कहानी- विरोध प्रदर्शन 3 (Short Story- Virodh Pradarshan 3)

Short Story, Virodh Pradarshan 3

कोई प्रयास, कोई संघर्ष काम न आया. वे किसके विरुद्ध प्रदर्शन करें?
उस डॉक्टर के विरुद्ध, जिसने केस बिगड़ जाने पर रीवा ले जाने की सलाह दी? प्रशासन के विरुद्ध, जिसने समय सीमा में सड़क निर्माण नहीं कराया? फरार ट्रक चालक के विरुद्ध, जो शायद कभी भी न पकड़ा जाए? प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध, जिन्होंने विरोध प्रदर्शन का ग़लत तरीक़ा चुना?

कुछ लोगों ने उन्हें देखा ज़रूर, लेकिन विस्तृत ब्योरा किसी ने नहीं पूछा. सोमनाथ वापस कार में बैठ गए.
गुड्डू ने फिर कहा, “पापा, रीवा चलो. मुझे अच्छा नहीं लग रहा है.”
“थोड़ी देर और. तुम बहादुर बच्चे हो. पानी पीयोगे?”
“नहीं, उल्टी आती है.”
मंगला गुड्डू के बाल सहलाने लगी.
“बच्चे का छोटा-सा मुंह हो गया है. देह में मांस-कपास नहीं बचा. डॉक्टर ने गरम दवाइयों और इंजेक्शन से यह हालत कर दी है.”
सोमनाथ ने आपत्ति की, “अच्छी बात करो मंगला. गुड्डू का दिल बहले.”
मंगला का कंठ भरा है, “मुझसे न होगा.”
सोमनाथ ने गुड्डू को पुचकारा, “याद है गुड्डू, हम लोग एक बार पहले भी जाम में फंस चुके थे. संकरी पुलिया में दो ट्रक आपस में टकराकर इस तरह तिरछे हो गए थे कि रास्ता जाम हो गया था. हम लोग बस में थे. बहुत से लोगों के साथ तुम भी बस से उतर गए थे. झाड़ियों से जंगली फूल तोड़े थे, महुआ बीना था. याद है?”
“हां पापा, मैं बीमार न होता, तो वह जो दुकान दिख रही है, हम लोग वहां बैठकर समोसे खाते.”
“अच्छे हो जाओ, तो ख़ूब सारे समोसे खिलाऊंगा.”
“पढ़ाई भी बहुत करूंगा. बहुत कोर्स हो गया होगा.”
सोमनाथ द्रवित हो गए. अच्छा है कि बच्चे आशावादी और स्वप्नदृष्टा होते हैं, इसलिए गुड्डू जाम की गंभीरता को उस तरह नहीं समझ पा रहा है, जिस तरह वे बेचैन हैं.
“कुछ करो.” मंगला जानती है सोमनाथ कुछ नहीं कर सकते, पर कहे बिना वह रह नहीं पा रही है.
सोमनाथ ने कई रातों से जागी, उनींदी, कुम्हलाई मंगला की हथेली थपकी. वे लाचार मां को यही सांत्वना दे सकते हैं.
“देखता हूं.”


कार से उतरकर उन्होंने दूर तक नज़र डाली. आड़े-तिरछे खड़े वाहन और वाहन.
कौन कहता है भारत गरीबों का देश है? कितने अधिक वाहन हैं इस देश में. जैसे ऑटोमोबाइल के बिना लोग ज़िंदा नहीं रहेंगे!
उन्हें याद आया चतुर्थ और तृतीय श्रेणी कर्मचारियों के साथ एक-दो बार उन्होंने भी धरना प्रदर्शन में भाग लिया था. कुछ समय के लिए जाम लग गया था. नहीं सोचते थे जाम ऐसा अवरोध होता है, जो गतिशीलता को ख़त्म कर देता है. मनुष्य के मस्तिष्क को सुन्न कर हाथ-पैर को जकड़ देता है.
लोग कह रहे हैं, “नगर निरीक्षक, नगर पुलिस अधीक्षक, एस.डी.एम. आ गए हैं. बात चल रही है, लेकिन ट्रैफिक क्लियर होने में घंटा-दो घंटा लग जाएगा.”
वे मानो दीवाने की तरह भीड़ को चीरते हुए चौराहे की ओर बढ़ने लगे. जैसे सत्यापित करना चाहते हैं बात सचमुच चल रही है.
उन्हें ढूंढ़ता हुआ टैक्सी ड्राइवर आ पहुंचा. “साहब, बच्चे की तबीयत बिगड़ रही है.”
सोमनाथ बदहवासी में कार तक पहुंचे. अनियमित सांसों के बीच गुड्डू छटपटा रहा था. सब कुछ ख़त्म करने के लिए कुछ क्षण बहुत होते हैं. गुड्डू की गर्दन एक ओर तिरछी हो गई.
दुलारे पुत्र की बीच मार्ग में हुई खानाबदोश मृत्यु पर उनका कलेजा फटने लगा. चीखना चाहते थे, चीख न पाए. अलबत्ता चीख मारकर मंगला बेहोश हो गई.
सोमनाथ कभी मृत पुत्र को देखते, तो कभी बेहोश पत्नी को. यह बच्चा तो जीवन और मृत्यु का अर्थ ठीक से नहीं जानता था. तीन साल पहले इसकी दादी का स्वर्गवास हुआ था.
यह पूछ रहा था, ‘पापा, दादी कब तक मरी रहेंगी? ज़िंदा कब होंगी?’
वो मासूम नहीं जानता था कि मरनेवाले फिर ज़िंदा नहीं होते.
बेचारा… कोई प्रयास, कोई संघर्ष काम न आया. वे किसके विरुद्ध प्रदर्शन करें?
उस डॉक्टर के विरुद्ध, जिसने केस बिगड़ जाने पर रीवा ले जाने की सलाह दी? प्रशासन के विरुद्ध, जिसने समय सीमा में सड़क निर्माण नहीं कराया? फरार ट्रक चालक के विरुद्ध, जो शायद कभी भी न पकड़ा जाए? प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध, जिन्होंने विरोध प्रदर्शन का ग़लत तरीक़ा चुना?
वे मृत पुत्र को देखते हैं. बेहोश पत्नी को देखते हैं. फिर जाम को देखते हैं. उन्हें लग रहा था एक ओवरलोडेड ट्रक अभी-अभी उनके ऊपर से गुज़री है और वे सूर्य की आंच से पिघल रही सड़क में रेशा-रेशा छितरा गए हैं.

 

 

 

 

सुषमा मुनीन्द्र

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