कहानी- अंतिम भविष्यवाणी 3 (Story Series- Antim Bhavishyavani 3)

हर आने-जाने वाले लोगों पर नज़र रखी जा रही थी. मगर नतीज़ा वही ढाक के तीन पात. इस बीच तीन और लोगों की मृत्यु भविष्यवाणी द्वारा बतलाए समय पर हो चुकी थी. मौत का तरीका भी वही था, जो फ़ोन पर बताया गया था. वे तीनों भी डॉक्टर जोज़फ़ के मरीज़ थे तथा मरने से चालीस-पैंतालीस दिन पहले डॉक्टर से मिले थे.

छानबीन किसी नतीज़े पर नहीं पहुंच रही थी. चंद्रचूड़ सिगार पर सिगार फूंक रहे थे. तभी उन्हें एक और सूत्र हाथ लगा कि न केवल धमकी या भविष्यवाणी प्राप्त लोग जिम के सदस्य थे, अपितु मिस्टर मल्होत्रा जिनकी मृत्यु से यह केस उजागर हुआ था, वह भी डॉ. जोज़फ़ से चेकअप करवा चुके थे. अत: अब चन्द्रचूड़ ने अपना ध्यान, इस डॉक्टर पर केन्द्रित किया.
सूचनाओं के अनुसार इस डॉक्टर का नाम था डॉ. गेब्रिल जोज़फ़, वह लगभग पचास साल से इस शहर में प्रैक्टिस कर रहा था. वो काफ़ी भला, सहृदय तथा क़ाबिल डॉक्टर था. कई दिन से डॉक्टर की निगरानी ज़ारी थी, मगर कोई संदिग्ध बात नज़र नहीं आई. डॉक्टर न केवल भले व्यक्ति थे, बल्कि अनेक ग़रीब मरीज़ों का इलाज नि:शुल्क करते थे. उनकी दिनचर्या में सुबह-शाम सैर, व्यायाम, फिर सारा दिन अपने क्लीनिक के काम. क्लीनिक उनकी कोठी के ही अहाते में था. डॉक्टर की आयु सत्तर वर्ष से ऊपर थी, मगर वे अच्छे स्वास्थ्य तथा क़द-काठी की वजह से मात्र पचास-पचपन के लगते थे. उनकी पत्नी तथा तीनों सन्तान इंग्लैंड जाकर रह रहे थे. उनका टेलीफ़ोन टेप किया जाने लगा. हर आने-जाने वाले लोगों पर नज़र रखी जा रही थी. मगर नतीज़ा वही ढाक के तीन पात. इस बीच तीन और लोगों की मृत्यु भविष्यवाणी द्वारा बतलाए समय पर हो चुकी थी. मौत का तरीका भी वही था,
जो फ़ोन पर बताया गया था. वे तीनों भी डॉक्टर जोज़फ़ के मरीज़ थे तथा मरने से चालीस-पैंतालीस दिन पहले डॉक्टर से मिले थे.
अब चन्द्रचूड़ ने और देर न करके डॉक्टर से पूछताछ का मन बना लिया. उन्होंने पुलिस के इन्स्पेक्टर जनरल से बात की और एक दिन सादी वर्दी में पुलिस कर्मी, डॉक्टर को चन्द्रचूड़ के पास ले आए. दो दिन लगातार पूछताछ के बाद भी कुछ सूत्र हाथ नहीं लगा. डॉक्टर काफ़ी सभ्य, मृदुभाषी, नेक इन्सान लगे थे चन्द्रचूड़ को, मगर उनकी छठी इन्द्रिय अभी भी शक की सूई डॉक्टर की तरफ़ घुमा रही थी, पर केवल शक के आधार पर डॉक्टर को गिऱफ़्तार करना न केवल कठिन था, अपितु इससे डॉक्टर की जान को ख़तरा भी हो सकता था.
फिर भी चन्द्रचूड़ ने डॉक्टर को शहर से बाहर न जाने की चेतावनी दे दी थी. उनका पासपोर्ट भी रखवा लिया था.
खोजी पत्रकार शिकारी कुत्तों की तरह इस सन्दर्भ में हर ख़बर को सूंघ रहे थे. जाने कैसे, एक सांध्य अख़बार ने डॉक्टर जोज़फ़ से पूछताछ की ख़बर छाप दी थी. बस फिर क्या था, आनन-फानन में यह ख़बर आग की तरह सारे शहर में फैल गई. इससे पहले कि डॉक्टर जोज़फ़ की सुरक्षा का कोई ठोस इंतज़ाम होता, गुस्साए रिश्तेदारों ने तथा दंगाई भीड़ ने डॉक्टर की कोठी को घेर लिया. डॉक्टर ने दरवाज़ा अन्दर से बंद कर लिया तथा पुलिस को सूचित किया. मगर पुलिस के आने से पहले लोगों ने डॉक्टर की कोठी को आग लगा दी थी. डॉक्टर खिड़की खोलकर चिल्ला रहा था, ‘‘मेरी चाबी गुम हो गई है. प्लीज, दरवाज़ा तोड़कर मुझे बाहर निकालो. मैं बेकसूर हूं.’’ गुस्साई भीड़ ने खिड़की पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए.
चन्द्रचूड़ वहां पहुंच गया था. मगर पुलिस अभी तक नहीं पहुंची थी. कोठी पर तैनात मात्र दो सिपाही गुस्साई भीड़ को काबू करने में असमर्थ थे. उसने लोगों को समझाने का प्रयत्न किया. मगर उसकी बात कोई नहीं सुन रहा था. फिर उसने देखा, डॉक्टर ऊपर वाले कमरे में खड़ा अपने सेलफ़ोन पर किसी से बातें कर रहा था. घर को आग ने बुरी तरह जकड़ लिया था और डॉक्टर जोज़फ़ अपने ही घर में जल कर मर गए थे. जैसा ऐसे हालात में होता है. पुलिस ने कुछ लोगों को दंगा फैलाने के अपराध में गिऱफ़्तार कर लिया था और बात यहीं ख़त्म हो गई.
चन्द्रचूड़ उदास से अपने होटल के कमरे में बैठे थे. वे स्वयं को डॉक्टर का हत्यारा समझ रहे थे और केस भी अभी सुलझा कहां था?

– डॉ. श्याम
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