कहानी- मम्मी बस… (Short Story- Mummy Bas 3)

 

हिंदी कहानी, Hindi Short Story

“हां ज़रूर, पर एक बच्ची, एक इंसान की तरह नहीं, अपनी सबसे महंगी गुड़िया की तरह, जिसे आप उसके पिता से भी नहीं बांट पातीं. इससे बच्ची अपने पिता को आपके सामने खुलकर प्यार भी नहीं कर सकती. मिसेज स्वामी आप जैसी मांएं मैं ह़फ़्ते में चार-पांच देख रहा हूं. आप ज़रा अपने बचपन की ओर नज़र डालिए और सोचिए बचपन आपके लिए क्या था? गिलहरियों के पीछे दौड़ना, मोहल्लेभर के बच्चों के साथ धमाचौकड़ी मचाना, क़िताबों के पन्ने फाड़ना… खाना-पीना, सोना, घूमने-जाना… कुल मिलाकर एक बच्ची बने रहना. और अंकिता? उसे आपने एक दिन भी चैन से सोने तक नहीं दिया. आपने उससे उसका बचपन छीन लिया. उसे असमय बड़ा बना दिया. आपके जवाबों से पता चलता है कि हर बार बच्ची को आप ज़बरदस्ती उठाती हैं.”
“मैं भी तो उठती हूं.” वह शिकायती लहजे में बोली.
“आप पच्चीस-तीस कितनी उम्र की हैं?” डॉक्टर ने क्रोधभरी आवाज़ में पूछा.
“और वो अधखिली कली, तीन साल की… आप जानती हैं क़ानूनन तो ये सारे के.जी. और नर्सरीवाले स्कूल गैरक़ानूनी हैं, अमानवीय हैं? जिस बच्ची की आंखों की मांसपेशियां अभी ठीक इमेज तक नहीं बना पातीं, वह आंखें गड़ा-गड़ाकर अक्षरों की बनावट देख उन्हें समझने, याद रखने के लिए मजबूर है. नतीजा- स्किवण्ट, भेंगापन, छोटी-सी उम्र में चश्मा. स्कूल में खड़े रहना अनुशासन में! उसकी छोटी-छोटी टांगों में कितना दर्द होता होगा? जो जीवनभर रहेगा. कमोबेश इस तरह की ज़्यादती के परिणाम आप जानती हैं ना क्या होता है?”
“नहीं.” में सिर हिलाया योगिता ने.
“या तो पांचवी तक आते-आते बच्चे ठस्स हो जाते हैं या पढ़ाई में उन्हें अरुचि होती है. वे हिंसक हो जाते हैं या माता-पिता, पढ़ाई, स्कूल, क़िताब आदि से नफ़रत करने लगते हैं! या उनकी वही हालत हो जाती है, जो… जो अंकिता की हुई है.”
एकाएक योगिता फूट-फूटकर रो पड़ी. अनिल अपनी कुर्सी छोड़ उसकी कुर्सी के पीछे जा खड़ा हुआ. उसके कंधों पर हाथ रख उसे सांत्वना देने लगा. फिर डॉ. वासु की ओर दर्दभरी आंखों से देखता हुआ बोला, “डॉक्टर प्लीज़! बताइए ना अंकिता का क्या होगा?”
“मि. स्वामी! मुझे तो ऐसा लगता है वह देर तक सोएगी! उसे सोने दें. अगर वह कसमसाए, चौंके तो… मिसेज स्वामी उसे थपकी देते रहिए. बच्चे मां की थपकियों से आश्‍वस्त होते हैं. जिस एक व्यक्ति से बच्चा सबसे ज़्यादा सुरक्षा और विश्‍वास पाता है, वह होती है मां! जब वही उसे सताने लगती है…” त़ड़पकर योगिता बोली, “मैं उसे क्यों सताऊंगी डॉक्टर? आप तो सारा आरोप मुझ पर ही डाल रहे हैं.”
“ऐसा ही समझ लीजिए. दोष कुछ आपके पति का भी है, जिन्होंने बच्ची को बचाने के लिए कुछ भी नहीं किया. खैर, मुझे उम्मीद है आप मामले को सुलझा लेंगे. लेकिन मिसेज स्वामी, आपकी महत्वाकांक्षाएं, आपकी अपेक्षाएं 3 साल की बच्ची की समझ में नहीं आनेवाली हैं. उन्हें उस पर मत थोपिए. इतने घंटे तक आप उसे जो बनाने में लगी हैं- वह सब कुछ आप अपने घर में उसे अपने साथ रखकर भी कर सकती हैं. उसे दीजिए पौष्टिक आहार, जिसे वह जल्दी-जल्दी नहीं, चैन से मज़ा लेकर खाए. 10-12 घंटे सोए. खूब खेले, बच्चा होने का आनंद लूटे, अन्यथा ये तो शुरुआत है. मैं आपको डराना नहीं चाहता, पर आप उसके पूरे नर्वस सिस्टम को ध्वस्त करने में लगी हैं. उसका स्नायुतंत्र एक बार असंतुलित हो गया, तो वह जीवनभर परेशान रहेगी.”

“बस- बस! डॉक्टर! बस! मैं अब ऐसा नहीं करूंगी?” वह सुबकने लगी. अनिल ने पूछा, “तो डॉक्टर, हमें अभी क्या करना चाहिए.”
“मि. स्वामी, अभी तो मेरे विचार से वह एकाध दिन सोकर उठेगी, तो सामान्य हो जाएगी और मिसेज स्वामी- आप तब तक उसके पास बैठकर उससे बातें करते रहिए, जब तक वह जाग न जाए.”
“मगर… मगर वह तो सो रही है.”
‘हां, मगर बच्ची के अवचेतन मन में यह बात जाने दीजिए कि अब उसे बस में बैठकर स्कूल नहीं जाना है. उसे पिकनिक की, घूमने की, खेलने की बातें बताइए, गाने सुनाइए.”
योगिता ने धीरे से बेटी का दायां हाथ अपने हाथ में ले उसे सहलाना शुरू किया- “अंकिता! इस इतवार को कहां चलेगी? पार्क चलेगी कि चिड़ियाघर? अप्पूघर चलेगी? अच्छा, पिंक फ्रॉक पहनेगी कि ग्रीन? ओह! देखो, पापा भी आ गए. अनिल, हम लोग इतवार को कहां चलेंगे?…” और रो पड़ी. अनिल ने धीरे से योगिता को ढाढ़स बंधाते हुए कहा, “बस योगिता, अगर वह जग गई और तुम्हें रोते देखेगी तो और घबरा जाएगी.” दोनों एक-एक स्टूल खींचकर अपने दिल के टुकड़े के जागने के इंतज़ार में बैठ गए. कम से कम वे तो जाग ही गए थे.

आशा अय्यर ‘कनुप्रिया