कहानी- पराई ज़मीन पर उगे पेड़ 1 (Short Story- Parai Zamin Par Uge Ped 1)

कहानी, पराई ज़मीन पर उगे पेड़, Short Story

“ज़मीन तो अपनी जगह पड़ी रहती है, हवा में उड़ते बीज आकर उस पर गिर जाते हैं. भावनाओं की बारिश में बीज कब अंकुरित हो जाते हैं, ज़मीन को पता ही नहीं चलता.”
अमृत के जवाब पर सामनेवाले ने फिर से सवाल किया, “तो कसूर हवा का है, जो बीजों को उड़ाकर ज़मीन पर गिरा देती है, ये भी नहीं देखती कि किस पेड़ के बीज हैं और किसकी ज़मीन है.”

“कुछ पेड़ अचानक ही ज़मीन पर अपने आप उग आते हैं और ज़मीन में बड़ी गहराई तक अपनी जड़ें जमा लेते हैं. इसमें किसका कसूर है, ज़मीन का या फिर पेड़ों का?”
“न ज़मीन का और न ही पेड़ों का.” अमृत ने अनमने स्वर में उत्तर दिया था.

“ज़मीन तो अपनी जगह पड़ी रहती है, हवा में उड़ते बीज आकर उस पर गिर जाते हैं. भावनाओं की बारिश में बीज कब अंकुरित हो जाते हैं, ज़मीन को पता ही नहीं चलता.”
अमृत के जवाब पर सामनेवाले ने फिर से सवाल किया, “तो कसूर हवा का है, जो बीजों को उड़ाकर ज़मीन पर गिरा देती है, ये भी नहीं देखती कि किस पेड़ के बीज हैं और किसकी ज़मीन है.”
“कसूर हवा का भी नहीं है. उसे तो पता ही नहीं होता कि वह क्या उड़ाकर ले जा रही है और किसकी ज़मीन पर कौन-सा बीज गिरा रही है.” अमृत ने बीयर का खाली मग नीचे रखा और सवाल करनेवाले से विदा लेकर बार से बाहर आ गया. लौटकर ऑफ़िस जाना है. रास्ते में पान मसाले का एक पाउच ख़रीदकर मुंह में डाला.
ऑफ़िस पहुंचते ही शैली से दिनभर के कॉल्स के बारे पूछ-बताकर अमृत अपने केबिन में जाकर बैठ गया. फ़ाइलें देखते हुए, फ़ोन अटेंड करते हुए, वह देख रहा था कि शैली का पूरा ध्यान उसी की ओर था. बहुत दिनों से वह गौर कर रहा था कि शैली के कपड़े दिन-ब-दिन चटकीले होते जा रहे हैं, चेहरे पर मेकअप की परतें बढ़ती जा रही हैं, हाव-भाव बदल रहे हैं.

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अमृत जब तक ऑफ़िस में होता है, शैली किसी न किसी बहाने से उसके आसपास मंडराती रहती है. केबिन के शीशे के दरवाज़े के ठीक उस पार बैठी शैली की आंखें दरवाज़े के इस पार बैठे अमृत पर ही टिकी रहती हैं.

“मे आइ कम इन?” शैली ने पूछा और बिना जवाब का इंतज़ार किए ही जाकर अमृत की सीट के पास खड़ी हो गई और झुककर फ़ाइल दिखाने लगी. डियो और पऱफ़्यूम की मिली-जुली तेज़ गंध अमृत की सांस में भर गई. फ़ाइल के पन्ने पलटते हुए शैली की कोहनी कई बार अमृत के कंधे से छू गई.
पहले शैली दूर खड़ी होती थी. एक-एक इंच पास खिसकते हुए कब अमृत के कंधे तक पहुंच गई, उसे पता ही नहीं चला. पहले वह अपनी कोहनी अमृत के कंधे से छू जाने पर झिझक जाती थी, फिर झिझकना छूट गया.
अब शैली जान-बूझकर अमृत के कंधे, उंगलियों को छूती रहती है. क्या पाना चाहती है शैली अमृत के कंधे को छूकर? शैली कॉफी के बारे में पूछ रही थी…
अमृत ने घड़ी देखी. बीयर पीकर काफ़ी व़क़्त बीत चुका था, उसने हां कह दिया. शैली दो कप कॉफी बना लाई. कॉफी पीते हुए शैली अपने परिवार की द़िक़्क़तों के बारे में बताती रहती थी. अमृत दिलचस्पी से सुनता था. पुरुष दूसरी औरतों के दुख और आंसू नहीं देख सकता, ये उसकी कमज़ोरी है. अमृत में यह कमज़ोरी कुछ ज़्यादा है.
शैली अमृत की यह कमज़ोरी भांप गई है, तभी वह समय मिलते ही अमृत के सामने अपनी परेशानियों का रोना रोने बैठ जाती है. शैली शिद्दत से चाहती है अमृत की उंगलियां उसके आंसू पोंछें और आंसू पोंछते हुए वे गालों से होती हुई शैली के कानों की लटों तक पहुंच जाएं. अमृत की उंगलियों को अपने गालों से कानों तक का सफ़र करवाने के लिए शैली आजकल हर संभव प्रयास कर रही है. दराज़ों को खोलने के बहाने कुर्सी की पीठ की बजाय अमृत के कंधे पर हाथ रख देती है या अमृत की बगल में झूल जाती है.
कॉफी ख़त्म हो चुकी थी. अमृत ने कप नीचे रखा और अपने काम निपटाने चल दिया. वो जानता था शैली यहीं चिपकी रहेगी. न ख़ुद काम करेगी न उसे करने देगी. शैली को आगे के काम के बारे में समझाकर वह निकल गया. शैली का चेहरा उतर गया…

 
डॉ. विनिता राहुरीकर
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