कहानी- पराई ज़मीन पर उगे पेड़ (Short Story- Parai Zamin Par Uge Ped 4)

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अब तक अमृत अपने बीज पराई ज़मीनों पर उगाता आया था. इसी में उसे अपना पुरुषार्थ सार्थक होते दिखता था. आज तक कोई भी अमृत के उगाए पेड़ों को काटने का दुस्साहस नहीं कर पाया, लेकिन स्वाति ऐसा दुस्साहस कर सकती है. उसकी ज़मीन में अमृत के बीजों को भस्म करने का तेज है और अगर ऐसा हुआ, तो अमृत हार जाएगा और अपनी हार अमृत बर्दाश्त नहीं कर सकता.

पिछले कई महीनों से अमृत देख रहा था स्वाति का व्यवहार बदल रहा है. पहले स्वाति हर आठ-दस दिनों में घर आ जाती थी. दो दिन भी रहती तो अपने बच्चे की तरह घर को दुलारती, अमृत का बिखरा सामान सहेजती, घर आकर अमृत से मिलकर उसके चेहरे पर एक आंतरिक ख़ुशी छलकती रहती थी.
लेकिन अब उन कामों में उसका पहले-सा मन नहीं रहा. दो दिनों के लिए ही आती है और उसमें भी न जाने किससे बात करती रहती है फ़ोन पर. अमृत के पूछने पर टाल जाती है. गैलरी या बरामदे में अमृत से दूर खड़ी होकर किसी से बात करते हुए स्वाति के चेहरे पर वही ख़ुशी छलकती है, वही भाव रहते हैं, जो आर्या से बात करते हुए अमृत के चेहरे पर रहते हैं. पिछले तीन महीनों से स्वाति घर नहीं आई. फ़ोन भी हमेशा अमृत ही करता है और उसके कान महसूस करने लगे हैं, स्वाति के स्वर में धीरे-धीरे गहराती हुई तटस्थता को, उभरती हुई औपचारिकता को…
घर आकर अमृत सीधे गैलरी में जाकर बैठ गया. स्वाति को किसी भी तरह से घर वापस लाना होगा. अमृत जानता है, स्वाति अमृत नहीं है. उसकी ज़मीन पर एक साथ कई पेड़ नहीं उग सकते. अगर वह किसी और के बीजों को उगाने के लिए ज़मीन तैयार कर रही होगी, तो वह पहले अमृत के पेड़ों को जड़-मूल से साफ़ करके ही दूसरे के लिए ज़मीन तैयार करेगी. इसीलिए अमृत स्वाति से मन ही मन घबराता है, चाहे ऊपर से यह बात कभी भी उसने प्रकट नहीं की हो.
और आजकल अमृत साफ़-साफ़ समझ रहा है, देख रहा है- स्वाति के अंदर कुछ तो उग रहा है. शायद उन बीजों का स्रोत अमृत को पता है. एक-दो बार स्वाति के यहां देखा था. तब ज़्यादा देर तक सामना नहीं हुआ था, पर शायद वही होगा. अमृत उस रात बिना खाए ही सो गया, स्वाति की चादर ओढ़कर.
दूसरे दिन शैली ऑफ़िस पहुंची, तो देखा उसका टेबल अमृत के केबिन के सामने से श़िफ़्ट हो चुका है. शैली को समझ में नहीं आ रहा था कि उसने आख़िर ऐसा क्या गुनाह कर दिया है, जो अमृत अचानक ही उससे इतना नाराज़ रहने लग गया.
पहले भी शैली काम में ग़लतियां करती थी, लेकिन अमृत ख़ुद ही करेक्शन कर लेता था. शैली को कुछ नहीं कहता था. जब भी अमृत ऑफ़िस में होता, किसी न किसी बहाने से शैली को अपने केबिन में बुलवाता और घंटों बातें करता रहता. घंटों की इन्हीं बातचीत और अमृत के स्पेशल अटेंशन ने शैली के मन में उसके लिए भावनाएं जगा दीं, तो इसमें शैली का क्या दोष?
क्यों आज तक अमृत अपने व्यवहार से हर समय शैली के मन में यह एहसास जगाता आया है कि वह उसके लिए कुछ ख़ास जगह रखती है और अब जब शैली अमृत के इतने क़रीब आ गई है, तो अमृत क़दम दर क़दम उससे दूर चला जा रहा है. अमृत जब ऑफ़िस पहुंचा, तब शैली नीता के पास बैठकर अपना रोना रो रही थी.

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अमृत भुनभुनाते हुए अपने केबिन में आकर बैठ गया. “ये लड़कियां भी अजीब होती हैं. ज़रा-सा हंस-बोल लो, तो मान बैठती हैं कि सामनेवाले को इनसे प्यार हो गया है. जैसे कि आदमियों को और कोई काम ही नहीं है. किसी से हंसना-बोलना भी गुनाह हो गया है. हंसने-बोलने का लोग ग़लत ही मतलब निकालकर बैठ जाते हैं. चाहे आर्या हो, शैली हो या स्नेहा…” आर्या को पक्का विश्‍वास है कि अमृत के जीवन में आर्या से अधिक कोई महत्व नहीं रखता, स्वाति भी नहीं. परिस्थितिवश आर्या की शादी पहले हो गई, नहीं तो अगर वह अमृत को पहले मिली होती तो अमृत उसी से शादी करता.
इस बात से अमृत भी इनकार नहीं कर सकता कि यदि वह श्रीकांत से पहले आर्या से मिला होता, तो वह उससे शादी कर लेता. यही वजह है कि वह कई बार बुरी तरह से चिढ़ जाने के बाद भी आर्या को छोड़ नहीं पा रहा. शायद कभी छोड़ भी नहीं पाएगा.
आर्या अमृत की इस कमज़ोर नस को पहचान चुकी है. तभी वह अमृत द्वारा झिड़क दिए जाने के बाद भी उसका पीछा नहीं छोड़ती है. लेकिन इन सभी सच के ऊपर एक और सच है, जो अमृत बहुत अच्छे से जानता है और मानता है. आर्या से वह कभी भी शादी नहीं कर सकता और आर्या स्वाति नहीं है. आर्या ही क्या, कोई भी स्वाति की जगह नहीं ले सकता.
आर्या अमृत के साथ से ख़ुश है, क्योंकि पति के अलावा भी एक और पुरुष का उसे अटेंशन मिल रहा है. लेकिन आर्या अगर उसकी पत्नी होती, तो अमृत के ऐसे रिश्ते को वह कभी भी सहन नहीं करती. वह अपने अधिकार की ज़मीन पर किसी दूसरे के पेड़ों को उगते नहीं देख पाती. जैसे स्वाति की ज़मीन पर किसी और के पेड़ों के उगने की आशंका अमृत के जीवन में एक तिलमिलाहट पैदा करती जा रही है. आदमी की फ़ितरत भी अजीब होती है.
अब तक अमृत अपने बीज पराई ज़मीनों पर उगाता आया था. इसी में उसे अपना पुरुषार्थ सार्थक होते दिखता था. आज तक कोई भी अमृत के उगाए पेड़ों को काटने का दुस्साहस नहीं कर पाया, लेकिन स्वाति ऐसा दुस्साहस कर सकती है. उसकी ज़मीन में अमृत के बीजों को भस्म करने का तेज है और अगर ऐसा हुआ, तो अमृत हार जाएगा और अपनी हार अमृत बर्दाश्त नहीं कर सकता.
रात में अमृत गैलरी में बैठ गया. स्वाति से बहुत देर तक बातें करके अभी-अभी उसने फ़ोन रखा था. इन दिनों वह रोज़ ही रात में देर तक स्वाति से बातें करता है. उसे एहसास दिलाता रहता है कि वह उसे कितना चाहता है, उसे स्वाति की कितनी ज़रूरत है. आख़िरकार अमृत ने एक फैसला किया. वो ज़िम्मेदारी अपने सिर पर लेने का, जिससे वह आज तक बचता आया है. वो ज़िम्मेदारी, जिसके लिए स्वाति अब तक तरस रही थी और अमृत उसका बोझ नहीं चाहता था. अब स्वाति टाल रही है, पर अमृत के पास और कोई चारा नहीं है. वो ज़िम्मेदारी ही स्वाति को हमेशा के लिए, हर परिस्थिति में अमृत के साथ बांधकर रख सकती है.
शैली या आर्या तो बहुत आती-जाती रहेंगी, पर स्वाति उसे दोबारा नहीं मिलेगी. अमृत जानता था, इसलिए वह उसे खो नहीं सकता. एक नए बंधन में जकड़कर उसे दोबारा इस घर और अमृत के साथ उसकी ज़मीन पर लाकर बसाना ही होगा. अमृत कल सुबह-सुबह ही स्वाति के पास पहुंच जाएगा. अमृत अंदर जाकर स्वाति की चादर लपेटकर सो गया. अमृत के अंदर की ज़मीन पर स्वाति के पेड़ लहलहा रहे थे.

डॉ. विनिता राहुरीकर
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