कहानी- बेड़ियां सोच की 2 (Story Series- Bediyaan Soch Ki 2)

“मैं जानता हूं स्वाति कि तुम्हारे मन में इस वक़्त क्या चल रहा है.” आख़िरकार यश ने चुप्पी तोड़ी.
“कुछ अजीब-सा महसूस हो रहा है यश. इतने शौक़ से घर लिया और पहुंचने के पहले ही पड़ोस में अजीब चीज़ें देखने को मिल रही हैं.”
“ऐसा कौन-सा आसमान फट गया है स्वाति? वो लोग अपने घर में अपने तरी़के से पूजा कर रहे थे, जैसे हम अपने घर में अपने तरी़के से करते हैं. कोई अपने घर में क्या कर रहा है, इससे हमारा कोई सरोकार नहीं होना चाहिए. वो लोग अपने फ्लैट में रहेंगे और हम लोग अपने में.”

फॉल्टी सामान होता, तो रसीद दिखाकर दुकान से पैसे वापस ले आते, पर इस घर का क्या करें, जिसे क़रीब तीन महीने तक सिंगापुर के कोने-कोने में लगभग सौ फ्लैट्स देखने के बाद ख़रीदा गया था. जब से इसे फाइनल किया था, तब से इससे दिल से भी जुड़ गए थे. टॉप क्लास फर्नीचर शोरूम्स में घंटों घूम-घूमकर फ्लैट के इंटीरियर के साथ मैच करनेवाले फर्नीचर्स भी पेशगी देकर फाइनल कर दिए गए थे. उस दिन फ्लैट की चाबी लेकर जाते समय दोनों ख़ामोश थे. नए घर में प्रवेश की ख़ुशी थोड़ी कम हो गई थी.
“मैं जानता हूं स्वाति कि तुम्हारे मन में इस वक़्त क्या चल रहा है.” आख़िरकार यश ने चुप्पी तोड़ी.
“कुछ अजीब-सा महसूस हो रहा है यश. इतने शौक़ से घर लिया और पहुंचने के पहले ही पड़ोस में अजीब चीज़ें देखने को मिल रही हैं.”
“ऐसा कौन-सा आसमान फट गया है स्वाति? वो लोग अपने घर में अपने तरी़के से पूजा कर रहे थे, जैसे हम अपने घर में अपने तरी़के से करते हैं. कोई अपने घर में क्या कर रहा है, इससे हमारा कोई सरोकार नहीं होना चाहिए. वो लोग अपने फ्लैट में रहेंगे और हम लोग अपने में.”
“मगर अपने प्रॉपर्टी एजेंट ने तो उनकी पूजा का कुछ और ही स्पष्टीकरण दिया था. वह भी तो लोकल चाइनीज़ है, उसे इन सब क्रिया-कलापों का अर्थ पता ही होगा. किराए का घर होता, तो भी कोई बात न थी, पर अपने इस आशियाने में तो मैंने और तुमने उम्र बिताने के ख़्वाब देखे हैं.”
“इसके बारे में अधिक सोचने से कोई फ़ायदा नहीं होनेवाला. अब 15 दिन बाद तो हमें अपने इस आशियाने में शिफ्ट होना ही है. पूर्वाग्रह के साथ शुरुआत करोगी, तो कभी ख़ुश नहीं रह पाओगी.”
स्वाति ने सोचा- ‘यश ठीक ही कह रहा है. अपेक्षाकृत ठीक होगा कि वह पूरे उमंग-उत्साह के साथ नए घर में प्रवेश करे. वह सब कुछ भूलकर गृहप्रवेश की तैयारी में लग गई.
एक फ्लोर पर आठ घर बने हुए थे. चार फ्लैट एक तरफ़ और चार उसके दूसरी तरफ़. मगर ये क्या सामनेवाले फ्लैट में रहनेवाली चाइनीज़ बुढ़िया और उसका अविवाहित बेटा यश और स्वाति को देखते ही अपने फ्लैट का दरवाज़ा बंद कर लेते थे. आख़िरी कोने के फ्लैट में रहनेवाले मलेशियन परिवार में पति-पत्नी और तीन टीनएजर बेटियां थीं. मां-बेटी तो
कभी-कभार ग़लती से मुस्कुराकर नए पड़ोसी से ‘हेलो-हाय’ कर लिया करती थीं. लेकिन उस मलेशियन आदमी को तो यश और स्वाति के साथ लिफ्ट में आना-जाना भी पसंद न था. उन्हें लिफ्ट में जाता देखकर वह अपना रास्ता बदलकर दूसरी तरफ़ से सीढ़ियों से जाता-आता था.
जब उनके साइड में रहनेवालों का यह हाल था, तो दूसरी तरफ़ रहनेवालों की तरफ़ देखने की तो यश और स्वाति हिम्मत ही कैसे जुटाते? हां, उनकी तरफ़ के लोगों में उन्हें देखकर कोई वाक़ई ख़ुश होता था, तो वे थे ये अजीब-सी पूजा करनेवाले अधेड़ चाइनीज़ कपल्स- लिमपेंग आंटी और जोसुआ अंकल.
सिंगापुर के फ्लैट्स में मुख्यद्वार पर दो दरवाज़े लगे होते हैं. एक लकड़ी का, जिसे अधिकांश लोग स़िर्फ रात के समय ही बंद करते हैं और दूसरा लोहे की जालीवाला. स्वाति भी दिन के समय दूसरों की तरह स़िर्फ लोहे की जालीवाले दरवाज़े को ही बंद रखती और लकड़ीवाला दरवाज़ा पूरे दिन खुला रहता. ऐसा करने से एक तो कॉरिडोर में आते-जाते लोगों को देखकर अकेलेपन का एहसास न होता, दूसरा खुली हवा के आर-पार का आनंद भी मिलता था. लिमपेंग आंटी और जोसुआ अंकल जब भी कॉरिडोर से गुज़रते, तो दो पल रुककर उसका हालचाल ज़रूर पूछते. साथ ही यश और स्वाति से यह कहना भी नहीं भूलते कि वे यहां परदेस में अपने आपको अकेला न समझें और कोई भी ज़रूरत होने पर उन्हें ज़रूर बताएं.
लिमपेंग आंटी और जोसुआ अंकल बौद्ध धर्म मानने के साथ-साथ शुद्ध शाकाहारी थे. जब लिमपेंग आंटी को पता चला कि यश और स्वाति भी वेजीटेरियन हैं, तो वह अक्सर ही कुछ न कुछ चाइनीज़ वेजीटेरियन फूड बनाकर दे जातीं. चाइनीज़ बहुलवाले देश में वेजीटेरियन पड़ोसी मिलना यश और स्वाति के लिए भी बड़े ही सौभाग्य की बात थी, पर स्वाति की सोच पर तो पूर्वाग्रह की बेड़ियां पड़ चुकी थीं.

 

रीता कौशल

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