्णा के लिए उसके पास सदा ऑफ़िस की चटखारों भरी गॉसिप का ख़ज़ाना रहता, सो छह बजते ही वह उसे नीचे उतरने के लिए आवाज़ें देना शुरू कर देती. इन सबके बीच उसे प्रणव से मेलजोल का कितना समय मिलता होगा, आप ख़ुद ही सोच लीजिए. पर इतना बता दूं कि जब-जब रिया रात का खाना हमारे साथ खाती, कोशिश करके वह भी समय पर डाइनिंग टेबल तक पहुंच ही जाता था.

मेरी अनुभवी आंखें लगातार दोनों का पीछा करतीं, पर कहीं कुछ भी ऐसा न मिलता, जो शक की डोर को पुख्ता कर सके. माना एकाध बार प्रणव उसे ऑफ़िस छोड़ने गया और कुछेक बार उसने प्रणव की पसंद की कुछ ख़ास चीज़ें बनाईं, पर इसके आगे कुछ और नोटिस करने का मेरा धैर्य जाता रहा.  कृष्णा अक्सर मुझे उसके पिता से बात करने को उकसाती रहती. जब मैं उसे रिया के पंजाबी होने का हवाला देता तो वह हरियाणा और पंजाब की सम्मिलित संस्कृति की दुहाई देने लगती. मैं जान गया कि वह इस नैया को पार लगाकर ही मानेगी. पर इंसान के चाहने से क्या होता है. ऊपरवाले की तरकीबें इतनी अजीबोगरीब हैं कि हम केवल उन पर आश्‍चर्य कर सकते हैं, शिकायत नहीं.

प्रणव की सहमति की हमने ख़ास आवश्यकता नहीं समझी थी और उसने वैसे भी यह भार हमें ही सौंप रखा था. रिया से उसके पिता का टेलीफ़ोन नंबर तो हमने ले ही रखा था, पर रिश्ते जैसी गंभीर बात एक अजनबी से छेड़ते हुए बेहद झिझक हो रही थी. उस पर अभी हमने अपनी मंशा रिया से भी ज़ाहिर नहीं की थी. कृष्णा बेहद एहतियात से चलने की सोच रही थी, क्योंकि उसे किसी भी क़ीमत पर यह रिश्ता चाहिए था. अब तो रात-दिन उसकी आंखों में बारात और डोली के सपने डोलते रहते. बात करते-करते अक्सर वह रिया के बाल सहलाने लगती, तो कभी उसके ठीक से न खाने पर सौ हिदायतें दे डालती.

इसी बीच मेजर मिश्रा की बेटी की शादी का कार्ड आया. हमारे अच्छे परिचित थे, सपरिवार आमंत्रण था. ‘परिवार’ में अब कृष्णा रिया को भी गिनने लगी थी, सो उसने उसे भी साथ चलने को मना लिया था. मुझे आज भी याद है, कृष्णा की गुलाबी रंग की सिल्क साड़ी पहने जब वह सीढ़ियों से उतरी तो कोई राजकुमारी ही जान पड़ रही थी. गले में कृष्णा की ही दी हुई सच्चे मोतियों की माला, कानों में बूंदे और गालों पर स्वस्थ गुलाबी आभा. सादे सिंगार में भी वह किसी परी से कम नहीं लग रही थी. प्रणव की आंखों में उतरे प्रशंसा के भाव मुझसे छुपे न रहे और मन ही मन मैंने भी फैसला कर ही लिया. ‘सुबह होते ही पूना फ़ोन मिलाना है, बस…’

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कहना न होगा, शादी में सबकी नज़रें उसी पर जमी रहीं. साथ ही लोगों के स्पष्ट इशारे थे कि हमने उसे बहू के रूप में चुन लिया है. हम ख़ुद भी इसी खुमार में डूबते-उतराते घर पहुंचे और ख़्वाबों को हक़ीक़त में बदलने का तसव्वुर लिए सो गए.

अगली सुबह, जी हां, वही हवा, वही भीगी महक, वही चहचहाहट सुनता हुआ मैं रिया के इंतज़ार में था कि अचानक कृष्णा हाउसकोट में अस्त-व्यस्त-सी प्रकट हुई. उसे इतनी सुबह जगा देखकर मेरा माथा ठनका.

“क्या हुआ, तबियत तो ठीक है न?” मेरे पूछते ही उसने एक मुड़ा-तुड़ा पर्चा मेरी ओर बढ़ाया और मुझे सिसकियों से दहला दिया. बेहद सुंदर कॉन्वेंटी लिखावट में, अंग्रेज़ी में लिखा ख़त था. अनुवाद ही पेश कर रहा हूं-

‘डियर अर्जुन अंकल व आंटी, आपके साथ जो व़क़्त मैंने गुज़ारा, वह मुझे हमेशा याद रहेगा. आज लेकिन इस सुहाने सफ़र का आख़िरी पड़ाव है. मैं आपके घर से कुछ नक़द व आंटीजी के गहने लेकर जा रही हूं. कुछ मजबूरियां हैं, वरना यहीं रहकर आजीवन आपकी सेवा करती. मैं जानती हूं, आप प्रणव से मेरा विवाह करना चाहते थे, पर यही समझिएगा कि अपनी मुंह दिखाई मैं स्वयं ले गई. कहा-सुना माफ करना.’

नोट- पूना फ़ोन करना व्यर्थ होगा, नंबर ठीक है, पर मेरे पिता नहीं, पुराने लैंडलॉर्ड मिलेंगे, वे भी नहीं जानते कि मैं कहां हूं.

पढ़ते-पढ़ते मेरी स्वयं यह हालत थी कि कहां खड़ा होऊं, कहां बैठूं? समझना मुश्किल था. कृष्णा का रुदन कब थमा, याद नहीं, पर वह इस बार डिप्रेशन में नहीं गई. कारण यही है कि मैंने तुरंत प्रणव की सगाई एक परिचित परिवार में कर डाली और एक परी की तरह सुंदर न सही, पर ठीक-ठाक बहू घर ले आया. आज भी जल्दी घर पहुंचना है, मेरे बेटे की पहली मैरिज ऐनीवर्सरी जो है. और हां, पेइंगगेस्ट रखने की हमें फिर कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी. ऊपर का कमरा अब हमारी बहू रानी का जो है.

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      सोनाली गर्ग

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