कहानी- मम्मी बस… (Short Story- Mummy Bas 2)

हिंदी कहानी, short story

धीरे-धीरे माता-पिता के स्पर्श से आश्‍वस्त-सी हो अंकिता सो गई, “आप दोनों स्क्रीन के इस तरफ़ आ जाइए.” कहते हुए दोनों डॉक्टर उस ओर गए और वहां बैठी नर्स से बोले, “सिस्टर, आप बच्ची के पास बैठिए, वह कुछ कहे तो नोट कीजिए.”
चारों जब वहां बैठ गए तो पहले डॉ. पंकज बंसल ने डॉ. वासु को अंकिता के आने व स्वयं द्वारा की गई जांच विस्तार से बताई. “वासु, मुझे लगता है, हमें बच्ची की बातों का मतलब इनसे पूछना चाहिए.”
“यस.” डॉ. बसंल बोले. “मिसेज स्वामी मुझे जगाना मत… इस बात का आपके लिए क्या मतलब है?”
योगिता ख़ामोश रही. अनिल बोला, “डॉक्टर साहब, ये अंकिता को ज़बरदस्ती हर बार उठाती है.”
“हर बार? यानी?”
डॉ. वासु को देख अनिल बोले, “डॉक्टर साहब, स्कूल से वह साढ़े बारह बजे लौटती है. फिर खाना खाकर सोती है तो ढाई बजे से ये उसे फिर उठाकर तीन बजे ‘किड्स एण्ड किड्स मदर्स’ में ले जाती है.”
“क्यों?”
“पर्सनैलिटी डेवलपमेंट के लिए.”
“किसकी पर्सनैलिटी?” डॉ. वासु ने
पूछा, “बच्ची की यानी अंकिता की?”
”ओह! फिर?”
“वहां से आती है ये साढ़े पांच, छह बजे. दूध पिलाकर सात बजे ‘रेडी फॉर के.जी. क्लासेस’ में ले जाती है.”
“वह किसलिए?”
“किसी अच्छे स्कूल में के.जी. में भरती के लिए.”
डॉ. वासु ने कहा, “आप दोनों की बातों से लग रहा है कि समस्या कहीं आप ही के द्वारा पैदा की गई है.” दोनों ने एक-दूसरे को देखा.
डॉ. वासु बोले, “देखिए मिसेज स्वामी, एक ही संतान होने से माता-पिता अपनी महत्वाकांक्षा का सारा बोझ उस एक बच्चे पर ही डाल देते हैं. सारे सपने उस एक के इर्द-गिर्द बुनते हैं. मैंने माता-पिता को बच्चों के पीछे 11वीं से पड़ते देखा है या बहुत हुआ तो 9वीं से- पर आपने तो सारी हदें ही तोड़ दीं?”
“मगर डॉक्टर, आजकल के.जी. में एड…?”
“मैडम, के.जी. में एडमिशन की जगह उसे अस्पताल में ‘एडमिट’ करवा दिया है आपने?” डॉ. बंसल ख़ुद को रोक नहीं पाए, “अब आप मुझे अंकिता का पूरा टाइम टेबल बताइए, वह सुबह कितने बजे उठती है? आप ही जवाब देंगी मिसेज स्वामी. मि. स्वामी आप तब ही जवाब देंगे, जब मैं ख़ासतौर से आपसे बात करूंगा. तो बताइए मिसेज स्वामी- अंकिता? यही नाम है न बच्ची का? कितने बजे उठती है?”
“छह-सवा छह, कभी-कभी साढ़े छह.”
“ख़ुद उठती है?”
“नहीं, उठाना पड़ता है.”
“कैसे उठाती हैं?”
“कैसे यानी? आवाज़ देती हूं.” योगिता थोड़ी चिढ़कर बोली.
“शांत! शांत मिसेज स्वामी, आप सही नहीं बताएंगी, तो हम कुछ नहीं कर पाएंगे. मेरा मतलब है कि आप स़िर्फ आवाज़ देती हैं कि हाथ से प्यार से छूकर उठाती हैं या चिल्लाकर-डांटकर उठाती हैं?”
“पहले तो धीरे-से आवाज़ देती हूं, जब साढ़े छह तक नहीं उठती, तो थोड़ा डांटती भी हूं.”
“ओह! तो फिर वो उठ जाती है. फिर?”
“फिर उसे बाथरूम में ले जाती हूं.”
“वह जगी रहती है?”
“… ?”
“वह जगी रहती है क्या?” डॉ. ने दोहराया.
“डॉक्टर, मैं कुछ बोलूं?” अनिल ने कहा.
“कहिए!”
“डॉक्टर, कभी-कभी वह स्टूल पर बैठी-बैठी ऊंघती रहती है. यह झटपट उस पर पानी डालती जाती है. फिर टॉवेल में लपेटकर मुझे पकड़ा देती है. जब तक यह उसका दूध-कॉर्नफ्लेक्स तैयार करती है मैं उसे तैयार कर देता हूं.” डॉ. वासु पेंसिल से नोट करते रहे, फिर हाथ रोक उसी पर नज़र गड़ाए रहे- थोड़ी देर बाद बोले, “मिसेज स्वामी, जब वह ऊंघती है और आप उस पर पानी डालती हैं, तो वह घबरा जाती होगी. ऐसे करती होगी जैसे कि पानी में डूब रही हो?”
“जी, कभी-कभी.”
“आपको कभी उस पर दया नहीं आई?”
“दया करने से वह रोज़ ही स्कूल नहीं जाने के कारण की तरह इसे इस्तेमाल करती!”
“ओह! फिर?”
“फिर नाश्ते की मेज़ पर भी वह कभी सोती कभी जागती. नाश्ता भी आधा-अधूरा करती है. फिर मैं उसे बस में चढ़ाने जाती हूं.”
“पैदल या गोद में? कितनी दूर?”
“चार ब्लॉक आगे पैदल. उसका बैग मैं रखती हूं. बॉक्स और पानी भी.” “बैग भी? नर्सरी में?”

“हां पिक्चर बुक्स, ड्राइंग कॉपी, कलर बॉक्स वगैरह!”
“फिर? दोपहर को क्या होता है?”
“साढ़े बारह बजे स्कूल से लौटती है.”
“खाना? खाने में क्या देती हैं आप उसे?”
“आकर वह सीधे सो़फे पर लेट जाती है. कपड़े तक नहीं बदलती. फिर उसे उठाकर ज़बरदस्ती खिलाना पड़ता है. कभी एक पूरी रोटी खा लेती है, मगर दाल-चावल ज़्यादा पसंद करती है. फिर से सो जाती है.”
“कितनी देर?”
“आधा-पौन घंटा.”
“फिर? दोबारा जगाती हैं आप?”
“जी.” अबकी बार योगिता की आवाज़ धीमी थी.
“वह आसानी से उठ जाती है ?”
“नहीं, हर ह़फ़्ते दो-तीन बार क्लास मिस होती है?”
“तो आप उसे मारती हैं?”
“न…” जब डॉ. वासु ने भौंहें उठाईं, तो वह बोली, “कभी-कभी… डॉक्टर, ढाई हज़ार रुपये भरे हैं मैंने वहां.”
“अंकिता को ये बात मालूम है?”
“जी! बताना ही पड़ता है ना?”
“आपको लगता है कि उसे इन रुपयों की क़ीमत समझ में आती है?”
“आती ही होगी?” योगिता दबी आवाज़ में बोली.
“मिसेज स्वामी, क्या आपको पता है कि ढाई हज़ार रुपयों और आपकी इस बच्ची में से किसकी क़ीमत ज़्यादा है?”
अब तक तो योगिता की आवाज़ बिल्कुल धीमी पड़ गई थी. डॉक्टर उसे किस बात का एहसास कराना चाहते हैं-
यह शायद वह समझ गई थी. उसने चेहरा झुका लिया.
“आप समझ रही हैं मिसेज स्वामी, आपकी बच्ची क्यों जागना नहीं चाहती? क्यों बस! बस! कर रही है? मेरे ख़याल से वह गर्म या ठंडे पानी के लिये बस कर रही है? है ना?”
“पता नहीं.” योगिता ने फुसफुसाकर कहा.
“मिसेज स्वामी, आपकी समस्या यह है कि बेटी की ज़िद आपने की थी, इसलिए आप उसमें कोई कमी नहीं रहने देना चाहतीं. दूसरे लोगों के बच्चों से होड़ में आप अपनी बेटी को सबसे आगे रखना चाहती हैं, ये आपकी दूसरी समस्या है. तीसरी ये कि आप बच्ची के बारे में, उसकी ज़रूरतों के बारे में, उसके बचपन के बारे में, उसकी रुचि और इच्छाओं के बारे में सारे फैसले ख़ुद ही करना चाहती हैं, क्योंकि उसे आपने पैदा किया है. आप उसे एक व्यक्ति नहीं मानतीं बल्कि…” बीच में ही योगिता ने कहा,
“डॉक्टर मैं उसे बहुत प्यार करती हूं.”

आशा अय्यर ‘कनुप्रिया’