कहानी- भूमिका 3 (Story Series- Bhumika 3)

“नहीं. तटस्थ हो जाना समाधान नहीं, बल्कि पलायन है. इस तरह रिश्तों में निराशा भरती है. यह सही है पति-पत्नी के बीच तनाव हो तो रिश्ते में वह बात नहीं रहती. फिर भी हमें रिश्तों को बचाये रखने की कोशिश करनी ही होगी, क्योंकि भागना कभी भी आसान नहीं होता. न समय से, न स्थिति से, न स्थान से, न ख़ुद से और न  ही रिश्तों से. समाज का अस्तित्व कायम है तो इसलिये कि परिवार है.

मेरी पहली कोशिश यह होती है कि मैं स्वयं को कभी भी दयनीय न लगने दूं. मेरा एक व्यक्तित्व है और मैं निराश या अस्त-व्यस्त रह कर अपने व्यक्तित्व को मात्र इसलिये ख़त्म नहीं कर सकती कि मेरे पति मदिरा या जुये में निमग्न हैं. ज़िंदगी में कोई एक पक्ष नहीं होता कि वहां से हमें हताशा मिली तो हम दूसरे पक्षों पर ध्यान न दें. यह नकारात्मक तरीक़ा है. मैं उन पक्षों को याद रखती हूं जो मुझे सुख देते हैं. मुझे नहीं मालूम डॉक्टर साहब में कभी सुधार होगा या नहीं, पर मुझे संतोष रहेगा कि मैंने घर के वातावरण को बिगड़ने से यथा सम्भव रोका है. यह समझौता या घुटने टेकना नहीं है, बल्कि मैं अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाना चाहती हूं.”

“एक दिन मैं होटल राजदरबार जा पहुंची कि मेरा वहां होना शायद इन्हें ग्लानि से भर देगा. मैंने इनके साथियों से कहा, आप लोग यहां न आएं तो इनका आना भी बंद हो जाए. आप लोग क्यों एक-दूसरे को तबाह कर रहे हैं. डॉक्टर साहब जैसे शिष्ट इंसान ने सार्वजनिक स्थल पर मुझे थप्पड़ मार कर कहा, तुमने यहां आने की हिम्मत कैसे की?” मुझे बड़ी शर्मिंदगी हुई कि इतना अपमान हम शिक्षित समर्थ स्त्रियों को सहना पड़ता है, तब निरक्षर निसहाय स्त्रियों की कितनी दीन दशा होती होगी. स्त्री चाहे जिस वर्ग की हो वह शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक किसी-न-किसी स्तर पर शोषित है और उसके पास सहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. नहीं सहती तो घर टूटता है और इस टूटने का ठीकरा स्त्री के सिर फूटता है कि इसे निबाहना नहीं आता. यह पक्षपात ही तो अखर जाता है. घर को टूटने से बचाने की ज़िम्मेदारी हमारी ही क्यों हो, हमें ही क्यों कहा जाये पति को ख़ुश रखो, घर में शांति बनाये रखो.

मैं रोते हुये घर पहुंची. मैं नियंत्रण खो रही थी. तब बड़ी बेटी कहने लगी, मां हम तीनों बहनें तुम्हारी कुछ नहीं हैं. पापा ही सब कुछ हो गये कि तुम एक उन्हें ही लेकर हरदम सोचो, तुम हमारी ख़ातिर ख़ुश नहीं रह सकती? उसी दिन मुझे लगा हम अपने दुख या अभाव को इतना व्यक्तिगत क्यों मान लेते हैं कि सोच नहीं पाते कि वह दुख दूसरों को कितना प्रभावित करेगा. क्लेश और कलह का बच्चों के विकास और वृद्धि पर बुरा असर होगा. मैंने प्रण किया मैं ऐसा व्यवहार नहीं करूंगी जो बिगड़े वातावरण को अधिक बिगाड़ दे. मुझे हर हाल में अपनी बेटियों को स्वस्थ वातावरण और सुरक्षा देनी है. तब मैंने सोचा, डॉ. साहब क्या करते हैं, मैं इसी उधेड़बुन में उलझकर क्यों रह जाना चाहती हूं, जबकि वे मेरी भावनाओं को महत्व नहीं देते. इनकी हरकत मुझे इसलिये दुख देती थी, क्योंकि मैं उन पर बहुत अधिक केंद्रित थी.”

तानिया को याद आया, कलह और उनके रोने-धोने से बेटे खीझ जाते हैं. ओह, ऐसा न हो बेटे भी विमुख हो जायें.

“तो क्या अब निरूपाय होकर आप तटस्थ हो गई हैं. मेरा मतलब मौन…”

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“नहीं. तटस्थ हो जाना समाधान नहीं, बल्कि पलायन है. इस तरह रिश्तों में निराशा भरती है. यह सही है पति-पत्नी के बीच तनाव हो तो रिश्ते में वह बात नहीं रहती. फिर भी हमें रिश्तों को बचाये रखने की कोशिश करनी ही होगी, क्योंकि भागना कभी भी आसान नहीं होता. न समय से, न स्थिति से, न स्थान से, न ख़ुद से और न  ही रिश्तों से. समाज का अस्तित्व कायम है तो इसलिये कि परिवार है.

मेरी पहली कोशिश यह होती है कि मैं स्वयं को कभी भी दयनीय न लगने दूं. मेरा एक व्यक्तित्व है और मैं निराश या अस्त-व्यस्त रह कर अपने व्यक्तित्व को मात्र इसलिये ख़त्म नहीं कर सकती कि मेरे पति मदिरा या जुये में निमग्न हैं. ज़िंदगी में कोई एक पक्ष नहीं होता कि वहां से हमें हताशा मिली तो हम दूसरे पक्षों पर ध्यान न दें. यह नकारात्मक तरीक़ा है. मैं उन पक्षों को याद रखती हूं जो मुझे सुख देते हैं. मुझे नहीं मालूम डॉक्टर साहब में कभी सुधार होगा या नहीं, पर मुझे संतोष रहेगा कि मैंने घर के वातावरण को बिगड़ने से यथा सम्भव रोका है. यह समझौता या घुटने टेकना नहीं है, बल्कि मैं अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाना चाहती हूं.”

तानिया मुग्ध भाव से कामाक्षी की बातें सुनती रही.

फिर बोली, “फ़िलहाल इतना कह सकती हूं कि आपसे मिल कर मेरा उच्चाटन कम हुआ है. समस्या का समाधान न भी निकले, पर हम उस समस्या को इतना विकृत न बना दें कि दूसरी समस्यायें खड़ी हो जायें. हमें कोशिश जारी रखनी होगी, क्योंकि हमारे हिस्से की भूमिका शायद कभी ख़त्म न होगी. पर मैं ईश्‍वर से प्रार्थना ज़रूर करूंगी इन पुरुषों को सदबुद्धि दे.”

तानिया ने कुछ इस तरह कहा कि कामाक्षी मुस्कुरा दी.

Sushma Munindra

सुषमा मुनीन्द्र

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