कहानी- गणित का घर 1 (Story Series- Ganit Ka Ghar 1)

“मुझे ऐसे ही रहने दो, लेखन कर रही हूं. घर के कामकाज भी हैं. अपना इंस्टीट्यूट चलाना आसान नहीं है, बहुत व्यस्त हो जाऊंगी.” फिर आंख मारती हुई बोली, “दो-तीन बच्चे हो जाएंगे, तो उन्हें भी तो मुझे ही संभालना होगा.”

लेकिन गौरव अपनी बात से टस से मस नहीं हुआ, “दूसरी औरतों को छोड़ो, तुम्हें तो अपने स्तर को ऊपर उठाने के बारे में सोचना चाहिए.” कुछ देर ना-नुकुर के बाद सुमन राज़ी हो गई. उस दिन दोनों ने बाहर खाना खाया और रेस्टोरेंट के बाहर लॉन में बैठकर योजना बनाई. कुछ महीने की दौड़-धूप करके पास की दूसरी कॉलोनी में किराए पर भवन लेकर इंस्टीट्यूट खोल दिया. जल्द ही सुमन उसमें मगन हो गई. इसी व्यस्तता में बच्चे की पैदाइश भी टल गई.

सुबह अच्छी-ख़ासी नींद लेनेवाली सुमन ने जल्दी उठने और जल्दी सोने का संकल्प ले ही डाला. रविवार के दिन चाहती, तो देर तक सो सकती थी, लेकिन रोज़मर्रा की तरह अपने आप आंख खुल गई. आवाज़ न हो, इसलिए धीरे से स्लीपर पहने और शॉल ओढ़कर बाहर निकल गई. वैसे घर में उसके अलावा था ही कौन, सिवाय उसके पति गौरव के और वह अंदर के कमरे में बेसुध सो रहा था. वह थोड़ा दूर जाकर पार्क में पत्थर के बने स्लैब पर शॉल को रखकर उस पर बैठ गई.

थोड़ी दूर पर दूसरे पत्थर की बेंच देखकर उसे याद आया कि ऐसी ही बेंच कॉलेज की लाइब्रेरी के पीछे के लॉन में भी थी. गौरव से उसकी पहली बार बात वहीं हुई थी. वह एकांत में कुछ नोट्स देख रही थी, तभी नीलिमा और गौरव वहां उससे मिलने आए थे. रंगमंच में रुचि रखने वाले गौरव को कॉलेज के वार्षिक कार्यक्रम में अपने नए प्ले का मंचन करना था. सुमन से कोई अंतरंग परिचय नहीं था, इसीलिए उसे नीलिमा को पकड़ना पड़ा था. वह तो हाथ बांधे खड़ा रहा, नीलिमा ने ही बात शुरू की, “सुमन, प्ले लिख दोगी? ये गौरव है, इसके लिए. एनुअल फंक्शन के लिए.”

“गुड इवनिंग मैम.” गौरव ने हाथ जोड़ दिए याचना के साथ. उसकी तरफ़ बिना देखे सुमन ने नीलिमा से कहा, “तुम जानती हो, मैं जो भी लिखती हूं, वह स़िर्फ सेल्फ सैटिस्फैक्शन के लिए. उसका प्रकाशन या पैसा कमाने से कोई संबंध नहीं है. कॉलेज की मैगज़ीन की बात अलग है.”

“वो तो है, लेकिन गौरव जूनियर है. क्या हम सीनियर्स की ज़िम्मेदारी नहीं कि जूनियर्स की मदद करें.”

वह थोड़ी देर तक चुप रही. सोचा, क्या नई मुसीबत गले पड़ रही है. फिर उसने मन को लचीला किया, “अब तुम कहती हो तो… ठीक है.” गौरव से पूछा, “किस विषय पर प्ले करना है?”

“नई भौतिकवादी स्थितियों में टूटते परिवारों को संजोने की थीम चुनी है.”

“तुमने क्या अनुभव किया?”

“मैंने…! मैम, मेरा तो अभी विवाह भी नहीं हुआ… अनुभव कैसे…”

थोड़ी-सी हंसी आई सुमन के चेहरे पर, लेकिन क्षण भर को. फिर बोली, “ठीक है तीन दिन बाद नीलिमा को दे दूंगी, इससे ले लेना.”

एनुअल फंक्शन में प्ले ने सर्वाधिक अंक बटोरे, तो गौरव और सुमन के बीच संबंधों का सूत्रपात-सा हो गया. बाद के दिनों में प्ले की मांग दूसरे संस्थानों में भी बढ़ती गई. प्ले का तानाबाना ही कुछ ऐसा था कि हर वर्ग को पसंद आ रहा था. आख़िर कौन चाहता है परिवार का टूटना और कौन नहीं चाहता है टूटते परिवार को बचाए रखना? बाद में सुमन ने गौरव के लिए कुछ और प्ले लिखे. कुछ में तो मंचन में भी वह उसके साथ रही.

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धीरे-धीरे आत्मीयता बढ़ी, तो प्रेम का बीज चुपके से मन में घुसकर दिल में पल्लवित हो उठा.

बात पहले कुछ अंतरंग मित्रों और उसके बाद दोनों के घरों तक पहुंची. सब कुछ मिलता-जुलता देख दोनों परिवार सहमत हो गए. कुछ दिनों में गौरव को एक रंगमंच से जुड़ी संस्था में निर्देशक का काम मिल गया. सुमन ने एमएससी के बाद एक कोचिंग इंस्टीट्यूट में पार्ट टाइम जॉब कर लिया. शीघ्र ही चढ़ते सर्दी के मौसम में दोनों का विवाह हो गया. जल्द ही उन्होंने शहर के पॉश इलाके में बनी नई कॉलोनी में लोन लेकर फ्लैट भी ले लिया.

सब कुछ सामान्य चल रहा था सिवाय गौरव के अधिक धन कमाने के जुनून को छोड़कर. इस महत्वाकांक्षा से वशीभूत होकर एक दिन उसने सुमन को सलाह दे ही डाली, “सुमन, मैं समझता हूं हमें आगे बढ़ने के लिए धन की ज़रूरत होगी. तुम अपना कोचिंग इंस्टीट्यूट चलाओ, इस छोटी-सी पराई नौकरी में मिलता ही क्या है.”

“मुझे ऐसे ही रहने दो, लेखन कर रही हूं. घर के कामकाज भी हैं. अपना इंस्टीट्यूट चलाना आसान नहीं है, बहुत व्यस्त हो जाऊंगी.” फिर आंख मारती हुई बोली, “दो-तीन बच्चे हो जाएंगे, तो उन्हें भी तो मुझे ही संभालना होगा.”

लेकिन गौरव अपनी बात से टस से मस नहीं हुआ, “दूसरी औरतों को छोड़ो, तुम्हें तो अपने स्तर को ऊपर उठाने के बारे में सोचना चाहिए.” कुछ देर ना-नुकुर के बाद सुमन राज़ी हो गई. उस दिन दोनों ने बाहर खाना खाया और रेस्टोरेंट के बाहर लॉन में बैठकर योजना बनाई. कुछ महीने की दौड़-धूप करके पास की दूसरी कॉलोनी में किराए पर भवन लेकर इंस्टीट्यूट खोल दिया. जल्द ही सुमन उसमें मगन हो गई.

इसी व्यस्तता में बच्चे की पैदाइश भी टल गई. तब गौरव ने कहा था, “हमें नया जीवन शुरू करना है, पहले ढंग से सेटल हो जाएं, तुम क्या कहती हो?”

“हां, ठीक है, जिसमें तुम राज़ी, उसमें मैं भी.” कितनी सहजता से उत्तर दिया था उसने. जब प्रेम हो, तो विरोध की जगह ही कहां बचती है? दोनों एक ही हो जाएं, तो विरोध करेगा भी कौन?

“सुमन, मुझे अपनी नहीं, तुम्हारी इच्छाओं का ख़्याल रखना है. तुम जैसा चाहो, मैं वही करूंगा.”

“अरे नहीं, मैं भी यही चाहती हूं. जब पैसा ही नहीं होगा, तो आनेवाले बच्चे को भी क्या दे पाएंगे.” सुमन ने गौरव के माथे पर चुंबन जड़ दिया, तो प्रत्युत्तर में गौरव ने उसे बाहुपाश में जकड़ लिया. फिर कुछ समय के लिए दोनों डूब गए प्रेम के अथाह सागर में.

Asalam Kohara

  असलम कोहरा

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