कहानी- गणित का घर 2 (Story Series- Ganit Ka Ghar 2)

बच्चों को देखते ही सुमन को गौरव से दूरी कचोटने लगी. यह क्या हो गया घर को! क्या उसे घर कहा जा सकता है? शायद नहीं, क्योंकि अब घर में ख़ूबसूरत दीवारें हैं, कालीन, पर्दे, सुविधाएं हैं, लेकिन सब बेजान-से हैं. उनका जीवन तो कहीं खो गया है. अब वह घर नहीं, सिर्फ़ और स़िर्फ मकान है और वो दोनों मालिक-मालकिन न होकर अपने ही घर में पेइंग गेस्ट हैं. आत्मनिर्भरता तो मिली, लेकिन बंधन कहीं खो गए थे, वो बंधन जो वैवाहिक जीवन का मुख्य आधार होते हैं और एक-दूसरे की निर्भरता के मोहताज होते हैं. ऐसे बंधन जिनमें बंधकर भी आज़ादी और स्वाभिमान का भास होता है. आत्मनिर्भर बनने और उससे उपजे अहं की संतुष्टि की कितनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ रही थी दोनों को!

इंस्टीट्यूट के चल निकलने पर दोनों की दिनचर्या काफ़ी व्यस्त हो गई. फ्लैट पर आते तो भी वेतन और इंस्टीट्यूट की आमदनी पर चर्चा होती. आगे बढ़ने के लिए गौरव ने कई कंपनियां बदल डालीं और सुमन के इंस्टीट्यूट में भी छात्र-छात्राएं बढ़ गए. आमदनी बढ़ी, तो फ्लैट बेचकर विला ख़रीद लिया. तीन साल ऐसे ही भागदौड़ में बीत गए. लेकिन बीते वर्षों में अगर उन्हें बहुत कुछ मिला था, तो काफ़ी-कुछ खोया भी तो था. धन कमाने के गणित ने विला में सुख-सुविधाएं तो भर दीं, लेकिन बच्चे की किलकारी से घर सूना था.

व्यस्तता और बढ़ती आत्मनिर्भरता ने दोनों के बीच रिश्तों को ठंडा करना शुरू कर ही दिया. बातचीत के लिए समय के अभाव के साथ ही एक-दूसरे पर निर्भर रहने से जुड़ी ज़रूरतों में भी कमी आती जा रही थी. आए दिन छोटी-छोटी बात पर दोनों के बीच पहले बहस, फिर आरोप-प्रत्यारोप और बाद में बोलचाल बंद होने लगी…

इतवार के दिन गौरव ने मूवी देखनी चाही, मन हुआ कि सुमन से पूछ ले, लेकिन हिम्मत नहीं पड़ी. अकेले ही मूवी देखने चला गया. बात खुली, तो दूसरे दिन सुमन ने कोहराम मचा दिया, “तुम समझते हो, मैं अकेले कुछ नहीं कर सकती? मैं तुम्हारी मोहताज नहीं हूं.”

“मैं ही कौन-सा तुम्हारे सहारे जी रहा हूं. ज़्यादातर काम तो ख़ुद ही करता हूं. तुमसे कोई उम्मीद भी नहीं रखता.” गौरव भी झल्ला उठा.

“उम्मीद रखना भी मत, मैंने तो पहले ही अपने दम पर जीने का मन बना लिया है. ख़ुद कमाती हूं और घर-बाहर के सारे अपने काम ख़ुद ही करती हूं, समझे… धौंस किसी और को देना.”

“घर का ख़र्चा कौन चलाता है?”

“आ गए अपने पे? मैं तो जानती ही थी कि तुम्हारे मन में क्या पक रहा है.” ग़ुस्से से बोली सुमन.

सुमन के कर्कश शब्दों ने उसे अंदर तक चीर दिया, “हर बात का ग़लत अर्थ निकालती हो. कुछ तो समझदारी हो…!”

“मैं ग़लत हूं, तो क्यों साथ रख रहे हो इस बोझ को, अलग करो.”

“अगर तुम्हारी यही मर्ज़ी है, तो अपने-अपने ख़र्चे अलग कर लो, मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.” गौरव को भी क्रोध आ ही गया, “शायद इसी से घर में शांति आ जाए.”

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दो दिन बोलचाल बंद रही. इसी बीच गौरव के ऑफिस का दोस्त निखिल आ गया. बात छुपनी तो थी नहीं. कुछ देर औपचारिकता के बाद तू-तू, मैं-मैं शुरू होनी ही थी, हो गई. बात बढ़ी तो निखिल ने समझौता कराने की कोशिश की, लेकिन बातचीत ने बहस का रूप ले लिया. बहुत समझाने पर समझौता तो हुआ, लेकिन ख़र्चे और काम के बंटवारे के बाद ही तय हुआ कि घरेलू सामान की पूरी ख़रीददारी गौरव करेगा, जबकि दूध, गैस, नौकरानी और घर का मेंटेनेंस सुमन के हिस्से में आया.

बंटवारा यहीं तक रहता तो ठीक था, लेकिन संबंधों का यंत्रीकरण इतना बढ़ गया कि धीरे-धीरे प्रेम और केयरिंग में भी शिथिलता आती गई. महीने के पहले सप्ताह में गौरव महीनेभर का सामान लाकर रख देता. बाकी चीज़ें. शर्त के मुताबिक़ सुमन जुटाती. अब जब घर में गणित घुस गया, तो हर बात उसी की नज़र से देखी जाने लगी. ऐसे में जीवन के कई अवसर कहीं खोते चले गए. मूवी देखना, कहीं घूमने जाना, बाहर खाना खाना और यहां तक कि विवाह समारोहों में शामिल होने पर भी ख़र्चे को लेेकर बहस होने लगी. बाद के दिनों में तेज़ बहस के तनाव से बचने के लिए दोनों चुप्पी साधने लगे. मन और उचाट हुआ, तो पहले एक बेड पर अलग-अलग हुए, फिर अलग-अलग बेड और बाद में कमरे भी अलग हो गए.

…सुमन बीते दिनों के ताने-बाने में डूबी थी, तभी कॉलोनी का एक परिवार सामने की बेंच पर बैठ गया.

पति-पत्नी बैठे, तो बेटा-बेटी उनसे छिटक कर झूले पर चढ़ गए. बच्चों को देखते ही सुमन को गौरव से दूरी कचोटने लगी. यह क्या हो गया घर को! क्या उसे घर कहा जा सकता है? शायद नहीं, क्योंकि अब घर में ख़ूबसूरत दीवारें हैं, कालीन, पर्दे, सुविधाएं हैं, लेकिन सब बेजान-से हैं. उनका जीवन तो कहीं खो गया है. अब वह घर नहीं, सिर्फ़ और स़िर्फ मकान है और वो दोनों मालिक-मालकिन न होकर अपने ही घर में पेइंग गेस्ट हैं. आत्मनिर्भरता तो मिली, लेकिन बंधन कहीं खो गए थे, वो बंधन जो वैवाहिक जीवन का मुख्य आधार होते हैं और एक-दूसरे की निर्भरता के मोहताज होते हैं. ऐसे बंधन जिनमें बंधकर भी आज़ादी और स्वाभिमान का भास होता है. आत्मनिर्भर बनने और उससे उपजे अहं की संतुष्टि की कितनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ रही थी दोनों को! न प्रेम, न सहानुभूति, न परवाह और न ही संबंध. क्या सोचा था और क्या हो गया ये? तो क्या एक-दूसरे पर निर्भर बने रहना ही ठीक था? प्रश्‍न कौंधा मन में.

सुमन ने एक बार फिर सामने बैठे परिवार को देखा, तो मन ईर्ष्या और खिन्नता की बजाय प्रफुल्लता से भर गया. उस परिवार में उसे अपना हंसता-खेलता परिवार नज़र आने लगा. ख़ुद-ब-ख़ुद क़दम घर की ओर चल दिए. घर में आते ही लॉबी से कमरे में झांका, गौरव अभी भी बेसुध सोया हुआ था. अचानक उसके मन में गौरव के लिए प्रेम उमड़ पड़ा. उसने उसके पास जाना चाहा, लेकिन जा ना सकी.

Asalam Kohara

असलम कोहरा

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बच्चों को देखते ही सुमन को गौरव से दूरी कचोटने लगी. यह क्या हो गया घर को! क्या उसे घर कहा जा सकता है? शायद नहीं, क्योंकि अब घर में ख़ूबसूरत दीवारें हैं, कालीन, पर्दे, सुविधाएं हैं, लेकिन सब बेजान-से हैं. उनका जीवन तो कहीं खो गया है. अब वह घर नहीं, सिर्फ़ और स़िर्फ मकान है और वो दोनों मालिक-मालकिन न होकर अपने ही घर में पेइंग गेस्ट हैं.
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