कहानी- अंतिम भविष्यवाणी 2 (Story Series- Antim Bhavishyavani 2)

 

वे कुछ कहने-सुनने को तैयार नहीं थे, मगर चन्द्रचूड़ महोदय ऐसे चिन्तित लोगों से बातचीत करना चाहते थे. उनके काम करने का तरीका जासूसों जैसा न होकर चिकित्सक जैसा था, वह भी मनोचिकित्सक जैसा.
उन्होंने इन दस लोगों को समझाया, “अगर आप सहयोग देंगे, तो हो सकता है कि हम उस व्यक्ति को पकड़ लें. मैं जानता हूं तथा आप सब भी जानते हैं कि मृत्यु अटल सच है, अत: उससे बचना या डरना समझदारी नहीं है?’’

शहर में अफ़रा-तफ़री का माहौल था. खोजी पत्रकारों ने खोज-खोजकर लोगों को ढू़ंढ निकाला, जिन्हें फ़ोन आए थे. अटकलें लगाई जा रही थीं कि अब किसकी बारी है?
तभी नगर में अफवाह फैली कि प्रसिद्ध उद्योगपति श्री मिन्हास राजधानी के एक बड़े हृदय रोग संस्थान में भरती हो गए हैं. हालांकि उन्हें कोई तकलीफ़ नहीं थी, मगर हितैषी का फ़ोन आया और उसने कहा कि उनकी मृत्यु हृदयगति रुकने से चौबीस जून को सुबह दस बजे हो जाएगी. दहशत व एहतियात के तौर पर उन्होंने हृदय रोग संस्थान के इन्टेंसिव केयर (सघन चिकित्सा कक्ष) में पांच दिन पहले ही कमरा ले लिया था.
डॉक्टरों की एक टीम ने सबसे वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट की अध्यक्षता में उनका पूरा चेकअप करके उन्हें हृदय रोग के कोई लक्षण न होने का प्रमाणपत्र भी ज़ारी कर दिया था, फिर भी श्री मिन्हास ने अस्पताल में रहना ज़रूरी समझा तथा तेईस जून की रात से चार-चार घंटे के लिए एक-एक डॉक्टर को अपनी देखभाल हेतु फ़ीस देकर रख लिया.
मगर सारे किए-कराए पर तब पानी फिर गया, जब चौबीस जून को ठीक दस बजे डॉक्टरों की टीम की मौजूदगी में उनके दिल ने धड़कना बंद कर दिया और उन्हें बचाने की डॉक्टरों की सभी कोशिशें नाकाम हो गईं.
हर तरफ़ बेबसी-बेकसी का माहौल था. किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. कोई कह रहा था कि यह आकाशवाणी हो रही है, मगर आकाशवाणी टेलीफ़ोन से…
आख़िर थक-हारकर पुलिस ने हाथ खड़े कर दिए. केस सीबीआई को सौंप दिया गया. सीबीआई ने शीघ्र ही अपने जासूस चारों ओर फैला दिए. मगर केस का कोई ओर-छोर पता नहीं लग रहा था. टेलीफ़ोन एक्सचेंज ने सभी नम्बरों पर विजिलेंस लगा दी थी. उपभोक्ताओं को बतलाया गया था कि कोई ऐसा फ़ोन आते ही तारे के चिह्न वाला बटन दबाएं, तो एक्सचेंज का कम्प्यूटर चौकस होकर फ़ोन करनेवाले के नम्बर को रिकॉर्ड कर लेगा, मगर कोई सुराग नहीं लगा. एक तो फ़ोन आने कम हो गए थे, दूसरे भविष्यवक्ता चौकन्ना हो गया था. वह पब्लिक बूथ प्रयोग में ला रहा था. पब्लिक बूथों पर पुलिस की निगरानी रखी जाने लगी. मगर नतीज़ा वही-ढाक के तीन पात.
आखिर सीबीआई ने अपने वरिष्ठ सेवानिवृत्त जासूस पं. चन्द्रचूड़ चिन्तामणि पाणिग्रही की सेवाएं लेने का फैसला लिया. श्री चन्द्रचूड़ अनेक जटिल केसों को सुलझा चुके थे. उन्होंने आते ही सारे हालात का जायज़ा लिया. जब कोई सूत्र हाथ नहीं लगा, तो उन्होंने उन दस लोगों को चुन लिया, जिनको सबसे बाद में टेलीफ़ोन आए थे. फिर वे हर किसी के घर जाकर उनसे मिले. लोग भड़के हुए थे. वे कुछ कहने-सुनने को तैयार नहीं थे, मगर चन्द्रचूड़ महोदय ऐसे चिन्तित लोगों से बातचीत करना चाहते थे. उनके काम करने का तरीका जासूसों जैसा न होकर चिकित्सक जैसा था, वह भी मनोचिकित्सक जैसा.
उन्होंने इन दस लोगों को समझाया, “अगर आप सहयोग देंगे, तो हो सकता है कि हम उस व्यक्ति को पकड़ लें. मैं जानता हूं तथा आप सब भी जानते हैं कि मृत्यु अटल सच है, अत: उससे बचना या डरना समझदारी नहीं है?’’
धीरे-धीरे उन्होंने अपने तय किए गए फार्मूले पर काम करना शुरू कर दिया. उन्होंने उन लोगों से फ़ोन आने से दस दिन पहले मिले लोगों की सूची बनाने को कहा. उन लोगों ने वह सूची बना दी थी, मात्र एक व्यक्ति को छोड़कर. वह था लाला घसीटाराम, भविष्यवाणी के मुताबिक उसके मरने में कुल बीस दिन बचे थे, अत: वह बहुत घबराया हुआ तथा गमगीन था. पं. चन्द्रचूड़ अब इस सूची को अपनी खोजी नज़रों से देखने लगे.
उन दस लोगों में सात व्यक्तियों में कुछ समानताएं थीं. एक तो अधिकांश लोग अमीर थे तथा चालीस से पचपन साल की उम्र के थे, दूसरा उनमें से छह व्यक्ति शहर के प्रसिद्ध जिम के सदस्य थे. असल में यह जिम, जिम कम क्लब ज़्यादा था. कुछ लोगों का ख़्याल था कि जिम की आड़ में यह अय्याशी का अड्डा था. इसका नाम भी इसकी बदनामी या शोहरत में इज़ाफ़ा करता था.
इस जिम का नाम था पल्सेटिंग हार्ट जिम. इस जिम के मालिक दो दोस्त थे. मिस्टर परेरा तथा कर्नल सिंह. दोनों अविवाहित थे तथा शहर में सनकी लोगों के सिरमौर कहे जाते थे. कर्नल सिंह जहां रंगीन तबीयत के आदमी थे, वहीं मिस्टर परेरा बेहद शुष्क व्यक्तित्व के स्वामी थे. कर्नल सिंह को ख़ूबसूरत औरतों से घिरे रहना पसंद था, वहीं परेरा औरतों से दूर भागते थे. मिस्टर परेरा यूं शुष्क प्रकृति के व्यक्ति थे, मगर वे हर शाम अपने एक अन्य मित्र डॉ. जोज़फ़ के घर शतरंज खेलने ज़रूर जाते थे तथा क्लब की सदस्यता प्राप्त करनेवाले व्यक्ति की शारीरिक जांच भी इन्हीं डॉ. जोज़फ़ द्वारा की जाती थी. यह जिम अपने अनोखे कार्यक्रमों तथा अजीबो-गरीब नियमों की वजह से भी (कु)ख्यात था.
इसकी सदस्यता हेतु न केवल मोटी फ़ीस वसूली जाती थी, अपितु अनेक शर्तें भी सदस्यों पर लादी जाती थीं. मगर फिर भी इसकी सदस्यता हेतु लंबी वेटिंग लिस्ट हर समय बनी रहती थी. पं. चंद्रचूड़ ने इस क्लब की काफ़ी खोजबीन की, मगर कोई सूत्र हाथ नहीं लगा. शहर के सभी आला अफ़सर भी इसके सदस्य थे तथा शहर के अनेक संभ्रान्त व्यक्ति भी इसके सदस्य थे. अत: उन पर हाथ उठाना संभव नहीं था.
पं. चंद्रचूड़ ने अब तक मर चुके लगभग बीस लोगों की भविष्यवाणी सुनकर मरनेवाले लोगों के बारे में तफतीश आरंभ कर दी. यहां भी कुछ संदिग्ध तथ्य सामने आए. एक तो यह कि मरनेवालों में से पांच व्यक्तियों के बारे में भविष्यवाणी ग़लत निकली थी, कोई उस समय नहीं मरा था, जो समय बतलाया गया. कोई एक दिन या दो दिन पीछे मरा था, तो कोई किसी अन्य तरीके से मरा था. पं. चन्द्रचूड़ ने अपने सहयोगी युवा पुलिस इन्सपेक्टर विनय मराठे को इनकी जांच सौंप दी.
इस कर्मठ अधिकारी ने तीन मामले शीघ्र सुलझा कर दोषी व्यक्तियों को गिऱफ़्तार कर लिया, मगर इन दोषी व्यक्तियों ने कहा कि पुलिस अपनी अकर्मण्यता छुपाने के लिए उन्हें फंसा रही है.

– डॉ. श्याम

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