कहानी- बेड़ियां सोच की 3 (Story Series- Bediyaan Soch Ki 3)

 

जब चेतना वापस आई, तो ख़ुद को एक अस्पताल में पाया. पेट के निचले हिस्से में असहनीय पीड़ा का एहसास होने पर उसने अपना दायां हाथ उधर सहलाने के लिए उठाने की कोशिश की… मगर ये क्या सीधे हाथ की कलाई से तो एक टयूब जुड़ी हुई थी. स्वाति ने जब अपने बाएं हाथ से पेट को छुआ, तो एक खालीपन के एहसास से भरी सिहरन उसके समस्त शरीर को ठंडा कर गई. वह अप्रिय की आशंका से कंपकपा रही थी… पलकों के बांध को तोड़ता हुआ उसका रुदन हिचकियों के बीच करुण विलाप में परिवर्तित हो गया. वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी.

जैसे ही लिमपेंग आंटी ताज़ा, ख़ुशबूदार भोजन स्वाति को पकड़ाकर जातीं, वैसे ही स्वाति पूरा खाना फेंक देती. उसे लगता कि अगर वह लिमपेंग आंटी के घर के भोजन को खाएगी, तो किसी टोने-टोटके का शिकार हो जाएगी. यह सिलसिला पूरे दो साल तक चला और आगे भी चलता रहता अगर परिस्थितियों ने स्वाति को उसकी क्रूरता का बोध न कराया होता.
स्वाति की प्रेग्नेंसी का तीसरा महीना चल रहा था कि उसे चिकन पॉक्स हो गया. डॉक्टर ने पूरी बॉडी पर लोशन लगाने को दिए. तीसरे दिन चिकन पॉक्स के कारण तेज़ बुख़ार भी हो गया. यश का प्रोजेक्ट लाइव जा रहा था, उसे स्वाति की देखभाल के लिए छुट्टियां मिलने की कोई गुंजाइश न थी, बल्कि ऐसे समय में उसका स्वाति से थोड़ा दूर रहना ही ठीक था. अब स्वाति क्या करे और कहां जाए… किससे मदद के लिए गुहार करे?
यश इंडियन रेस्टोरेंट से फोन द्वारा खाने की होम डिलीवरी करा लेता और स्वाति के लिए एक प्लेट उसके कमरे के दरवाज़े पर रखकर चला जाता था. उस शाम जब यश ऑफिस से लौटकर आ रहा था, तो लिफ्ट में उसकी मुलाक़ात लिमपेंग आंटी से हो गई.
“क्या बात है यश, मैंने तीन-चार दिन से स्वाति को नहीं देखा. वो इंडिया चली गई है क्या?” लिमपेंग आंटी की आंखों में बेचैनी थी.
यश से सारी घटना का ब्यौरा मिलते ही वह बिना देरी किए स्वाति की सेवा में हाज़िर हो गईं.
“जब तक स्वाति ठीक नहीं हो जाती, मैं उसके साथ तुम्हारे ही घर में रहूंगी यश.”
“मगर आंटी अगर उसके साथ रहने से आपको भी चिकन पॉक्स हो गया तो…?”
“तो क्या… अगर उसकी जगह मेरी बेटी इन्हीं हालात से गुज़र रही होती, तो क्या मैं उसको छूत के डर के कारण उसके हाल पर छोड़ देती? दूसरी बात कई वर्ष पूर्व मुझे चिकन पॉक्स हो चुका है, अत: अब इसके दोबारा होने की संभावना कम ही है.”
लिमपेंग आंटी की आर्थिक स्थिति बहुत सुदृढ़ न थी. वह और जोसुआ अंकल किसी ग्रॉसरी शॉप में डेली बेसिस पर काम करते थे. लेकिन वे बिना अपनी जीविका की परवाह किए स्वाति की ख़िदमत में लग गईं. स्वाति को शरीर पर हो रहे चिकन पॉक्स के लाल दानों से असहनीय पीड़ा हो रही थी. एक रात दर्द से कराहती हुई वह बाथरूम के लिए उठी, तो अंधेरे में साइड टेबल से टकराकर गिर गई.
कहां है वो… अर्धचेतन अवस्था में भी स्वाति को तीव्र वेदना की अनुभूति हो रही थी और फिर सब कुछ शून्य. फिर कुछ पल का शोर… और उसके चेहरे के आस-पास तैरते कुछ अजनबी, तो कुछ परिचित चेहरे.
जब चेतना वापस आई, तो ख़ुद को एक अस्पताल में पाया. पेट के निचले हिस्से में असहनीय पीड़ा का एहसास होने पर उसने अपना दायां हाथ उधर सहलाने के लिए उठाने की कोशिश की… मगर ये क्या सीधे हाथ की कलाई से तो एक टयूब जुड़ी हुई थी. स्वाति ने जब अपने बाएं हाथ से पेट को छुआ, तो एक खालीपन के एहसास से भरी सिहरन उसके समस्त शरीर को ठंडा कर गई. वह अप्रिय की आशंका से कंपकपा रही थी… पलकों के बांध को तोड़ता हुआ उसका रुदन हिचकियों के बीच करुण विलाप में परिवर्तित हो गया. वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी.
अचानक उसे अपने सिर पर स्नेहमयी स्पर्श महसूस हुआ और वह फफककर रोते हुए बोली, “यश प्लीज़, कह दो कि जो मैं सोच रही हूं, वह सच नहीं है.”
“स्वाति, मैं यश नहीं लिमपेंग हूं… यश यहां से थोड़ी देर पहले ही गया है. वह जाना तो नहीं चाहता था, पर मैंने ही उसे ज़बर्दस्ती घर भेज दिया. आख़िर रातभर का जगा हुआ था, कुछ देर सो लेगा, तो तुम्हारी भी देखभाल अच्छे-से कर पाएगा.”
स्वाति ने गर्दन को घुमाकर देखा, तो पाया कि बेड के साइडवाली कुर्सी पर लिमपेंग आंटी बैठी थीं. नींद न पूरी होने से उनकी आंखें लाल और थकान से शरीर का पोर-पोर मुरझा रहा था. ऐसा लग रहा था कि रातभर जगने के बाद अभी कुछ मिनट पहले ही उनकी आंख लगी थी, पर स्वाति के रोने से वे घबराकर उठ गई थीं.
“मैं यहां क्यों हूं आंटी?”
“मैं कुछ नहीं बता सकती… अभी तुम्हें आराम की सख़्त ज़रूरत है.”

रीता कौशल

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