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कहानी- एक बदलाव की उम्मीद… 3 (Story Series- Ek Badlav Ki Umeed 3)

इससे पहले बुआ कुछ कहतीं पीछे खड़ी दादी बोल पड़ीं, “पागल हो गई है क्या छोरी. तू तो इस शगुनवाली मेहंदी से दूर ही रहना. इसे छू कर अपशकुन कर देगी तू. चल… चल भाग यहां से और वही दूर खड़ी सब देखती रह समझीं.” 

 

… मंजरी का आहत हृदय आंसू बन उसकी आंखों से अविरल बहने लगा. मां और मैं मूक विवश दर्शक बने सब देख-सुन रहे थे, पर कुछ भी कहने की हिम्मत न जुटा पाए. किसी की पीड़ा, आंसू दादी की सनक के सामने मूल्यहीन थे.

उनकी इस सनक ने तो उनकी अपनी बेटी रमा बुआ तक को नहीं बख़्शा. कितना मनुहार करके रमा बुआ ने अपनी मां को आशू भैया की शादी में बुलाया था. हम सभी की उपस्थिति ख़ासतौर पर अपनी मां की उपस्थिति से रमा बुआ अत्यंत प्रसन्न थीं. अपनी मां की सनक से परिचित बुआ हर समय एहतियात बरतती रहती थीं. अपने सभी नौकर-चाकरों को उनके आस-पास भी न जाने की सख़्त हिदायतें दी थी. बुआ ने उनके लिए ख़ासतौर पर बनारस से ब्राह्मण रसोइया बुलवाया था, जो उनकी रसोई के साथ-साथ उनका और काम भी कर देता था. दादी पूरी तरह बुआ के इस रसोइये से संतुष्ट थीं. पूरे हर्षोल्लास के साथ शादी के सभी कार्यक्रम निर्विघ्न हो रहे थे.
मेहमानों से भरा पूरा घर ढोलक की थापों, शादी की गीतों और हंसी की ठिठोलियों से गूंज रहा था. बुआ के तो पैर ही ज़मीन पर नहीं थे… आख़िर उनके एकलौते बेटे की शादी जो थी. हम सभी नाच-गाने में व्यस्त थे कि बुआ बोलीं, ”सुनो सुनो!.. थोड़ी देर में मेहंदीवाला आनेवाला है. सभी मेहंदी लगवा लेना और साथ में हल्दी की रस्म होगी.“
“भाभी मैं भी मेहंदी लगवा लूं…“ बुआ की कामवाली की दस वर्ष की लड़की डरते-डरते बोली.
इससे पहले बुआ कुछ कहतीं पीछे खड़ी दादी बोल पड़ीं, “पागल हो गई है क्या छोरी. तू तो इस शगुनवाली मेहंदी से दूर ही रहना. इसे छू कर अपशकुन कर देगी तू. चल… चल भाग यहां से और वही दूर खड़ी सब देखती रह समझीं.”
उनकी बात सुनकर उसका नन्हा-सा बालमन दुखी हो गया. ढोलक, गीत-संगीत सब मौन हो गए.
“अरे, मुझे ऐसे क्या देख रही है तू… तू नहीं जानती रमा इन अछूतों के छूने से सब अपवित्र हो जाता
है. एक तो तूने वैसे ही अपने ब्याह की हल्दी का शुभ काम इससे करवाकर बहुत बड़ा अपशकुन करवा लिया ऊपर से वो लड़की…” कह कर दादी वहां बैठी रमा बुआ की विधवा ननद की तरफ़ देखने लगी, जो हल्दी की रस्म की तैयारी कर रही थीं.
पूर वातावरण एकदम स्तब्ध और मौन हो गया.
“कैसी बातें कर रही हो मां. सुधा जीजी इस घर की बेटी आशू की बुआ है.“

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“अरे, बेटी है तो क्या हुआ है तो विधवा. विधवा भी कभी शुभ काम करे है क्या. इतनी समझ तो होनी चाहिए ना. अब मुझे ही देख, मैं भी तो इसलिए दूर से सब देख रही हूं.” दादी के इतने कड़वे वचनों से सुधा बुआ का हृदय छलनी-छलनी हो गया. आंखें बरबस बह रही थीं. वे चुपचाप उठ कर अपने कमरे में चली गईं. और वो छोटी-सी पूजा… उनकी कामवाली की बेटी, वो तो बेचारी डरी-सहमी, रोई-रोई अपराधिनी-सी एक कोने में खड़ी थी…

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

कीर्ति जैन
कीर्ति जैन

 

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