कहानी- बापू से पापा तक̷...

कहानी- बापू से पापा तक… 6 (Story Series- Bapu Se Papa Tak…6)

बहुत कशमकश में बीते वह दिन. किस से कहूं अपने मन का बात? किस से बांटू अपनी परेशानी? पापा से अब पहलेवाली दूरी नहीं रह गई थी, पर यह बात कहने का साहस अभी भी नहीं था मुझमें. मम्मी से भी नहीं कह पाई. काश! विभोर होता घर पर. ज़रूर समझ लेता मेरी परेशानी. बड़ा हो चुका है अब वह.

अब मैं उनसे मिलने के बहाने तलाशने लगी थी. उनकी पसन्द नापसन्द का ध्यान रख कर तैयार होने लगी थी. उन्हें भारतीय पहनावा अधिक पसन्द था. सलवार सूट तो मैं पहनती ही थी, विशेष अवसरों पर अब साड़ी बांधनी शुरू कर दी. अन्य लड़कियों की देखादेखी मैंने भी अपने बाल कटवा लिए थे. उन्हें फिर से बड़ा करने लगी.
परन्तु मैं उन्हें सिर्फ ख़्यालों में ही पाकर संतुष्ट नहीं थी, जीवन में पा लेना चाहती थी और यह बात मेरे लिए प्रेरणास्रोत बन गई. मैं पढ़ाई में जी जान से जुट गई. जोशीजी मुझे आईएएस में बैठने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे. बीए पास कर मैंन एमए में प्रवेश लिया और साथ ही उसकी तैयारी में जुट गई.
मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन था वह, जिस दिन मेरा आईएएस का परिणाम आया और उसमें मेरा बहुत अच्छा रैंक आया. अपनी सफलता का प्रमाण ले मैं स्वयं गई थी पापा के पास. मेरा रैंक देखकर वह इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने बेसाख़्ता मुझे आलिंगन में ले लिया. उनका बहुत मन था कि विभोर आईएएस करे, परन्तु वह इंजीनियरिंग करने चला गया था. और मैंने उनका वही सपना पूरा किया था. पापा यह तो जानते थे कि पढ़ने में मेरी रुचि है और मैं पढ़ाई में अच्छा कर रही हूं, पर शायद उन्होंने मेरी ऐसी सफलता की आशा नहीं की थी. इसी बात पर उन्होंने आनेवाले रविवार को एक पार्टी देने की घोषणा कर दी.
जोशीजी को गुलाबी रंग बहुत पसन्द था. यह बात उन्होंने बहुत शुरू में कपड़े दिलवाते समय एक बार बताई थी. यह भी कहा था कि यह रंग मुझ पर बहुत फबता है. अब तो ख़ैर मैं स्वयं ही अपने काम कर आती थी. बहुत कपड़े ख़रीदने का शौक तो मुझे कभी था ही नहीं. बस ज़रूरतभर की चीज़ लेती थी, किन्तु यह एक विशेष अवसर था. और सिर्फ इसलिए नहीं कि मेरा आईएएस मे चयन हुआ था, वास्तव में आज ही मैंने पापा को पूरी तरह से पाया था. मैं ख़ुश भी थी एवं आत्मविश्‍वास से भररपूर भी. मैने बाज़ार जाकर हल्की कढ़ाईवाली गुलाबी रंग की साड़ी ख़रीदी और ब्लाउज़ सिलने भी दे दिया, ताकि रविवार तक तैयार हो जाए.

पार्टी मेरी सफलता के निमित थी, तो स्वभाविक ही सब मुझसे स्नेहपूर्वक मिल रहे थे, मुबारक दे रहे थे, प्रशंसा कर रहे थे. पर जोशीजी? मुबारक देने आए ज़रूर, वह भी धीमे से स्वर में और मुबारकवाद के सिवा कुछ न बोले. मेरा मन चाह रहा था कि वह एक बार तो प्रशंसा का कोई शब्द कहें, पर जाने क्यों उन्होंने मुझसे दूरी ही बनाए रखी. अपने को पार्टी के इन्तज़ाम में, मेहमानों की देखरेख में व्यस्त रखा अथवा व्यस्तता का नाटक किया, कौन जाने? स्पष्ट समझ आ रहा था कि वह मुझसे दूर रहने का प्रयत्न कर रहे हैं, पर आख़िर क्यों? यह मेरी समझ के बाहर था. वह मुझे कुछ उदास से भी लगे. एक-दो बार मैं उनकी तरफ़ बढ़ी कि उदासी का सबब ही पूछ सकूं, पर मुझे ऐसा लगा जैसे मुझे अपनी तरफ़ आता देख ही वह दूसरी तरफ़ मुड़ गए और किसी अतिथि से बात करने लगे. पार्टी में सम्मिलित सबसे शुभकामनाएं पा लीं, प्रशंसा एवं आशीर्वाद पा लिया, परन्तु जिनकी प्रशंसा मेरे लिए सबसे अधिक महत्व रखती थी वह नहीं मिली.

सुना कि पापा मेरे विवाह की सोच रहे हैं और यह काम भी उन्होंने जोशीजी के सुपुर्द कर रखा है. मम्मी चूंकि मेरी बात में विशेष रुचि नहीं लेती थीं, इसलिए ही शायद पापा को मुझसे सम्बन्धित हर कार्य के लिए जोशीजी पर निर्भर रहना पड़ता था. मुझे पता तब चला, जब पार्टी के दो दिन पश्चात ख़ूब छानबीन करके वह दो लड़कों के नाम पापा को सुझाने आए. यह तो अच्छा हुआ कि पापा को वह दोनों अपनी हैसियत के बराबर नहीं लगे और उन्होंने दोनों को नकार दिया. मुझे ग़ुस्सा तो बहुत आया, पर पापा के सामने बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. जोशीजी से ही बात करना चाहती थी, पर वह टेलीफोन ही नहीं उठा रहे थे. दफ़्तर में पूछने पर मालूम हुआ कि वह सप्ताहभर के लिए बाहर गए हैं.

बहुत कशमकश में बीते वह दिन. किस से कहूं अपने मन का बात? किस से बांटू अपनी परेशानी? पापा से अब पहलेवाली दूरी नहीं रह गई थी, पर यह बात कहने का साहस अभी भी नहीं था मुझमें. मम्मी से भी नहीं कह पाई. काश! विभोर होता घर पर. ज़रूर समझ लेता मेरी परेशानी. बड़ा हो चुका है अब वह. पर वह इंजनीयरिंग कर रहा था सुदूर अमरीका में. पर वह इंजीनियरिंग कर रहा था सुदूर अमरीका में.
सप्ताह के पश्चात लौट आए जोशीजी और सुना उनकी मंगनी हो गई है और वह इसीलिए गए हुए थे. सुबह नाश्ते के समय पापा ने दी थी यह ख़बर. मेरे सिवा शायद सब को ही पता थी यह बात. पापा के ही एक मित्र की बेटी थी वह. पहले वह देहरादून में ही रहते थे और मैं भी दो-चार बार उसे पार्टियों में मिल चुकी थी. तीन वर्ष पूर्व उसका तलाक़ हुआ था. किस कारण? पता नहीं, परन्तु मैं यह अच्छी तरह जानती थी कि जोशीजी और उसमें विचारों का कोई सामंजस्य नहीं था. और न ही जोशीजी उसे पसन्द ही करते थे. मेरी सहनशक्ति एकदम चुक गई. ऐसा क्यों किया जोशीजी ने समझ नहीं पाई. क्यों कर रहे थे मुझसे भागने का प्रयत्न? मैं जानती थी कि उनके घर ऐसा बड़ा कोई नहीं था, जो उन पर विवाह करने का दबाव डाल रहा हो अथवा मुझसे विवाह करने में जिसे आपत्ति हो. एक बड़ा भाई था, जो वर्षों से विदेश में बसा हुआ था.

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मैं स्वयं को भी नहीं समझ पा रही थी। क्रोधित थी या निराश या फिर अपमानित महसूस कर रही थी स्वयं को? मैं यह मानने को तैयार नहीं थी कि मेरा प्यार एक तरफ़ा था। कुछ नहीं था जोशी जी के मन में मेरे प्रति। एक बार पूछना चाहती थी जोशी जी से। यदि मैने अब हिम्मत नहीं की तो उम्र भर ग्लानि रहेगी। इससे पहले कि मेरी हिम्मत छूट जाये मैं एकदम से जोशी जी के दफ़्तर जा पहुँची। चपरासी हैरान तो हुआ, उठा भी पर रोकता कैसे? बडे साहब की बेटी थी मैं। और उसे कुछ कहने का अवसर दिये बग़ैर ही मैं भीतर घुस चुकी थी.

घुसते ही किसी भूमिका के बग़ैर मैने पूछा, “क्यों कर रहे हो ऐसा? जानते हो न कि कितना प्यार करती हूं मैं आपसे? जानते हो न? प्यार में मुंह खोलकर कहना ज़रूरी नहीं. और मैं यह जानती हूं कि आप भी मुझे उतना ही चाहते हो. मुंह खोलकर कभी न कहा हो तब भी जानती हूं…”
मैं बोलती रही और वह सुनते रहे. अपराधी की तरह, किसी बेबस की तरह, पर बोले कुछ नहीं. क्या उनकी आंखें भर आईं थीं अथवा यह मेरा कोरा वहम था?

Usha Wadhwa

उषा वधवा

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