कहानी- पराई ज़मीन पर उगे पेड़ (Short Story- Parai Zamin Par Uge Ped 3)

 

कहानी, पराई ज़मीन पर उगे पेड़, Short Story

अमृत की ज़मीन पर उगे आर्या के पेड़ों को वह अपना नसीब मानकर बैठी रहे या ऋषि की ज़मीन पर अपना नया बगीचा बनाए.
क्या ऋषि उम्रभर ऋषि ही रहेगा? या कुछ समय बाद वह अमृत बन जाएगा.

अमृत की भीतरी ज़मीन पर पराए पेड़ों का घना जंगल था. अमृत के साथ रहते-रहते स्वाति को समय-समय पर उन जंगलों के बारे में पता चला है. दूसरों के अंदर पनपते उन पेड़ों के बारे में भी पता चला, जिनके बीज अमृत के व्यवहार से पनपे थे.
पहले अमृत के अंदर स्वाति के मनचाहे पेड़ों का बगीचा था, जिसके सारे पेड़ स्वाति की पसंद के थे. लेकिन एक दिन अचानक आर्या ने स्वाति का भ्रम तोड़ दिया. स्वाति के लिए बगीचा तैयार करने के बहुत पहले से ही अमृत की ज़मीन पर आर्या ने अपने बीज बो दिए थे. उन पेड़ों की जड़ें इतनी अधिक गहरी और मज़बूत थीं कि स्वाति का कोमल बगीचा उखड़ने लगा.

अब तो जब भी स्वाति अमृत की ज़मीन पर उतरती, अपने आप को आर्या के पेड़ों के बीच पाती. आर्या, फिर स्नेह, फिर शैली… अमृत ने अपने अंदर न जाने कितने जंगल बना रखे थे.
अमृत की ज़मीन के उन कंटीले जंगलों में भटकते-भटकते स्वाति थक गई थी. उनके कांटों से छलनी हो गई थी, इसलिए वह दूर चली आई थी. अमृत से दूर, ताकि ताज़ी हवा में खुलकर सांस ले सके.
श्रीकांत को क्या कभी आर्या की ज़मीन पर पराए पेड़ों के जंगल दिखाई नहीं दिए होंगे? क्यों और कैसे श्रीकांत उन जंगलों को इतनी आसानी से सह लेता है? या फिर आर्या श्रीकांत के पहुंचने तक अमृत के जंगलों का रास्ता चतुराई से बंद कर देती है. या आर्या ने अपने जंगलों को दो अलग-अलग हिस्सों में सफ़ाई से बांट रखा है. जब मौक़ा हो अमृत के जंगल में, जब मन हो श्रीकांत के साथ उसकी ज़मीन पर. कोई इतनी सफलतापूर्वक अपने दो हिस्से कैसे कर सकता है? पर कुछ लोग कर लेते हैं, जैसे अमृत.
उसने तो न जाने अपने आप को कितने हिस्सों में बांट दिया है. स्वाति अपने आप को कभी भी अलग-अलग हिस्सों में बांट नहीं पाई. यदि दूसरे पेड़ उगाने हों, तो उसे पहला जंगल पूरा साफ़ करके ज़मीन खाली करनी होगी…
“आ गया सामान?” ऋषि ने अंदर आते हुए पूछा, “सॉरी ज़रा काम से चला गया था, पर तुम तो रुक सकती थीं. शाम को साथ ही में चलते.”
चाय, फिर साथ में डिनर बनाना, बीच-बीच में नोक-झोंक और बातें…

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फिर रात में गैलरी में चांद की रोशनी में बैठकर कॉफी. स्वाति का दिन अच्छा गुज़रा. आजकल ऋषि के साथ ज़िंदगी वैसी ही हल्की-फुल्की और ख़ुशनुमा हो गई है, जैसी शुरुआती दिनों में अमृत के साथ थी. हंसते-खेलते साथ में घर के काम करना, बातें करना… ठंडी-ठंडी छांव के बीच से झरती कच्ची-पक्की गुनगुनी धूप जैसे.
क्या करे स्वाति?
अमृत की ज़मीन पर उगे आर्या के पेड़ों को वह अपना नसीब मानकर बैठी रहे या ऋषि की ज़मीन पर अपना नया बगीचा बनाए.
क्या ऋषि उम्रभर ऋषि ही रहेगा? या कुछ समय बाद वह अमृत बन जाएगा.

अमृत भी पहले-पहले ऋषि जैसा ही था, पर धीरे-धीरे… क्या समय बीतने पर ऋषि भी अमृत बन जाएगा?…
“ये क्या है शैली? हर काम में ग़लती. तुम्हारा ध्यान कहां रहता है आजकल?” अमृत ने बिल शैली के सामने फेंकते हुए कहा, “जाओ, फिर से बनाकर लाओ.”
शैली ग़ुस्से से मुंह फुलाकर अमृत के केबिन से बाहर चली गई. अमृत भुनभुनाता हुआ वापस अपनी कुर्सी पर बैठ गया.

“जब देखो तब बस बैठे-बैठे शीशे के उस पार से यहीं देखती रहती है या फिर केबिन में बैठे रहने के बहाने ढूंढ़ती रहती है. काम में कौड़ी का ध्यान नहीं है. कल इसके आने के पहले इसका टेबल दरवाज़े के सामने से साइड में श़िफ़्ट करवाना पड़ेगा.”
अमृत के मोबाइल की रिंग बजी. आर्या का फ़ोन था. झल्लाकर अमृत ने फ़ोन काट दिया. दो मिनट बाद रिंग फिर बजी.

उसके दो मिनट बाद फिर, अमृत बुरी तरह से चिढ़ गया. फ़ोन रिसीव करके बोला, “मीटिंग में हूं. घर पहुंचकर बात करूंगा.”…

डॉ. विनिता राहुरीकर
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