कहानी- अपरिभाषित 1 (Story Series- Aparibhashit 1)

“कैसे हो सुमित!” उसकी मधुर आवाज़ खनकी. मेरा जवाब सुने बिना ही जैसे कि उसकी आदत थी, उसके मन में जो कुछ आता गया, वह बोलती गई.

“कमज़ोर हो गए हो, बीमार रहे हो क्या? अपना ध्यान नहीं रखा होगा. मशीनों के साथ उलझे रहते होगे? अकेले थे? बातें किससे करते थे?”

आख़री वाक्य कहते-कहते उसकी आवाज़ में स्पन्दन आ गया. सोचा, कह दूं ‘बहुत अकेला हूं वनिता तुम्हारे बिना. कोई दोस्त आए-जाए… क्या फ़र्क़ पड़ता है. तुम तो लुप्त हो गई न अकेला छोड़कर, मेरी नज़रें उसकी मांग में चमकते हुए सिन्दूर पर अटकी हुई थीं. वनिता की शिकायतें अभी समाप्त नहीं हुई थीं.

 

मुझे देखकर वह एकदम खिल उठी, पहले की तरह.

“सुमित! तुम! कहां चले गए थे तुम? अब कहां से आ रहे हो? मेरा तुम्हें कभी ध्यान नहीं आया?”

वह एक ही सांस में न जाने क्या-क्या कहती जा रही थी और मैं अपलक उसे देख रहा था. व़क़्त इतना भी बेरहम नहीं था. वह तो ज़रा भी नहीं बदली थी. वह जलन जो न जाने कब से अनदेखे प्रतिद्वन्द्वी से हो रही थी, कहीं लुप्त-सी हो गई.

वह किसी की है, उसके तन-मन पर, ज़िन्दगी पर किसी अन्य का अधिकार है, मेरे साथ तो शायद यूं ही बात कर लेती थी- यह सोच थी जो घने कोहरे की तरह मेरे अस्तित्व पर छाई हुई थी और मेरे हृदय में पल्लवित प्यार की कोंपल, जो बढ़कर वृक्ष में परिवर्तित हो चुकी थी, को ठिठुरा रही थी. पर वनिता की सरल हंसी की धूप में कोहरा उड़ गया, पत्ती-पत्ती बसन्त के आगमन पर खिल उठी.

“अरे! यहीं खड़े रहोगे? अन्दर आओ न.” यह क्या? उसकी आंखें नम. पर वह तो हंस रही थी. और शायद मेरी ही तरह भावातिरेक से हल्का-सा कांप भी रही थी.

मैं अभिभूत-सा उसके पीछे-पीछे चलता हुआ ड्रॉइंगरूम में जाकर बैठ गया. किसी से कुछ भी कहते नहीं बन पा रहा था. एक अजीब से आनन्द के सागर में मैं डूब-उतरा रहा था, शायद… वो भी. हालांकि उसने अपनी भावनाएं स्पष्ट शब्दों में मेरे लिए कभी भी अभिव्यक्त नहीं की थीं, फिर भी मुझे हमेशा यही लगता रहा था कि जो मुझे महसूस होता है, वही उधर, उसके हृदय में भी प्रतिबिम्बित होता है.

“कैसे हो सुमित!” उसकी मधुर आवाज़ खनकी. मेरा जवाब सुने बिना ही जैसे कि उसकी आदत थी, उसके मन में जो कुछ आता गया, वह बोलती गई.

“कमज़ोर हो गए हो, बीमार रहे हो क्या? अपना ध्यान नहीं रखा होगा. मशीनों के साथ उलझे रहते होगे? अकेले थे? बातें किससे करते थे?”

आख़री वाक्य कहते-कहते उसकी आवाज़ में स्पन्दन आ गया. सोचा, कह दूं ‘बहुत अकेला हूं वनिता तुम्हारे बिना. कोई दोस्त आए-जाए… क्या फ़र्क़ पड़ता है. तुम तो लुप्त हो गई न अकेला छोड़कर, मेरी नज़रें उसकी मांग में चमकते हुए सिन्दूर पर अटकी हुई थीं. वनिता की शिकायतें अभी समाप्त नहीं हुई थीं.

“मेरी शादी पर भी नहीं आए. मैं इन्तज़ार करती रही. तुम्हारी तरह तो कोई नहीं करता. ख़ैर!”

कैसे कह दूं- ‘वनिता अपनी बर्बादी का तमाशा देखने आता क्या?’

पर उससे क्या शिकायत? कब उसने कुछ भी ऐसा कहा था, जिससे मैं कह सकूं कि हमारे बीच में फलां रिश्ता था या हो सकता था. वह मेरे साथ हंस-बोल लेती थी, इसका अभिप्राय यह तो नहीं कि मैं उससे शादी के सपने सजाने लगूं या उससे जलूं, जिसे उसे पाने की ख़ुशक़िस्मती हासिल हुई.

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मेरे सपनों पर… हां, सपने ही कहूंगा, क्योंकि वे हक़ीक़त में कभी बदल ही नहीं पाए. वैसे वे कभी हक़ीक़त में बदल पाएंगे, ऐसा सोचने का भी शायद कभी मैंने साहस नहीं किया था. मेरे सपनों पर, मेरी सोच पर क्यों एकाधिकार उस लड़की का हो गया था, जो या तो इतनी भोली थी, जिसे अपने दिलो-दिमाग़ का पता ही नहीं था या जान-बूझकर अपनी और दूसरों की भावनाओं को न समझने का अभिनय करती थी.

वनिता खन्ना साहब की, जो कि शहर के बहुत बड़े उद्योगपति थे, सबसे छोटी सन्तान थी. बड़ी बेटी दिल्ली के एक प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने में ब्याही गई थी. बड़ा बेटा अमेरिका में व्यवस्थित था. और मैं… खन्ना साहब की फर्म में इंजीनियर था. मेरी पृष्ठभूमि गांव की थी. शहर में निवास ढूंढ़ने में थोड़ी द़िक़्क़त आई तो खन्ना साहब ने अपने ही बंगले में दो कमरे मुझे रहने के लिए दे दिए.

यहीं पर मेरी मुलाक़ात उस हंसती-खिलखिलाती, मस्त पहाड़ी नदी की सादगी, ताज़गी और चुलबुलापन लिए उस लड़की से हुई, जिसने मेरी रूखी-सूखी मशीनी ज़िन्दगी को एक कविता बना दिया था. बी.ए. करने के पश्‍चात् वह इंटीरियर डेकोरेशन का कोर्स कर रही थी. मैंने पाया कि वह अत्यधिक मेधावी थी. लगभग हर विषय पर वह अपने विचारों को अभिव्यक्त कर सकती थी.

मैं यह तो नहीं जानता था कि यह लम्बी, छरहरी, काली आंखों और घने-लम्बे काले बालों वाली लड़की का शारीरिक आकर्षण था या उसके निष्कपट दिल की ख़ूबसूरती या उसके तेज़ दिमाग़ का प्रभाव, पर कुछ तो था उसमें, जो कुछ ही देर में दुनिया की हर ख़ूबसूरत चीज़ में मुझे वही नज़र आती- सुबह के उगते सूरज में, तारामण्डित रात में, चन्द्रमा के चेहरे में, फूलों की मुस्कान में, हर जगह! हर तरफ़! काम करते-करते ध्यान उचट-उचट कर उसकी तरफ़ चला जाता. उसकी आवाज़ सुनने की, उसे देखने की ललक हर व़क़्त लगी रहती, मुझे क्या हो गया था यह!

कभी-कभी मुझे लगता कि वह भी मेरे बारे में कुछ तो सोचती होगी. नहीं तो क्यों इतनी देर बातें करती रहती थी मेरे साथ! पर लगता यह उसका सरल, उन्मुक्त व्यवहार ही है, उसके दिल में ऐसा-वैसा कुछ नहीं.

एक बार यूं ही बातें करते हुए मैंने कहा, “वनिता, तुम्हारे ख़याल में शादी माता-पिता द्वारा ढूंढ़े गए लड़के या लड़की से करनी चाहिए या यह चुनाव अपना होना चाहिए?” उसने मुझे अरेंज्ड मैरिज के पक्ष में एक अच्छा-ख़ासा भाषण सुना डाला. मैं पता नहीं उससे क्या मनवाना चाहता था जो मैंने फिर कहा, “मैं तुमसे सहमत नहीं हूं वनिता! जिसके साथ ज़िन्दगी बसर करनी है, अगर अपनी पसन्द का न हो तो क्या ज़िन्दगी का सफ़र कांटों भरा नहीं हो जाएगा?” मेरी बात बीच में ही काट कर खफ़ा होते हुए उसने कहा, “तुम मुझे क्या उल्टी-सीधी बातें सिखाने की कोशिश कर रहे हो? माता-पिता क्या बुरा करेंगे तुम्हारा? और फिर, शादी तो एडजस्टमेंट का नाम है. अगर एडजस्टमेंट अपने चुनाव के साथी से भी नहीं हो पाई तो शादी चलेगी नहीं.”

मैं तिलमिला उठा…

– सुमन बाली

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