कहानी- बेड़ियां सोच की 4 (Story Series- Bediyaan Soch Ki 4)

 

कुछ रिश्ते अर्थहीन होते हैं और कुछ के अर्थ इतने गूढ़ होते हैं कि उन्हें औसत समझ का व्यक्ति नहीं समझ सकता. अपने आपको बहुत ज़्यादा बुद्धिजीवी और आधुनिक समझनेवाली स्वाति आज ख़ुद पर शर्मिंदा थी. वह स्तब्ध थी कि अपने शोध के लिए जूनियर साइंटिस्ट का अवॉर्ड जीतनेवाली वह असल में कितनी संकीर्ण मानसिकता की थी. किसी ने किसी के बारे में कुछ कहा और उसने बिना किसी तार्किक आधार के उस पर यकीन करके अपनी सोच की बेड़ियों पर एक बड़ा-सा ताला और लगा दिया.

लिमपेंग आंटी ने अपनी हथेलियों से स्वाति के आंसू पोंछते हुए कहा.
तब तक नर्स राउंड पर आ गई और उसने स्वाति का ब्लडप्रेशर और बुख़ार चेक करने के बाद उसे कुछ दवाइयां खाने को दीं. दवाइयों के असर और संताप से निढाल स्वाति फिर से सो गई. उसको दो दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिलनी थी, पर उसके पहले एक काउंसलिंग सेशन अटेंड करना था. यश ने भी उसके साथ सेशन जॉइन किया.
जब वो दोनों काउंसलिंग के लिए रुके हुए थे, तो लिमपेंग आंटी टैक्सी लेकर यह कहते हुए घर चली गईं कि चलकर तुम लोगों के खाने-पीने का इंतज़ाम करती हूं, स्वाति को तो अभी लंबे समय तक परहेज़ी खाने पर ही रहना होगा. रेस्टोरेंट का खाना उसकी सेहत के लिए ठीक न होगा.
जब यश कार से स्वाति को घर ले जा रहा था, तो उसने स्वाति से कहा, “अगर उस रात आंटी न होतीं, तो न जाने क्या होता… तुम्हारी चीख की आवाज़ से जब आंटी उठीं, तो तुम्हें होश न था, तुम्हें हैवी ब्लीडिंग हो रही थी… तुम्हें अस्पताल में लाने के बाद जब अल्ट्रासाउंड किया गया, तो भ्रूण में कुछ असामान्यता पाई गई और भी कई कॉम्प्लीकेशन थे, इसलिए तुरंत ही तुम्हारा ऑपरेशन करना पड़ा. स्वाति सच में अगर लिमपेंग आंटी न होतीं, तो मैं अकेला इन हालात से कैसे निपटता.”
कुछ रिश्ते अर्थहीन होते हैं और कुछ के अर्थ इतने गूढ़ होते हैं कि उन्हें औसत समझ का व्यक्ति नहीं समझ सकता. अपने आपको बहुत ज़्यादा बुद्धिजीवी और आधुनिक समझनेवाली स्वाति आज ख़ुद पर शर्मिंदा थी. वह स्तब्ध थी कि अपने शोध के लिए जूनियर साइंटिस्ट का अवॉर्ड जीतनेवाली वह असल में कितनी संकीर्ण मानसिकता की थी. किसी ने किसी के बारे में कुछ कहा और उसने बिना किसी तार्किक आधार के उस पर यकीन करके अपनी सोच की बेड़ियों पर एक बड़ा-सा ताला और लगा दिया.
हैरानी की बात थी कि वह काग़ज़ का एक टुकड़ा बर्बाद नहीं करती थी. पर्यावरण संरक्षक की वकालत करते हुए बिजली-पानी, खाना बर्बाद करनेवालों को हज़ारों दलीलें दे डालती थी. फिर कैसे दो साल तक किसी के प्यार के मसालों से महकते भोजन को वहमों की शिकार होकर कूड़े में फेंकती रही?
वे घर पहुंच चुके थे. स्वाति के कमज़ोर शरीर को ऊर्जा की ज़रूरत थी. भूख से उसका हाल बेहाल था. वो अभी कपड़े बदलकर फ्रेश भी न हो पाई थी कि लिमपेंग आंटी हाज़िर हो गईं. एक ट्रे में दो बड़े बाउल में वेजीटेबल सूप के साथ. स्वाति को तेज़ भूख लगी थी, वो दोनों बाउल के सूप तुरंत पी गई.
“लिमपेंग आंटी मेरी आंटी हैं यश. वो ये सूप अपनी बेटी यानी कि मेरे लिए लाई थीं. तुम फोन करके अपने लिए बाहर से खाना ऑर्डर कर लो.” स्वाति ने टिश्यू से अपना मुंह पोंछा और आंटी के गले लग गई. स्नेह के बल से सोच पर पड़ी बेड़ियां टूट चुकी थीं.

 

रीता कौशल

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