कहानी- पराई ज़मीन पर उगे पेड़ (Short Story- Parai Zamin Par Uge Ped 2)

“तुम जानते हो तुम्हारा व्यक्तित्व, बोलचाल का तरीक़ा, हर एक के साथ तुम्हारी ज़रूरत से ज़्यादा इंटीमेसी दिखाना सामनेवाले को हर बार ग़लतफ़हमी में डाल देता है. तुम्हारे व्यवहार के धोखे में आकर सामनेवाला अपने आप को तुम्हारी ज़िंदगी में बहुत ज़्यादा इंपॉर्टेंट समझने लगता है. इससे हमारा रिश्ता प्रभावित होता है.” स्वाति बार-बार उसे कहती.

रात में अमृत गैलरी में आकर बेंत की कुर्सी पर बैठ गया. स्वाति को चांद की रोशनी में गैलरी में बैठना बहुत पसंद था. चाहे जितनी रात गहरा जाए, वह दस मिनट तो यहां बैठने का समय निकाल ही लेती थी. अमृत तब जाकर कमरे में सो जाता था, जब स्वाति यहां बैठती थी.
अब जब स्वाति नहीं है, तो अमृत रोज़ यहां आकर बैठता है. जब स्वाति थोड़ी देर गैलरी में बैठने की ज़िद करती थी, तब अमृत खीझ जाता था. लेकिन जब से स्वाति गई है, अमृत रोज़ गैलरी में आकर बैठता है. जाने कितनी देर तक बैठा रहता है, फिर भी नींद नहीं आती, रात नहीं ढलती. लगता है समय जैसे रुक गया है.

अजीब बात है, स्वाति की ओर पीठ करके अमृत कितनी चैन से सोता था, सीधे सुबह ही आंख खुलती थी. लेकिन जब से स्वाति गई है, अमृत को नींद नहीं आती. रातभर पीठ की ओर पलंग पर एक खालीपन-सा चुभता रहता है, तब अमृत स्वाति की ओढ़ी हुई चादर अपने ऊपर कसकर लपेट लेता.
अमृत ने एक सिगरेट सुलगाई और एक लंबा कश लिया. दिन में पूछा गया सवाल अचानक ही अमृत के सामने आकर खड़ा हो गया, ज़मीन पर पेड़ों के बारे में.
शैली के अंदर की ज़मीन पर भी कुछ उग रहा है, वह महसूस कर रहा था. पिछले कई महीनों से ख़ासतौर पर जब से स्वाति गई है, शैली ही अपनी ज़मीन को बहुत ज़्यादा फैलाव दे रही है, एक के बाद एक पेड़ उगाती चली जा रही है…
“तुम जानते हो तुम्हारा व्यक्तित्व, बोलचाल का तरीक़ा, हर एक के साथ तुम्हारी ज़रूरत से ज़्यादा इंटीमेसी दिखाना सामनेवाले को हर बार ग़लतफ़हमी में डाल देता है. तुम्हारे व्यवहार के धोखे में आकर सामनेवाला अपने आप को तुम्हारी ज़िंदगी में बहुत ज़्यादा इंपॉर्टेंट समझने लगता है. इससे हमारा रिश्ता प्रभावित होता है.” स्वाति बार-बार उसे कहती.

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“ऐसा कुछ नहीं है. मैं जानता हूं तुम मेरे लिए क्या हो, मेरे मन में तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता.” अमृत सपाट स्वर में कहता.
“कभी मार्क किया है तुमने, शैली मुझे कैसी नज़र से देखती है? ऐसा लगता है जैसे मुझ पर हंस रही है कि तुम हो ही क्या? तुम्हारे पति के लिए तुम मायने ही क्या रखती हो? उसमें तुम्हें लेकर अपने आप पर इतना ज़्यादा कॉन्फ़िडेंस कैसे डेवलप हो गया अमृत?” स्वाति अब बिफरने लगी थी.
“ऐसा कुछ भी नहीं है. ये स़िर्फ तुम्हारी ग़लत सोच है, जिसे मैं बदल नहीं सकता.” अमृत के पास कहने को कुछ नहीं होता, तो वह स्वाति की सोच को ग़लत बताकर बात वहीं ख़त्म कर देता.
“तुम ग़लत कर रहे हो अमृत. तुम स़िर्फ हमारे रिलेशनशिप के साथ ही धोखा नहीं कर रहे, बल्कि उस लड़की को बढ़ावा देकर उसकी भावनाओं से भी खेल रहे हो.” स्वाति कहने से अपने आप को रोक नहीं पाई.
“मैं किसी के भी साथ ऐसा नहीं करता. तुम्हें तो आदत हो गई है हर एक के साथ मेरा नाम जोड़ने की.”
“मेरी हर एक के साथ तुम्हारा नाम जोड़ने की आदत नहीं है, तुम्हारी आदत है हर किसी के साथ ऐसा रिलेशन डेवलप कर लेने की.” स्वाति कहना चाहती थी, लेकिन तब तक अमृत कमरे से बाहर जा चुका होता था.
स्वाति ने पास ही के शहर में नौकरी करने का निर्णय कर लिया था. उसने किराए का मकान भी ले लिया था. पहले स्वाति हर आठ दिन में अपने घर आ जाती थी, फिर धीरे-धीरे उसने आना कम कर दिया. जब भी आती, अमृत के उगाए हुए पेड़ों के जंगल उसके सामने आ जाते और उसका दम घुटने लगता…

 डॉ. विनिता राहुरीकर
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