कहानी- अंबर की नीलिमा 3 (St...

कहानी- अंबर की नीलिमा 3 (Story Series- Ambar Ki Neelima 3)

“अंबर, रुक जाओ.”

अंबर ने पलटकर पीछे देखा. पलभर ठिठकने के बाद वह पुन: तेज़ क़दमों से गेट की ओर बढ़ने लगा.

“अंबर, प्लीज़ रुक जाओ. अंबर के बिना नीलिमा का कोई अस्तित्व नहीं है.” नीलिमा पूरी शक्ति से अंबर की ओर दौड़ पड़ी.   अंबर के बढ़ते क़दम ठिठक गए. उसने एक बार फिर पीछे पलटकर देखा.   

“मम्मी की ग़लती के लिए मुझे इतनी बड़ी सज़ा मत दो. जीवन के अंतिम पलों तक वे अपने आपको माफ़ नहीं कर पाई थीं. अगर आज वे होतीं, तो तुमसे हाथ जोड़कर माफ़ी मांग लेतीं.” नीलिमा ने क़रीब पहुंच फफकते हुए अपने दोनों हाथ जोड़ दिए.

“क्या? आंटी इस दुनिया में नहीं हैं?” अंबर के होंठ हिले.

“मम्मी, यह क्या बोल रही हो?” नीलिमा ने मम्मी के मुंह पर हाथ रख दिया. नीलिमा जब अपने कमरे में पहुंची, तो अंबर वहां नहीं था. नीलिमा फूट-फूटकर रो पड़ी.

दो दिन बाद नीलिमा एग्ज़ाम देने पहुंची. उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि अंबर का सामना कैसे करेगी, किंतु अंबर तो एग्ज़ाम देने ही नहीं आया. पेपर देकर नीलिमा सीधे उसके कमरे पर पहुंची, तो पता लगा कि वह अपने घर पलिया चला गया है.

अंबर के अचानक चले जाने से नीलिमा का मन घबरा रहा था. मन में अनेकों झंझावत लिए वह घर लौट आई. अंबर के दिए गए नोट्स उसकी मेज़ पर ही रखे थे. उस दिन अंबर के अपमानित होकर चले जाने के बाद नीलिमा ने उनको उठाकर भी नहीं देखा था. उसने कांपते हाथों से नोट्स उठाए, किंतु पहला पन्ना खोलते ही उसकी चेतना जड़ हो गई. ख़ूबसूरत अक्षरों में लिखे एकलौते वाक्य ने उसके अस्तित्व को ही हिला दिया था. ‘फाइनल एग्ज़ाम में प्रथम स्थान पाने की अग्रिम शुभकामनाएं.’ अंबर के हाथों से लिखे अक्षर किसी नश्तर की भांति नीलिमा की आत्मा को बींधे जा रहे थे. इसका मतलब अंबर

जान-बूझकर पेपर देने नहीं आया था. नीलिमा का प्रथम स्थान सुरक्षित करने के लिए उसने अपना करियर ही बर्बाद कर डाला था. नीलिमा को अपने वजूद से ही घृणा होने लगी. क्रोध से फुंफकारती हुई वो बाहर आई और मम्मी को क्या-क्या नहीं कह डाला था उसे ख़ुद याद नहीं.

पूरी बात जान मम्मी भी सन्न रह गईं. उनकी बातों से आहत हो अंबर ऐसा क़दम उठा लेगा, इस बात की उन्हें कल्पना भी नहीं थी. उनकी आंखें भीग गईं. अगले ही दिन मम्मी नीलिमा को लेकर पलिया पहुंची, तो वहां दूसरा आघात प्रतीक्षा कर रहा था. अंबर के माता-पिता की काफ़ी पहले मृत्यु हो गई थी. तीन दिन पहले अचानक वह अपनी ज़मीन-जायदाद कौड़ियों के भाव बेच विदेश चला गया था. नीलिमा ने उसे ढूंढ़ने की हर संभव कोशिश की, लेकिन असफल रही.

धीरे-धीरे बारह वर्ष बीत गए. नीलिमा अब एक मल्टीनेशनल बैंक में अधिकारी थी.  स्नो-स्कीइंग का उसे बचपन से शौक़ था. वह हर साल स्कीइंग करने कुफरी ज़रूर आती. पिछले दो वर्षों से वह यहां की चैंपियन थी. नीलिमा को याद आ रहा था कि एक दिन अंबर ने बताया था कि उसके पूर्वज पंजाब से ‘पलिया’ आए थे. पंजाब में अपने नाम के आगे अपने गांव का नाम जोड़ने का रिवाज़ है, इसलिए उसने नाम अंबर राज के आगे ‘पलिया’ जोड़कर उसे ए. आर. पलिया कर लिया था. इस नाम को सुन नीलिमा को आभास भी नहीं हुआ था कि वह अंबर है, किंतु कुफरी में उस अंजान मददगार के मुंह से निकले शब्दों ‘अपने आप को संभालना सीखो, क्योंकि हर जगह तुम्हें संभालने के लिए मैं मौजूद नहीं रहूंगा…’  ने उसकी यादों को ताज़ा कर दिया था.

उसका नाम प्रतियोगियों की लिस्ट में देख अंबर ने एक बार फिर उसका प्रथम स्थान सुरक्षित करने के लिए इतना बड़ा बलिदान दिया था. वह बिना कुछ कहे जिस तरह चला गया था, उससे स्पष्ट था कि वह अभी तक आहत है. नीलिमा का कलेजा बैठा जा रहा था. वह अंबर को पाकर दोबारा उसे खोना नहीं चाहती थी.  नीलिमा जिस समय एयरपोर्ट पहुंची अंबर अंदर जाने के लिए आगे बढ़ रहा था. उसे देखते ही वह पुकार उठी, “अंबर, रुक जाओ.”

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अंबर ने पलटकर पीछे देखा. पलभर ठिठकने के बाद वह पुन: तेज़ क़दमों से गेट की ओर बढ़ने लगा.

“अंबर, प्लीज़ रुक जाओ. अंबर के बिना नीलिमा का कोई अस्तित्व नहीं है.” नीलिमा पूरी शक्ति से अंबर की ओर दौड़ पड़ी.   अंबर के बढ़ते क़दम ठिठक गए. उसने एक बार फिर पीछे पलटकर देखा.

“मम्मी की ग़लती के लिए मुझे इतनी बड़ी सज़ा मत दो. जीवन के अंतिम पलों तक वे अपने आपको माफ़ नहीं कर पाई थीं. अगर आज वे होतीं, तो तुमसे हाथ जोड़कर माफ़ी मांग लेतीं.” नीलिमा ने क़रीब पहुंच फफकते हुए अपने दोनों हाथ जोड़ दिए.

“क्या? आंटी इस दुनिया में नहीं हैं?” अंबर के होंठ हिले.

“हां, वे तुमसे माफ़ी मांगने तुम्हारे घर पलिया तक गई थीं, मगर तुम वहां से जा चुके थे. मम्मी को जब पता चला कि मैं ख़ुद तुम्हें फर्स्ट आते देखना चाहती थी, तो वे बहुत रोई थीं.”

“क्या कहा? तुम ख़ुद मुझे फर्स्ट आते देखना चाहती थी?” अंबर तड़प उठा. उसकी आंखों में थर्ड ईयर की क्लास का वह दृश्य कौंध उठा, जब हेड ऑफ डिपार्टमेंट मिसेज़ डिसूज़ा ने नीलिमा को डांटते हुए कहा था कि वह टाइम मैनजमेंट सीखे, ताकि एग्ज़ाम में साढ़े चार की बजाय पूरे पांच प्रश्‍नों का उत्तर लिख सके.

भयानक तूफ़ान के बाद जैसे कुहासा हट गया हो. अंबर नीलिमा के कंधों को पकड़ उसे झिंझोड़ते हुए चीख पड़ा, “इसका मतलब तुम जान-बूझकर साढ़े चार प्रश्‍न ही हल करती थी, ताकि मैं प्रथम आ सकूं.”

नीलिमा ने कोई उत्तर नहीं दिया. उसने अपनी आंखें झुका लीं, किंतु अंबर ने उसके चेहरे को अपने हाथों में भर लिया और उसकी आंखों में झांकते हुए भर्राये स्वर में बोला, “इतना बड़ा बलिदान और मुझे ख़बर तक नहीं होने दी?”

“बलिदान तो तुमने भी किया था और मुझे बताया तक नहीं. यह भी नहीं सोचा कि अंबर के बिना नीलिमा कितनी अधूरी है.” नीलिमा की आंखों से अश्रुधार बह निकली.

“नीलिमा, अगर हो सके, तो अंबर को उस गुनाह के लिए माफ़ कर दो, जो उसने तुमसे दूर जाकर किया है.” अंबर का स्वर कांप उठा.

नीलिमा किसी लता की भांति अंबर के चौड़े सीने से लिपट गई. उसके आंसू अंबर को भिगोए जा रहे थे. बारह वर्षों की दूरी मिट चुकी थी. कुछ देर बाद उसने सिसकते हुए कहा, “अंबर, वादा करो कि कल चैंपियनशिप में तुम जीतने की पूरी कोशिश करोगे.”

“तुम्हें भी वादा करना होगा कि तुम हारोगी नहीं.” अंबर ने एक बार फिर नीलिमा के चेहरे को अपने दोनों हाथों में भर उसकी आंखों में झांका.

“वादा रहा.” सिसकियां भरते हुए नीलिमा मुस्कुरा उठी.

एक-दूजे को जीत का तोहफ़ा देने दो प्रेमी वापस लौट पड़े. अंबर में मुस्कुराता हुआ सूर्य दोनों के मिलन का साक्षी था.

Sanjiv Jaiswal

संजीव जायसवाल ‘संजय’

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