कहानी- विरोध प्रदर्शन 2 (Short Story- Virodh Pradarshan 2)

कहानी- विरोध प्रदर्शन 2, Short Story

“वो डॉक्टर पहले ही कह देता रीवा ले जाओ, तो गुड्डू अब तक ठीक हो जाता, लेकिन डॉक्टर की फीस मारी जाती न. ये लोग मानव सेवा नहीं कर रहे हैं. मानव को लूट रहे हैं. चिकित्सा न हुई, महाजनी हो गई.”
मंगला इतनी निराश है कि उसके चेहरे पर कातरता स्पष्ट दिख रही है, “जी घबरा रहा है, कुछ करो.”
“क्या करूं? कहो तो उस बिजली के खंभे पर अपना सिर पटक दूं.”

वाहनों की चिंघाड़ से चौराहा दहल रहा है. वाहनों के गंधाते तीक्ष्ण धुएं… दोपहर की चिलचिलाती धूप से लोगों के कपोल, कनपटी, कमीज़ें पसीने से भीग रही हैं. ट्रकों-ट्रैक्सियों के चालक बीड़ी-सिगरेट सुलगाकर अपने साथ दूसरों का भी स्वास्थ्य चौपट कर रहे हैं. स्कूलों की छुट्टी हुई है. अस्पताल में भर्ती पिता के लिए दवाइयां ले जा रहा युवक कार का हॉर्न बजाकर व्यग्रता दिखा रहा है. अपनी बेटी को लड़केवालों को दिखाने के लिए दूसरे शहर जा रहा एक परिवार वाहन में असहाय बैठा है. ये लोग व़क्त पर रेलवे स्टेशन नहीं पहुंचेंगे, तो ट्रेन छूट जाएगी. ट्रैफिक पुलिस के जवान डंडा ठोककर भीड़ और वाहनों के निकलने लायक जगह बनाना चाहते हैं, पर जानते हैं नहीं बना पाएंगे.
गुड्डू, “पापा, हॉस्पिटल कब पहुंचेंगे?”
सोमनाथ ने फिर यही उत्तर दिया, “बस बेटा, पहुंचनेवाले हैं.”
देवेन्द्रनगर तहसील में गुड्डू का उपचार चल रहा था. स्थिति बिगड़ने पर डॉक्टर ने रीवा मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया. मामूली हैसियतवाले सोमनाथ कुछ हज़ार में पत्नी मंगला के आभूषण गिरवी रख टैक्सी से इकलौते पुत्र गुड्डू को लेकर रीवा के लिए चल दिए. देवेन्द्रनगर से रीवा जाने के लिए इस शहर के चौराहे से गुज़रना होगा. जाम देखकर सोमनाथ के होश गुम होने को हैं.
मंगला से कहते हैं, “वो डॉक्टर पहले ही कह देता रीवा ले जाओ, तो गुड्डू अब तक ठीक हो जाता, लेकिन डॉक्टर की फीस मारी जाती न. ये लोग मानव सेवा नहीं कर रहे हैं. मानव को लूट रहे हैं. चिकित्सा न हुई, महाजनी हो गई.”
मंगला इतनी निराश है कि उसके चेहरे पर कातरता स्पष्ट दिख रही है, “जी घबरा रहा है, कुछ करो.”
“क्या करूं? कहो तो उस बिजली के खंभे पर अपना सिर पटक दूं.”

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कहकर सोमनाथ कार से उतर गए.
कुछ जानकारी मिलने की उम्मीद में कई बार कार से उतरकर भीड़ के पास जा चुके हैं. उन्होंने लोगों को कहते सुना, “ट्रकवाला तो भाग गया. जाम लगाकर लोगों की दिक़्क़त बढ़ाने से नहीं पकड़ा जाएगा.”
“युद्धस्तर पर विरोध न करो, तो शासन-प्रशासन नहीं सुनता.”
“कर्फ़्यू, जाम, बंद, हड़ताल से समस्याएं हल नहीं होतीं. आप लोग देखोगे, अफ़सर और पुलिसवाले आश्‍वासन देंगे कि सड़क जल्दी से जल्दी बनेगी, ट्रक चालक पकड़ा जाएगा, उसे सख़्त सज़ा मिलेगी. लोग थोड़ी-बहुत बहस कर धरना ख़त्म कर देंगे. फिर कोई ध्यान न देगा आश्‍वासन को अमली जामा पहनाया जा रहा है या नहीं.”
“ठीक कहते हैं. धरना और जाम से होता कुछ नहीं है, लेकिन आजकल जिसे देखो वह जाम, धरना, हड़ताल, घेराव में लगा है. इसी तरह कुछ लोग राजनीति में घुसने के मौ़के बना लेते हैं.”
एक युवक ख़फा हो गया, “ग़ज़ब करते हैं आप. हम लोग राजनीति में घुसने के लिए टनों पसीना बहा रहे हैं? प्रजातंत्र है. हमें अपनी मांग रखने का अधिकार है.”
“मांग रखने का एक तरीक़ा होता है.”
“तरीक़ा बता दीजिए. रोज़ चोरी, डकैती, मर्डर, रेप, एक्सीडेंट हो रहे हैं. नगर निगम सो रहा है. नेता सुनते नहीं. कलेक्टर को दौरे से फुर्सत नहीं. आवाज़ तो उठानी पड़ेगी.”
“लाशें क्यों ख़राब कर रहे हैं? क्रियाकर्म करें. बेचारों को मुक्ति मिले.”
कुछ लोग बोल नहीं रहे हैं, सुन रहे हैं. जिसकी बात सुनते हैं, इन्हें वही बात उचित लगने लगती है.
सोमनाथ जानते हैं लोग उन्हें गंभीरता से नहीं लेंगे, लेकिन व्यथा बताने लगे, “मेरा बच्चा बहुत बीमार है. जल्दी से जल्दी उसे रीवा मेडिकल में भर्ती कराना है. बताइए क्या करूं? इस तरह का धरना क्या व्यावहारिक है? न जाने कौन, कैसे ज़रूरी काम से जा रहा होगा..?”

 

सुषमा मुनीन्द्र

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