कहानी- अपरिभाषित 3 (Story Series- Aparibhashit 3)

…और मैं आगे बढ़ कर उसको बांहों में नहीं भर सका. मैं उसे बेतहाशा चूम न सका, जो कल्पना में मैंने जाने कितनी बार किया था.

मैं उसके गले लग कर, जी भर कर रो भी नहीं सका, उसे चुप भी नहीं करा सका. सीने में एक सैलाब उमड़ आया था, जो शरीर की हदें तोड़कर बह जाना चाहता था, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. हां मुझे यह ज़रूर लगा कि मेरे अस्तित्व का ज़र्रा-ज़र्रा सुमित नहीं रहा, वनिता हो गया मैं, मैं नहीं रहा, इस रिश्ते को नाम देने की पागल कर देनेवाली इच्छा नहीं रही.

स़िर्फ साल भर बाद उसकी शादी का कार्ड मिला, जिसने एक बार फिर मुझे झकझोर कर रख दिया. उसकी तरफ़ से कार्ड के रूप में जो हवा आई थी, उससे उदासीनता की राख उड़ गई. मुहब्बत के अंगारे अभी भी सुलग रहे थे. सांसें चल रही थीं, इसलिए ज़िन्दा तो था ही. पर ज़िन्दगी से अजनबी हो गया था. एकाकीपन और गहरा हो गया था.

और उसके छ: महीने बाद मैं फिर उसके सामने बैठा था.

पता नहीं किस भावना के वशीभूत होकर खन्ना साहब के यहां चला आया था मैं. यह भी इत्तफ़ाक़ ही था कि वह भी अपनी मम्मी से मिलने आई हुई थी.

वह कुछ नर्वस-सी लग रही थी. हाल-चाल पूछने के बाद रुक-रुककर इधर-उधर की बातें होती रहीं. कोई तार जुड़ नहीं रहा था. पहले की तरह बातों का कोई सिलसिला नहीं चला. अचानक पता नहीं कैसे पूछ बैठा, “और बताओ, राजन से कैसे बनती है? कैसा स्वभाव है उसका?”

एक पल के लिए उसने मुझे ग़ौर से देखा और खिलखिलाकर हंस पड़ी.

“बहुत अच्छे हैं वो. मेरा बहुत ध्यान रखते हैं. ज़रा भी उदास नहीं होने देते मुझे. बहुत हैंडसम और स्मार्ट हैं. आई लव हिम ए लॉट. राजन चाहे एक बहुत बड़े बिज़नेस एम्पायर के मालिक हैं, पर स्वभाव में ज़रा भी घमण्ड नहीं. तुम दो दिन ठहरो, मुझे लेने आ रहे हैं. मिलवाऊंगी उनसे…”

उसे तो जैसे पति की प्रशंसा का मौक़ा मिल गया. मुझे उस पर कम और अपने पर ़ज़्यादा ग़ुस्सा आ रहा था. मुझे क्या पड़ी थी यहां आने की और अब उससे यह बेतुका सवाल पूछने की. सुन लिया उसका बेतरतीब, असम्बद्ध भाषण. वह है ही इतनी पऱफेक्ट, उसका पति कम कैसे हो सकता है. क्रोध और जलन की भावना मेरा दिल फूंक दिए. तभी उसकी आवाज़ खनकी.

“तुम भी अब शादी कर लो न किसी सुन्दर-सी लड़की से.”

“हां जल्दी ही कर लूंगा, लड़कियों की कोई कमी नहीं है. तुमसे कहीं सुन्दर और इंटेलीजेंट लड़की ढूंढ़ कर लाऊंगा. तुम समझती क्या हो अपने आपको?”

कहते-कहते मैं खड़ा हो गया, जाने के लिए तत्पर. वह भी उठी और बिल्कुल मेरे सामने आकर खड़ी हो गई, आहिस्ता से. और मुझसे बिना नज़रें मिलाए जैसे दीवार की ओर ही देखते हुए कहा, ‘सचमुच सुमित! जिसे तुम्हारा ज़िन्दगीभर का साथ मिलेगा, तुम्हारी या किसी और की नज़र में हो या न हो, मेरी नज़र में वह सबसे सुंदर लड़की होगी, सारी दुनिया से सुंदर, तक़दीर भी साथ में लिए हुए.”

फिर एकदम मेरी तरफ़ पलटी और नज़रों में नज़रें डाल कर उस आवाज़ में बोली जो अब तक बिल्कुल रुआंसी हो आई थी.

“पर तुम मुझसे नाराज़ क्यों होते हो सुमित? मुझे डांटते क्यों हो? क्या मैं तुम्हारे इसी व्यवहार के क़ाबिल हूं?”

मैं अपराधी की तरह उसके सामने खड़ा था. कुछ भी कहते नहीं बन पा रहा था. सदा ही ऐसा होता था, कुसूर चाहे उसका ही हो, अपराधी वह मुझे ही बनाती थी और मैं भी अपने आपको ही कुसूरवार समझता था, उसे नहीं.

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“…तुम मेरी ज़िन्दगी में आए बिना बुलाए और मुझे पता भी नहीं चला कब मेरे जीवन का हिस्सा बन गए. और जब जी में आया चले गए, मुझे बिना बताए. तुम्हारे जाते हुए क़दमों की आवाज़ तो सुनी थी मैंने… पर आगे बढ़ के भागकर तुम्हें रोक नहीं पाई. मेरे पैर इस ज़मीन में ही गड़े रहे. कभी भी समझ नहीं पाई, तुम्हें रोकूं तो कैसे? किस अधिकार से? किस रिश्ते से?”

आंसू बहकर उसके गालों पर आ गए थे.

“… आज… आज तुम मेरे सामने खड़े हो. कल मुझे लगेगा जैसे यह सपना था. तुम न जाओ सुमित… तुम न जाओ. तुम होते हो, तो सब कुछ अच्छा लगता है. नहीं तो यह भरी-पूरी, रंगबिरंगी दुनिया अन्तहीन वीराना लगती है. अकेली हूं तुम्हारे बिना मैं, बिल्कुल अकेली. मुझे उस दुनिया में छोड़कर न जाओ जहां मैं तुम्हें देख न सकूं. तुम से बात न कर सकूं… मुझे शून्य में भटकने के लिए छोड़कर न जाओ सुमित. न जाओ…” कहते-कहते बुरी तरह से हिचकियां लेकर रोते हुए, हाथों में मुंह छिपाए वह घुटनों के बल बैठ गई. जैसे खड़े होने की शक्ति शेष न बची हो. काली घटा से बाल खुलकर उसके चेहरे पर फैले हुए थे. मांग में सिन्दूर चमक रहा था.

…और मैं आगे बढ़ कर उसको बांहों में नहीं भर सका. मैं उसे बेतहाशा चूम न सका, जो कल्पना में मैंने जाने कितनी बार किया था.

मैं उसके गले लग कर, जी भर कर रो भी नहीं सका, उसे चुप भी नहीं करा सका. सीने में एक सैलाब उमड़ आया था, जो शरीर की हदें तोड़कर बह जाना चाहता था, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. हां मुझे यह ज़रूर लगा कि मेरे अस्तित्व का ज़र्रा-ज़र्रा सुमित नहीं रहा, वनिता हो गया मैं, मैं नहीं रहा, इस रिश्ते को नाम देने की पागल कर देनेवाली इच्छा नहीं रही.

मैं कहना चाहता था, ‘वनिता, मैं नहीं जा रहा. मैं तुम्हारे पास ही रहूंगा. तुम्हारे सपनों में, तुम्हारी कल्पना में, जो न तुमसे छिनेगी, न कभी बूढ़ी होगी, न जुदा होगी’ पर कह नहीं पाया. मैं उसे वह सुकून नहीं दे पाया, जो मुझे मिल गया था. मैं उसकी तलाश में कहां-कहां नहीं भटका था? वह तो मेरे भीतर थी, मेरे वजूद के हर ज़र्रे में.

– सुमन बाली

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कहानी- अपरिभाषित 3 (Story Series- Aparibhashit 3)
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मैं उसके गले लग कर, जी भर कर रो भी नहीं सका, उसे चुप भी नहीं करा सका. सीने में एक सैलाब उमड़ आया था, जो शरीर की हदें तोड़कर बह जाना चाहता था, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. हां मुझे यह ज़रूर लगा कि मेरे अस्तित्व का ज़र्रा-ज़र्रा सुमित नहीं रहा, वनिता हो गया मैं, मैं नहीं रहा, इस रिश्ते को नाम देने की पागल कर देनेवाली इच्छा नहीं रही.
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